Tuesday, September 13, 2016

बन्दे मातरम्

माँ भारती हम सब की माता
यही है माता यही विधाता
हम सब इसकी संतान हैं
छाती ठोक गर्व से बोलें
मेरा भारत महान है
यही भाव रहे सीने अपने
हो एक पल भी न कम
लगा भाल पे इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम
बन्दे मातरम ,बन्दे मातरम
फिर कहलाये सोने की चिड़िया
हो कायम यहाँ चैन औ अमन
कर्ज उतारें मिटटी का इसकी
सौ सौ बार इसे करें नमन
लगा भाल पे इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम
बन्दे मातरम ,बन्दे मातरम
सुख समृद्धि का लगायें नारा
तन मन भी चाहे जाए वारा
करें वन्दना चरणों में माँ की
चलो खायें माँ की कसम
लगा भाल पर इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम्
बन्दे मातरम् ,बन्दे मातरम्
आंचल समेटे माँ अपने बच्चे
हैं चार धरम चारों ही अच्छे
देश की खातिर मर मिट जाएँ
अब अपना यही जतन
लगा भाल पर इसकी मिटटी
कहें बन्दे मातरम्
बन्दे मातरम् ,बन्दे मातरम्
दुश्मन जिन्दा नहीं जाने देंगे
आंच न इसपर आने देंगे
इसकी जय जयकार से गूंजें
ये धरती और वो गगन
लगा भाल पर इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम
बन्दे मातरम ,बन्दे मातरम्
न घर है न ही  परिवार हमारा
पंद्रह अगस्त त्यौहार है प्यारा
है संकल्प यही अब अपना
यही अपना एक धरम
लगा भाल पर इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम्
बन्दे मातरम् ,बन्दे मातरम्
खड़े सीमा पर जितने भी जवान
कोई हिन्दू है न है मुसलमान
आँख उठा देखे कोई माँ को
लहू हो जाता इनका गरम
लगा भाल पर इसकी माटी
कहें बन्दे मातरम्
बन्दे मातरम् ,बन्दे मातरम

साहित्यकार  सपना मांगलिक
f-659 agra (up)282005

 email-sapna8manglik@gmail.com

Saturday, September 10, 2016

उठा तिरंगा हाथ में कहें बंदे मातरम

साहित्यकार  सपना मांगलिक
f-659 agra (up)282005
 email-sapna8manglik@gmail.com


बन्दे मातरम्)
1
जुल्म रक्तपात का ,देश के विनाश का
दह्शाती लूटपाट का ,करें खेल अब खत्म
न कोई दुखी हो न हो सीने में कोई गम
करेंगे नाम रोशन इस सरजमीं का हम
उठा तिरंगा हाथ में कहें बंदे मातरम
संसद इस राष्ट्र की मलंग हो गयी
मर्यादा नीती इनदिनों पतंग हो गयी
नेता भी लो देश से महान हो गए
गद्दारों से सांठगाँठ यही काम हो गए
कुर्सी के खटमलों को खींच फैंक डालें हम
विभीषणों की संख्या करें देश से खत्म
उठा तिरंगा हाथ में कहें बंदे मातरम
टूटा है दिल देश का ,इसे आस चाहिए
रग रग में दौढ़ता नया विश्वास चाहिए
जिस सोने की चिड़िया के पर कतरे हैं लोगो
नए पंख देने को उसे तिलक ,सुभाष चाहिए
फिर से रंगेंगे माँ की चुनरी को हम धानी
लिखेंगे अपने खून से फिर शोर्य कहानी
रख पवित्र अग्नि पे कर ,खाते हैं ये कसम
उठा तिरंगा हाथ में कहें बंदे मातरम
एक रात की नही पलों की बात थी नहीं
मिली यह आजादी हमें खैरात में नहीं
कर शीश कई कुर्बान ,इसको पाया है हमने
आजाद भगत की जान इतनी सस्ती थी नहीं
आये जो दुश्मन सामने उन्हें भून डालेंगे
जमा के धौल पीठ पर इन्हें कूट डालेंगे
जिन्दा ही धरती में उन्हें कर देंगे हम दफ़न
उठा तिरंगा हाथ में कहें बंदे मातरम

साहित्यकार  सपना मांगलिक

Tuesday, June 21, 2016

मूर्खता की मिली सजा, नहीं आपका खोट!!

कर्म योगी जो होत हैं, कहां मिलत अवकाश।

मांग किसी से है नहीं, रोटी ना आवास॥


प्रेम भाव में सरसता, ये है आनन्द मूल।

कोई झूठ छिपाव ना, मिटते सारे शूल॥


कल था वह ना आज है, आज का रहे कल।

टेढ़े पथ तू छोड़ कर, सच के साथ जी पल॥


चाह छोड़ तू राह चल, चाह पूरी होत।

चाह तजे राहत मिले, हिय माहि जले जोत॥


प्रेम नाम विस्तार का, जग भी जात समाय।

सीमित करती वासना, दूजा लखा जाय॥


प्रेम पात्र ना खोज तू, कर निज से ही प्रेम|

निजता को विस्तार दे, जग प्रेम निज प्रेम॥


साथ कोई चल सके, तक किसी की राह।

आना तो नीका लगे, बिछड़े निकले आह॥


राही अपनी राह चल, चल अपने ही साथ।

साथ चले वह ठीक है, ना थाम किसी हाथ॥


षड्यन्त्र चालें तेरी, हम समझे हैं आज!

तेरे खातिर हम तजे, सारे साज-समाज॥



विश्वास कर की मूर्खता, सही है हमने चोट!

मूर्खता की मिली सजा, नहीं आपका खोट
!!