Thursday, June 15, 2017

बचें परिवर्तन के दंभ से

संसार में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि कोई भी व्यक्ति अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं है। अधिकांश व्यक्ति असंतुष्टि के साथ जीते हैं। हमारे आसपास की सभी व्यवस्थाएं हमें अधूरी या अपूर्ण लगती हैं। हम कितने भी अज्ञानी या ज्ञानवान हों, हमें लगता है कि संसार में बहुत कुछ सही नहीं चल रहा है। इसे बदलने की आवश्यकता है। हमें अपने मित्रों में बुराई नजर आती हैं, उनके कार्य व व्यवहार में सुधार करने की अनेक संभावनाएं नजर आती है। परिवार में अनेक खामियां नजर आती हैं और प्रतीत होता है कि यदि मैं घर का मुखिया होता तो ऐसा करता। मैं गाँव का प्रधान होता तो ऐसा करता, मैं राज्य का मुखिया होता तो ऐसा करता या मैं देश का प्रधानमंत्री होता तो ऐसा करता। हमें सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में अनेकों खामियां नजर आती हैं। अधिकांश व्यक्तियों के पास ढेरों सुझाव होते हैं, वे अपने सुझावों को दूसरों के लिए उपयोगी समझते हैं और चाहते हैं कि लोग उनके उन विचारों और सुझावों पर काम करें; जिन पर स्वयं उन्होंने कोई काम नहीं किया है।
                असंतुष्टि के भी दो पहलू होते हैं। असंतुष्टि ही उद्यमिता को जन्म देती है। असंतुष्टि ही कार्य करने के लिए प्रेरित कर विकास का आधार बनती है तो दूसरी ओर असंतुष्टि ही निराशा से अवसाद व अपराध की ओर कदम बढ़ाती हैं। कई बार व्यक्ति असंतुष्टि से उपजे अवसाद के कारण आत्महत्या तक कर लेता है। वस्तुतः यह व्यक्ति के ऊपर निर्भर है कि वह असंतुष्टि को किस प्रकार लेता है। असंतुष्टि विकास का आधार बनती है। यदि हम वर्तमान स्थिति से संतुष्ट हो गये तो विकास कैसे करेंगे? प्रसिद्ध गजलकार दुष्यन्त कुमार की भाषा में-
न हो कमीज तो पैरों से पेट ढक लेंगे।
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।।

वास्तविक रूप से विकास के पथ के लिए संतुष्ट हो जाने की प्रवृत्ति किसी भी प्रकार से उचित नहीं कही जा सकती। असंतुष्टि से ही संतुष्टि प्राप्त करने के लिए विकास पथ मिलता है। व्यक्ति असंतुष्टि से संतुष्टि प्राप्त करने के लिए ही जीवन भर कर्मो में लीन रहता है।

                                    क्रमशः जारी..............................................

Thursday, May 18, 2017

काश दूध बन जाती

17.05.17
सुनो,
तुम्हें सिर्फ़
और सिर्फ़ प्रेम-
प्रेम और प्रेम...
ही दिखता है????
मेरी गहरी आँखों की
गहराई में,
डूबते उबरते हो न तुम,
हमेशा
मुझमें,
मुझको ही ख़ोजते रहते हो,,
सदा से ही तुम,
मगर
मैं हमेशा
तुम्हें मिलती हूँ-
उस कटे पेड़ की पीड़ा में
जिसकी छोटी सी टहनी भी
परोपकार को उतावली हो
फल जाती है कुछ फल
मरने से पहले......
मिलती हूँ मैं तुम्हें
उन सूखे स्तनों में
जिनकी चाहत है कि
ख़ून की हर बूँद भी
काश दूध बन जाती
और
एक बच्चा शायद भूखा
न मरता.....
मुझे तुम पाते ही हो हमेशा-
उस बूढ़ी माँ की
फटी बिवाइयों में
जो रिसते दर्द औ' ख़ून को
प्लास्टिक की बोतल का
सहारा दे
किसी तरह लंगड़ाती है.....
सुनो
मेरी आँखों की गहराई में छुपी पीड़ा
तुम क्यों नहीं देखते
कुछ गहरे उतरो न कभी तो
मुझमें तुम
मैं तल पर ही मिलूँगी तुम्हें
कभी पूरा डुबो तो सही,,,,,

शुचि भवि.................        फ़ेसबुक से साभार

Wednesday, May 17, 2017

हम सबको हैं चाहते, सबसे अपनी प्रीति

हम सबको हैं चाहते, सबसे अपनी प्रीति।

अपने दिल पर किसी को, नहीं मिली है जीत॥



स्वार्थ हित है मित्रता, उठात पल में शस्त्र।

गला काटने को यहां, बनाते हैं बस मित्र॥



शत्रुओं के गृह बसें, वहीं रहे आबाद।

साथ चलें वह मित्र है, उनकी ना की माद॥



जो अपना हुआ नहीं, क्यों करता तू याद।

पथ अपने पर चल सखे, ना कोई फ़रियाद॥



अपनी चादर देखकर, अपने पैर पसार।

अपनी कमाई देखकर, रोटी और अचार॥



लूट सके तो लूट ले, खुशियों की बरसात।

चाहत उतनी ही करो, जितनी है औकात॥



जिसके पास जाओगे, मारेगा वह चोट।

सबके अपने हित जुड़े, ना है उनका खोट॥



मित्र का विलोम शत्रु है, पढ़ते आये लोग।

शत्रु मित्र के मध्य भी, होता है कुछ जोग॥



सम्बन्ध किसी से बनें, चार बार तू सोच।

सुरक्षित दूरी पर रहो, वरना आवे मोच॥



जैसे हम हर वस्तु का, नहीं लगाते भोग।

सबसे ना हो मित्रता, सही कहत हैं लोग॥



फ़ेसबुक की है मित्रता, करना ना विशवास।

दूर के ही ये मित्र है, कभी न आयें पास॥


Monday, May 15, 2017

सबकी अपनी राह है, सबकी अपनी चाह

खड़े बीच बाजार में, ना है कोई चाह।

सुन्दर की पहचान ना, चलते हैं बस राह॥



नहीं किसी से प्रेम है, नहीं है कोई भय।

बतियाते सबसे चलो, यही जीवन की लय॥



हम जिस पथ के पथिक है, साथ न कोई आय।

धोखा देकर साथ का, चोट मारकर जाय॥



सबसे गहरा घाव दे, विश्वासघात की चोट।

हमने इसको भी सहा, ना विश्वास को वोट||



केवल पुस्तक मित्र है, राह रही आवास।

साथी आयें, छोड़ दें, अपना यही लिवास॥



साथ हमारे वह चले, जिसको और न चाह।

झूठ कपट को छोड़कर, सच को कहता वाह॥



वर्षों हमें हैं हो गये, पग-पग फ़सते जाल।

फ़सता है वह ही यहां, चलता टेढ़ी चाल॥




हम पर अब तक ना चला, कभी किसी का जाल। 

कोई उसका क्या करे, जो खुद का ही काल॥



नहीं चाह हमको मिलें, धन, पद, यश, सम्बन्ध।

चाह हमारी एक ही, मिले न मन का अन्ध ॥



सबकी अपनी राह है, सबकी अपनी चाह।

धोखा देते फ़िर रहे, स्वयं मिलत है आह॥



Sunday, May 14, 2017

कर्तव्य बिना अधिकार

सुन्दर सुन्दर चाहते, कुकर्म करके लोग।

कर्तव्य बिना अधिकार, वे करते उपभोग॥



जो पाया खोया सभी, ना संचय दरकार।

जो चाहो वह लूट लो, लुटने को तैयार॥



प्रेम सभी से चाहते, ना देने को तैयार।

लेन देन से ही चले, यह जीवन व्यापार॥



हम तो यह हैं चाहते, सबको मिलता प्यार।

चाहने से कुछ होत ना, होता है व्यापार॥








Saturday, May 13, 2017

सीधे पथ पर पथिक यहां, लोग करत हैं घात

सीधे पथ पर पथिक यहां, लोग करत हैं घात।

कुटिल चाल छलना करत, लेते फ़ेरे सात॥



हम ना धोखेबाज हैं, करते नहीं शिकार।

हानि लाभ चिन्तन नहीं, ना करते व्यापार॥



झूठ और छ्ल के लिये, नर-नारी तैयार।

एक दूसरे से कभी, कर न सकत हैं प्यार॥



जो भी धोखादेत हैं, वो है धोखेबाज।

झूठ बोल छलना करें, सजन सजें ना साज॥



दो लाइन में हम करें, आसमान की बात।

फ़ेसबुक पर मिलत यहां, ना किये मुलाकात॥



दोहा छोटा छ्न्द है, हम करत हैं पसन्द।

ना कोई छलना यहां, ना कोई है फ़न्द॥

Thursday, May 11, 2017

जिसको जाना जाय

हमारे साथ चल सके, साथ हमारे आय।

अपना पथ ना हम तजे, जिसको जाना जाय॥



जो सबका ही मित्र है, नहीं किसी का होत।

चन्द और सूरज हुए, कभी किसी की जोत॥



हम साथी थे चाहते, उनकी चाह गुलाम।

लुटकर भी हम बढ़ रहे, करते हुए सलाम॥



कोई अपना ना हुआ, सब स्वार्थ के दास।

सच राही से चाहते, रहे असत के पास॥



मैं पथ का बस पथिक हूं, नहीं कहीं है गेह।

ठोकर से आगे बढ़ा, बाधा बना सनेह॥



ना लाया पाया यहीं, सब कुछ जाऊं छोड़।

जीवन पथ अपने चला, नहीं किसी से होड़॥



स्वारथ हित जो चाहते, नहीं हैं तेरे मित्र।

निस्वार्थ हों यदि शत्रु भी, खींच उन्हीं के चित्र॥



पथ के बाधक मित्र जो, साथ न उनका देख।

शत्रु के सहयोग से तू, लिख विकास आलेख॥



जो मिलता इस राह में, करना ना तू चाह।

अपने पथ तू आगे बढ़ ले, कर ना तू परवाह॥



कुछ करने से मिलत है, कुछ यूं ही मिल जात।

कीया वह अपना रहा, बाकी यूं ही जात॥



जग में सब कुछ मिलत है, जो जिसके है जोग।

जिसने जितना कर लिया, उतना मिलता भोग॥



अपने को न लगाव है, ना कोई है आश।

सच की बस चाहत रही, ना सुननी बकवाश॥



जग में सब मिल जात है, करते हैं जो कर्म।

झूठ बोल छलना करें, मिलती केवल शर्म॥



जो खाई हैं खोदते, गिरते खुद ही लोग।

कुआ खोद ही जगत में, हो जल का उपभोग॥



करवा चौथ व्रत करे, पति का मूल विनाश



धन को ठग हैं लूटते, लुट न सके विशवास।

जो विश्वास को लूटते, कोई आस न पास॥


प्रेम भाव इस जगत में, छीन सके ना कोय।

जिसको है यह मिल गया, चाह और ना होय॥


प्रेम समर्पण करत है, छीन किया बेहाल।

सीधे पथ के पथिक हम, तुम्हारी टेढ़ी चाल॥


धोखा देकर फ़ांसकर, किया बड़ा उपकार।
मोह पाश से छूटकर, कर्म करें साकार॥

चाहा था खुश रख सकें, साथ साथ हो व्यस्त।
छलना कर तुमने किया, सुख्ख हमारा अस्त॥

पत्नी बन कर छल रहीं, पति से खेलें खेल।
यारों संग मस्ती करत, शौक बनात रखेल॥

मस्ती में व्रत करत हैं, मस्ती के उपवास।
करवा चौथ व्रत करे, पति का मूल विनाश॥

झूठ बोलते, ठगत नित, लें ईश्वर का नाम।
धन की खातिर बेचते, इज्जत औ ईमान॥

चाहा था अब करेंगे, कुछ उपयोगी कर्म।
हवन करते हाथ जले, बचा रहे अब चर्म॥

चिन्तन मन्थन व दर्शन, हमारे हुये फ़ेल।
नारी के षडयन्त्र फ़स, चख कानूनी खेल॥

Monday, May 1, 2017

जीते है कह वाह

सब हमको है सीख दें, स्वीकारे ना एक।

हम भी पथ से ना डिगें, यही हमारी टेक॥


पास में हमरे आकर, लूटा करते यार।

सकंट में वो डालकर, कहते करते प्यार॥


प्राण हरन को आ गये, लेत प्रेम का नाम।

ऐसा प्रेम न चाहिये, नहीं प्रेम से काम॥


गले लगा समझत रहे, जिनको अपने मित्र।

लूटन को खींचत रहे, वही हमारे चित्र॥


कदम कदम संकट यहां, कदम कदम है राह।

साथ न कोई चलत है, जीते है कह वाह॥

Sunday, April 30, 2017

शादी बिन भरतार

प्रेम नाम धोखे मिलें, रिश्ते नाम हो लूट।

राष्ट्र नाम कुर्सी तकें, लूटन की फ़िर छूट॥



सती न अब आदर्श है, धन ही है सब सार।

धन देख कर शादी हो,पति को दें फ़िर मार॥



शिक्षा नहीं साक्षर बनें, रटे हुए कुछ तथ्य।

मूल्य हीन मानव हुए, सार हीन हैं कथ्य॥



प्यार बिना विशवास के, शादी बिन भरतार।

धोखे से शादी रचें, बचा मुझे करतार॥



एक छाड़ि दूजा मिला, छोड़ा वो भी यार।

घर के बिन घरनी बनी, न्याय दिया है मार॥



दोहा छोटा छ्न्द है, हमको इससे प्यार।

ज्यों पल में प्रेमी मिले, मिले नहीं भरतार॥

शिक्षक शिक्षा के बिना

नहीं किसी पर पकड़ है, ना कोई अधिकार।

समझ और सम्बन्ध से, उड़ती है पतवार॥


उनका ही स्वागत यहां, जिनको ना है चाह।


जो स्वारथ बस आत हैं, उनको है बस आह॥


गुरु नहीं नौकर फ़िरें, शिष्य नहीं, हैं छात्र।


जग में वो ही मिलत है, जिसका है जो पात्र॥


शिक्षक शिक्षा के बिना, छत्र बिना हैं छात्र।


ज्ञानवान वह बनत है, नहीं ज्ञान का पात्र॥

चाहत चली, चिन्ता चुकी

चाहत चली, चिन्ता चुकी, नहीं रहे अरमान।

जैसे भी हैं ठीक है, ना चाहत सनमान॥


तू सब कुछ अर्पण करे, चाह न फ़िर भी मान।


जो तुझको हैं लूटते, गात प्रेम का गान॥



साथी तू अब खोज ना, खोज न सुख की धार।


साथ न तुझको मिल सके, धोखा दे बस यार॥







Wednesday, April 12, 2017

विश्वासघात की पीड़ा

जांच और बिन विश्लेषण,व्यक्ति करे विश्वास।

विश्वासघात की पीड़ा, हरदम रहती पास॥



हम तो पथ के पन्थी है, नहीं किसी के साज।

राही को ठग लूटते, फ़िर भी बढ़ता काज॥



जो असत्य पथ पर चलें, सरपट उनसे भाग।

साथी कह जो छल करें, मानव तन में काग॥



अपना कह कर जगत में, क्यों बांधत हैं लोग।

जबरन जो है बांधता, ना कोई है जोग॥



धोखे की ठोकर मिले, फ़िर भी बढ़ते लोग।

जीवन भर भी ठगी कर, शाह का ना संयोग॥



मुफ़्त खोर को ना कभी, मिलता जग में चैन।

मखमल पर भी ना कभी, उनके मुदते नैन॥



अपना हम जिसको कहें, ना कोई है मीत।

शिकारी भी शिकार कर, गात प्रेम के गीत॥



विश्वास की ही आड़ ले, धोखा देते लोग।

प्रेम का फ़न्दा बना के, करते ये उपभोग॥



अपना कर्म ही साथी, और न कोई साथ।

झूठे व्यक्ति का बन्दे, चाह न कोई हाथ॥



धोखेबाज राह खड़े, सावधान हो राह।

पैसा ही देव जिनका, प्राण लेत वो चाह॥



साथ की चाहत ना कर, राह ही साथी जान।

दो कदम साथ चल सके, मांगत है वो दाम॥



अपना साथी आप बन, चाह न कोई हाथ।

गले काटने को यहां, चलते हैं बस साथ॥



छियालीस के हो चुके, जीवन रह उस पार।

अनुभव ने है सीख दी, ना कोई है यार॥



शिकारी के फ़न्दे फ़ंसे, बने फ़िर हैं शिकार।

शिकार का मरना भला, सुनता कौन पुकार॥



मित्रता के नाम यहां, बिछे राह में जाल।

सम्बन्धी उसके बने, होत गांठ में माल॥



धोखा खाकर सीख है, सावधान मत सोय।

ठोकर से जो चोट है, पाठ पढ़े सुख होय॥



सोने को अब जात हैं, बीती काफ़ी रात।

फ़ेसबुक ना बात बने, बिन किए मुलाकात॥



Monday, April 10, 2017

ये ही है सच धर्म

 
                                         
किसी और का दोष ना, भोग रहे निज कर्म।

मन की कर कहते रहे, यही हमारा धर्म।।


चेहरे हैं मुस्काते, अन्दर रहे तनाव।

दवा पर्स में रहत है, छल ही करत जनाब।।


शिकवा-शिकायत भूलें, याद रखें बस कर्म।

क्षण-क्षण का उपयोग कर, बढ़ें यही है धर्म।।


लघु जीवन कुछ हाथ ना, हाथ हमारे कर्म।

संचय ना तू कर्म कर, यही धर्म का मर्म।।


धोखा दे, छलना करे, करे न अपना कर्म।

मुफ्तखोर बनकर भला, क्या जीवन? क्या? शर्म।।


झूठ और छल छदम से, नष्ट होत सत्कर्म।

तनाव ही बस मिलत है, जो करते दुष्कर्म।।


अपने बल पर बढ़त हैं, जो करते हैं कर्म।

पल-पल का उपयोग कर, यह विकास का मर्म।।


धोखा दे कर लूटकर, नहीं करत हैं शर्म।

रोम-रोम है छल भरा, घण्टी बजाकर धर्म।।


धर्म की बस बात करत, फैलाते पाखण्ड।

लूटन को तत्पर रहत, कर समाज के खण्ड।।


मन मन्दिर दूषण भरा, खोजे मन्दिर धर्म।

कर्तव्य नहीं, हक चाहिए, बने बात बेशर्म।।


बिना वृक्ष फल चाहिए, सफल बने बिन कर्म।

छल से ही माँगत दुआ, ढीठ बने बेशर्म।।


मन्दिर-मस्जिद छोड़कर, कर ले अपना कर्म।

सबके हित में कर्म कर, ये ही है सच धर्म।।

Sunday, March 26, 2017

चाहो जो तुम लूट लो


चाहो जो तुम लूट लो, दो न प्रेम का घाव।
लुटकर भी जीते रहें, प्रेम घात है दाव॥



वास्तविकता जी सखे, प्रेम मिले ना ख्वाब।
सबसे प्रेम से बातें, बनी रहेगी आब॥



प्रेम नाम धोखे बिछे, होते नित उतपात।
सावधान! विशवास में, होना है आघात॥



प्राण लेत हैं वाम


धोखा दे शादी करत, फ़ैलायें आतंक।
ऊपर से ये श्वेत है, नीचे भरी है पंक॥



सम्बन्धों के नाम यहां,धोखे है अब आम।
कदम-कदम पर सभल तू, प्राण लेत हैं वाम॥



प्रेम नाम धोखे मिलें, जीवन ही है मौत।
एक रहे दूजी मिले, वही कहाती सौत॥



चाहो जो तुम लूट लो, दो न प्रेम का घाव।
लुटकर भी जीते रहें, प्रेम घात है दाव॥



Saturday, February 25, 2017

प्रेम उपकरण ठगी का

ऐसा साथी चाहिए, ऐसी चाहत मित्र।

कुछ न छिपाए, सब सुने, पारदर्शी हो चित्र॥



सच कहने की चाह है, श्रोता चाहूं एक।

सच को कह व सुन सके, मिली न कोई टेक॥



सम्बन्धों की भीड़ में, मिला न मुझको एक।

मन की कह औ सुन सकूं, मिलता कोई नेक॥



प्रेम उपकरण ठगी का, बेच रहे हर रोज।

मैं इसको ढूढ़न चला, पूरी न होती खोज॥



प्रेम नाम पर मिलत हैं, मिलते हैं बस गात।

अन्दर अन्दर कोसते, पीछे करें उत्पात॥

Wednesday, February 22, 2017

सच आत्मा का भोज है, बढ़ता नर का तेज

प्रेम नहीं जग में मिले, नर गरीब यदि होय।

प्रेम जाम जिसने पिया, और अमीर न कोय॥



अन्दर अन्दर काटते, करें प्रेम की बात।

सावधान तू दूर रह, छिप करते हैं घात॥



अपनी धुन में सब लगे, सुनत न कोई बात।

झूठ बोल कर ठग रहे, प्रकट मिलत कह तात॥



सच आत्मा का भोज है, बढ़ता नर का तेज।

झूठ बढ़ाता बोझ है, चिन्ता की सजी सेज॥



सच का ही आंचल गहे, दुश्मन हो संसार।

घर की भी अब चाह ना, धोखे बारंबार॥



ठोकर खाकर सभलते, लगे भले ही चोट।

निर्भय हो विचरण करें, नहीं किया है खोट॥



कर्तव्य कर, फ़ल चाह ना, सस्ता बिकता प्रेम।

प्रेम नाम ठगते यहां, कहते उसको गेम॥

Saturday, January 21, 2017

परिवर्तन की स्वीकारोक्ति ही संतुष्टि का आधार

                                                                                    /डॉ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। यह कहावत अक्सर कही सुनी जाती है। परिवर्तन ही वह शक्ति है, जो प्रकृति के प्रत्येक अंग को नवीनता प्रदान करती है। परिवर्तन ही उत्साह व अभिप्रेरण की शक्ति है। परिवर्तन के परिणामस्वरूप ही प्रत्येक प्राचीन वस्तु नष्ट होकर नवीन को जन्म देती है। प्रत्येक नवीन वस्तु व प्राणी समय के साथ परिवर्तित होकर पुराना होना ही है। नवीनता से पुरातनता निकलती है तो पुरातनता ही नवीनता को जन्म देती है। प्रत्येक वस्तु व प्राणी नवीनता व प्राचीनता के इस चक्र से गुजरते रहते हैं और सृष्टि का यह पहिया इसी प्रकार चलता रहता है। वास्तव में परिवर्तन के फलस्वरूप ही संसार स्थायित्व ग्रहण करता है। यदि मृत्यु न हो तो जीवन एक भार बन जाय, यदि जन्म न हो तो नवीनता का सृजन कैसे होगा? वस्तुतः परिवर्तन ही नवीनता व पुरातनता के साथ मिलकर संसार को आनंददायक बनाते हुए हुए स्थायित्व प्रदान करता है।
आप किसी वन क्षेत्र में जाइए तो देखेंगे कि संपूर्ण बन क्षेत्र में छाटे-मोटे परिवर्तन तो होते रहते हैं किंतु वह लगभग स्थायित्व लिए हुए है। नवीनता और प्राचीनता का सुन्दर संगम देखने को मिलेगा। छोटे-पौधे बड़े होते हुए प्राचीनता की और बढ़ रहे होते हैं तो प्राचीन नवीन पौधों के लिए स्थान रिक्त करने को तैयारी करते देखे जाते हैं। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप  आप किसी देखे हुए वन क्षेत्र में पचास वर्ष बाद भी जायेंगे तो आपको सब कुछ पूर्व की भाँति ही मिलेगा, बशर्ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण आमूलचूल बदलाव न किया गया हो।
आपके दादा-दादी वृद्ध हो रहे हैं। वे बार बार ईश्वर के पास जाने की बात करते दिखाई देते हैं। वास्तव में उनके स्थान को आपके माता-पिता भरने की स्थिति में होते हैं। आप अपने माता-पिता के स्थान को लेने की तैयार हो रहे होते हैं। आनुवांशिकता के कारण आपके दादाजी व आपके पिताजी में बहुत सी समानताएँ भी देखी जाती हैं। शारीरिक कद काठी देखकर कहा जाता है कि फलां व्यक्ति तो हूबहू अपने बाप की तरह है। पारिवारिक संस्कार व परंपरायें भी समानता को सुनिश्चित करने में अपना योगदान देती हैं। आपको आध्यात्मिक क्षेत्र में संसार को क्षणभंगुर कहते हुए मिल जायेंगे, किंतु यह सत्य नहीं है। संसार क्षण भंगुर नहीं वरन स्थाई है। क्षण-क्षण परिवर्तन भले ही होता हो किंतु संसार इसी परिवर्तन के फलस्वरूप अपने मूलरूप में बना रहता है।
इस स्थाई परिवर्तन को स्वीकार करके ही हम आनन्ददायक जीवन बिताते हुए संतुष्ट रह सकते हैं। हम जो है और जहाँ हैं वही और वहीं नहीं रह सकते। हमारे ऊपर समय का प्रभाव हो रहा है। हम प्रगति करें या अवनति दोनों ही परिवर्तन के अंग हैं। परिवर्तन तो समय चक्र का भाग है। हम इसे रोक नहीं सकते किंतु अपने नियंत्रणाधीन कर्मो को दिशा देकर प्रगति या अवनति को निर्धारित कर सकते हैं। हमें किसी पद या स्थान से चिपकने की प्रवृत्ति को त्याग कर अपनी दूसरी पीढ़ी के लिए स्थान खाली करते हुए आगे बढ़ने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसी स्वीकारोक्ति और तैयारी में सुख, आनंद और संतुष्टि का आधार है।