Monday, December 31, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३९

उसका बेटा परीक्षा देकर लगभग 2 बजकर 30 मिनट पर वापस आया। मनोज ने पूरा प्रयत्न किया कि उसका बेटा उसकी चिंताओं को समझ न सके। मनोज ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए दरवाजा खोला। सामान्य होकर बेटे से परीक्षा के बारे में पूछताछ की। किंतु वह बेटा ही क्या ? जो अपने पिता के चेहरे से उसकी चिंताओं को न पढ़ सके। प्रभात मनोज के चेहरे को देखकर ही समझ गया कि कुछ गंभीर बात है। क्योंकि उसे पता था कि उसके पिता छोटी-मोटी बातों से चिंतित नहीं होते। प्रभात ने मनोज से बार-बार पूछा कि पापा बात क्या है? आप परेशान क्यों लग रहे हैं? मनोज ने उसे सब कुछ सामान्य बताकर केवल इतना ही कहा, ’मुझे किसी आवश्यक कार्य से तुरंत बाहर जाना होगा। अतः तुम्हारी बुआ कल यहाँ आ रही है।’
                      मनोज को परेशानी यह नहीं थी कि उसके खिलाफ कोर्ट में केस हो गया है। केस तो होना ही था। यह उसे उसी दिन पता चल गया था, जिस दिन माया पहली बार शादी के नाटक के बाद घर आई थी। यह उसे उसी क्षण लग गया था जिस क्षण उसे पता चला था कि माया अपना मोबाइल लेकर नहीं आई है। यह उसी समय पता चल गया था कि माया ने अपने वायदे के अनुसार अपना बैंक खाता बंद करके उसकी धनराशि अपनी माँ को नहीं दी है। यह उसी दिन पता चल गया था जिस दिन माया ने मनोज के मोबाइल से अपने संदेश मिटाए थे। वास्तविक रूप से माया ने शादी नहीं, मनोज का शिकार किया था। माया और माया के भाई ने सोच-समझकर मनोज को फंसाया था। जबकि मनोज ने अपने प्रोफाइल पर स्पष्ट लिख दिया था कि किसी भी प्रकार का झूठ का मतलब शादी चल नहीं सकेगी। विवाह संबन्ध विश्वास पर टिके होते हैं। विवाह को पवित्र संस्कार कहा जाता है। यदि विवाह की बुनियाद ही झूठ पर आधारित हो तो वह विवाह कैसा? वह तो धोखे, छल व कपटपूर्ण ढंग से किसी का शिकार करना ही हुआ ना? अतः यह तो पहले दिन से ही तय था कि माया ने मनोज के साथ नेक इरादे से शादी न की थी। 
                        ऐसी शादी के बड़े खतरनाक परिणाम होते हैंे। शादी के बाद तथाकथित पत्नी अपने प्रेमियों के साथ मिलकर पति की हत्या इस ढंग से करती है कि वह आत्महत्या या दुर्घटना लगे और पत्नी पति की संपत्ति को अपने कब्जे में करके मौजमस्ती भरा जीवन बिता सके। इस तरह की घटनाएं आये दिन अखबारों में और पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। टेलीविजन पर भी सावधान इंडिया और क्राइम अलर्ट जैसे सच्चाई का दावा करने वाले धारावाहिक भी इस तरह की घटनाओं को दिखाते रहते हैं।  दूसरा रास्ता झूठे मुकदमेबाजी में फसाकर ब्लेकमैलिंग करके रूपये ऐंठना या कोर्ट की सहायता से कानूनों का दुरूपयोग करके अच्छी खासी रकम प्राप्त करना। प्रारंभ में ही माया के षडयन्त्र को मनोज ने समझ लिया था। अतः वह चैकन्ना हो गया था। यदि वह अपने प्रेमियों  के साथ मिलकर मनोज की हत्या भी करवाती तो उसे जेल ही जाना पड़ता। उसके हाथ कुछ न आता। वैसे भी मनोज के बाद प्रभात ही उसका वारिस था। माया के षडयंत्रपूर्वक शादी की बात पता चलते ही मनोज अपने बेटे की सुरक्षा को लेकर अत्यन्त जागरूक हो गया था। अतः माया के पास कोर्ट के माध्यम से अपने इरादों को पूरा करने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता न था। अतः मनोज को अनुमान था कि माया अवश्य ही ऐसा करेगी किंतु इतना जल्दी करेगी? यह उसने न सोचा था। 

Saturday, December 29, 2018

दिखावटी प्रेम के दोहे

शादी हैं धन्धा बनीं, झूठे दहेज के केस।
काली कपट कलंकिनी, पहनें दुल्हन वेश॥
शर्म हया लज्जा बिकी, धन ही है बस सार।
शादी पति के पर्स से, मजे करन को यार॥
शादी को कुछ ओर है, नौकरी को कुछ ओर।
शादी को धन्धा बना, कहत और को चोर॥
सम्बन्धों को बेचते, रिश्तों का व्यापार।
छल,कपट औ प्रपंच कर, कहते तुमसे प्यार॥
जिसको कुछ ना चाहिये, पास वही अब आय। 
हम पहले ही लुट चुके, पास बचा कुछ नाय॥
धोखे, छल औ कपट से, दिखलाती हैं प्यार।
शादी है धन्धा बनी, ये हैं आधुनिक नार॥
धोखे का ये बीज बो, कपट का डाले खाद।
शादी का नाटक करें, कोर्ट में करें फ़रियाद॥
प्रेम शब्द से अब बचो, जी लो पल दो चार।
प्रेम धोखे का नाम है, करता बण्टा ढार॥
इंसानित है खो गयी, प्यार बना व्यापार।
गला रेत कर कहत हैं, हमको तुमसे प्यार॥

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३८

1 मार्च से बेटे की परीक्षा प्रारंभ हुईं। मनोज ने बड़े प्यार से बेटे को पहली परीक्षा देने भेजा था। बेटा परीक्षा कक्ष में बैठा परीक्षा दे रहा होगा किंतु मनोज उसी के बारे में सोचता हुआ, घर के कामों को निपटा रहा था। बेटे के आने से पहले उसे उसकी इच्छा के अनुसार  भोजन जो तैयार करना था। मनोज रसोई का काम भी लगभग पूरा कर चुका था। वह बेटे की प्रतीक्षा करने लगा। तभी उसके क्वाटर की घण्टी किसी ने बजाई। मनोज ने सोचा इतनी जल्दी उसका बेटा कैसे आ सकता है। अभी तो उसकी परीक्षा का समय भी समाप्त नहीं हुआ है। उसका अनुमान सही था। दरवाजे पर उसका बेटा नहीं डाकिया था। डाकिया एक रजिस्टर्ड पत्र लेकर आया था। मनोज ने डाकिया से पत्र प्राप्त किया। लिफाफे पर ही प्रेषक के स्थान पर न्यायालय की मुहर देखकर वह घबड़ा ही गया। जिसका डर था वही हुआ। आज बेटे का पहला प्रश्न पत्र था। अभी किसी भी प्रकार का तनाव उसकी परीक्षाओं में व्यवधान डालने के बराबर ही था। 
                माया ने अपनी माया दिखा दी थी। उसे मनोज और मनोज के बेटे से क्या मतलब? उसे अपने स्वार्थ की पूर्ति करनी थी और उसका रास्ता तो कोर्ट से होकर ही गुजरता था। मनोज के लिए जीवन का कठिनतम् समय था। जिस बेटे के लिए उसके पिछले पन्द्रह साल सब कुछ सहा है। आज यदि उसे किसी भी प्रकार के तनाव से गुजरना पड़ा तो निसन्देह उसकी परीक्षाओं में उसका निष्पादन प्रभावित होगा। इसके लिए और कोई नहीं स्वयं मनोज ही जिम्मेदार है। मनोज के लिए जिम्मेदारी स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं थी। वह अपनी जिम्मेदारियों से कभी भागने की चेष्टा नहीं की। किंतु प्रश्न यह था कि वह इस समय बेटे के लिए तनाव मुक्त वातावरण किस प्रकार प्रदान कर सकता है?
                                  सबसे पहली बात तो यह थी कि कोर्ट का नोटिस था। वहाँ तो जाना ही था। वहाँ जाने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। ऐसी विकट व अनिवार्य परिस्थिति में उसे अपनी बहन का नाम ही याद आया। एक वही एक ऐसी व्यक्ति है जो उसकी समस्या को समझ सकती है और उसकी अनुपस्थिति में उसके बेटे प्रभात को सभाल सकती है। मनोज के बाद प्रभात का भावनात्मक लगाव किसी से था तो वह प्रभात की बुआ ही थी। मनोज ने तुरंत अपनी बहन को फोन पर तुरंत सारी परिस्थिति बताई और तुरंत प्रभात के पास आने के लिए कहा क्योंकि मनोज को दूसरे ही दिन बरेली के लिए निकलना था। मनोज की बहिन की भी शादी हो चुकी थी। वह स्वतंत्र नहीं थी कि मनोज ने कहा और वह तुरंत चल पड़े। उसे भी अपनी ससुराल से अनुमति की आवश्यकता थी। परेशानी यह भी थी कि मनोज की बहन ससुराल में यह सब बता भी नहीं सकती थी क्योंकि मनोज की आनलाइन शादी की बात वहाँ किसी को मालुम न थी। अब सब कुछ बताने का मतलब हंगामा होना ही था। उस समय ऐसा कुछ करना प्रभात के पास आने में रूकावट ही बनता। अतः प्रभात की बुआ अर्थात मनोज की बहिन ने अपने पति को विश्वास में लेकर ससुराल से अनुमति प्राप्त की और दूसरे दिन ही मनोज के पास आने के लिए तैयार हो गयी। मनोज ने यह सब अपने बेटे के परीक्षा देकर आने से पूर्व ही कर लिया था।

Tuesday, December 25, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३७

मनोज ने बोर्ड कक्षाओं को ध्यान में रखकर अपने बेटे प्रभात की देखभाल के लिए लगभग चार महीने के लिए अर्धवेतन अवकाश ले लिया जिसमें आधा वेतन ही मिलना था। किंतु मनोज को अब वेतन या अपने जाॅब की चिन्ता नहीं थी। जब अपनों के प्राणों पर संकट बन आये तो व्यक्ति अपने प्राणों की चिंता भी छोड़ देता है। जाॅब की तो बात ही क्या है? यहाँ तो अपने बेटे के भविष्य का प्रश्न था। केवल भविष्य ही क्यों? झूठी, धोखेबाज व कपटी लालची औरत कुछ भी कर सकती थी। मनोज का बेटा ही उसका एकमात्र वारिस भी था। ऐसी स्थिति में वह लालची औरत उसके प्राणों के लिए संकट भी बन सकती थी। 

               अपने बेटे के प्राणों की रक्षा के प्रयत्न के बाद अब मनोज अपने बेटे को तनावमुक्त अध्ययन के अवसर भी उपलब्ध करवाना चाहता था। मनोज सभी प्रकार के तनाव के होते हुए भी अपने बेटे को तनावमुक्त माहोल प्रदान करने की हर संभव कोशिश करने लगा। मनोज का बेटा भी काफी समझदार था, वह सब कुछ नजरअंदाज करके अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करके परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त हो गया। मनोज का मानना था कि कम से कम माया प्रभात की परीक्षाओं तक कोई व्यवधान नहीं डालेगी। लेकिन मनोज के मानने से क्या होने वाला था? यदि माया सीधे और सरल मार्ग की पथिक होती तो मनोज को झूठ बोलकर कपटपूर्वक शादी के जाल में ही क्यों फंसाती? सच्ची व समर्पित पत्नी और माँ बनने लायक होती तो शायद अभी तक कुँआरी नहीं बैठी होती? 

               सच्ची व समर्पित पत्नी और माँ की भूमिका निभाती तो मनोज को अपने बेटे की परीक्षाओं के लिए अपने विभाग से अर्ध-वेतन अवकाश क्यों लेना पड़ता? नौकरी-पेशा लोग सामान्यतः वेतन कटवाकर अवकाश लेना अच्छा नहीं मानते। किंतु मनोज का जीवन सामान्य तो न था? सब कुछ असामान्य घटित हो रहा था उसके साथ। उसके साथी उसे समझाते क्यों व्यर्थ में इतने रूपये का नुकसान कर रहे हो। बेटा अब तक जिस प्रकार पढ़ा है। अब भी पढ़ लेगा किंतु मनोज को ही पता था कि उसके बेटे को कितना झेलना पड़ा है? वह समझता था कि बोर्ड की अन्तिम परीक्षा में वह बेटे का जितना ख्याल रख सके उतना ही कम है?

Saturday, December 22, 2018

मन के पऺक्षी

अरमान
         अर्चना पाठक

मन के पंछी उड़
      अरमान बड़ा बाकी है।
धागा रिश्तों का उलझा,
       ताना बुनना बाकी है।
अकेला अकेला रोया खूब,
       हंसना हंसाना बाकी है।
मन के पंछी उड़
      अरमान बड़ा बाकी है।
शिकवे शिकायत बहुत हुए,
      मिलना मिलाना बाकी है।
बीत कर सब रीत गया,
     प्रीत निभाना बाकी है।
मन के पंछी उड़,
       अरमान बड़ा बाकी है।।

                        #होश॑गाबाद

Friday, December 21, 2018

जब से बने हैं हम ओफ़ीसर

 ओफ़ीसर 

                                               डाॅ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जब से बने हैं, हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।
प्यार  प्रेम  की  बातें  भूले, क्रोध  छोड़कर  कूल भये।।
अधीनस्थ ना चाहें हमको।
काम बताते, पी के गम को।  
पास में आने से डरते वे,
फिर भी साथ ले चलते सबको।
अधिकारी हमें घास न डालें, हम उनको हैं फूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
गाना कोई याद न आये।
नियम ही देखो मन पर छाये।
करने कराने के चक्कर में,
हम भी हैं कुछ, हम भरमाये।
ड्यूटी करने के चक्कर में, अधीनस्थों को शूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
सेवा नियमावली में उलझे।
जीवन के ना मुद्दे झुलझे।
पेंशन पाने का चक्कर है,
टीए डीए में भी उलझे।
राष्ट्रप्रेमी हैं जीवन भूले, केवल अब हम टूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
प्रेम नहीं आॅॅफीसर करता।
नफरत का कोई काम नहीं।
खाना-पीना भूलें हैं हम,
रात को भी आराम नहीं।
मनोरंजन की बात छोड़ दो, कविता लिखना भूल गये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।

जवाहर नवोदय विद्यालय, केन्द्रीकोणा, साउथ वैस्ट गारो हिल्स-794106 (मेघालय)
चलवार्ता 09996388169  ई-मेलःsantoshgaurrashtrapremi@gmail.com 
बेब ठिकाना: www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in

Tuesday, December 11, 2018

बेटा! अब है बड़ा हो गया


मना करने पर पास था आता।
साथ में ही था वो सो पाता।
हाथ से मेरे, दूध था पीता,
वरना भूखा था सो जाता।
                अकेले का अभ्यास हो गया।
                बेटा! अब है बड़ा हो गया।
डाॅटा, डपटा, मारा-पीटा।
दूध पिलाया, खिलाया पपीता।
अपनी, उसकी, इच्छा मारी,
चाहा था, बने ज्ञान की गीता।
                 इंटरनेट से विद्वान हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।
मोबाइल ही सार हो गया।
लेपटाॅप से प्यार हो गया।
साथ न उसको भाता है अब,
लगता वह वीतराग हो गया।
                 अपने पैरों खड़ा हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।
संयम का अभ्यास कर रहा।
बचपन बीता, चाव मर रहा।
स्वस्थ रहे बस, यही चाह है,
जग को दे जो, अभी ले रहा।
                 अपने आगे खड़ा हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।

Wednesday, November 7, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम- दीपावली विशेष

नवीन परिस्थितियों में मनोज कोे अपने और अपने बेटे के प्राणों पर संकट दिखाई दे रहा था। यही नहीं वह किसी भी कीमत पर अपने बेटे की पढ़ाई को नुकसान होने देना नहीं चाहता था। उसका बेटा प्रभात बहुत समझदार था और अपने पिता की मजबूरी को समझ रहा था। अतः वह पढ़ने के लिए छुट्टी वाले दिन भी घर (वैसे उस स्थल को घर कहना ही गलत होगा, वह तो मनोज और उसके बेटे के लिए प्रताड़ना स्थल में परिवर्तित हो चुका था।) से निकलकर विद्यालय में जाकर पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ने लगा। जो मनोज अपने बेटे को एक पल के लिए अपनी नजरों से दूर नहीं होने देता था। उसका बेटा मजबूरी में पढ़ने के लिए पेड़ों के नीचे जा रहा है, यह देखकर वह कितनी पीड़ा का अनुभव करता होगा? इसे कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। मनोज को फिलहाल कैसे भी अपने बेटे प्रभात की सुरक्षा व उसे पढ़ाई के लिए वातावरण उपलब्ध करवाने की चिंता थी। मनोज का क्वाटर तनाव का चैम्बर बन चुका था, जहाँ केवल और केवल माया की मनमर्जी चल रही थी। बेटे को बोर्ड की परीक्षायें देनी थीं। परीक्षायें इतनी निकट थीं कि चाहकर भी मनोज अपने बेटे को किसी अन्य स्कूल में नहीं भेज सकता था। परीक्षाओं तक अपने बेटे को पास रखना मनोज के लिए मजबूरी थी। अतः मनोज ने किसी प्रकार कुछ महीनों के लिए माया को उसके मायके भेजने का विचार बनाया। किंतु समस्या यह थी कि माया को इसके लिए तैयार कैसे किया जाय? माया का तो उद्देश्य ही मनोज और उसके बेटे को तनाव देकर परेशान करना था।  अतः वह क्यों मानेंगी? इसी उहापेाह में दीपावली निकट आ गयी।

                    मनोज किसी भी प्रकार बेटे की परीक्षाओं को लेकर तात्कालिक रूप से माया को अपने व अपने बेटे से अलग करना चाहता था ताकि उसके बेटे के अध्ययन पर माया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके। मनोज ने काफी-सोच विचार और विचार-विमर्श के बाद दीपावली पर माया को उसके मायके भेजने का रास्ता निकालने का मन बनाया। मनोज ने दीपावली का बहाना लेकर स्वयं और अपने बेटे के साथ अपने पैतृक गृह जाने का कार्यक्रम बनाया। माया और मनोज की शादी मनोज के घरवालों के विरोध के बावजूद हुई थी। अतः माया का वहाँ जाना संभव नहीं था। अतः वह अपने चचेरे भाई के पास गाजियाबाद जाने के लिए तैयार हो गयी। 
                   दीपावली को सामान्यतः लक्ष्मी पूजन का पर्व माना जाता है। घर की लक्ष्मी गृहलक्ष्मी होती है। अतः दीपावली गृहलक्ष्मी के पूजन का दिन होता है, मनोज का ऐसा मानना था। किंतु यहाँ तो अजीब स्थिति थी, कपटपूर्वक षडयंत्र रचकर यहाँ तो गृहलक्ष्मी के पद को एक झूठी, बदमिजजाज राक्षसी ने कब्जा लिया था। जो हर क्षण मनोज व उसके बेटे का रक्त पी रही थी। वह तो आयी ही इस उद्देश्य से थी किसी प्रकार मनोज और उसके बेटे प्रभात को ठिकाने लगाकर उनके पास जो था, उस पर कब्जा कर सके। अतः जैसे-तैसे उस राक्षसी को जाने के लिए तैयार किया। यह मनोज और उसके बेटे की किस्मत ही थी कि वह अपने भाई के पास जाने के लिए तैयार हो गयी। माया के प्रेमी अफजल ने मनोज को आश्वासन दिया था कि कैसे भी एक बार उसे यहाँ भेजिए फिर वह वापस नहीं जायेगी। मनोज यही चाहता था। तात्कालिक रूप से उसे राहत भी मिली। अब उसके बेटे के लिए कम से कम कुछ दिनों के लिए सुरक्षित माहोल सुलभ हो सकेगा। यह सोचकर कुछ आश्वस्त हुआ। किंतु मामला इतना सरल नहीं था। 
                   माया को बेटे की परीक्षाओं तक वापस न आने के लिए तैयार करना लगभग असंभव काम था। दीपावली के तुरंत बाद माया फोन करके वापस आने के लिए दबाब बनाने लगी। अतः मनोज ने माया और अफजल के संबन्धों को उसके भाइ्र्र और चचेरे भाई के सामने रखकर माया को वापस बुलाने से साफ इंकार कर दिया। माया बार-बार फोन करके उसे धमकाने लगी। यही नहीं, माया ने मनोज की माताजी को भी फोन करके धमकाया कि वह सीधी-सादी औरत नहीं है। वह मनोज को जेल की सलाखों के पीछे भेज देगी। मनोज ने माया से अपने बेटे की बोर्ड परीक्षाओं तक किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही न करने के लिए प्रार्थना भी की किंतु माया को मनोज, उसके परिवार और उसके बेटे से क्या लेना-देना था? उसे तो अपने स्वार्थ पूरे करने थे।

Wednesday, October 31, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३५

संसार में शायद ही कोई स्वीकार करे कि मनोज ने केवल अपने बेटे और अपने माता-पिता को सुरक्षित देखभाल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से ही शादी की असफल कोशिश की थी। उसकी इस बात को केवल उसका बेटा प्रभात ही जानता था। मनोज कई वर्षो से अपने बेटे से वायदा करता आ रहा था, ‘शायद अगले वर्ष से तुझे घर के काम-काज अपने आप न करने पड़े।’ मनोज लगातार वैवाहिक वेबसाइटों के माध्यम से जीवन साथी की तलाश कर रहा था। मनोज जानता था कि उसके जैसे विशिष्ट जीवन शैली वाले व्यक्ति के लिए जीवन साथी मिलना मुश्किल है, किन्तु असंभव है यह मानने को उसका मन तैयार न था। इतनी स्पष्टता व सच्चाई से अपनी बात रखने वाला मनोज यह कल्पना नहीं कर सका कि शादी के नाम पर उसके साथ धोखा भी हो सकता है। स्वयं धोखा खाने के बाद भी उसे विश्वास करना मुश्किल ही रहा कि ऐसा भी हो सकता है बल्कि उसके साथ ऐसा हो चुका है। अब भी वह विचार करता है तो यह समझ ही नहीं पाता कि उसके साथ उन लोगों ने इस प्रकार धोखा क्यों किया होगा? कोई झूठ बोलकर कपटपूर्वक किसी से शादी कैसे कर सकता है? कैसे कोई किसी को शिकार बनाने के लिए शादी जैसे पवित्र रिश्ते का प्रयोग कर सकती है? मजेदार बात यह कि वह इस सबके बावजूद प्रेम होने का दावा अभी भी करती है। आई लव यू तो जैसे उसका तकिया कलाम है। शायद! सभी को वह ऐसे ही बोलती होगी। 

ऐसी औरतों के लिए प्रेम केवल मनोरंजन की एक चाल मात्र होता है। ऐसी चालबाज औरतों की संख्या समय के साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है। पहले कभी दहेज के आधार पर महिलाओं का उत्पीड़न होता रहा होगा किन्तु अब समय बदल चुका है और चालू औरतें दहेज विरोधी कानूनों का दुरूपयोग करके केवल  तथाकथित पति का ही नहीं तथाकथित ससुराल के प्रत्येक सदस्य का उत्पीड़न करती हैं और स्वयं अपने यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाती हैं। अब तो घर-घर से ऐसी समस्याएँ सुनने को मिलती हैं। अपनी काली करतूतों को छिपाने के लिए आधुनिक तथाकथित दुल्हनें ससुराल में आते ही अपनी मनमर्जी चलाने लगती हैं। उनकी मनमर्जी में किसी प्रकार की बाधा आने पर दहेज का केस लगाने की धमकी देती हैं। केस, कचहरी और बदनामी के डर से सामान्यतः लोग ऐसी औरतों की ब्लेकमेलिंग में फंसकर नारकीय जीवन को स्वीकार कर लेते हैं। मनोज को इस प्रकार का नारकीय जीवन स्वीकार नहीं था। उसका मानना था कि प्रति दिन मृतवत जीवन जीने से अच्छा है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार की कुर्बानी दी जाय। घुट-घुट कर जीवन जीने से तो अच्छा है कि एक बार में ही मृत्यु को गले लगा लिया जाय। मनोज के मन में माया के षडयंत्र में फंसने के बाद कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया किन्तु उसके लिए ऐसा करना संभव ही न था। आत्महत्या को वह सबसे निकृष्ट कृत्य समझता था।

अब आॅनलाइन शादी के षड्यंत्र में फसने के बाद मनोज के सामने प्रश्न यह था कि इस कपटजाल से अपने बेटे को किस प्रकार से बचाये। मनोज को केवल अपने बेटे के प्राणों की रक्षा ही नहीं करनी थी वरन उसको विकास के अवसर भी उपलब्ध करवाने थे। मनोज को वर्तमान वातावरण में अपने बेटे को पढ़ाई लिखाई का वातावरण उपलब्ध करवाना असंभव जैसा लग रहा था। जो औरत कपटपूर्वक उसकी तथाकथित पत्नी का दर्जा पा गई थी। वह वास्तव में एक ठग थी जिसने योजनापूर्वक मनोज को फसाया था। इस काम में उसके भाई ने भी उसी का साथ दिया था। मनोज तो नितान्त अकेला था। शादी के नाटक के समय भी मनोज के पास तो अपने गवाह भी न थे। मनोज की तरफ से भी माया के भाई बन्दों ने ही गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे।

Friday, October 19, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३४

मनोज के सामने जिम्मेदारी फिक्स करने का मसला नहीं था। काम न करने के बहाने खोजने वालों में मनोज न था। किस काम के लिए कौन जिम्मेवार है? इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि काम श्रेष्ठतम गुणवत्ता के साथ पूरा हो। मनोज अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने से भागने वाला इंसान भी नहीं था। निसन्देह! अपने बेटे की सुरक्षा व संरक्षा व विकास के अवसर उपलब्ध करवाने के लिए वह ही जिम्मेदार था। तलाक के बाद माता और पिता दोनों की जिम्मेदारी उसकी ही थी। अपनी इसी जिम्मेदारी में सहयोग प्राप्त करने के लिए ही उसने शादी की थी किन्तु वह शादी नहीं, वह तो उसके जीवन को बर्बाद करने का आधार तैयार हो गया था। अब उसके पारिवारिक जीवन का कोई मतलब नहीं रह गया था। परिवार का तो कहना ही क्या? उसके माता-पिता और बेटे का मनोज के साथ रहना लगभग असंभव हो गया था। जिस औरत ने रूपये के लिए शादी की थी, उसके लिए सम्बन्धों का क्या मतलब था? वह औरत कलह प्रिय और अच्छी होने का नाटक करने को तत्पर रहती थी। मनोज के स्थान पर और कोई रहा होता तो शायद आत्महत्या भी कर चुका होता। उस कठिन दौर में यदि मनोज को भी अपने माता-पिता और बहन का साथ न मिला होता तो शायद मनोज परिस्थितियों से पलायन कर चुका होता। माया का वहाँ होना ही मनोज के लिए असह्य और तनाव पैदा करने वाला था। मनोज को नहीं मालुम था कि माया कब क्या कर बैठ? जो स्त्री अपने तथाकथित पति की उपस्थिति में अपने प्रेमी से बात करती हो। उसके बारे में क्या कल्पना की जा सकती है। दूसरी ओर उसका प्रेमी बार-बार वहाँ आकर मनोज से मिलने का आग्रह कर रहा था। 

मनोज का बेटा प्रभात उसके सामने भूखा घूमता रहता था किंतु मनोज कुछ भी करने की स्थिति में नहीं था। इससे ज्यादा वेदना किसी संवेदनशील पिता के लिए क्या हो सकती थी। हाँ! मनोज को उन दिनों को याद करके अभी भी आश्चर्य होता है कि उसके बेटे ने कितनी समझदारी दिखाई और मनोज से कभी किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं की। यहाँ तक कि वह मनोज के तनाव को कम करने का ही प्रयास करता। प्रभात समझता था कि उसका पिता स्वयं कितने तनाव में है। वह यह भी जानता था कि उसका पिता स्वयं भूखा रहकर पूरे दिन काम करता रहता है। ऐसी स्थिति में प्रभात का भी दुःखी होना लाजिमी था। दोनों बाप-बेटे एक-दूसरे से कुछ न कहते थे किन्तु एक-दूसरे की आन्तरिक वेदना को अच्छी तरह से समझते थे। विद्यालय जाने से पूर्व ड्रेस पहने हुए उसका चावल बीनना अभी भी याद आता है। यदि प्रभात चावल बीनकर रखकर नहीं जाता तो माया कीड़ों व पत्थर सहित ही चावल उबालकर रख देती। दिन रात आराम फरमाना, अपने प्रेमी से बातों में मशगूल रहना और मनोज पर व्यंग्य करना माया के प्रतिदिन के कार्य थे। यहाँ तक कि रात को सोने से पहले रसोई में झूठे बर्तनों को साफ करके सोना मनोज की मजबूरी थी। ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मनोज के पारिवारिक जीवन मूल्य आदर्शवाद से प्रेरित थे। पत्नी का गृहणी के रूप में एक देवीय रूप की कल्पना मनोज के मस्तिष्क में थी किंतु यहाँ तो एक राक्षसी आ गयी थी। जो प्रत्यक्ष रूप से खून भले ही न पीती हो किन्तु हर क्षण खून जलाती अवश्य थी। इसके बावजूद दिखावा एक समर्पित पत्नी का करती थी। किसी ने सच ही कहा है बुरा व्यक्ति जब अच्छा होने का दिखावा करता है, तब वह और भी बुरा हो जाता है।

Thursday, October 18, 2018

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३३"

जब से माया मनोज के पास शादी का ड्रामा रचाकर आई थी, तभी से वह स्वयं, उसका बेटा प्रभात और मनोज की माँ सभी परेशान थे। घर घर न रहा था। वह तनाव का अड्डा बन चुका था। माया को कोई काम-धाम तो करना नहीं था। उसका काम तो एक मात्र सभी को परेशान करना ही था। बेटा प्रभात और मनोज की माँ! मनोज की मजबूरी और पीड़ा को समझ रहे थे। अतः उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई शिकायत कभी भी मनोज से नहीं की किंतु मनोज सब कुछ समझ रहा था। वह जब भी घर के काम-धाम और अपनी माँ या अपने बेटे की देखभाल के बारे में माया से बात करने की कोशिश करता। माया स्पष्ट रूप से धमकाने के अन्दाज में कहती किसी ने कोई शिकायत की क्या? अब ऐसी खतरनाक औरत की कोई शिकायत कैसे कर सकता था? मनोज का बेटा प्रभात और मनोज की माँ दोनों बड़ी ही सहनशीलता और धैर्य से काम ले रहे थे। वे दोनों ही मनोज को और दुखी नहीं करना चाहते थे। वे समझ रहे थे कि मनोज अपनी शादी के गलत निर्णय के कारण पहले से ही दुःखी है और अपने कष्टों के बारे में बताकर और दुःखी क्यों करें? जबकि वे दोनों भली प्रकार समझ रहे थे कि माया जैसी दुष्ट, बदमिजाज, शातिर, कपटी और बेशर्म औरत के लिए पारिवारिक मूल्यों का कोई मतलब नहीं था।

               मनोज ने सबसे पहले अपनी माँ को अपने गाँव में भेजने की व्यवस्था की, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी माँ के लिए कोई खतरा पैदा हो। माया के चाल-चलन और उसके व्यवहार से स्पष्ट था कि वह अपने किसी विशिष्ट मकसद और खतरनाक इरादों से कपटपूर्वक शादी रचाकर मनोज के पास आई है। मनोज का यह विचार तब और पक्का हो गया, जब माया अपने प्रेमी अफजल से खुलेआम बातें करने लगी। वह बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए रात के दो-दो बजे तक अपने प्रेमी से बातें करने में मशगूल रहती। इस प्रकार के तनाव भरे माहोल में मनोज के लिए अपने बेटे को पढ़ाई का माहोल देने में समस्या हो रही थी। उसने माया से बात की कि प्रभात का बोर्ड का एग्जाम है, इस प्रकार से उसकी पढ़ाई का नुकसान होगा। माया ने धमकाने के अंदाज में स्पष्ट रूप से कहा कि इसके लिए तुम और केवल तुम जिम्मेदार होगे। मनोज क्या करता? उसके लिए जिम्मेदारी फिक्स करना महत्वपूर्ण नहीं था। उसके लिए महत्वपूर्ण था अपने बेटे के लिए अध्ययन का वातावरण उपलब्ध करवाना और वह वैसा कर नहीं पा रहा था। अतः वह स्वयं ही तनाव में रहने लगा था। अपने बेटे की समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता उसकी समझ नहीं आ रहा था।

Tuesday, October 16, 2018

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३२"‍


मनोज आज जब अपने गुजरे हुए जीवन पर नजर डालता है तो उसे अपने पहले प्रयोग में कोई बुराई नजर नहीं आती। वही परिस्थितियाँ दुबारा उसके जीवन में हों तो शायद सहायता करने से अब भी पीछे नहीं हटेगा। शादी का उसका पहला प्रयोग असफल भले ही रहा हो किंतु उसमें धोखा न था, लालच न था। परिस्थितियों की मजबूरी भले ही रही हो किंतु किसी भी पक्ष की ओर से कोई कपट न था। हाँ! दूसरी बार वह जब वास्तव में शादी करके जीवन संगिनी चाहता था। वह पारिवारिक जीवन जीना चाहता था। वह चाहता था कि उसके बेटे व माँ-बाप की देखभाल में उसकी जीवनसंगिनी सहयोग करे। वह व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में अपने साथ चल सकने वाली जीवनसंगिनी चाहता था। वह चाहता था कि मन, विचार व आचार एक करके वह अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। किंतु व्यक्ति जो सोचता है वही तो नहीं होता। मनोज के साथ भी नहीं हुआ और वह आॅनलाइन मैरिज के ऐसे धंधेबाजों के चंगुल में फंस गया कि उस चक्रव्यूह से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं दिखाई देता।


धोखा देकर कपट पूर्वक शादी करके कोई खुश रहने की कल्पना कैसे कर सकता है? मनोज के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। जब से माया मनोज के पास शादी का नाटक करके आई थी, पहले दिन से ही मनोज के लिए तनाव का वातावरण बन गया था। मनोज को जब मालुम हुआ कि माया अपना मोबाइल लेकर नहीं आई है। उसी से स्पष्ट हो गया था कि दाल में कुछ काला अवश्य है अन्यथा मोबाइल नितान्त व्यक्तिगत उपकरण है और उसे कोई छोड़कर नहीं आता/जाता। ऐसा भी नहीं था कि माया उसे गलती से भूल आई हो। यदि हम मोबाइल गलती से भूल जाते हैं तो वह हमारे परिवार वालों के पास होता है। उसे बन्द नहीं किया जाता। माया तो जानबूझकर अपने मोबाइल को बन्द करके आई थी। शायद नष्ट करके आई थी, क्योंकि बार-बार जोर देने पर उसकी ओर से और उसके भाई की ओर से यही कहा गया कि मोबाइल खराब हो गया है। कोई महिला शादी के बाद अपने मोबाइल को अपने माइके में तभी नष्ट करके आयेगी, जब वह कोई ऐसा धन्धा करती होगी कि ससुराल में मालुम पड़ने के बाद भूचाल आ जाने की संभावना हो या उसके इस प्रकार के फोन काॅल आते हों, जिनको कोई भी सामान्य व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा। इस प्रकार माया के द्वारा अपने मायके में मोबाइल नष्ट करके आना, मनोज के लिए प्रथम साक्ष्य था कि अवश्य ही माया शादी से पूर्व गलत गतिविधियों में लिप्त थी।

मनोज के पास आते ही माया के द्वारा मनोज के मोबाइल से एक-एक करके अपने द्वारा भेजे गये सभी सन्देशों को मिटा देना जिनसे माया की वचनबद्धता प्रकट होती थी। मनोज के लिए तनाव का दूसरा कारण था। माया स्पष्ट रूप से शादी से पूर्व किये गये वायदों से हट गयी थी। वह परिवार के प्रति किसी भी जिम्मेवारी को निभाना तो क्या? उसने मनोज के द्वारा कोई भी सामान न लाने के निर्देश का भी पालन नहीं किया था। मनुष्य की भी क्या विडम्बना है? वह जिसको गलत कहता है, उसी को करने की कोशिश करता है। मनोज ने शादी से पूर्व ही स्पष्ट कर दिया था कि वह माया से या माया के घर वालों से किसी भी प्रकार की कोई वस्तु या धन स्वीकार नहीं करेगा। यहाँ तक कि शकुन के रूप में किसी प्रकार के वस्त्र भी उसे स्वीकार नहीं थे। किन्तु माया और उसके धोखेबाज भाई को तो झूठा नाम भी दिखाना था कि उसने दहेज में बहुत कुछ दिया है। वे कुछ देना भी नहीं चाहते थे और देने का दिखावा भी करना चाहते थे। यदि उन्हें वास्तव में कुछ देना होता तो 40 की उम्र तक माया शादी के बिना नहीं भटक रही होती। बार-बार मना करने के बाबजूद माया न जाने क्या अपने बैगों और कुछ डिब्बों में कुछ न कुछ लेकर आयी। यह मनोज के लिए तनाव का एक और कारण था। जब शादी के पूर्व ही स्पष्ट कर दिया गया था कि कुछ नहीं का मतलब कुछ नहीं, तो माया उसकी आत्मा को घायल करने पर क्यों उतारू थी? और जो स्त्री अपने तथाकथित पति की आत्मा पर ही वार करे वह किसी की पत्नी कैसे हो सकती है?

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३१"


मनोज को न धन चाहिए था, न यश की कामना थी। मनोज जाति व संप्रदाय में भी बिल्कुल विश्वास नहीं करता था। मनोज को धन, पद, संबन्ध या यश किसी की कामना नहीं थी। उसे तो केवल अपने कर्तव्यों के निर्वहन में रूचि थी। इसीलिए वह शादी करना ही नहीं चाहता था। अतः कुवारी लड़की से शादी करने का तो कोई सपना संभव ही न था। उसे परिवार की भी कोई कामना नहीं थी। मनोज को तो ऐसा साथ चाहिए था, जो उससे कभी कुछ न छिपाये। सदैव सच बोले और ईमानदारी के रास्ते का पथिक बनने के लिए तैयार हो। मनोज का यह सपना असंभव था। मनोज के साथ रहने का मतलब निस्वार्थ भाव से जीवनयापन करना। एक महिला ने तो मनोज से स्पष्ट रूप से कह ही दिया था कि जब संन्यासी की तरह जीवन जीना है तो शादी करने का क्या मतलब है? किसी का कुछ भी विचार हो। मनोज अपने रास्ते पर ‘अकेला चलो रे‘ की नीत पर चलने के लिए भी तैयार था। उसके बावजूद उसने इस आशा के साथ कि स्पष्ट बातचीत करने पर शायद कोई उसकी राह की पथिक मिल ही जाय। उसने बेवसाइट पर प्रोफाइल बनाया और वह माया के जाल में फँस गया। शिकारी के जाल में एक बार फँसने के बाद उसके जाल से निकलना मुश्किल ही नहीं होता, लगभग असंभव होता है। यही मनोज के साथ हुआ।

मनोज जब स्नातक का विद्यार्थी था। तभी उसकी कल्पना थी कि वह संप्रदाय, जाति व अन्य किसी वर्गभेद से अलग हटकर किसी ऐसी महिला को जीवनसंगिनी बनायेगा, जो किसी भी जाति की हो, भले ही समाज की परिभाषा में वह बांझ हो। भले ही उसने स्वार्थी बनाने वाली आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त न की हो किंतु जिसमें कुछ करने की ललक हो। जो छल, कपट और झूठ से दूर रहती हो जिसमें प्रदशर्न की भावना न हो। जो सादा व साधारण जीवन जीते हुए न केवल उच्च विचार रखती हो वरन विचारों के अनुरूप उसके कर्म भी हों। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उसने मैरिज ब्यूरो का विज्ञापन देखकर विधवा/तलाकशुदा बांझ महिला से शादी के लिए पत्र भी लिखा था। किंतु उस समय अपरिपक्व विचार को क्रियान्वित करने का साहस मनोज में न था। वह पूरी तरह परिवार के उपर आश्रित था। अतः स्वतंत्र निर्णय नहीं कर सकता था और न ही उस समय शादी की उम्र थी और न ही आवश्यकता। किंतु मनोज के वे विचार समय के साथ धुधले नहीं हुए वरन् और भी प्रखर होते गये और एक दिन दया की भावना में बहकर उसने बिना किसी की स्वीकृति की अपेक्षा किए हुए। एक अनाथ, विजातीय, विधवा व निरक्षर महिला को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। यह अलग बात है कि उसका प्रयोग असफल रहा। असफल रहा यह कहना भी सत्य प्रतीत नहीं होता। उस महिला के साथ उसका तलाक भले ही हो गया हो, किंतु उस महिला का जीवन बदल गया। उस उम्र में जाकर एक निरक्षर महिला मनोज के प्रयासों से पढ़ाई शुरू करके स्नातक, स्नातकोत्तर के बाद शिक्षा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर सकी।

Thursday, September 27, 2018

निष्ठुर नहीं, मनुष्य बनो

हे  मानुष तनधारी!

                          अर्चना पाठक

हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।
कहते तो रहते ही हो साहस करके आज सुनो।।
दया तुम्हारा धर्म है,
मदद तुम्हारा कर्म।
जीवन मूल्य से मनुष्य तुम,
वरना सुंदर चर्म।
गिरने से न डरना तुमको, सत्पथ के तुम पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।

राह कठिन, कंटक पूरित,
लहूलुहान तुम हो भले ही।
पंच तत्व में मिलेगा,
 तन यह सुंदर हो भले ही।
प्रेम में जियो, प्रेम बिखेरो, मानव प्रेम के पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।

स्वारथ में जिए हो अब तक,
संग्रह नहीं अब दान करो।
कर्म करो, मत फल को देखो,
खुद  पर तुम विश्वास करो ।
बाधाओं से नहीं रुकना है, मानवता के तुम पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।
              

होशंगाबाद

Saturday, September 15, 2018

प्रेम की व्यापारी



Friday, September 14, 2018

हिन्दी दिवस के अवसर पर


Thursday, September 13, 2018

जीवन पीछे छूट गया है


Thursday, August 23, 2018

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३०

मनोज ने आदर्शो पर आधारित जीवन जीने का अहम् पाला हुआ था। उसके लिए सच्चाई, ईमानदारी व समाज की सेवा जीवन के उद्देश्य थे। उसे बनावटीपन व प्रदर्शन स्वीकार नहीं था। उसका विचार केवल विचार के लिए नहीं था, उसे कार्यरूप में परिणत करने के लिए था। वह सोचता था कि यदि किसी विचार को कार्यरूप में परिणत नहीं किया जा सकता तो वह विचार नहीं प्रारंभ से ही एक झूठ है। ऐसे झूठे विचारों को तो प्रारंभ में ही त्याग देना चाहिए। लगभग तीन वर्ष तक तो उसने एक राष्ट्रªीय स्तर के सामाजिक संगठन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य भी किया था। बाद में उस संगठन की राजनीतिक गतिविधियों से असंतुष्ट होकर शिक्षा को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। मनोज के लिए शिक्षा आजीविका का साधन मात्र नहीं थी। वरन् सामाजिक परिवर्तन का आधार थी। उसके विचार में स्वास्थ्य व शिक्षा ही मानव की सबसे बड़ी संपत्ति थी। अतः उसने अपने जीवन का आधार ही शिक्षा और स्वास्थ्य को बना लिया। वह कई सामाजिक संगठनों से जुड़ा रहा था। उसने अपने लिए अलग से सामजिक संगठन बनाने का भी प्रयास किया था। अपनी विशिष्ट सोच के कारण ही शादी करने में उसकी कोई रूचि नहीं   थी। उसे लगता था कि कोई स्त्री उसके जीवनपथ की पथिक बनना पसंद नहीं करेगी। उसके घर वाले शादी के लिए जोर देते तो वह स्पष्ट रूप  से इंकार कर देता। अपनी विशिष्ट सोच के कारण ही दया करके एक स्त्री को पत्नी के अधिकार दे दिये और यह विचार नहीं किया कि उसके क्या परिणाम हो सकते हैं? वास्तव में पति-पत्नी एक दूसरे की ताकत या कमजोरी होते हैं। अतः इनका चयन अत्यन्त सावधानी के साथ होना चाहिए। अपने समुदाय से अपनी परंपराओं के अनुसार की गयी शादी कम जोखिमपूर्ण हो सकती है किन्तु वह भी सफल होगी, इसकी कोई गारण्टी नहीं हो सकती। केवल भावनाओं में आकर शीध्रता में इस सन्दर्भ में लिए गये निर्णय आत्मघाती सिद्ध हो सकते हैं। मनोज के साथ भी ऐसा ही हुआ था। उसने शादी करके अपने लिए जीवनसंगिनी प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया था। वास्तव में उसने शादी के लिए कोई प्रयास किया ही नहीं था। उसने पत्नी के पद को उपहार में दे दिया था। 
 कुप्रथाओं व अनावश्यक परंपराओं का मनोज घोर विरोधी था। कुप्रथाओं का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं था। अनावश्यक परंपराओं को तोड़ने में उसे विशेष आनन्द आता था। इस सन्दर्भ में उसने समाज के दबाब को कभी नहीं माना। यही कारण था कि मनोज ने शादी नहीं की थी किंतु जब उसकी मुलाकात ऐसी महिला से हुई जो जीवन से निराश हो चुकी थी। जिसका कोई ठिकाना नहीं था। जिसके घर वालों ने उसे एक आश्रम में जाने के लिए मुक्त कर दिया था। मनोज ने उस महिला से आत्मनिर्भर बनने व पढ़ाई करने का अनुरोध करते हुए उसे उसके इस कार्य में सहयोग करने का आश्वासन दिया। इस सहयोग के क्रम में महिला के प्रस्ताव पर मनोज ने उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।  लोग गलतफहमी में इस शादी को लवमैरिज की संज्ञा दे देते थे। लेकिन ऐसा बिल्कुल न था। इस प्रकार की शादी के लिए परंपरागत विवाह प्रणाली में कोई शब्द ही नहीं मिलता। वास्तव में दया करके पत्नी के अधिकारों को उपहार में दे दिया गया था। वर्तमान में लोग अधिकार ही प्राप्त करते हैं कर्तव्य तो स्वीकार ही नहीं करते। मनोज के साथ भी यही हुआ। उसकी वह पत्नी अधिकारों के प्रति जागरूक होती गयी किंतु अपने कर्तव्य कभी स्वीकार नहीं किये।
वास्तव में यह दया करके सहयोग के लिए की गई शादी थी। मनोज को उस महिला से कुछ भी प्राप्त करने की कामना नहीं थी। मनोज तो उसे केवल देना ही चाहता था। लेकिन क्या देना चाहता था? रूपये, वस्त्राभूषण या अन्य कोई धन संपत्ति नहीं। क्योंकि इन चीजों को मनोज ने कभी कोई महत्व ही नहीं दिया था। मनोज ने जीवन में शिक्षा और स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकताओं में रखा था। मनोज ने इन्हीं दोनों के प्रति जागरूक करके उसे समर्थ और सक्षम बनाने का प्रयास किया। किन्तु वह महिला शादी के बाद ही मनोज को उसके आदर्शो से हटाकर सामान्य व्यक्ति की तरह स्वार्थ पूर्ण गतिविधियों तक सीमित करने की कोशिश करने लगी। मनोज को जिस रास्ते पर चलते हुए वह मिली थी, उस रास्ते पर चलने से रोकने का प्रयास करने लगी। मनोज को अपने जीवन पथ से हटना कतई मंजूर न था। अतः उस महिला के साथ जीवनसाथी के रूप में चलते रहना संभव ही न था। 5 वर्ष के लम्बे विचार-विमर्श और लगभग 2 वर्ष की कानूनी प्रक्रिया के बाद मनोज का उस महिला से तलाक हो गया।

Sunday, August 19, 2018

दहेज़ के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-२९

अफजल दोहरा गेम खेल रहा था। एक तरफ तो वह माया से दिन भर बात करता था,  नहीं, माया अफजल से बात करती थी । यह अफजल का ही कथन था कि वह नहीं माया उसको फोन मिलाती है। बात भी सही थी। माया जिस स्थान पर रह रही थी, उसे लूटने आयी थी। उस स्थान पर उपलब्ध फोन से फोन करके माया का खर्च नहीं हो रहा था। वह अपने प्रेमी से फोन करवा कर उसके खर्चे में वृद्धि क्यों करवाती? दूसरी और अफजल भी क्यों खर्च करता, वह तो माया के साथ भी गेम ही खेल रहा था। वह माया से बदला दे रहा था। उसकी तो पौ बारह थी। नमक लगे न फिटकरी रंग चौखा ही चौखा। माया से प्रेम भरी बातें करके उससे एक एक बात जानकर प्रसन्न होता कि खूब बेवकूफ बन रही है। वह एक और तो माया से अंतरंग बातें करके उसे अपने प्रेम का विश्वास दिलाकर मजे ले रहा था, तो दूसरी ओर मनोज को आश्वासन दे रहा था कि वह उसका पीछा माया से छुड़ा देगा। मनोज से कहता कि वह एक बार मेरे पास आ जाय फिर वह वापस नहीं जायेगी। माया ने मनोज से जो जो छिपाया था, उस सबकी जानकारी अफजल ने मनोज को दी इस कारण मनोज का अफजल की बातों पर आसानी से विश्वास हो गया। मनोज को अफजल से ही माया की वास्तविक जाति का पता चला। अफजल से मिली जानकारी की पुष्टि के लिए माया से जब जाति प्रमाण पत्र माँगा तो वह जाति प्रमाण पत्र लाने में आना कानी करने लगी। जब अधिक जोर देने पर माया ने अपना जाति प्रमाण पत्र उपलब्ध करवाया तो उससे अफजल के दावे की पुष्टि हो गयी। 
माया ने जाति छिपाकर अफजल से शादी की थी। उसका उद्देश्य भी अफजल के द्वारा ही मनोज को बताया गया था। अफजल ने ही स्पष्ट किया कि माया अपने एकमात्र भाई को जी जान से चाहती है। वह माया से आयु में काफी छोटा भी था। उसके अतिरिक्त उसके घर में अन्य कोई पुरूष सदस्य न था। अतः माया ने ही घर परिवार को सभाल रखा था। माया ने घर-घर जाकर ट्यूशन पढ़ाकर रूपया कमाने की कोशिश की थी। अपने छोटे भाई को आर्थिक सहायता कर सके इसी के लिए वह किसी नौकरी करने वाले या व्यवसायी से शादी करना चाहती थी, जो अच्छा खासा कमाता हो। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह कुछ भी कर सकती थी। वह ऐसे आदमी से शादी करने के लिए भी तैयार थी, जिसको पहली पत्नी से बच्चे हों। माया ऐसे व्यक्ति से शादी करने के लिए भी तैयार थी, जो विदेश में रहता हो। माया को वश पैसा चाहिए था, जिससे वह अपने भाई को आर्थिक सहायता कर सके और स्वयं ऐसो-आराम की जिन्दगी जी सके। किन्तु माया की शक्ल-सूरत ठीक न होने के कारण उसकी शादी होना ही मुश्किल हो रहा था। उसके बाबजूद माया की महत्वाकांक्षा कि वह किसी पैसे वाले से ही शादी करेगी। माया की उम्र बढ़ती गयी और वह चालीस को पार कर गयी। माया का पूरा परिवार उसकी शादी को लेकर चिन्तित था। माया दिखाने के लिए मना करती थी कि वह शादी नहीं करेगी। किन्तु माया अपनी महत्वाकांक्षा को शादी के माध्यम से पूरा करना चाहती थी। उसके समुदाय व उसके परिवेश में माया की शादी होना ही संभव नहीं था। महत्वाकांक्षा का पूरा होना तो अलग बात थी। इतनी बढ़ी हुई उम्र पर ऐसी बदसूरत औरत से कौन शादी करता? उसके बावजूद माया को अच्छा खासा कमाने वाला मुर्गा चाहिए था।

Friday, July 27, 2018

कितना मधुर प्रेम है इनका, प्रेम में जान ये लेती हैं

सम्बंधों की आड़ ये लूटें

                    डाॅ संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


कितना मधुर प्रेम है इनका, प्रेम में जान ये लेती हैं।
सम्बन्धों की आड़ ये लूटें, कह कह प्रेम ये देती हैं।।
धन पद से हैं रिश्ते बनातीं।
प्रेम नाम ले ये भरमातीं।
प्रेमी से मिलकर के फिर ये,
पति को पथ से, ये हैं हटातीं।
रिश्तों का अपहरण करके, कानून का सहारा लेतीं हैं।
सम्बन्धों की आड़ ये लूटें, कह कह प्रेम ये देती हैं।।
झूठ, छल और कपट वहाँ है।
प्रेम नाम की चीज कहाँ है?
कानून को हथियार बनाकर,
झूठे केस से लूटें जहाँ है।
दहेज हिंसा के केस बना ये, ब्लेकमेल कर, लेती हैं।
सम्बन्धों की आड़ ये लूटें, कह कह प्रेम ये देती हैं।।
प्रेम और ममता की मूरत।
बनावटी है इनकी सूरत।
सूरत सीरत नहीं है कुछ भी,
खुद को कहतीं, खुद खुबसूरत।
संपत्ति और प्रेमी की खातिर, पति के प्राण हर लेती हैं।
सम्बन्धों की आड़ ये लूटें, कह कह प्रेम ये देती हैं।।

ई-मेलःsantoshgaurrashtrapremi@gmail.com    
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जवाहर नवोदय विद्यालय, महेंद्रगंज(मेघालय)-794106

Saturday, February 24, 2018

मुस्कानों की खेती


                 
मुस्कानों की खेती कर लें, मुस्कानों का व्यापार करें।
सभी हमारे अपने हैं यहाँ, सबको ही हम प्यार करें।।
दो दिन का बस है यहाँ डेरा, 
नहीं लगेगा फिर यहाँ फेरा;
नहीं लेकर कुछ यहाँ से जाना,
फिर क्यूँ करना मेरा तेरा।
नहीं किसी पर दया है करनी, सब अपना अपना काम करें।
मुस्कानों की खेती कर लें, मुस्कानों का व्यापार करें।।
सहानुभूति की नहीं जरूरत,
सबके दिल ही हैं खुबसूरत;
कोई किसी सा नहीं है जग में,
सबकी अपनी अपनी मूरत।
प्राण हरण, कर्तव्य बने यदि, प्रसन्न करें, फिर वार करें।
मुस्कानों की खेती कर लें, मुस्कानों का व्यापार करें।।
राष्ट्रप्रेमी का है यह फण्डा,
नहीं उठाते किसी का झण्डा;
प्यार हमारा सबको मिलता,
सबका गुस्सा करते ठण्डा।
बाँह फैलाकर  करते स्वागत, मिलता नहीं, बस प्यार करें।
मुस्कानों की खेती कर लें, मुस्कानों का व्यापार करें।।

Saturday, January 6, 2018

रुपया ही भगवान है


रुपये हित हैं रिश्ते नाते


                                 डाॅ संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



रुपये हित हैं रिश्ते नाते, रुपया ही भगवान है।
नर-नारी की साध एक है, रुपया ही अरमान है।।
बाजार बड़ा, सब कुछ मिल जाता,
बिकते रिश्ते, बिकता नाता।
रुपये की ताकत सब चाहें,
चिन्ता नहीं, कैसे वह आता।
नारी की इज्जत बिकती है, रुपया उसकी शान है।
नर-नारी की साध एक है, रुपया ही अरमान है।।
रुपये हेतु है हत्या होतीं,
रुपयों से मिले, छिनती रोटी।
रुपया देख होती हैं शादी,
पति को मार, गैरों संग सोती।
छल, कपट, धोखा सब जायज, रुपये का बस मान है।
नर-नारी की साध एक है, रुपया ही अरमान है।।
झूठे केस वकील हैं लड़ते,
रुपयों से गवाह हैं मिलते। 
खिलाड़ियों की बोली लगती,
आस्तीनों में सांप हैं पलते।
धन लूटकर पत्नी कहती, पति नहीं शैतान है।
नर-नारी की साध एक है, रुपया ही अरमान है।।

Friday, January 5, 2018

कृत्रिम प्रेम के गाने हैं

कदम-कदम पर जाल


                    डाॅ संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



धोखा देकर रिश्ते बनाकर, कृत्रिम प्रेम के गाने हैं।
कदम-कदम पर जाल बिछे हैं, आकर्षक बिछे दाने हैं।।
रिश्तों को व्यापार बनाया,
प्रेम नाम ले लूट मचाया;
कानून को हथियार बनाकर,
कपट जाल को कैसा छुपाया?
रिश्तों को ब्राह्मण बन जाते, आरक्षण को, वर्ग पुराने हैं।
कदम-कदम पर जाल बिछे हैं, आकर्षक बिछे दाने हैं।।
घट-घट का पानी पीकर भी,
रानी अनेकों की बनकर भी;
कुआंरी बनकर शादी रचायें,
पत्नी का ढोंग, करें ठगकर भी।
नारी पुरानी, नवेली ठगिनी, देखो नए जमाने हैं।
कदम-कदम पर जाल बिछे हैं, आकर्षक बिछे दाने हैं।।
मर्यादा की, तज दी रेखा,
फंस गये हम, नहीं था देखा;
षड्यंत्र का जाल बिछाकर,
दहेज का केस, कोर्ट में लेखा।
झूठे यहाँ, सच्चे बनते हैं, सच को मिलते ताने हैं।
कदम-कदम पर जाल बिछे हैं, आकर्षक बिछे दाने हैं।।

Thursday, January 4, 2018

उन सब मित्रों को धन्यवाद

मित्रों नव वर्ष पर शुभकामनाओं का दौर रहता है किन्तु मुझे इस प्रकार शुभकामनायें देने की आदत नहीं है। नव वर्ष में लिखी हुई प्रथम कविता आप सभी को समर्पित है-



उन सब मित्रों को धन्यवाद
                      डाॅ संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

घायल हैं हम, चोट सहीं, अनगिनत हम पर हुए वार;
ठोकर से है, गति बढी, साथी हमको, मिले चार;
काम है चलना, चलते हैं हम, दुनिया भले ही करे वार;
जिन-जिनने हैं वार किए, उन सब मित्रों को धन्यवाद।

बीता वर्ष, लघु जीवन बीता, साथ न कोई, मिले यार;
जिस पर, है विश्वास किया, विश्वासघात के सहे वार;
अपने अपने लक्ष्य सभी के, धन-दौलत से जिन्हें प्यार;
झूठे घृणित आरोप लगाये, उन सब मित्रों को धन्यवाद।

जिजीविषा है शेष अभी भी, बार बार हैं हुए प्रहार;
प्रेम कोष आपूरित अब भी, लुटायेंगे हम सबको यार;
देना ही है, कर्म हमारा, चाह नहीं है, मिले प्यार;
जिन-जिनने भी, ठगा है हमको, उन सब मित्रों को धन्यवाद।

धोखा देकर, बनाते रिश्ते, कानून की फिर देते मार;
अजीब प्यार है, देखो इनका, आत्मा पर, करते प्रहार;
नहीं किसी के, बंधन में हम, सबसे करते, बातें चार;
जिन-जिनसे भी मिला हूँ पथ में, उन सब मित्रों को धन्यवाद।