Thursday, April 23, 2015

उन्हे ना आना था ना आयेंगे

मुझसे दूर चले गये 


      रोशनी विश्वकर्मा




हमने भी ढूंढा था .
प्यारा प्यारा सा एक मन मीत.
मेरी आवाज़ सुनकर जागता था वो.
जो नाराज़ हो जाऊँ मैं मनाता था वो.
जो वो नाराज़ होता मना लेती मैं.
एक दूजे के गुण अवगुण जोड़ते घटाते, 
कब एक दूजे के दिल तक पहुँचे 
समझ ही ना पायें.
दोनो एक दूजे के धड़कन बनते 
बढाये थे क़दम एक दूजे की तरफ़,
दो कदम उसके थे दो कदम मेरे थे 
कब मेरे कदम मिले उनके कदमों से,
था इंतजार इसका
कब सुने मेरी चलती सांसों के सरसराहट, 
था इंतजार इसका 
अचानक कब मुड़े उनके कदम 
मै समझ ही नही पायी 
आवाज़ दी मगर सुनी नही 
सोचा एक बार तो मुड़ कर 
देखेंगे 
मगर ऐसा नही हुआ
बिना मेरी खता बताये 
मुझसे दूर चले गये 
आज भी खड़ी हूँ इंतजार में 
जानते हुये कि वे किसी और के हैं 
उन्हे ना आना था ना आयेंगे 

Wednesday, April 22, 2015

प्रेमी संग कविता सोती है

टूटे दिल से निकले कविता


टूटे दिल से निकले कविता, दिल की कसक कोमल होती है।
संयोग काल में समय न मिलता, प्रेमी संग कविता सोती है।
विश्वास खून जब यहाँ हुआ था,
महसूसा किया जब फटा हिया था
फोटो सेशन वहाँ था होता,
विश्वास कैसे? तब यहाँ जिया था।
हँसते होंगे आप तो तब भी, आत्मा हमारी आज भी रोती है।
टूटे दिल से निकले कविता, दिल की कसक कोमल होती है।।
आत्मा के जब फटे आवरण,
मुक्ति की चाहत जबती है।
आवरण रहित आत्मा ही तो,
सीप है, जो मोती सेती है।
इच्छाओं के आँगन में तो काँटों की महफिल सजती है।
टूटे दिल से निकले कविता, दिल की कसक कोमल होती है।
हमने सजायी प्यार की महफिल,
इच्छाओं के हाथी ने रौदा,
हमने प्यारा मित्र था खोजा,
उधर से बस हो रहा था सोदा।
कैसे सजाऊँँ? फिर से  महफिल! जगते हम दुनिया सोती है।
टूटे दिल से निकले कविता, दिल की कसक कोमल होती है।

Tuesday, April 21, 2015

ना जाने कब कोई आ कर

टूटे दिल से नही बनती कोई कविता


                  रोशनी विश्वकर्मा




टूटे दिल से नही बनती कोई कविता,

नही जमती रंगों छंदों अलंकारों की महफिल.


विश्वास के टूटे तारों से नही सीलती 


आत्मा के फटे आवरण,


पर कटे परिंदे की तरह


बैठी हूँ मरी इच्छाओं के आँगन में,


जुटा नही पाती हिम्मत 


फ़िर से उड़ने की खुले आसमान में,


डर बैठा है कुंडली मारे,


ना जाने कब कोई आ कर,


फ़िर से पर काट ले जाये 


कर दे लहू लूहान इस कदर,


जनाजे के लिये भी कुछ ना बचे.

नए दौर में बढ़कर लिख लें नई कहानी

छोड़े कल की बातें


छोड़े कल की बातें, कल की बात पुरानी।

नए दौर में बढ़कर  लिख लें नई कहानी।।


बीत गया,  जो बीत गया,  पछताने का ना कोई मतलब।

कहा-सुना बहुत आज तक, दुहराने का ना कोई मतलब।

भिन्न राह के राही हैं हम, वायदों का,  ना कोई मतलब।

समय मिला, अवसर चूके, पछताने का ना कोई मतलब।

राष्ट्रप्रेमी अब आगे बढ़ता, साथ  चले जो वही है रानी।

                     छोड़े कल की बातें, कल की बात पुरानी।


बातों के थे शेर हम केवल, अवसर था, नहीं मिल पाये।

काम-काज का अवसर था जो, हमने केवल गाल बजाये।

वादे मिलन के किए बहुत थे, अवसर पाया पीछे धाये।

पवित्र भाव को अपवित्र समझ, मित्र आपने हम ठुकराये।

काँटों को हम गले लगाते, आप हैं कुसुमों की महारानी।

                      छोड़े कल की बातें, कल की बात पुरानी।


विदा की बेला, विदा करो, शुभकामनाएँ  स्वीकार हमारी।

मन का मीत मिले आपको, जग में पाओ  शोभा न्यारी।

साहस, प्रेम, आत्मविश्वास से, महके तुम्हारी जीवन क्यारी।

पीड़ाएँ सब हमको दे दो, आपको मिले बस सुख की यारी।

राष्ट्रप्रेमी की कठिन डगर है, आप बनें बस सुखों की रानी।

                       छोड़े कल की बातें, कल की बात पुरानी।

Monday, April 20, 2015

आप गये हम अस्त हो गये

पथ के पथिक थे परिचित हो गये,

मन मिलने से हम हर्षित हो गये।

चन्द कदम था साथ हमारा,

चौराहे से ही जुदा हो गये।

राह में देखी थी एक बगिया,

सुगन्ध से उसकी मस्त हो गये।

सपने देखे साथ रहें मिल,

आप गये हम अस्त हो गये।

आप हमें कैसे भूल सकोगे?

हम कविता में व्यस्त हो गये।

Saturday, April 18, 2015

वो लोग करें मुहब्बत की बातें

वो लोग करें मुहब्बत की बातें, जो नहीं अपना वायदा निभाते है।
बिजनिस के लिये घूमते अक्सर, पर नहीं प्रेम के पास जाते हैं।+
जो करते हैं बहुत बड़ी-बड़ी बातें, पर समय का नहीं ख्याल रख पाते हैं।
पुकारे थे आपको ही जानेमन, ठुकराया, इसलिये दूर जाते हैं।

Friday, April 17, 2015

हमारी सांसों से भी आपकी यदि, खुशियाँ कम होती हों।


रंगीनी नहीं जिन्दगी में दिखता नहीं सपना है।

संगिनी ने साथ छोड़ा, कोई दिखता नहीं अपना है।

जिन्दगी धूप मरुस्थल की, स्नेह नीर नहीं आसपास।

इस तपते पथ में पथिक तुझे, अब अकेले ही तपना है।

पल में भूल जायें आप हमें, होगा सरल आपके लिए।

हमें तो पल-क्षण-निमिश क्या? युगों आपका नाम जपना है।

हमारी सांसों से भी आपकी यदि, खुशियाँ कम होती हों।

सौंपतें हैं ये थाती आपकी, हमारे गमों का नहीं नपना है।

जब भी आवाज दोगी हमें, हम खड़ें मिलेंगे आपके दर पर।

गलती नहीं थी, न है, आपकी, ये तो हमारा ही बचपना है।

Tuesday, April 14, 2015

जीवन का उपवन

जीवन का उपवन

लगता है मधुवन

मिलता हो प्रेम

साथ में हो हमदम।


जीवन का उपवन

लगता है गुमशुम

मुष्किलों से डर के,

भागे आप दबा के दुम।

Sunday, April 5, 2015

हाल तुम्हारा पाऊँ किस ठोर

सपने में भी नहीं दिखती आप


सपने में भी नहीं दिखती आप

मुरझाया वो चाँद दिखा दो,

बादलों में छिप जाना आप।


टूटी नहीं हमारी आस

घोड़ी नहीं हमारे पास

फिर भी खोद रहे हम घास।


मरूस्थल में भी दादुर मोर

नीर नहीं हैं मचाये शोर

 हाल तुम्हारा पाऊँ किस ठोर।

Thursday, April 2, 2015

जीवन क्या है?

समझ न पाये



जीवन क्या है? समझ न पाये,

जो भी किया नहीं पछताये।

आपकी यादों में हम जीते,

करतीं क्या हो? जान न पाये।


अवकाशों में खेलो, खाओ,

पिय की बाँहों में सो जाओ।

हम तो केवल सपने देखें,

आज नहीं तो कल मिल जाओ।


आपने भी तो मित्र कहा था,

बड़े प्रेम से हस्त गहा था।

प्रेम नहीं अब क्यों कहती हो?

नयनों से क्यूँ अश्रु बहा था?


मजबूरी का जीवन कैसा?

पशु रस्सी से बँधा हो जैसा।

अपने मन को मुक्त करो,

बतलाना फिर लगता कैसा?

नहीं रह सकता जिन्दा

प्रेम वहाँ



ईर्ष्या,

छल, छद्म,

कपट, धोखा,

अहम्, जिद

स्वार्थ,

रहते जहाँ,

चलती 

घातें-प्रतिघातें

नहीं रह सकता जिन्दा

प्रेम वहाँ।

ये कैसी रीति चलाये बैठे हो

आप ही दूर हुये बैठे हैं 

                                                 

              रोशनी विश्वकर्मा, जमशेदपुर, झारखण्ड


हम तुमसे नही ऐंठें है 

आप ही दूर हुये बैठे हैं 


ये कैसी रीति बनाये हो 


मुझे मनाते मानते 


खुद ही रूठे बैठे हो 


खींच ले गये मुझे अपने 


गलियारे तक 


पर बन्द रखा दरवाजा 


बिना मुझे देखे 


बिना मुझसे मिले 


छोड बैठे गली के कोने में 

कम से कम इतना तो करते 


झरोखा ही खुला छोड़ देते 


झाँक लेती मैं भी अंदर


दे पाती आवाज़ , पर 


भला बताओ तो 


चीत भी आप पट भी आप 


ये कैसी रीति चलाये बैठे हो.

Saturday, March 28, 2015

प्रेम ही गुंजन

प्रेम है समर्पण 
            रोशनी विश्वकर्मा


प्रेम ही सृजन 
प्रेम ही गुंजन 
प्रेम ही प्रकृति 
प्रेम ही संस्कृति 
प्रेम की परिभाषा 
जाने ना रे कोई
अभागा है वो जो 
प्रेम पा कर भी खोय 
प्रेम है धड़कन 
प्रेम है समर्पण 
प्रेम ही ईस्वर 
प्रेम ही पूजा 
इसके बिना 
बेंरंग है दुनिया 
प्रेम के पास ने ही 
बाँधे रखा है 
इंसा को इंसा से 
काश की समझ पाते 
आप और हम 
तो होती ना यूँ दुरी 

आप हम से क्यों ऐठें हैं?

प्रेम
छोटा-साशब्द
कितना हमदर्द।

प्रेम में धोखा,
गवाँ दिया मौका,
लगाया था चौका।

प्रेम बकवास,
टूटी है आस,
बुझती नहीं प्यास।

प्रेम में धक्का,
लगा दिया छक्का,
जमता नहीं थक्का।

प्रेम का रुक्का,
फँसाने का चुग्गा,
रह गया हक्का-बक्का।

साथ पल दो-चार,
यादों का अचार
मिलते नहीं समाचार।

गुपचुप का विचार,
हमने किया प्रचार,
बेवफाई दो-चार।

जीवन की धार,
छलावा था प्यार,
कट गए यार।

लड़ाई-झगड़ा छूटा,
प्रेम का धागा टूटा,
गैर का गड़ गया खूँटा।

दिल को दबाये बैठे हैं,
आपको छुपाये बैठे हैं,
आप हम से क्यों ऐठें हैं?

Sunday, February 22, 2015

हम तो केवल सपने देखें

आज नहीं तो कल मिल जाओ

जीवन क्या है? समझ न पाये,
जो भी किया नहीं पछताये।
आपकी यादों में हम जीते,
करतीं क्या हो? जान न पाये।

अवकाषों में खेलो, खाओ,
पिय की बाँहों में सो जाओ।
हम तो केवल सपने देखें,
आज नहीं तो कल मिल जाओ।

आपने भी तो मित्र कहा था,
बड़े प्रेम से हस्त गहा था।
प्रेम नहीं अब क्यों कहती हो?
नयनों से क्यूँ अश्रु बहा था?

मजबूरी का जीवन कैसा?
पशु रस्सी से बँधा हो जैसा।
अपने मन को मुक्त करो,
बतलाना फिर लगता कैसा?

Wednesday, February 18, 2015

आसूँ हैं मुस्कान के पीछे

घायल करके चली गई तुम


घायल करके चली गई तुम, दवा कौन दे पायेगा?
आसूँ हैं मुस्कान के पीछे, ऐसे कब तक जी पायेगा?
अपने आप को भूल गया मैं,
प्यार में देखो धूल भया मैं।
मैंने सब कुछ सौंप दिया था,
प्यार से फिर भी छला गया मैं।
आपकी जिद मुझको ले डूबी, कौन पार ले जायेगा?
घायल करके चली गईं तुम, दवा कौन दे पायेगा?
जीवन तो हम जी ही लेंगे,
दिए हैं गम वह पी ही लेंगे।
आप को सुखी देख हम पायंे,
वियोग-विश भी पी ही  लेंगे।
अकेले छोड़ा, अकेले रहेंगे, साथ कौन चल पायेगा?
घायल करके चली गईं तुम, दवा कौन दे पायेगा?
आपसे जब भी मुलाकात होगी,
आँखों-आँखों में हर बात होगी।
दीदार आपके होंगे हमें जब,
खुषियों की देखो बरसात होगी।
साथी ही जब साथ रहा ना, गान कौन अब गायेगा?
घायल करके चली गईं तुम, दवा कौन दे पायेगा?

Wednesday, February 4, 2015

हमने कोई और, राह न देखी

बुद्धिमान तू सुख है ढूढ़ती


हम तो केवल प्रेम को जानें,
और कोई भी राह न देखी।
प्रेम राह के पथिक हैं हम तो,
तूने  दिल  की राह न देखी।
बुद्धिमान तू सुख है ढूढ़ती,
दिल ने दुख की राह न देखी।
कठिनाइयों से घबराई तू,
तूने हमारी चाह न देखी।
आदर्शों की बात है करती,
झूँठी, दिल की राख न देखी।
चाह करें क्यूँ? तुझे हम पायें,
मरुस्थल में बरसात न देखी।
चूमा  पहले, फिर ठुकराया,
तेरी अदा, कहीं और न देखी।
तुझे छोड़ हम जायँ कहाँ पर,
हमने कोई और, राह न देखी।

Saturday, January 31, 2015

प्यार हमारा मजाक न समझो

प्यार का नाटक, क्यूँ था खेला?


प्यार हमारा मजाक न समझो,
जी न सकेगें,  तुम्हें भुलाकर।
तुम हो पराई, अब कहती हो,
खेला खेल था, तब बहालाकर।
प्यार का नाटक, क्यूँ था खेला?
हसँती हो अब हमें रुलाकर।
हम तो पागल, दिल की मानें,
तुमने  मारा, यूँ  फुसलाकर।
प्यार  नहीं, यह मानें  कैसे?
समझा दो विश्वास  दिलाकर।
एक बार आओ, फिर जाना,
मौत की नींद में , हमें सुलाकर।

Friday, January 23, 2015

बातें कर ले आँख मिलाकर

बेवफाई ही रहमत तेरी


अब मैं अपनी बात करूँगा,
क्या पाऊँगा तुझे रुलाकर?
मेरे ऊपर हँसी है अब तक,
अपने ऊपर जरा हँसाकर।
बेवफाई ही रहमत तेरी,
अपने साथ तो जरा वफाकर।
खत सारे तू, भले जला दे,
दिल में रखना जरा बचाकर।
हमराही बिन चल लेंगे हम
साथ किसी के राह चलाकर।
सारी धुंध फिर छँट जायेंगी,
बातें कर ले आँख मिलाकर।

Thursday, January 22, 2015

आगामी पुस्तक - पापा मैं तुम्हारे पास आऊँगा

अगली किताब

Monday, January 19, 2015

वियोग हम सहते रहेंगे

आप ना हमको याद करना, याद हम करते रहेंगे।

संयोग का जीवन जीओ तुम, वियोग हम सहते रहेंगे।

शमा को क्या फर्क पड़ता, परवाने जलते, मरें नित,

चमकती रहें आप तो बस, यूँ ही हम जलते रहेंगे।

दूर फेंको, मिलन से इन्कार कर दो, फरियाद हम करते रहेंगे।

खत जलाओ, दूर से इन्कार कर दो, दरियाफ्त हम करते रहेंगे।

चाहत की आग में जलते हुए भी, मिलन की आश में ठण्डे रहें,

ठुकराओ, पहचान से इन्कार कर दो, अर्ज हम करते रहेंगे।

Wednesday, January 14, 2015

प्रेम कितना लाजबाब है

काश!
समझा होता
तुमने प्यार
प्यार का सार
अपनत्व को
मिटाकर
अहम् को भुलाकर
जिद को गलाकर
सुनी होती
पुकार।

काश!
तुमने 
न समझा होता
प्यार को पागलपन
आवारापन 
और सौदा
बन जाते घरौंदा।

काश!
तुमने 
समझा होता
समर्पण 
एक शब्द ही नहीं
भाव है
केवल नहीं 
यह ख्वाब है
समझ पातीं
प्रेम कितना लाजबाब है।

Tuesday, January 13, 2015

स्नान से जब देह भीगी, पयोधरों पर केश छाये,

जागती या सो रही हो, समय व्यर्थ क्यों खो रही हो?
तन को दुलारो, मन को सभाँलो, मुस्कराती रो रही हो?
जिद अब तो छोड़ दो प्रिय, दिल की भी आवाज सुन लो,
बुद्धि तो भरमाती हरदम, अब भी उसको ढो रही हो।

प्यार से जब भी निहारा, हमने समझा तारिका हो।
नयनों में चंचल चाह देखी, हमने समझा सारिका हो।
स्नान से जब देह भीगी, पयोधरों पर केश छाये,
पवित्रता के आवरण में, हमने समझा निहारिका हो।

Sunday, January 11, 2015

हम प्रतीक्षा कर रहे प्रिय, क्या इरादे आपके हैं?

आपके बिना यह दुनियाँ कैसी? हम दुनियाँ को भूल गए।
जीवन में हों, कलियाँ कैसी? हम कलियों को भूल गए।
आपने हमको फेंका उर से, हमने आपको बसा लिया है,
 तन्हाई का राज ये कैसा? हम अपने आप को भूल गए।


हमारे हिय की ये तड़पन ही हमको हरदम बता रही है।
प्रिये! आपको याद हमारी, देखो हर पल सता रही है।
क्यों अपने को पीड़ित करतीं? जिद कर उर को दबा रही हो,
हम यादों में यहाँ हैं जीते, अपने को आप क्यों भुला रही हो?


चाह हमें कभी न थी प्रिय, देह आपकी, पा जाएं।
वक्ष पर, ताले जड़े दो, मसल तोड़, हिय में समाएं।
थिरकती मुस्कान लवों पर, वो अदाए देख पायें,
दिल हमारा कुचल कर भी, आप हमेशा मुस्करायें।

आपको ना पा सके हम, हम तो हर पल आपके हैं।
गले लगे तब आपके थे, ठुकराये हुए भी आपके हैं।
मन में आये सितम ढाओ, मन में आए मुस्कराओ,
हम प्रतीक्षा कर रहे प्रिय, क्या इरादे आपके हैं?

Friday, January 9, 2015

ठोकरें तो आपकी भुला बैठे सब हम

5.12.2007


खड़े हैं हम, जहाँ छोड़ा था आपने।


उर में संजोये जो दिया था आपने।


ठोकरें तो आपकी भुला बैठे सब हम,


यादें हैं शेष अभी, गले लगाया आपने।


Tuesday, January 6, 2015

होठों के गुलाब सदैव खिलते रहें

होठों के गुलाब सदैव खिलते रहें।

आपके नयनों में नगमे मचलते रहें।

आप खुशियों के जाम पल-पल पीओ,

आपकी यादों में जीते हम ढलते रहे।


Monday, January 5, 2015

प्रेम के बदले प्रेम की चाह, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।

प्रेम किया है हमने तुमको, पाने की कोई चाह नहीं है।
प्रेम के बदले प्रेम की चाह, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।
तन-मन-धन से सुखी रहो तुम हमने तो बस इतना चाहा,
शान्त, सुखी, समृद्ध रहो तुम, करें कोई तकरार नहीं है।

तेरा तो सब कुछ तेरा है, पाने की कामना नहीं की।
अपना भी सब कुछ हो तेरा, हमने तो कामना यही की।
गलती से हमने समझा था, तुमको चाहत रही हमारी,
प्रेम, तुमसे मिलना क्या है? वफा की भी कामना नहीं है।

Sunday, January 4, 2015

प्रेम में स्वार्थ घोल, नहीं इसे अपवित्र करूँगा

5.09.2007

प्रेम में स्वार्थ घोल, नहीं इसे अपवित्र करूँगा।
चाहत को पाने की, नहीं मैं कामना करूँगा।
चाहत को चाह मिले, मुहब्बत को राह मिले,
कुचल कर निकले, नहीं कभी मैं आह करूँगा।

जाती हो जिस राह आप, काँटों को मैं साफ करूँगा।
काटाँ चुभा आपको कोई, अपने को नहीं माफ करूँगा।
जरूरत पड़े न आपको कोई, रहूँगा मैं आस-पास,
दुःखों को मैं झेलूँ हरदम, सुख्खों में ना बाँट करूँगा।

Saturday, December 27, 2014

जख्मी दिल दिखाने का, एक मौका देना

5.08.2007

कभी तेरे शहर में आऊँगा मुसाफिर की तरह
बस, एक बार, मुलाकात का, एक मौका देना।
जुदा हो के तुझसे भटका हूँ किस तरह,
जख्मी दिल दिखाने का, एक मौका देना।
तन्हाइयों में सांसे, लेता था किस तरह,
एक बार तुम्हें बताने का,एक मौका देना।
तेरी गलियों में गाऊँगा, शायर की तरह,
एक बार घर में आने का, एक मौका देना।
खुशियों में जानेमन, ना काँटा बनूँ, इस तरह,
मुझे भी मुस्कराने का, एक मौका देना।

Friday, December 26, 2014

उम्मीद है खुश् होंगी आप

5.06.2007

क्षणभर को लहर ने भिगोया
था रावी का किनारा
वर्षो की प्रतीक्षा
डुबकी लगाने को
गहराई में उतरा
तुम्हारा हाथ पकड़ा
न तुम डूबी, न मुझे डूबने दिया
स्नेह नीर को
गन्दा करार देकर
न केवल मुझको
कीचड़ में ढकेल दिया
वरन् स्वयं भी
जहाजों के आकर्षण में
भंवरों में फंस गईं
काश! तुम्हें भंवरों से मुक्त कर पाता।

5.07.2007

दुनियाँ में नहीं बुझती
नेह की प्यास
यहाँ दिखता 
हर चेहरा उदास
हम तो जी रहे हैं
सिर्फ आपकी यादों को ले
उम्मीद है
खुश् होंगी आप
प्रेम की सुगंध से सुगंधित
चहुँ ओर बिखेरती होंगी हास।

Friday, December 19, 2014

बजी अन्तर की शहनाई आस भरी

5.05.2007

गहराई असीमित अंधकार भरी
हाहाकार हरक्षण चीत्कार भरी
खतरों से हताश था चला जाता
आई थी फुहार एक आश भरी

मरूस्थल की रेत मरूमरीचिका भरी
कीचड़ के दल-दल में नहीं गागर भरी
जैसे सागर का रमा ने छुआ गात
बजी अन्तर की शहनाई आस भरी

Thursday, December 18, 2014

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

5.04.2007

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
कब?
कहाँ?
कैसे?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
साल?
दो साल?
या युगों के बाद?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
जवानी?
प्रोढ़ावस्था
या वृद्धावस्था में?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
शारीरिक?
मानसिक?
या आत्मिक रूप से?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
चेतन?
अवचेतन?
या अचेतन?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
नियोजित?
अनियोजित?
या अचानक?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मुझे मालुम है
वश इतना
एक ना एक दिन
एक ना एक पल
मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
तुम भले ही
पहचानने से इन्कार कर देना
कुशल व्यापारी की तरह।

Monday, December 15, 2014

शीतल आग में जलते नित हम, आप अंगारों को भोग रहे हैं

5.02.2007
हर खत पर खामोश चाहत को दबा रही हो।
हर मुस्कराहट में आप आँसू छिपा रही हो।
ना पा सके आपको, कोई गिला नहीं हमको,
दोस्त बनकर क्यूँ? मौत की दवा पिला रही हो।

तुम अपना परिवार संभालो, हम भी तो उसमें ही आते।
मजबूरी में हुईं बेवफा, हम अब भी तुमरे गाने गाते।
तुम हर पल हो साथ हमारे, भले शरीर से पास नहीं हो,
आओ बंधकर आलिंगन में, चुंबन दे दो, दो मदमाते।

5.03.2007
एक बार प्रिय एक बार बस, अपने आलिंगन में बांधो।
गले लगा लो एक बार वश, एक बार बांहों में बांधो।
दिल है तुम्हारा जान भी ले लो, अधरामृत वश हमें पिला दो,
जो तुम चाहो वही करेंगे, एक बार नजरों में बाँधों।

हमें नहीं है अपनी चिन्ता आपकी तड़पन भोग रहे हैं।
संयोग में वियोग आपको शोभित, हम वियोग ही भोग रहे हैं।
नहीं बना सके आपको अपना, हममें ही कुछ कमी रही है।
शीतल आग में जलते नित हम, आप अंगारों को भोग रहे हैं।

दिल में तो बसी हुई हो, आप से, होगी कब मुलाकात हो

5.01.2007

आपने हमको जिलाया, आप ही अब मौत भी दे दो।
साथ नहीं दे सकतीं तो बस अपने हाथों विष ही दे दो।
आप रहो खुश, मिली है मंजिल, पीओ जी भर रस का प्याला,
इस दुनियाँ से हमें विदा कर, तन्हाई से मुक्ति दे दो।

शरीर से ही दूर हो केवल, दिल से हर पल साथ हो।
क्षण भर भी ना भूलें हम, दिन हो या फिर रात हो।
आप ही प्रेरणा प्रेरित करतीं, आगे तब ही हम बढ़ पाते,
दिल में तो बसी हुई हो, आप से, होगी कब मुलाकात हो।

Sunday, December 14, 2014

पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी

बात बड़ी ही अजीब है,
                      रोशनी विश्वकर्मा

बात बड़ी ही अजीब है,  दोस्त 
मैं तुम्हारी बात बनाने का इरादा करती हूँ,
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी 
मुझे दो कदम पीछे धकेल देती है I 
मेरी चाहत मुझे ये कहती है ,
तुम्हे चाहने की एक कोशिश करूँ ,
मन में उठती तो है , 
तुम्हारी चाहत की तरंगे ,
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी ,
पल भर में शांत कर देती है, 
मेरे  मन की उठती उमंगें I 
करना चाहती हूँ तुमसे प्यार, 
पाना चाहती हूँ तुमसे दुलार ,
चाहती हूँ मना लो मुझे ,
जब भी हो जाऊँ मैं नाराज़ ,
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी 
धकेल देती है मुझे दो कदम पीछे.
थाम कर हाथ तुम्हारे  ,
चाहती हूँ पार करना ,
जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्ते I 
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी 
ले जाती है मुझे तुमसे दूर I 
मन के किसी कोने में ,
जा कर  छिप जाती है,
बचपन सी एक इच्छा ,
लग कर तुम्हरे सीने से ,
बांध लूँ तुम्हारे  सांसों की 
डोरी से अपनी सांसे ,
सुन लूँ तुम्हारे धडकनों की संगीत I 
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी 
 मुझे तुमसे दूर जाने को कह देती है,
पर, क्या करूँ अपने दिल का ,
तुम्हरी बाँहों में आने को ,
मचल उठता है I 
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी,
झटक देती है मुझे दूर से ही  I 
काश मना पाती मैं तुम्हारे दिल को .
खोल दो गिरह अपने मन का 
अंदर आने का बता दो रास्ता ,
समा जाने दो मुझे अपने अंदर इस तरह ,
फूल और सुगंध हो जिस तरह I 
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी,
दूर न कर दे मुझे तुमसे 
कही ऐसा न हो ,
ढूढ़ते रह जाएँ तुम और मैं 
एक दूजे की परछाई भी न मिले ,
पर तुम और तुम्हारी नाराज़गी। 
 

जिस राह पर आप चलेंगे, खुद को वहीं विछायेंगे

4.29.2007

गर्मी के अवकाशों का प्रिय आनन्द आप लेते होंगे।
आनन्द और शान्ति के साथ, परिवार में आप रहते होंगे।
सोच-सोच हम खुश होते हैं, आप तो खुश होंगे हर पल,
तन्हाई में हम हर क्षण हैं, कभी तो याद करते होंगे।

समाचार भी यदि पा जाते, हम अपने को क्यूँ तड़फाते।
आपकी खुशियों से ही कुछ पल, अपने आपको हम बहलाते।
पुष्पित होंगी, फल भी लगेगा, शायद हमें भी दिखलाओगी,
तमन्ना यही बस देख सकें हम, गोद आपकी दुलराते।

4.30.2007
भूल से भी यदि हम, यादों में आपकी आयेंगे।
ध्यान से यदि देखोगे तो, हमें अपने पास ही पायेंगे।
सितम आपने किया ही क्या है? कितना भी ठुकरायेंगे।
जिस राह पर आप चलेंगे, खुद को वहीं विछायेंगे।

संग-साथ को पाप कहा, हमें धोखेबाज कह सकती हो।
हमने तो बस ताप सहा है, जितना चाहो दे सकती हो।
आगे कुआ, पीछे खाई, आपने हमको जहाँ है छोड़ा,
पथ तो सारे बन्द हमारे, मुस्कराहट तो दे सकती हो।

Tuesday, December 9, 2014

आप कहेंगे हम जी लेंगे, आपकी खातिर मर जायेंगे

4.28.2007

क्या सचमुच जान आपके दरश नहीं कर पायेंगे।
अपने ही उस गात का कभी, परस नहीं कर पायेंगे।
बस एक बार है दिल की रानी अपना चेहरा हमें दिखा दो,
आप कहेंगे हम जी लेंगे, आपकी खातिर मर जायेंगे।

एक बार आ अंक में बैठो रूप आपका पी जायेंगे।
अधरों का बस जाम पिला दो, मरते हुए भी जी जायेंगे।
गोल उभारों की धड़कन से, जब आप हमें धड़कायेंगे।
हम तो आपके हो ही चुके हैं, आप हमारे हो जायेंगे।

Sunday, December 7, 2014

आपके अधरों के सिवा कोई जाम ना भाए हमें

4.27.2007
प्यार किया है, सौदा नहीं किया, जिसको बदला जा सकता हो।
दिल दिया है, कोई वस्तु नहीं दी, जिसको खरीदा जा सकता हो।
आप तो दिल के ही सौदागर, सस्ता खरीदा, लाभ ले बेचा,
प्रेम किया था, चाहा न कुछ भी, जिसको सहेजा जा सकता हो।

यादें हैं आपकी बस नींद कहाँ आए हमें।
आपके अधरों के सिवा कोई जाम ना भाए हमें।
भूख और प्यास हमारी, आप ले गईं चलते-चलते,
आपके कर कमलों के बिना, खाना कहाँ भाए हमें।

Saturday, December 6, 2014

आशिक हैं आपके जानेमन, कोई शैतान तो नहीं

4.26.2007
आप हमारी रहीं प्रेरणा, अब भी प्रेरित करती हो।
शिक्षार्थी हैं आपके हम तो, अब भी शिक्षित करती हो।
भटक रहे हम, ले नाम लवों पर, पल-पल जीवित करती हो।
आप नहीं, है प्यार आपका, सपनों में, हर रात उतरती हो।

बता देना, हमारे जमीं पै होने से आप परेशान तो नहीं।
बता देना, आपके शुकून के लिए हम हैवान तो नहीं।
यदि अन्त चाहो हमारा, मुस्करा के जहर पिला दो।
आशिक हैं आपके जानेमन, कोई शैतान तो नहीं।

Friday, December 5, 2014

आँखों से हमारी नींद तो, आप चुरा ले गईं

4.25.2007

आँखों से हमारी नींद तो, आप चुरा ले गईं।

आपकी यादों में तड़पें, आप सजा दे गईं।

सोती रहो आप अपने प्रियतम् की बाँहों में,

अकेली जिन्दगानी का, हमें मजा दे गईं।

जिन्दा रहें या मुर्दा, हम आपकी अमानत हैं।

आपकी यादों के घेरे में, हम सही सलामत हैं।

सिर्फ आपके लिए, अपने आप को रख्खे हुए,

कहें नहीं आप कर दी, अमानत में खयानत है।

Wednesday, December 3, 2014

दुनियाँ में मेरे हमदम, कुछ ऐसे भी फूल खिले

4.24.2007
बस मुश्किल यही केवल, आपसे मुलाकात नहीं।

आपकी यादों से मरहूम, हमारी कोई रात नहीं।

हमारे जीने के लिए तो, आपकी यादें ही हैं काफी,

आपकी खुशबू तो है, बस आपका हाथ नहीं।।

राह आपकी चलते हैं हम, आपका केवल साथ नहीं।

कटींली, तीखी धूप में, कुम्लाये, आपका गात नहीं।

दुनियाँ में मेरे हमदम, कुछ ऐसे भी फूल खिले,

जीवन बख्शा खुदा ने उनको, लेकिन खुशबू का साथ नहीं।।