Tuesday, May 18, 2021

सशक्तीकरण का, युग है भाई

 नारी नर पर भारी है

            

सशक्तीकरण का, युग है भाई, नारी नर पर भारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली, घर की पट रानी।

बड़े-बड़ों को, पिलाती पानी।

अप्रसन्न हो गयीं, किंचित भी,

नर को याद दिलाती नानी।

घर ही नहीं, कार्यस्थल पर भी, प्रेम से चलाती आरी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

शिक्षा में अब, नर से आगे।

गुस्से से अब, भूत भी भागे।

नर की इज्जत लूट रही है,

अधिकारों हित, नारी जागे।

अत्याचार सहे थे अब तक, अब नारी की बारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली का खिताब है छोड़ा।

कर्तव्यों से, रिश्ता  तोड़ा।

नर के पीछे दौड़ रही है,

कानून का ले, हाथ में कोड़ा।

नारी को अधिकार मिले सब, नर की जिम्मेदारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।


Sunday, May 16, 2021

सबका अपना-अपना चिंतन

 अपना-अपना राग है

          


सबका अपना-अपना चिंतन, अपना-अपना राग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


अपनी-अपनी ढपली सबकी, अपना-अपना राग।

कोई छल-कपट कर लूटे, कोई करता त्याग।

सीधे-सच्चे पथ पर, चलकर खोज रहा वो शांति,

दूजा दुनिया को, पाने को, करता भागम भाग।

विविधतामयी, विश्व ये देखो, पानी के संग आग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


दाल-रोटी पाकर केवल, वह रहता कितना शांत?

ऐश्वर्य में सुख, ढूढ़ रहा है, दूजा कितना भ्रांत।

प्रगति पथ प्रशस्त कर, दिखाए सबको  राह,

दूजा विध्वंश का बन नायक, जग को करे अशांत।

पिज्जा बर्गर को बिकती वह, इसको भाता साग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


चकाचैंध, रंगीली दुनिया, नहीं होती यहाँ, रात।

जहाँ, प्रेम के नाम पर, बिकते हैं, हर पल गात।

एक सेवा के पथ पर बढ़, देता खुद को त्याग,

दूजा आसमान में उड़ता, करे न, धरणि से बात।

इधर देर तक, नींद न खुलती, उधर भोर ही जाग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


Friday, May 14, 2021

पुदीने की पहचान

 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र युवा कवि  गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित मिट्टी की खुशबू का गान गाती कविता प्रस्तुत है-

खुद का दुख!

                                              गोलेन्द्र पटेल

दुख की दुपहरिया में

मुर्झाया मोथा देख रहा है

मेंड़ की ओर

मकोय पककर गिर रही है

नीचे

(जैसे थककर गिर रहे हैं लोग

तपती सड़क पर...)

और

हाँ,यही सच है कि पानी बिन

ककड़ियों की कलियाँ सूख रही हैं

कोहड़ों का फूल झर रहा है


गाजर गा रही है गम के गीत

भिंड़ी भूल रही है

भंटा के भय से

मिर्च से सीखा हुआ मंत्र

मूली सुन रही है मिट्टी का गान


बाड़े में बोड़े की बात न पूछो

तेज हवा से टूटा डम्फल

ताड़ ने छेड़ा खड़खड़ाहट-का तान


ध्यान से देख रही है दूब

झमड़े पर झूल रही हैं               अनेक सब्जियाँ

(जैसे - कुनरू , करैला, नेनुआ, केदुआ, सतपुतिया, सेम , लौकी...)


पास में पालक-पथरी-चरी-चैराई चुप हैं

कोमल पत्तियों पर प्यासे बैठे पतंगें कह रहे हैं

इस कोरोना काल में

पुदीने की पहचान करना 

कितना कठिन हो गया है


आह!                                     

आज धनिया खोटते-खोटते

खोट लिया मैंने                          

खुद का दुख!


जिंदादिली से जीना है तो

 कांटों में भी खिलना होगा

             

साथ न कोई चल पाएगा, अकेले पथ पर बढ़ना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

सुख-दुख जैसी, कोई चीज ना।

कायरता का, कहीं, पड़े बीज ना।

सबके हैं, अपने-अपने  स्वारथ,

धीरे-धीरे, तुझे पड़े, खीज ना।

साथी भले ही, साथ राह में, सावधान हो चलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

ना कोई अपना, ना है पराया।

मित्र दिखे, हर चेहरा मुस्काया।

विश्वास किया है, जिस पर तूने,

विश्वासघात का, अस्त्र थमाया।

आकर्षण पग-पग, जाल हैं, तुझको, उनसे बचना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

किसी से, करनी नहीं, शिकायत।

पढ़नी नहीं, मुझे, धर्म की आयत।

ठोकर खाकर, पग-पग बढ़ना,

कर्मवीर को, शुभ हैं, सब सायत।

काम बहुत है, समय ढल रहा, समय के साथ, ढलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।


Wednesday, May 12, 2021

जिनको अपना, समझ रहा था

 उनसे ही विष पीना  होगा

              


सब की खातिर, जीकर देखा, खुद की खातिर जीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

परिवर्तन का, दंभ भरा था।

संवेदना का,  दर्द हरा था।

कदम-कदम, ठोकर खाकर भी,

नहीं कभी, संघर्ष मरा था।

अपेक्षा सभी की, पूरी न होतीं, सब कुछ कर, कमीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

लीक से हटकर, चलता है जो।

समाज का कंटक बनता है वो।

उपलब्धि कितनी भी पा ले,

अंत में अकेला, मरता है वो।

करनी नहीं, किसी से आशा, बहाना खुद ही, पसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

अकेले ही, फिर से बढ़ना होगा।

थकान मिटा, फिर चढ़ना होगा।

निराश मिटा, जिंदा दिल बन,

कर्म का पाठ, फिर पढ़ना होगा।

चिंता छोड़, चिंतन भी तज तू, कर्म ही तेरी  हसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।


Tuesday, May 11, 2021

कोई साथ नहीं आता है

 सच की राह पर

          

सच की राह पर

चलने का, 

संकल्प लेकर,

चाहा था,

एक साथी।

चाहा, खोजा,

मनाया, प्रेम किया,

अपने आपको,

लुटाया।


बस,

एक ही इच्छा,

सच की राह पर,

साथी का हाथ पकड़,

जब मुश्किल घड़ी हो,

एक-दूसरे का हाथ जकड़,

साथ-साथ चलेंगे।

सच के पथ को,

नहीं तजेंगे।


मूर्ख था मैं,

ना समझ भी,

समझ न पाया।

सच की राह पर तो,

सच भी, 

साथ छोड़ जाता है।

अपना साया भी,

साथ नहीं आता है।

खुद को खुद का,

साथ भी नहीं भाता है।


कोई मूर्ख पथिक ही,

सच की यात्रा पर,

साथी का गान गाता है।

वास्तविकता तो यही है,

सच के पथ पर,

पथिक को अकेला ही,

चलना होता है।

कोई साथ नहीं आता है।


Monday, May 10, 2021

नर-नारी के एक होने से

 सृष्टि  जन्मती पलती है

            


इक-दूजे से शेयर करके, परिवार की गाड़ी चलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

सहयोग समन्वय से आगे बढ़ के।

साथ-साथ  बढ़,  सीढ़ी चढ़ के।

विकास पथ पर, आगे बढ़ो मिल,

मिट जाओगे, अकेले  अढ़ के।

इक-दूजे की देखभाल कर, प्रेम भावना बढ़ती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

केयरिंग-शेयरिंग, सूत्र यहाँ पर।

पारिवारिक हैं,  मूल्य जहाँ पर।

प्रेम, त्याग, समर्पण, निष्ठा,

साथ में जीते, स्वर्ग वहाँ पर।

छल, धोखा, कपट भावना, परिवार में सबको खलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

प्रेम से देखो, घर महकेगा।

दिखावे से तो, बस बहकेगा।

इक-दूजे हित जीना सीखो,

रोम-रोम फिर से चहकेगा।

ईष्र्या, द्वेष तज, प्रेम भाव से, सूरत घर की बदलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।


Sunday, May 9, 2021

आज सीख वह देता है

 


आखिर वह मेरा बेटा है

      

आज सीख वह देता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


उसके जन्म से बाप बना।

खुद को भूला, ताप बना।

होते हुए भी, अभाव दिए,

मजबूत बने, मैं घात बना।

ज्ञान में, उसे लपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


खेल-खिलोनों से दूर रखा।

वात्सल्य भी, नहीं  चखा।

योग्य बनाने के चक्कर में,

बना नहीं, मैं कभी सखा।

एकान्त ने दिया चपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


वह तकनीक की ओर चला।

जीवन से,  वह दूर  चला।

मोबाइल ही, है बस साथी,

सम्बन्धों से, वह, दूर चला।

बड़ा हुआ, अब  चेता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


संबंधों का,  बंधन तजकर। 

रहना नहीं, कहीं तू फंसकर।

उड़ ले, गगन में, जितना चाहे,

जीवन जीना तू बस हँसकर।

समझे न  कोई हेटा  है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


Monday, May 3, 2021

असफलता संग व्यथा रही

 मेरे जीवन की कथा रही

     


असफलता संग व्यथा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


पीड़ा से पीड़ित था बचपन।

भय से भयभीत था, छुटपन।

किशोर हुआ, अभाव मिले नित,

युवावस्था भी, थी बस ठिठुरन।

अकेलेपन की सजा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


किसी को कुछ भी दे न सका।

साथ आया जो,  वही  पका।

भटकर को ना, राह मिली,

टूटा सपना, पर नहीं थका।

राह ही जिसका, पता रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


राह में कुचली कली मिली।

दुलारा उसको, वही खिली।

राह अलग, उसको था जाना,

नहीं कभी वह, हिली-मिली।

साथ हमारे, बस सजा  रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


आदर्शो की कुछ राह चुनीं।

अपनों की भी, नहीं सुनी।

संघर्ष पथ पर साथ था खोजा,

मिली न अब तक कोई गुनी।

कोशिशों की बस  कज़ा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


Saturday, May 1, 2021

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता

साथ किसी के,  रो न  सके

               

साथ के सपने अपने भी थे, साकार कभी भी हो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

किसी का बुरा, कभी न चाहा।

किसी के दुख में, कहा न आहा।

अनजानों को गले लगाकर,

सबको नेह से, था अवगाहा।

हमने सबको, अपना समझा, पराया किसी को कह न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

धोखे से साथ में हमें फंसाया।

छल-कपट का जाल विछाया।

प्रहार आत्मा पर करने को,

विश्वासघात का अस्त्र चलाया।

षड्यंत्रों से हमको घेरा, सच के सपने,  खो  न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के, रो न  सके।।

हमने सब कुछ, सौंपा जिसको।

उसने  मूरख, समझा  हमको।

हमने सब कुछ खोल दिया था,

उसने सब कुछ छिपाया खुदको।

प्रेम बिना, है खेती सूखी, विश्वास के बीज, बो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के,  रो न  सके।।


Friday, April 30, 2021

अलग राह की राही हो तुम

 जाओ हमें सरोकार नहीं है

             

कर्म के पथिक, सच है साथी, और कोई दरकार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

मूरख थे, हम समझ न पाये।

व्यर्थ ही तुमको गले लगाये।

सीधे-सच्चे पथिक हैं हम तो,

तुमने विकट थे,जाल विछाये।

प्रेम की तुम व्यापारी शातिर, हमारा कोई इकरार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

तुम्हारा कोई दोष नहीं है।

हमको ही था होश नहीं है।

षड्यंत्रों की देवी हो तुम,

पास हमारे कोष नहीं है।

सच के साथ विश्वास पनपता, किसी से कोई तकरार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

नित तुम प्रेम के जाल विछाओ।

नए-नए नित शिकार फंसाओ।

मुझे छोड़ो, और आगे जाओ,

और किसी को तुम भरमाओ।

तुम कानून के जाल हो बुनती, हमारी कोई सरकार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।


Wednesday, April 7, 2021

जीवन का मर्म

 कर्म, कर्म, कर्म!

 



कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


सक्रियता ही,

जीवन की निशानी है।

इच्छाएँ, कामनाएँ,

बाधाएँ, पीड़ाएँ,

आस्थाएँ और भावनाएँ,

चुनौतियों का बीड़ा,

तर्क-वितर्क के होते हुए भी,

कर्म के बिना,

व्यक्ति है बस एक कीड़ा।

जीना ही है,

सबसे प्राचीन धर्म!

कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


छोटा हो या बड़ा,

अमीर हो या गरीब,

बैठा हा या खड़ा,

गतिमान हो या अड़ा,

चलना ही,

जीवन की निशानी है,

थम गया जो,

वह है मरा।

जो पड़ गया,

वो है सड़ा।

कर्म से कैसी शर्म?

कर्म ही है सच्चा धर्म।


कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


Sunday, April 4, 2021

एकान्त और अकेलापन

 

एक समय था,

जब मैं चाहता था,

एकान्त।


तब कुछ पढ़ने की,

कुछ बनने की,

किसी को पढ़ाकर,

कुछ बनाने की,

तीव्र इच्छा, 

मुझे एकान्त के लिए,

मजबूर करती थी।


एक समय था,

जब साथी को चाह थी,

मेरे साथ की,

बेटे को चाह थी,

हर पल, हर क्षण,

हर दिन, हर राह,

मेरे साथ की

मुझसे दुलार की।


और मैं,

उन्हें आगे बढ़ाने,

उन्हें कुछ सिखाने,

अपना करियर बनाने,

के चक्कर में,

अपने आपको भूल गया!

पता ही नहीं चला,

कब अपनी राह भूला,

और ठहर गया।


और आज

जब साथी साथ मिलने का,

इंतजार करते-करते,

प्रतीक्षा से थककर,

आगे बढ़ गया।

दूसरे शब्दों में कहूँ,

साथ अलग हो गया।


और आज

हर पल, हर क्षण

हर राह,

साथ चाहने वाला बेटा,

साथ रहना भूलकर,

एकान्त के पथ पर,

बढ़ गया।

एकान्तवासी बन गया।


और आज

मैं एकान्त से भी,

ठुकराया गया,

अकेला रह गया।

एकांत और अकेलेपन

का अंतर समझ आ गया।

अनुभव से

कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।


Thursday, April 1, 2021

सबके विकास की बातें करते

  आत्म विकास नहीं कर पाते


                 


ईर्ष्या, द्वेष,  नफरत है दिल में,  किंतु, प्रेम के गाने गाते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

करते रहे औरों की समीक्षा।

कैसे पूरी हो?  फिर इच्छा।

सबको सीख देत हो क्षण-क्षण,

खुद ही, खुद की, ले लो परीक्षा।

भ्रष्ट आचरण, कर्महीन धन,  उससे, कराते हो जगराते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

अहम ने, सबको, दूर भगाया।

दान के नाम, खुद को भरमाया।

खुद ही, खुद को, समझ न पाये,

पल-पल औरों को समझाया।

धैर्य, शान्ति की बातें करते, धैर्य बिना, कटें, खुद की रातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

कर में जो है, यहीं है पाया।

सीख रहे जो, केवल माया।

खुद तो भ्रम में जीते हर पल,

औरों को भी, है भरमाया।

सच क्या है? ईश्वर कैसा? जाना न, किसी ने, केवल बातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।


Wednesday, March 31, 2021

नर क्या समझे

 

               नारायण को,  नारी ने भरमाया है


प्रकृति सृष्टि का गूढ़ तत्व है, समझ न कोई पाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

नर, सागर की, गहराई नापे।

मौसम की कठिनाई भी भाँपे।

आसमान में उड़ता है नर,

इससे देखो, पर्वत काँपे।

नारी की मुस्कान ने जीता, प्रकृति की कैसी माया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

वेद ज्ञान से, भरे पड़े हैं।

कुरान और हदीस लड़े हैं।

नारी प्रेम की चाह में ये नर,

बुद्धिहीन से, पीछे खड़ें हैं।

सिद्धांत गढ़ो, कुछ भी कह लो, नर नारी का साया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

 उपदेश नहीं, कुछ कर दिखलाओ।

चाहो नहीं, बस प्यार लुटाओ।

सबको मुफ्त की सीख हो देते,

चलकर उन पर, खुद दिखलाओ।

छल, कपट, धोखे में फंसाकर, गान मिलन का गाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।


Monday, March 29, 2021

संग-साथ की इच्छा सबकी

किन्तु साथ कुछ को मिलता है

                  




पुष्प की चाह, सभी को होती, कुछ ही पल को वह खिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

चाहने से यहाँ, कुछ नहीं होता।

काटता है वही, जो व्यक्ति बोता।

कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे,

कदम-कदम वह, निश्चित रोता।

साथ उसी को, मिलता जग में, प्रेम सूत्र रिश्ते सिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

आकांक्षा और अभिलाषाएँ।

तरह-तरह की हैं आशाएँ।

चाहत किसी की पूरी न होतीं,

चुनौती देती, हैं निराशाएँ।

चाहत तजकर,  साथ निभाए, साथ उसी का, बस निभता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

प्रकृति का कण-कण साथ हमारे।

सुना न तुमने, हम थे पुकारे।

कर्तव्य पथ पर, बढ़ते रहेंगे,

मृत्यु भी, पग-पग, हमें दुलारे।

पथ ही साथी, जब हो पथिक का, ऐसे पथिकों से, जग हिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।


Saturday, March 27, 2021

समय का साधक, कर्म करे बस

 नहीं माँगता बस देता है।

  


अकेलेपन से जूझ रहे सब, साधक एकान्त का रस लेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

इक-दूजे से सब हैं जूझें।

मित्र कौन है?  कैसे बूझें?

प्रेम-प्रेम कह, लूट रहे नित,

भीड़ में अपना, ना कोई सूझे।

परिवार में ही महाभारत होता, अपना वही जो नाव खेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

खुद ही खुद से, जूझ रहे हम।

विश्वासघात नित, झेल रहे हम।

जिसको अपना साथी समझा,

घात से उसके, अचेत हुए हम।

विश्वास किया था, जिस पर हमने, चुंबन लेकर गला रेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

मित्र खोजना बंद करो अब।

अपने आपके मित्र बनो अब।

इसको-उसको, समय बहुत दिया,

खुद ही, खुद को, आज गढ़ो अब।

आगे बढ़कर,  पथ जो बनाये,  वही कहाता, प्रणेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।


Friday, March 26, 2021

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी

 प्रकृति न हमसे न्यारी है

  


प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।

महासागर,  पर्वतमालाएँ, प्रकृति ही,  नर और नारी है।।

प्रकृति का सूक्ष्म रूप है नारी।

ललित लालिमा कितनी प्यारी!

पर्वत हरीतिमा, ललचाती है,

गोलाइयों में, भटकाती नारी।

जीवन रस देती हैं नदियाँ,  पयस्वनी  माता नारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

प्रेम अश्रु में, डूबी नदियाँ।

सहनशील प्रथ्वी की तरियाँ।

प्रचण्ड अग्नि पुंज है नारी,

बाँह फैलाए, हैं वल्लरियाँ।

सर्पिल चितवन पर नर मर मिटता, वक्ष उरों पर आरी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

पर्वतों को, धूल चटाता जो नर।

सागर विजयी, कहलाता जो नर।

नारी नयन के,  अश्रु बिन्दु में,

गल बह जाता, कठोर हृदय नर।

विश्वामित्र ऋषि, हत हो जाते, जब मार मेनका मारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

विकास के लक्ष्य, बड़े जो होते।

प्रकृति के साथ ही, पूरण होते।

नारी साथ मिल, इच्छाशक्ति से,

नर आनन्द के,  खोले सोते।

विध्वंस पथों पर सृजन सजाती, नर-नारी की यारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।


Thursday, March 25, 2021

किसी से, किसी की, करो न शिकायत

 समाधान बनकर दिखलाओ

                 


समस्याओं से,  तुम कभी न भागो, सोचो, समझो और गले लगाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

रोते हुए को, कोई न देखे।

सबके अपने-अपने  लेखे।

समय की शिकायत करते हैं जो,

करते रहते, वही  परेखे।

बातों से,  कभी,  काम न होते,  चलो,  चलो और  चलते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

उसकी, उससे बातें करते।

समय नष्ट कर, क्यों हो मरते?

अपने आप से, बातें करके,

सिद्ध करो, तुम, नहीं हो डरते।

लीकों पर चल,  कहाँ पहुँचोगे?  तुम बाधाओं से, राह बनाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

विकास के पथ, तुम चलते जाओ।

कहते  हो जो,  कर दिखलाओ।

डर ही, शिकायत, इसकी, उसकी,

कर्म से,  डर को,  दूर भगाओ।

खुद पर, तुम विश्वास करो, फिर, शिखरों पर, तुम चढ़ते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

कर्म के पथिक को, कोई न पराया।

निराशा को, पल-पल,  ठुकराया।

कमियों को,  वो, नहीं खोजते,

जिनने खुद को खुद ही बनाया।

मरने की मन,  बात करो ना,  अकेले रहो,  सबको अपनाओ।

किसी से किसी की करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

Monday, March 22, 2021

अपने आपको मित्र बनाओ

 साथी न खोजो, साथ निभाओ

               



जब भी आपको साथ चाहिए, अपने साथी खुद बन जाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

खुद को अच्छी तरह से जानो।

क्षमताओं  को,  खुद पहचानो।

करो कभी ना, आत्म प्रशंसा,

सहयोग मिला, उसको भी मानो।

समय है सीमित, काम करो, काम के केवल गाने न गाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

खुद ही खुद को बढ़ना होगा।

पथ में पथिक हैं, मिलना होगा।

पथ में पथिक को, नहीं है बसना,

विश्राम किया, अब चलना होगा।

साथी की चाह, सभी को यहाँ पर, आगे बढ़कर गले लगाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

किसी की करनी, क्यों है प्रतीक्षा?

सबकी  अपनी-अपनी  इच्छा।

अपने आपको, समझ न पाए,

देते फिरते, जग को दीक्षा।

कोई व्यक्ति पूरण ना होता, खुद समझो तुम, ना समझाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

ओरों  की ही, चर्चा  करते।

खुद ही खुद की ऊर्जा हरते।

कमी ओरों की निकाल रहे जो,

समझो, अपने आप से डरते।

विश्वास न खुद पर, साथी खोजो, साथ देकर, विश्वास कमाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।


Saturday, March 20, 2021

प्रेम और विश्वास मिले बस

 मन-मयूर, मन करेगा नर्तन

            


नर-नारी संबन्ध निराला।

पत्नी, बेटी हो या खाला।

इक-दूजे को देखे बिन,

गले से उतरे नहीं निवाला।


नारी को कहते घरवाली।

कभी न रहती है वह खाली।

घर ही नहीं, बाहर भी वह,

नर की प्रेरणा डाली-डाली।


इक-दूजे को बहुत सताते।

इक-दूजे  के गाने  गाते।

इक-दूजे की कमी निकालें,

इक-दूजे बिन नहीं रह पाते।


कोई क्षेत्र न रहे अछूता।

नारी का ही है, ये बूता।

प्रेम लता में बांधे रहती,

वरना चल जाते हैं जूता।


नारी नर को कोष रही है।

फिर भी उसको पोष रही है।

पिता, भाई और पति की खातिर,

पल-पल मर, मदहोश रही है।


प्रतियोगी तुम नहीं हो समझो।

इक-दूजे के गुणों को समझो।

नर नारी बिन रहे अधूरा,

नर बिन नारी, क्या है समझो?


नर वीर है, सिंह लगाता।

सदैव युद्ध के गाने गाता।

नारी के आँचल की छाव में,

अहम मिटे, तब ही सुख पाता।


इक-दूजे के साथ में चलकर।

हाथ थाम लें, आगे बढ़कर।

चढ़े विकास की सीढ़ी तब ही,

गले लगा लें, सबको हँसकर।


भाई-बहिन का रक्षा बंधन।

माता का दुलार है बंधन।

जग में देखो अतुलनीय है,

पति-पत्नी का गृह प्रबंधन।



नरक देखना, कर लो घर्षण।

स्वर्ग की चाह, करो समपर्ण।

इक-दूजे की शक्ति बनो तुम,

यही है पूजा, यही है दर्शन।


करो न केवल, पे्रम प्रदर्शन।

दिल का दिल से कर लो अर्चन।

प्रेम और विश्वास मिले बस,

मन-मयूर, मन करेगा नर्तन।


Friday, March 19, 2021

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से

 सृष्टि की रचना होती है

                                    


नारी उर में, दीप सजाती, नर बिखराता ज्योती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

भिन्न प्रकृति है, भिन्न मही है।

दोनों ही अपनी जगह सही हैं।

दोनों मिल जब साथ में चलते,

दानों की राह, आनन्द मयी है।

नर भी सुख से जी नहीं सकता, नारी जब भी रोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

आपस में संघर्ष ये कैसा?

किसी को बोलो न ऐसा-वैसा।

मिल विकास की राहें खुलतीं,

अविश्वास विध्वंस है प्रलय जैसा।

नर जब पथ से विचलित होता, नारी भी पथ खोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

सच पर ही विश्वास है पलता।

संबन्धों का पुष्प है खिलता।

समर्पण से अलगाव है मिटता,

मिट जाती है, सारी कटुता।

पारदर्शी व्यवहार ही समझो, मानवता का मोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।


Wednesday, March 17, 2021

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

 किसी की कोई, परवाह नहीं है

                 


बहुत है झेला, बहुत है भोगा,

शेष रही कोई, चाह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


प्रताड़ना रूपी, प्रेम था पाया।

अभावो ने भी था ठुकराया।

तप्त धरा पर नंगे पाँव चल,

हमने बसंत का राग सुनाया।।

बचपन भूख से पल-पल खेला,

जवानी काल कुछ याद नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


जन्म लिया, तब घर नहीं अपना।

अकेलेपन में, पड़ा था तपना।

शिक्षा काल, ठहराव हुआ ना,

नहीं किसी का, नाम थ जपना।

युवावस्था संघर्ष में बीती,

पूरी हुई कोई चाह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


कर्म के पथ पर, अडिग रहे हम।

स्वार्थ के आगे, नहीं झुके हम।

भीड़ में भी, हम रहे अकेले,

अपने कहकर, लूटे गए हम।

पीड़ाओं का अभ्यास हो गया,

भरते अब हम, आह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


Tuesday, March 16, 2021

हर प्राणी, चैन की नींद सोता है

 घर तो आखिर, घर होता है

               

हर प्राणी, चैन की नींद सोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


कण-कण में, प्रेम है रमता।

दादी दुलार में बचपन पलता।

चंचलता अगड़ाई लेती जहाँ,

सीमा टूटतीं, युवा मचलता।

प्रेम के आँसू, जो रोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


अभावों में भी जीवन खिलता।

टूटे दिलों को, प्रेम है सिलता।

मिट्टी में है प्रेम की खुशबू,

रोने में है, हास्य झलकता।

गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


बचपन की शरारतें छिपी हुई हैं।

प्रेम इबारतें, लिखी हुई हैं।

दूर-दूर रह, दिल हैं मिलते,

दिल से दिल की, जमी हुई है।

अंकुर बढ़, पौधा होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


युवा काम हित बाहर जाते।

बाहर रह कर, घर को चलाते।

यादों का अंबार, जमा जहाँ,

आते हैं, जब छुट्टी पाते।

घर चल, पगले, क्यों रोता है?

घर तो आखिर, घर होता है।।


घर छोड़ा, मजबूरी दाम की।

मिली न हमें मजदूरी नाम की।

सपने लेकर, शहर थे आए,

मिलती थी, मजदूरी काम की।

वापस, घर जाना होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


समय बदला, फिजाएं बदलीं।

शहरों की अब, हवाएं बदली।

लाॅकडाउन ने जीवन रोका,

वापसी की अब, राह भी बदलीं।

हर, मजदूर मजबूर होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


बची नहीं, अब छत की छाया।

ना कुछ पीया, ना कुछ खाया।

पैदल ही, अब राह नापनी,

साथ छोड़ता, विपत्ति में साया।

मर-मर कर जीवन बोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


Sunday, March 14, 2021

उठकर आगे, बढ़ेंगे फिर से

 गलती से, यदि हम फिसलेंगे

                   


हम अपनी ही राह चलेंगे।

सुविधाओं को ना मचलेंगे।

उठकर आगे, बढ़ेंगे फिर से,

गलती से, यदि हम फिसलेंगे।


धोखे अब तक बहुत ही खाये।

सच के गान हैं, फिर भी गाये।

हमने सब कुछ सौंप दिया था,

तुमने छल के तीर चलाये।


नारी का सम्मान है करते।

नहीं किसी का मान है हरते।

सहयोग करते कदम कदम पर,

लेकिन धोखा, नहीं, सह सकते।


नारी विशेष है, हम हैं मानते।

डरते हैं, नहीं, रार ठानते।

कर्म प्रधान है, जग में भाई,

लिंग भेद नहीं, कर्म मानते।


कोई न अपना, ना कोई पराया।

झूठ जो बोला, वो ठुकराया।

धन, पद, यश, संबन्ध न बाँधें,

सहयोग दिया, पर साथ न पाया।


नहीं रूप की, चाह हमें है।

ना ही, धन की आह हमें है।

ज्ञानवान की चाह नहीं है,

पारदर्शी की चाह हमें है।


सच बोले, ऐसा मित्र चाहते।

मुक्त भाव, माहोल चाहते।

मन की कहे, मन की सुन ले,

ऐसा बस एक साथ चाहते।


नर नारी का, मित्र स्वाभाविक

 नर की कामना, नारी है

            

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।

इक-दूजे के लिए बने हैं, फिर, रण की क्यों तैयारी है?

शब्द ही युग्म है, नर-नारी का।

पीड़ा हरे, आँचल साड़ी का।

नारी, नर पर, हो न्यौछावर,

नर है सजाता, पथ प्यारी का।

भिन्न-भिन्न हों, राह भले ही, अटूट दोनों की यारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।

आमने-सामने, आज खड़े हैं।

अपनी जिद पर, दोनों अड़े हैं।

समलिंगी, पशुता है बढ़ती,

प्रथा, परंपरा, आज सड़े हैं।

सृजन की देवी, ममता की मूरत, विध्वंश की खेले पारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।

सिर्फ विकास की बातें होतीं।

पवित्र  भावनाएँ,  हैं खोतीं।

नर-नारी प्रतियोगी बनकर,

नष्ट कर रहे, जीवन मोती।

अब भी सभलो, संग-साथ रह, सींचो प्रेम की क्यारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।


Friday, March 12, 2021

जन्मने दो, शिक्षित होने दो

 नारी के अरमान

     



नहीं चाहिए, दुआ किसी की, नहीं देवी का मान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

सहायता नहीं, सहयोग चाहिए।

नहीं कोई,  हमें आन चाहिए।

पथ अपना हम, खुद चुन लेंगी,

नहीं कोई, व्यवधान  चाहिए।

हमको क्या सुरक्षा दोगे? खतरों में तुम्हारी जान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

सुरक्षा के नाम, हमें ना बाँधो।

षड्यंत्रों से, हित  ना साधो।

शिक्षा, चिकित्सा, रक्षा हम करें,

घर में बैठो, माटी  के माधो।

घरवाली बन, घर था, चलाया, बढ़ायें देश की शान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

देवी की पूजा, नाटक करते।

प्राण हमारे, गर्भ में  हरते।

जन्मने दो, ना पाप करो नर,

हमसे क्यों? तुम इतना डरते।

हाथ थाम, मिल साथ चलें, गायें विकास के गान हैं।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।


Wednesday, March 10, 2021

एक नारी ने, जन्म दिया था

 दूजी ने मौत की राह दिखाई!

                  


एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।

विश्वासघातिनी ने सब छीना, पर, नारी से विश्वास न जाई।।

जन्म दिया, और, नारी ने पाला।

पिलाया पल पल प्रेम का प्याला।

कपट जाल में, नर को फंसाकर,

नारी ने ही,  मुँह  किया काला।

प्रेम बहिन का, याद करूँ, या कुलटा की चाल, जो हैं चलाई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।

औकात से बढ़, जब नारी चाहे।

पाप के,  सागर में,  अवगाहे।

काम पिपासा, धन की आशा,

कटरा हो, या हो फिर माहे।

बेटी, बहिन और माँ की महानता, नारी ही, बनती हरजाई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।

नारी पर विश्वास है अब भी।

धोखा खाया, प्रेम है तब भी।

प्रेम नाम, कुछ धोखा देतीं,

कुछ की पूजा, करता रब भी।

विश्वासघातिनी, कुलटा,  इधर है, प्राण दात्री नारी माई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।


हम सच के गाने गाते हैं

 तुम कपट गान ही गाओगी

           


हम आजीवन, रहे अकेले, अब क्या साथ निभाओगी?

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

जीवन में कुछ नहीं छिपाना।

सच ही जीवन, सच अपनाना।

छल-कपट का, जाल यूँ बुनकर,

मुझे चाहतीं, तुम धमकाना।

धन, पद, यश, संबन्ध चुरा लो, किन्तु साथ ना पाओगी।

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

जीने की भी, चाह नहीं अब।

कष्टों में भी, आह नहीं अब।

धोखे से, विश्वास है तोड़ा,

विश्वास बिना, प्रेम हुआ कब?

कितनी भी पीड़ा पहुँचाओ, मजबूर नहीं कर पाओगी।

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

बंदी भले ही, हमें बना लो।

झूठे कितने? केस चला लो।

हमको पथ से, डिगा न सकोगी,

चाहे जितनी, सजा दिला लो।

धन तो क्या? प्राण भी ले लो, विश्वास कहाँ से लाओगी?

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।