Tuesday, May 18, 2021

सशक्तीकरण का, युग है भाई

 नारी नर पर भारी है

            

सशक्तीकरण का, युग है भाई, नारी नर पर भारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली, घर की पट रानी।

बड़े-बड़ों को, पिलाती पानी।

अप्रसन्न हो गयीं, किंचित भी,

नर को याद दिलाती नानी।

घर ही नहीं, कार्यस्थल पर भी, प्रेम से चलाती आरी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

शिक्षा में अब, नर से आगे।

गुस्से से अब, भूत भी भागे।

नर की इज्जत लूट रही है,

अधिकारों हित, नारी जागे।

अत्याचार सहे थे अब तक, अब नारी की बारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली का खिताब है छोड़ा।

कर्तव्यों से, रिश्ता  तोड़ा।

नर के पीछे दौड़ रही है,

कानून का ले, हाथ में कोड़ा।

नारी को अधिकार मिले सब, नर की जिम्मेदारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।


Sunday, May 16, 2021

सबका अपना-अपना चिंतन

 अपना-अपना राग है

          


सबका अपना-अपना चिंतन, अपना-अपना राग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


अपनी-अपनी ढपली सबकी, अपना-अपना राग।

कोई छल-कपट कर लूटे, कोई करता त्याग।

सीधे-सच्चे पथ पर, चलकर खोज रहा वो शांति,

दूजा दुनिया को, पाने को, करता भागम भाग।

विविधतामयी, विश्व ये देखो, पानी के संग आग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


दाल-रोटी पाकर केवल, वह रहता कितना शांत?

ऐश्वर्य में सुख, ढूढ़ रहा है, दूजा कितना भ्रांत।

प्रगति पथ प्रशस्त कर, दिखाए सबको  राह,

दूजा विध्वंश का बन नायक, जग को करे अशांत।

पिज्जा बर्गर को बिकती वह, इसको भाता साग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


चकाचैंध, रंगीली दुनिया, नहीं होती यहाँ, रात।

जहाँ, प्रेम के नाम पर, बिकते हैं, हर पल गात।

एक सेवा के पथ पर बढ़, देता खुद को त्याग,

दूजा आसमान में उड़ता, करे न, धरणि से बात।

इधर देर तक, नींद न खुलती, उधर भोर ही जाग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


Friday, May 14, 2021

पुदीने की पहचान

 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र युवा कवि  गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित मिट्टी की खुशबू का गान गाती कविता प्रस्तुत है-

खुद का दुख!

                                              गोलेन्द्र पटेल

दुख की दुपहरिया में

मुर्झाया मोथा देख रहा है

मेंड़ की ओर

मकोय पककर गिर रही है

नीचे

(जैसे थककर गिर रहे हैं लोग

तपती सड़क पर...)

और

हाँ,यही सच है कि पानी बिन

ककड़ियों की कलियाँ सूख रही हैं

कोहड़ों का फूल झर रहा है


गाजर गा रही है गम के गीत

भिंड़ी भूल रही है

भंटा के भय से

मिर्च से सीखा हुआ मंत्र

मूली सुन रही है मिट्टी का गान


बाड़े में बोड़े की बात न पूछो

तेज हवा से टूटा डम्फल

ताड़ ने छेड़ा खड़खड़ाहट-का तान


ध्यान से देख रही है दूब

झमड़े पर झूल रही हैं               अनेक सब्जियाँ

(जैसे - कुनरू , करैला, नेनुआ, केदुआ, सतपुतिया, सेम , लौकी...)


पास में पालक-पथरी-चरी-चैराई चुप हैं

कोमल पत्तियों पर प्यासे बैठे पतंगें कह रहे हैं

इस कोरोना काल में

पुदीने की पहचान करना 

कितना कठिन हो गया है


आह!                                     

आज धनिया खोटते-खोटते

खोट लिया मैंने                          

खुद का दुख!


जिंदादिली से जीना है तो

 कांटों में भी खिलना होगा

             

साथ न कोई चल पाएगा, अकेले पथ पर बढ़ना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

सुख-दुख जैसी, कोई चीज ना।

कायरता का, कहीं, पड़े बीज ना।

सबके हैं, अपने-अपने  स्वारथ,

धीरे-धीरे, तुझे पड़े, खीज ना।

साथी भले ही, साथ राह में, सावधान हो चलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

ना कोई अपना, ना है पराया।

मित्र दिखे, हर चेहरा मुस्काया।

विश्वास किया है, जिस पर तूने,

विश्वासघात का, अस्त्र थमाया।

आकर्षण पग-पग, जाल हैं, तुझको, उनसे बचना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

किसी से, करनी नहीं, शिकायत।

पढ़नी नहीं, मुझे, धर्म की आयत।

ठोकर खाकर, पग-पग बढ़ना,

कर्मवीर को, शुभ हैं, सब सायत।

काम बहुत है, समय ढल रहा, समय के साथ, ढलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।


Wednesday, May 12, 2021

जिनको अपना, समझ रहा था

 उनसे ही विष पीना  होगा

              


सब की खातिर, जीकर देखा, खुद की खातिर जीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

परिवर्तन का, दंभ भरा था।

संवेदना का,  दर्द हरा था।

कदम-कदम, ठोकर खाकर भी,

नहीं कभी, संघर्ष मरा था।

अपेक्षा सभी की, पूरी न होतीं, सब कुछ कर, कमीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

लीक से हटकर, चलता है जो।

समाज का कंटक बनता है वो।

उपलब्धि कितनी भी पा ले,

अंत में अकेला, मरता है वो।

करनी नहीं, किसी से आशा, बहाना खुद ही, पसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

अकेले ही, फिर से बढ़ना होगा।

थकान मिटा, फिर चढ़ना होगा।

निराश मिटा, जिंदा दिल बन,

कर्म का पाठ, फिर पढ़ना होगा।

चिंता छोड़, चिंतन भी तज तू, कर्म ही तेरी  हसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।


Tuesday, May 11, 2021

कोई साथ नहीं आता है

 सच की राह पर

          

सच की राह पर

चलने का, 

संकल्प लेकर,

चाहा था,

एक साथी।

चाहा, खोजा,

मनाया, प्रेम किया,

अपने आपको,

लुटाया।


बस,

एक ही इच्छा,

सच की राह पर,

साथी का हाथ पकड़,

जब मुश्किल घड़ी हो,

एक-दूसरे का हाथ जकड़,

साथ-साथ चलेंगे।

सच के पथ को,

नहीं तजेंगे।


मूर्ख था मैं,

ना समझ भी,

समझ न पाया।

सच की राह पर तो,

सच भी, 

साथ छोड़ जाता है।

अपना साया भी,

साथ नहीं आता है।

खुद को खुद का,

साथ भी नहीं भाता है।


कोई मूर्ख पथिक ही,

सच की यात्रा पर,

साथी का गान गाता है।

वास्तविकता तो यही है,

सच के पथ पर,

पथिक को अकेला ही,

चलना होता है।

कोई साथ नहीं आता है।


Monday, May 10, 2021

नर-नारी के एक होने से

 सृष्टि  जन्मती पलती है

            


इक-दूजे से शेयर करके, परिवार की गाड़ी चलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

सहयोग समन्वय से आगे बढ़ के।

साथ-साथ  बढ़,  सीढ़ी चढ़ के।

विकास पथ पर, आगे बढ़ो मिल,

मिट जाओगे, अकेले  अढ़ के।

इक-दूजे की देखभाल कर, प्रेम भावना बढ़ती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

केयरिंग-शेयरिंग, सूत्र यहाँ पर।

पारिवारिक हैं,  मूल्य जहाँ पर।

प्रेम, त्याग, समर्पण, निष्ठा,

साथ में जीते, स्वर्ग वहाँ पर।

छल, धोखा, कपट भावना, परिवार में सबको खलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

प्रेम से देखो, घर महकेगा।

दिखावे से तो, बस बहकेगा।

इक-दूजे हित जीना सीखो,

रोम-रोम फिर से चहकेगा।

ईष्र्या, द्वेष तज, प्रेम भाव से, सूरत घर की बदलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।


Sunday, May 9, 2021

आज सीख वह देता है

 


आखिर वह मेरा बेटा है

      

आज सीख वह देता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


उसके जन्म से बाप बना।

खुद को भूला, ताप बना।

होते हुए भी, अभाव दिए,

मजबूत बने, मैं घात बना।

ज्ञान में, उसे लपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


खेल-खिलोनों से दूर रखा।

वात्सल्य भी, नहीं  चखा।

योग्य बनाने के चक्कर में,

बना नहीं, मैं कभी सखा।

एकान्त ने दिया चपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


वह तकनीक की ओर चला।

जीवन से,  वह दूर  चला।

मोबाइल ही, है बस साथी,

सम्बन्धों से, वह, दूर चला।

बड़ा हुआ, अब  चेता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


संबंधों का,  बंधन तजकर। 

रहना नहीं, कहीं तू फंसकर।

उड़ ले, गगन में, जितना चाहे,

जीवन जीना तू बस हँसकर।

समझे न  कोई हेटा  है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


Monday, May 3, 2021

असफलता संग व्यथा रही

 मेरे जीवन की कथा रही

     


असफलता संग व्यथा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


पीड़ा से पीड़ित था बचपन।

भय से भयभीत था, छुटपन।

किशोर हुआ, अभाव मिले नित,

युवावस्था भी, थी बस ठिठुरन।

अकेलेपन की सजा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


किसी को कुछ भी दे न सका।

साथ आया जो,  वही  पका।

भटकर को ना, राह मिली,

टूटा सपना, पर नहीं थका।

राह ही जिसका, पता रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


राह में कुचली कली मिली।

दुलारा उसको, वही खिली।

राह अलग, उसको था जाना,

नहीं कभी वह, हिली-मिली।

साथ हमारे, बस सजा  रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


आदर्शो की कुछ राह चुनीं।

अपनों की भी, नहीं सुनी।

संघर्ष पथ पर साथ था खोजा,

मिली न अब तक कोई गुनी।

कोशिशों की बस  कज़ा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


Saturday, May 1, 2021

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता

साथ किसी के,  रो न  सके

               

साथ के सपने अपने भी थे, साकार कभी भी हो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

किसी का बुरा, कभी न चाहा।

किसी के दुख में, कहा न आहा।

अनजानों को गले लगाकर,

सबको नेह से, था अवगाहा।

हमने सबको, अपना समझा, पराया किसी को कह न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

धोखे से साथ में हमें फंसाया।

छल-कपट का जाल विछाया।

प्रहार आत्मा पर करने को,

विश्वासघात का अस्त्र चलाया।

षड्यंत्रों से हमको घेरा, सच के सपने,  खो  न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के, रो न  सके।।

हमने सब कुछ, सौंपा जिसको।

उसने  मूरख, समझा  हमको।

हमने सब कुछ खोल दिया था,

उसने सब कुछ छिपाया खुदको।

प्रेम बिना, है खेती सूखी, विश्वास के बीज, बो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के,  रो न  सके।।