Saturday, May 1, 2021

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता

साथ किसी के,  रो न  सके

               

साथ के सपने अपने भी थे, साकार कभी भी हो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

किसी का बुरा, कभी न चाहा।

किसी के दुख में, कहा न आहा।

अनजानों को गले लगाकर,

सबको नेह से, था अवगाहा।

हमने सबको, अपना समझा, पराया किसी को कह न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

धोखे से साथ में हमें फंसाया।

छल-कपट का जाल विछाया।

प्रहार आत्मा पर करने को,

विश्वासघात का अस्त्र चलाया।

षड्यंत्रों से हमको घेरा, सच के सपने,  खो  न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के, रो न  सके।।

हमने सब कुछ, सौंपा जिसको।

उसने  मूरख, समझा  हमको।

हमने सब कुछ खोल दिया था,

उसने सब कुछ छिपाया खुदको।

प्रेम बिना, है खेती सूखी, विश्वास के बीज, बो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के,  रो न  सके।।


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