Thursday, July 2, 2020

धोखा खाकर, जश्न मनाओ

जीवन-पथ


जीवन पथ पर, पथिक है चलना।
राह में राही, सबसे है मिलना।
पथिक तो  आते, जाते रहते,
रूकना नहीं, है अविरल चलना।

आधा जीवन बीत रहा है।
नहीं, कभी संगीत रहा है।
हमने सब कुछ लुटा दिया,
फिर भी साथ न मीत रहा है।

साथ में जो भी, मीत ही समझो।
नहीं किसी से, कभी भी उलझो।
जीवन तो है, भूल-भुलैया,
सोचो, समझो और फिर सुलझो।

यहाँ, कोई तेरा मीत नहीं है।
हार-जीत, संगीत नहीं है।
पल-पल जी ले, तू मुस्काकर,
रोना यहाँ की, रीत नहीं है।

जीवन को क्यों काट रहे हो?
सुख को भी, दुख बाँट रहे हो।
दुख्खों के घेरे से निकलो,
व्यर्थ ही, खुद को डाँट रहे हो।

जीवन का आनन्द लुटाओ।
विध्वंसों में मौज मनाओ।
धोखा देना, फितरत उनकी,
धोखा खाकर, जश्न मनाओ।

Sunday, June 28, 2020

घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।

जग में सबको पाल रही है


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
गृह प्रबंधन की कला है आती।
कुशल प्रबंधन, जहाँ भी जाती।
सेनाओं का नेतृत्व कर रही,
स्वयं जगी, जग को है, जगाती।
बेटी, बहिन, पत्नी, माता बन, नारी नर की ढाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
क्रोध में आकर, दण्ड भी देती।
सहलाकर, पीड़ा, हर लेती।
स्नेह, प्रेम, वात्सल्य लुटाती,
दिन में, रात में, सुख ये देती।
अन्तर्विरोध, घर-घर में होते, प्रेम से पिरोती माल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
छल, कपट और झूठ भी बोले।
आँखों से ही सबको तोले।
घर, बाहर, तूफान हो कितना?
सब सभालती, हौले-हौले।
तृण-तृण से है नीड़ बनाती, सुख का बुनती जाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।


Saturday, June 27, 2020

एकान्त और अकेलापन

एक समय था,
जब मैं चाहता था,
एकान्त।

तब कुछ पढ़ने की,
कुछ बनने की,
किसी को पढ़ाकर,
कुछ बनाने की,
तीव्र इच्छा,
मुझे एकान्त के लिए,
मजबूर करती थी।

एक समय था,
जब साथी को चाह थी,
मेरे साथ की,
बेटे को चाह थी,
हर पल, हर क्षण,
हर दिन, हर राह,
मेरे साथ की,
मुझसे दुलार की।

और मैं,
उन्हें आगे बढ़ाने,
उन्हें कुछ सिखाने,
अपना करियर बनाने,
के चक्कर में,
अपने आपको भूल गया!
पता ही नहीं चला,
कब अपनी राह भूला,
और ठहर गया।

और आज
जब साथी साथ मिलने का,
इंतजार करते-करते,
प्रतीक्षा से थककर,
आगे बढ़ गया।
दूसरे शब्दों में कहूँ,
साथ अलग हो गया।

और आज
हर पल, हर क्षण
हर राह,
साथ चाहने वाला बेटा,
साथ रहना भूलकर,
एकान्त के पथ पर,
बढ़ गया।
एकान्तवासी बन गया।

और आज
मैं एकान्त से भी,
ठुकराया गया,
अकेला रह गया।
एकांत और अकेलेपन
का अंतर समझ आ गया।
अनुभव से
कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।

Tuesday, June 23, 2020

हर युग में, मैं छली गई हूँ

प्रेम से कहकर प्यारी हूँ

                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


काली, दुर्गा, सरस्वती नहीं हूँ, मैं साधारण सी नारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
जिम्मेदारी, मुझ पर डालीं।
काम सौंप दिया, कह घरवाली।
अधिकार सब, रखे पुरूष ने,
कर्तव्यों की, थमा दी, प्याली।
संस्कृति का भी भार बहुत है, थामो तुम, मैं हारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
पूजा मुझको, नहीं, चाहिए।
थोड़ा सा, सम्मान चाहिए।
मन की कहे, मन की सुने,
ऐसा पति का प्यार चाहिए।
संस्कार, नैतिकता, लज्जा, थामो तुम, मैं मारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
परमेश्वर नहीं, पति चाहिए।
स्वर्ग नहीं, कुछ हँसी चाहिए।
निर्णयों में, भागीदारी दे,
नर की ऐसी, मति चाहिए।
प्रेम, विश्वास, सम्मान मिले बस, फिर देखो, मैं थारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।

Sunday, June 21, 2020

घरवाली

भोर ही नहीं, रजनी में भी


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


समय, काम की, सीमा न कोई, नहीं, वेतन की माँग उठी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
सबसे पहले, जग जाती है।
शुभ हो दिन, मंगल गाती है।
साथ-सफाई का चक्र है चलता,
बार-बार कह, नहलाती है।
गृहलक्ष्मी, सबको है देती, चाह न कुछ भी, स्वयं लुटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
समय की नहीं, कोई सीमा है।
घर ही तो, इसका बीमा है।
अन्दर बाहर काम कर रही,
कभी तेज, कभी धीमा है।
स्वयं भले ही नहीं पढ़ पाई, संतान की शिक्षा हेतु पिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
संघर्षो में भी नहीं बुझी है।
सजती-संवरती, कितनी हंसी है?
काम काज सबके निपटाकर,
बिस्तर में भी, पति की खुशी है।
घर में ही नहीं, दफ्तर में भी, शालीनता कभी न मिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।

Thursday, June 4, 2020

संग साथ की, इच्छा थी, पर,

कोई भी साथ निभा न सकी


                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नहीं, चाह थी, रूप रंग की, मन की प्यास, बुझा न सकी।।
सीधे-सच्चे पथ पर चलना।
नहीं चाहिए, कोई छलना।
सब कह ले, सब कुछ सुन ले,
बाहों में उसके, चाहूँ मचलना।
प्रेम राह, मिल चलना चाहा, कोई भी, राह दिखा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।।
कामना रहित, प्रेम हो जिसका।
नहीं, किसी से, वैर हो उसका।
बुजुर्गो के प्रति, सेवा भाव हो,
हित जो चाहे, सदैव ही सबका।
अंग-अंग, सौन्दर्य भले ही, कर्मो से, मुझे लुभा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नारीत्व दिखा, अन्दर ना पाया।
झूठे ही, प्रेम का, गाना गाया।
छलना, छल का भेद, खुला जब,
पता चला, बस था, भरमाया।
कमनीय कामिनी की, झूठी अदायें, पथ से मुझे डिगा न सकीं।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।

Sunday, May 31, 2020

कदम-कदम, यह साथ है, चलती,

चिर संगिनी नारी है


                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



शक्ति की मूरत, भोली सी सूरत, विधि की रचना प्यारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
सौन्दर्य ही नहीं, शक्ति भी है।
कहती ही नहीं, करती भी है।
हर विपत्ति में, हाथ थामती,
डराती ही नहीं, डरती भी है।
नख से शिख, सौन्दर्य समाया, पीड़ा सहती, सारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
हँसने से, यह भी हँसती है।
नर को, कष्ट, यह भी रोती है।
कमजोर और अबला, मत कहना,
सब कुछ सहकर भी, जीती है।
नर ने, बहुत खेल है खेला, अब नारी की बारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
संघर्ष नहीं, सहयोग चाहिए।
राष्ट्रप्रेमी को नहीं, जीत चाहिए।
सच को कह ले, सच को सुन ले,
ऐसा बस एक, मीत चाहिए।
विश्वास पुष्प, उर माँहि खिलेगा, तू सींच ले, सच की क्यारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।

Friday, May 29, 2020

नारी ही, प्रेरणा, जन-जन की

नारी की प्रेरणा से


                  डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नर-नारी दोनों हैं व्यक्ति।
मिलते, बन जाते हैं, शक्ति।
अलग-अलग, अस्तित्व नहीं है,
इक-दूजे की, कर लो भक्ति।

अलग-अलग, दोनों पे विपत्ति।
मिल कर,  बनते हैं,  दंपत्ति।
ज्ञान, शक्ति का, सृजन हैं करते,
गृह लक्ष्मी,  सच्ची  संपत्ति।

मिल के काल से भी लड़ जाते।
ये कष्टों  में भी, मिल  हरषाते।
नारी की, प्रेरणा से, ये नर,
मूरख, कालिदास बन जाते।

समानता, संघर्ष का गाना।
शक्ति बिना, शिव किसने जाना।
विष्णु के, कम, भक्त मिलेंगे,
लक्ष्मी को, हर घर ने, माना।

सरस्वती ही हैं ज्ञान खजाना।
लक्ष्मी की, पूजा करे जमाना।
प्रिया प्रेरणा पर, तुलसी ने,
राम चरित का, लिखा फसाना।

नारी ही, प्रेरणा, जन-जन की।
नारी ही शक्ति, त्रि भुवन की।
नारी बिन, नर, सदैव अधूरा।
नारी ही, संगिनी, है, हर नर की।

Monday, May 25, 2020

अतीत की फांस


                               अर्चना पाठक, होसंगाबाद



अतीत की फांस,
चुभती अंतर्मन में,
एक बार नहीं,
बार-बार,
हर बार,
जब भी झांकती,
बीते समय में।

मन है भटकता,
अतीत में जब भी।
अतीत की चुभन,
गहराती है समय के साथ।
मैं करती प्रयत्न भुलाने के,
निकल आती है विस्मृति से,
अवचेतन मन से,
मेरे न चाहते हुए भी।
किसी के पास है?
कोई तरीका भुलाने का,
बता दो मुझे।

चाही थी सबकी भलाई,
की भी अपनी क्षमता भर,
किंतु लगता है अब,
अपनों का साथ,
देते देते,
भूली पुरानी राहें,
नई भी खोजी,
किंतु
अपनी राह न पाई।

किसे दोष दूं?
सबकी अपनी-अपनी राह।
केवल कहा वाह!
और चले गए।

अपने एकांकीपन के लिए,
किसे दोष दूं?
किसे ठहराऊं,
अपराधी?
जबकि दूसरों को,
संवारने की आपाधापी में,
खुद को ही भुला दिया था मैंने!
आज जीवन के इस मोड़ पर,
नितान्त एकाकी, 
कौन अपना और कौन पराया?
कितनों को दुलारा,
कितनों को ठुकराया?
जीवन रस!
किसका रहा जस का तस?
मन है सीजता,
प्यास अब भी विकल,
प्राण सरोवर सूखता।
प्यार की धरा,
सींचना चाहता है कोई,
मैं पीछे कदम हटाती,
चुपचाप।
अब प्यार में डूबने का,
साहस नहीं रहा।

Thursday, May 21, 2020

बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू,

शक्ति स्वरूपा नारी है


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।
कदम-कदम आईं कठिनाई, नहीं वक्त से हारी है।।
प्रेम में समर्पण कर सकती है।
अत्याचार से लड़ सकती है।
दुस्साहसए यदिए वह कर बैठे,
विध्वंस प्रलय सा, कर सकती है।
संघर्ष करने का जीवट है, पर अपनों से ही हारी है।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।
सृजन भाव से, घर है रचती।
स्वर्ग बने, जहाँ जाकर बसती।
प्रेमी हित, सब कुछ न्यौछावर,
षड्यंत्रों की, वह, देवी बनती।
आजीवन संघर्ष तपस्या, नहीं, किसी से हारी है।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।
नर सदैव, आराधन करता।
रूप, तुम्हारे पर, है मरता।
कठपुतली नर, तुम हो नचातीं,
संकेतों पर वह है चलता।
नर-नारी मिल, साथ चलें, पूरी हों इच्छा सारी हैं।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।

Thursday, May 14, 2020

हम भूल नहीं सकते तुमको

नयनों में तुम बसी हुई हो


                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



हम भूल नहीं सकते तुमको, नयनों में तुम बसी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
तुम ही प्रेरणा जीने की हो।
तुम ही प्रेरणा गीतों की हो।
तुम से ही ये जीवन प्यारी,
तुम ही घड़कन सीने की हो।
सद्य स्नाता, बिखरे कुंतल, रावी तट पर खड़ी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
खिलखिलाहट, वह हँसी याद है।
बलखाती,  वह चाल, याद है।
बुलाया था, मुझे, बड़े प्रेम से,
नेह पगी, फरियाद, याद है।
भुला न सका, कोशिश करके, अंग-अंग, तुम ही रमी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
आने का तुमने, वायदा किया था।
दूर से, साथ के पल को, जिया था।
रूष्ट क्यों हों तुम? यह तो बताओ,
याद है, प्रेम का प्याला पिया था।
भले ही दूर हो, याद न करतीं, बाँहों में अब भी कसी हुई हो।
भले ही कभी, मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।

Saturday, May 9, 2020

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी,

नर हो या फिर नारी है

                                 डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



हीं, कोई भी, दोयम जग में, नहीं, कोई भी भारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
प्रकृति का सृजन, अजब निराला।
कोई  न  इसे,  झुठलाने वाला।
अनुपम है, हर  प्राणी,  जग में,
निकृष्ट नहीं, कोई गोरा-काला।
कोई समान प्रतिरूप नहीं यहाँ, पूरक हैं, सब, तैयारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
नारी बिन, अस्तित्व न, नर का।
नारी अकेली,  कारण डर का।
अकेले-अकेले, दोनों भटकें,
मिलने से, सृजन हो, घर का।
नारी खुद को, समर्पित करती, नर को नारी, प्यारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
समानता, संघर्ष  व्यर्थ  है।
पूरकता ही, सही अर्थ है।
इक-दूजे बिन, दोंनो अधूरे,
मिलकर के वे, सृष्टि समर्थ हैं।
संघर्ष से विध्वंस करो ना, मिलकर सीचों क्यारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

Friday, May 8, 2020

क्या करती हो?

                             ठहरो नारी!

                                                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।
प्रेम, समर्पण, निष्ठा तज कर, ना, जग पर अत्याचार करो।।
स्नेह, दया, करूणा की मूरत।
भावों से, खिलती थी, सूरत।
निज अर्धांग की, प्रतियोगी बन,
सृष्टि को, करती, बदसूरत।
संबन्ध तो होते, दिल का समर्पण, ना, विश्वास का बंटाधार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।
झूठ, छल-कपट, षड्यन्त्र छोड़ो।
तुम सच्चाई से, नाता जोड़ो।
शिक्षा, सहयोग, समर्पण, निष्ठा,
स्वयं को गढ़ो, मरीचिका छोड़ो।
सच ही शक्ति, सच ही भक्ति, ना, धोखा दे, लाचार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।
संयम, धैर्य, मातृत्व की देवी।
क्यों? दुष्टा बन, प्राणों की लेवी।
शिक्षक, प्रेरक, नियंता नर की,
तुम तो थीं, सृष्टि की सेवी।
सृजन छोड़, विध्वंस के पथ पर, क्यों? ऐसा, दुराचार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।

Thursday, May 7, 2020

सामाजिक दूरी पर रहकर

जीत का ध्वज फहराना है

                         डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नहीं, बाजार की चिंता है, अब, नहीं काम पर जाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
मानवता को बचायेंगे हम।
मानकों को अपनायेंगे हम।
नहीं थामेंगे, हाथ किसी का,
फिर भी साथ, निभायेंगे हम।
राशन भी, घर बैठे मिलेगा, मिल कर, पकाकर खाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
नहीं, क्रैच की, आज जरूरत।
बच्चों की दुनिया, खुबसूरत।
पति-पत्नी को, साथ मिल रहा,
इक-दूजे की, उन्हें जरूरत।
साथ रहेंगे,  नहीं मिलेंगे, कोरोना को मिटाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
रोज काम पर, हम, जाते थे सब।
साथ में मिल, बैठे थे, कब-कब?
पत्नी भी तो, थी, नौकरी करती,
घरवाली है,  आज, बनी अब।
अवसर आज मिला है, फिर से, घरवाली को सजाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।

Wednesday, May 6, 2020

दहेज के झूठे केस लगाकर

सच ही, सच की, नींव हिला दी

                                          डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


समय बदल गया, नारी बदली।
नहीं रही, अब रस की पुतली।
ऐसे-ऐसे कुकर्म कर रही,
घृणा को भी, आयें मितली।

प्रेम नाम ले, नित, नए, फँसाती।
सेक्स करो, खुद ही उकसाती।
धन लौलुपता, पूरी करने,
बलात्कार का केस चलाती।

शादी के नाम पर, जाल बिछाती।
झूठ बोल कर,  ब्याह रचाती।
पति कह, नर को, जी भर लूटे,
प्रेमी से मिल, उसे मरवाती।

कुकर्म घृणा के, करती ऐसे।
भाई-पिता भी, जीते कैसे?
सबको तनाव दे, मजे है करती,
रोज फँसा कर, जैसे-तैसे।

छल, धोखे से कर ली शादी।
खुद के मजे, पति की बरबादी।
दहेज के झूठे केस लगाकर,
सच ही, सच की, नींव हिला दी,

नर, नारी से डरता है अब।
बात राह में, करता है कब?
दुष्टा नारी, पीछा न छोड़े,
आत्म हत्या नर, करता है जब।


Tuesday, May 5, 2020

टेढ़़े-मेढ़े, अंधेरे पथ पर, सहजता से

साथ में मेरे आ जाओ

                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


टेढ़़े-मेढ़े, अंधेरे पथ पर, सहजता से,
चल सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
लोभ, लालच, ईष्र्या-द्वेष, सच्चे मन से,
तज सको, तो, साथ में, मेरे आ जाओ।
छल, कपट, षड्यंत्र, बदला, दुर्भावना से,
हट सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
असत्य, लालसा, लिप्सा, वासना से,
रूक सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
कथनी-करनी एक, बनावटीपन से मुक्त,
हो सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
आलस्य, निद्रा, तंद्रा तज, कर्म पथ पर,
बढ़ सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
धन, पद, यश, संबन्धों का मोह तज,
रह सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
अहंकार, दुर्भावना, तज, सदभावना,
पा सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।

Sunday, May 3, 2020

अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति

नारी! अजब निराली हो


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।
आवाज से ही, आकर्षित करतीं,  नहीं,  सिर्फ  घरवाली हो।।
नाम नहीं कोई, न मुलाकात होगी।
आमने-सामने, कभी न बात होगीं।
अजीब सी आशा, जगाती हो क्यूँ?
देवी दर्शन, बड़ी सौगात होगी।
निराशा में भी, तुम, आश जगातीं, प्रेम से पूरित प्याली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
प्यार न मिला, कोई आश नहीं है।
खुश रहो, तुम सदा, अरदास यही है।
मिलने की अब, आश जगाओ ना,
समय हमारे पास, अब खास नहीं है।
नहीं, अबला हो, नहीं है, कोई सीमा, नहीं कभी, तुम खाली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
कर्तव्य पथ पर, खुद को लुटाया।
बेटी का भी, हर,  कर्तव्य निभाया।
खुद को मिटाकर, सबको संवारा,
अपना भाव, नहीं, किसी को बताया।
पास भले ना,  साथ हो रहती, नर बगिया की, तुम माली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।

Saturday, May 2, 2020

स्वाभाविक सहयोगी दोनों

 कोई न किसी पर भारी है

                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


प्रेम का भौतिक रूप प्रकृति है, नर की प्रकृति नारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
कोमल और कठोर न कोई।
प्रकृति सींचती, नर ने बोई।
सृष्टि का आधार हैं दोनों,
छोटा-बड़ा, यहाँ नहीं है कोई।
भावों का भण्डार है नारी, नर की तर्कशीलता प्यारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
प्रकृति-पुरुष संबंध निराला।
जन्म दिया है, उसने पाला।
लक्ष्य विहीन नर भटक रहा था,
पहना दी, उसने वरमाला।
असंतुष्ट वह,  रहा अपूरण,  पूरण करती नारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
चट्टानों से वह टकराये।
सागर में भी राह बनाये।
सारी वेदना, पीड़ा भोगे,
बस एक बार नारी मुस्काये।
अलग-अलग असंतुष्ट अपूरण, मिल, पूरण इच्छा सारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।

Friday, May 1, 2020

कदम-कदम, मैं साथ चलूँगा, बस सीमाओं में उड़ना होगा

शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा


                             डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


कितनी भी आयें, कठिनाई, तुमको, आगे बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
जिस गंतव्य, तुम जाना चाहो।
जिस लक्ष्य को, पाना चाहो।
सक्षम हो तुम, कर सकती हो।
गाओ, जो तुम, गाना चाहो।
रूककर कुछ, विश्राम करो तुम, पथ पर फिर से, बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
अंधकार में, मत घबड़ाना।
प्रेम का छोटा, दीप जलाना।
अकेलापन जब, तुम्हें डराये,
दिल से तुम, आवाज लगाना।
कदम-कदम, मैं साथ चलूँगा, बस सीमाओं में उड़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
संघर्ष नहीं, समन्वय करके।
एक-दूजे के पूरक बनके।
साथ रहे हैं, हम साथ रहेंगे,
पा लेंगे, सब साथ में चलके।
नर-नारी को साथ-साथ मिल, आनंद पथ पर बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।

Thursday, April 30, 2020

प्रकृति का कण-कण है नारी


                       
प्रकृति का कण-कण है नारी।
सरस, सलिल, सरिता है नारी।
गगन में काली छायी घटायें,
मानो केश सुखाती नारी।

चहचहाहट, संगीत है नारी।
चिड़ियों के ये गीत है नारी।
पर्वतों पर छायी हरियाली,
वक्षस्थल पर केश ज्यों नारी।

प्राची लाल, शर्माती नारी।
खिलती कली, मुस्काती नारी।
सुन्दर नहीं, दाड़िम की लाली,
अधर हैं, ज्यों हँसती है नारी।

मंद सुगंधित, पवन है नारी।
ठण्ड में गरम, छुवन है नारी।
प्रेम राग में, झूम रही जो,
नर्तन कला, नर्तकी नारी।

क्रोध में काली, बनती नारी।
प्रेम में खुद को, लुटाती नारी।
जग की सारी पीड़ा सहती,
माता जब बनती है नारी।

खुद से खुद को छुपाती नारी।
मन्द-मन्द, मुस्काती नारी।
लोक लाज से डरती इतनी,
जीवन जेल बनाती नारी।

बेटी के रूप में, प्यारी नारी।
बहिन का प्यार है, राखी नारी।
माँ बन, जब वात्सल्य लुटाये,
खुद को भुलाती, रमणी नारी।

पल-पल समर्पित, तुझको नारी।
तुझे समर्पित जग ये नारी।
तुझ बिन कोई अस्तित्व न नर का,
सब कुछ सौंपा तुझको नारी।

Wednesday, April 29, 2020

धोखे की ठोकर, घायल आत्मा

नारी बिन नर!

                    डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नींद ही जाकर, कहीं सो गई है।
चिंता, दुख से,  बड़ी हो गई है।
तूने,  जब से,  दिया है धोखा,
कोमलता भी, कड़ी,  हो गई है।

नारी बिन, नर! जी नहीं सकता।
स्वयं, जहर, कभी, पी नहीं सकता।
छल, छद्म, षड्यन्त्र, मुकदमें,
अवसाद अमर, कभी मर नहीं सकता।

प्रेम की मूरत, अब कहाँ खो गई है?
मातृत्व की गरिमा, कहाँ सो गई है?
प्रेम, समर्पण, और सृजन की देवी,
नारी! ठगिनी, कैसे  हो गई है?

ठोकर की, अब, चिंता न मुझको।
मैंने, सब कुछ, सौंपा था तुझको।
लोभ-लालच की करके सवारी,
कमाया है जो, देगी वो किसको?

अपने पर,  विश्वास,  बड़ा था।
नारी हित, हो कर्म, अड़ा  था।
धोखे की ठोकर, घायल आत्मा,
अडिग हूँ, पथ पर, जहाँ खड़ा था।

नारी! ठगिनी, कह नहीं, सकता।
ठगा गया हूँ, ठग  नहीं सकता।
सुता, बहिन, माता भी नारी,
नारी बिन, नर रह नहीं सकता।




Thursday, April 23, 2020

झूठा सच!

जो धोखा दे, पत्नी कहते हैं


               

                                                    डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



झूठा सच! हम बोल रहे हैं।
बिना तराजू तोल रहे हैं।
नर-नारी के रिश्ते में अब,
कानून ही विष घोल रहे हैं।

गृह लक्ष्मी अब मेम हो गईं।
चलता फिरता जेम हो गई।
कैसा पति और कैसे बच्चे?
सोशल मीडिया, फेम हो गई।

घर अब आफिस जैसा चलता।
बच्चा भी अब क्रैच में पलता।
पति-पत्नी पद, हुए कानूनी,
विश्वास सूर्य, कपट से ढलता।

पति-पत्नी अब, चलते चालें।
एक-दूजे को, बनें न ढालें।
पति का बीमा, है करोड़ का,
पत्नी सोचे, राम उठा ले।

सुविधाओं को सुख कहते हैं।
रोते-हँसते, सुख सहते हैं।
शादी भी व्यवसाय बन गई,
जो धोखा दे, पत्नी कहते हैं।

प्रेम नाम, हैं  धंधे  होते।
शर्म, हया, अब रिश्ते खोते।
मिलने से, हो जाय, कोरोना,
मिलेगा वही, जो हम हैं बोते।

Wednesday, April 22, 2020

नारी ही, जननी है, नर की

नारी प्राणाधार है



नारी शक्ति, नारी भक्ति, नारी पालनहार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
जन्मदात्री है, नर की, नारी।
प्राकृतिक सखी, सहचरी, नारी।
नारी बिन, नर, नहीं चल सकता,
उँगली पकड़, चलाती नारी।
नारी ही, सृष्टि का मूल है, नारी ही, से घर-द्वार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
नारी ही है, घर को बनाती।
नारी ही है, घर की बाती।
नारी दुर्गा, नारी काली,
प्रेम से, नर को, है नहलाती।
नारी ही की, प्रेरणा पर नर, मर-मिटने को तैयार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
नारी ही सृजन है करती।
प्रेमी के लिए, रति ये बनती।
ज्ञान की देवी, नारी सरस्वती,
गृहलक्ष्मी भी, नारी बनती।
नर को, प्राणों से सहलाकर, नर को देती धार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।

Monday, April 20, 2020

हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना

तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे

                   

हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।
जब तक, तुम नहीं चाहोगी, हम राहों में नहीं आयेंगे।।
नयनों में ही, नहीं बसी हो।
दिल के अंदर, तुम्ही सजी हो।
तुम्हारे बिना, ये जीवन कैसा?
प्रेम से प्यारी, मेरी सखी हो।
तुम्हारे सपनों की खातिर, हम, जीवन भर सो जायेंगे।
हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।
पीछा तुम्हारा, कभी न करेंगे।
तुम्हें देखकर, नहीं, आह भरेंगे।
तुमको खुशियाँ, मिलती रहें बस,
जीवन पथ पर, अकेले चलेंगे।
तुम्हारे पथ पर, पुष्प सजायें, प्रेमी को, गले लगायेंगे।
हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।
तुम्हें न कभी, मजबूरी हो।
सुविधा मिलें, जो, जरूरी हो।
पथ में, न आये, कोई बाधा,
इच्छा हमारी, यह, पूरी हो।
रहो कहीं भी, आनंद से चहको, हम तुम्हें देख मुस्कायेंगे।
हम तुम्हें, प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।

Sunday, April 19, 2020

हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना?

ये अहसास दिला न सके


                                                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।
साथ तुम्हारा, पल पल चाहा, हम, तड़पे कितना? बता न सके।
समय न माँ का, मिला बचपन में।
किताबों में खोये, थे जिदपन में।
युवावस्था, सारी, संघर्ष में बीती,
आज भी, अकेले, हम पचपन में।
नारी हित में, जीये थे पल-पल, साथ कभी भी पा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।
प्रेम छिपा, हम रहे घूमते।
साहस नहीं था, तुम्हें चूमते।
हम तो, दिल की, नहीं कह पाये,
मिली न कोई, जो दिल की पूछते।
कदम-कदम पर, मिलीं कई थीं, दिल की बात, बता न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास, दिला न सके।।
सच्चाई की, चाह थी हमको।
छिपाव कपट बर्दाश्त न हमको।
सब कुछ कह ले, सब कुछ सुन ले,
साथी कोई भी, मिली न हमको।
कदम-कदम पर प्यार लुटाया, विश्वास किसी का पा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।
कभी किसी से, कुछ नहीं चाहा।
सच बोले बस, वह भी न पाया।
मैंने सब कुछ, सौंप दिया था,
सब कुछ छिपाकर, क्यों भरमाया?
प्यार के नाम क्यों, मिलते धोखे? हम, अपने को समझा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।

Thursday, April 16, 2020

नारी नहीं है नर पर भारी

ईश्वर की वह रचना प्यारी



                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नारी नहीं है नर पर भारी।
ईश्वर की वह रचना प्यारी।
कुछ इच्छाएँ, उसकी भी हैं,
सजाती हमारी जीवन क्यारी।

पूजा नहीं बस प्रेम चाहिए।
थोड़ा सा सम्मान चाहिए।
जन्म लेने दो, जीने दो,
उड़ने को आसमान चाहिए।

संपत्ति की, नहीं है इच्छा।
दे लेंगी हम, कठिन परीक्षा।
सोना चाँदी, नहीं चाहिए,
स्कूल भेजो, दे दो शिक्षा।

शिक्षा अनुरूप, काम चाहिए।
खुली हवा में श्वांस चाहिए।
सुरक्षित बाहर घूम सकें हम,
सुरक्षित  वातावरण  चाहिए।

पराये घर की कहा न जाए।
अधिकारों को लड़ा न जाए।
मायके की ना भेंट चाहिए, 
दान करो हमें, सहा न जाए।

आँसू अब तक बहुत बहाये।
महिला हैं, अबला कहलाये।
अपना भाग्य, खुद ही लिखेंगी,
देवी कह, अब तक,  बहलाये।

घृणा नहीं, हम, प्रेम हैं करतीं।
मुस्कानों  से  पीड़ा  हरतीं।
कदम-कदम  बाधाएँ  आएँ,
मौत से भी हम नहीं हैं डरतीं।

आरक्षण,  हमें  नहीं चाहिए।
दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।
यह घर भी अपना कहलाए,
उस घर का भी प्यार चाहिए।

राष्ट्रप्रेमी बस मान चाहिए।
जीने के अरमान चाहिए।
सब कुछ अर्पण कर दूँगी मैं,
दया नहीं, स्वाभिमान चाहिए।

पिता से थोड़ा दुलार चाहिए।
भाई से, बहन का, प्यार चाहिए।
सब कुछ देकर, थोड़ी आशा,
सखा! सदैव, बस साथ चाहिए।

तन मन धन सब अर्पण है।
मेरा  उर, तेरा  दर्पण है।
नर-नारी हम पूरक दोनों,
कर दूं, सब तुझको अर्पण है।

साथ में मिलकर, हम होते पूरे।
अलग-अलग, दोनों ही अधूरे।
अपना अपना, आपा मिटा कर,
जग के सपने, हम कर दें पूरे।

Tuesday, April 14, 2020

प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है

प्रेम की देवी

                                    

प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करूणा की तू खान है।
बेटी, बहिन, पत्नी, माता बन, जग का रखती ध्यान है।।
कार्य क्षेत्र की, नहीं कोई सीमा।
आश्वासन  ही, है  बस  बीमा।
अंदर बाहर, काम ये करतीं,
कल्पना, करीना या हो हसीना।
अदम्य जिजीविषा है अन्तर में, मानिनी मन की मान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।
बचपन  से है,  मुझे दुलारा।
गुस्से में भी,  दिया  सहारा।
दौड़ी-दौड़ी,  आई  माता,
पीड़ा में, जब भी मैंने पुकारा।
पति, पुत्र, पिता, भाई हित, खुद को करे कुर्बान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।
समान नहीं, तू अति विशिष्ट है।
सब कुछ तुझमें, अन्तर्विष्ट है।
सीमाएं जब, नर है लांघता,
काली बनकर, करे शिष्ट है।
तन-मन-धन सब करूँ समर्पित, करूँ समर्पित ज्ञान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।

Monday, April 13, 2020

प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू

तू ही रस की खान है


                                     


प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।
तू ही प्रेम की सीमा मेरी, मेरे उर की जान है।।
केशोें की ये, काली घटायें।
नयन कालिमा, कुटिल फिजायें।
कपोल लालिमा, सौन्दर्य बिखेरे,
उर पर ताले, मदमस्त कुचायें।
सरस रसीली, चितवन, चित को, चित्रित करती मान है।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।।
नासिका मानो, शुक है विराजा।
अधरों की सुरखी, उसका खाजा।
चाल अदा, आमंत्रित करती,
इंतजार है, पिया  आजा।
नयन नजर है, मिलन प्रतीक्षा, कपोल लालिमा आन है।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।
बलखाती कटि, चलती है जब।
सभाल ले आंचल, कलि बिखरे कब?
चाहत चाहूँ, रहे चहकती,
तू ही प्यार है, तू ही है रब।
जीवन का आधार प्रेम है, मैं गाऊँ प्रेम के गान हैं।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।

Sunday, April 12, 2020

सृष्टि का आधार तुम्हीं हो

नर की संगिनी आली हो

                                     

नारी नहीं, नई नवेली, रचना अजब निराली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
मधुर आवाज में, नर विंध जाता।
मुस्कान पर, मर मिट जाता।
अधरों के रसपान को ये नर,
ब्रह्माण्ड में, सबसे भिड़ जाता।
नर का आकर्षण, पाकर के, तुम होती मतवाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
अंग-अंग सौन्दर्य समाया।
कातिल कैसा? हुस्न ये पाया।
छाती की, गोलाइयों ने ही,
नर को तेरा गुलाम बनाया।
कैसे प्रेमी बच पायेगा? मारक गालों की लाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
कमर कटीली, चाल मदमाती।
नर हो जाता, मदमस्त हाथी।
मर्यादा कोई, ठहर न पाये,
जब तुम, उसको पास बुलातीं।
जान हथेली पर रखकर के, करता वह  रखवाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।

Friday, April 10, 2020

भावों की सरिता है उर में,

भावों की सरिता है उर में

                                         डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।
आश्चर्य, घृणा, जुगुप्सा और भय, किंतु प्रेम सबसे हटकर है।
क्षणिक भाव हैं, आते-जाते।
हँसते हैं कभी, कभी रुलाते।
क्रोध में जाग्रत विवेक न रहता,
प्रेम गान जड़ चेतन गाते।
निर्वेद, हास और उत्साह से, प्रेम का मुकाबला डटकर है।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।
शोक, वात्सल्य और रति में।
जीवन की इस मंथर गति में।
प्रेम की माया, अजब निराली,
पत्नी अनुरक्त प्रेम से पति में।
प्रेम से सारे झगड़े मिटते, प्रेम से मिलते जब हँसकर हैं।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।
प्रेम समाया अंग-अंग में।
जरूरी नहीं, चले संग-संग में।
सबसे प्रेम, हम पथिक प्रेम के,
नहीं किसी के रंगे रंग में।
मानते है हम नियम कायदे, किंतु प्रेम सबसे चढ़कर है।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।


Thursday, April 9, 2020

रेगिस्तान में उड़ता रेत नर, नारी ज्यों फुलवारी है

नारी के बिन नर है अपूरण


                                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।
उड़ता हुआ बीज ज्यौं है नर, पौषण देती क्यारी है।
सुंदर और सरस है रमणी।
गोरी हो या  काली चमड़ी।
कठिन समय की खातिर देखो,
संचित करती है वह दमड़ी।
कोमल है वह शक्ति पुंज है, विधि की रचना न्यारी है।
 नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।
नारी बिन, नहीं है जीवन।
नर को देती नित संजीवन।
सरस स्पर्श और दिव्य दृष्टि से,
पोषण करती, देती जीवन।
माता, भगिनि, पत्नी प्रयसी, पुत्री भी जान से प्यारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।
नर नारी का विरोध नहीं है।
सरस प्रेम है, किरोध नहीं है।
तर्क-वितर्क और नोंकझोंक है,
आत्म मिलन में निरोध नहीं है।
रेगिस्तान में उड़ता रेत, नर, नारी ज्यों फुलवारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।
राष्ट्रप्रेमी को प्रेम मिला है।
प्रणय काल में पुष्प खिला है।
झूठ कपट की मूरत बनकर,
नारी ने ही दिया सिला है।
विध्वंस में भी प्रेम का कलरव, सृष्टि की किलकारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।