Wednesday, June 16, 2021

सभी को हम हैं, मित्र मानते

 सभी को माने सहेली है                       


कण्टक पथ के पथिक हैं हम, खतरों से अठखेली है।

सभी को हम हैं, मित्र मानते, सभी को माने सहेली है।।

साथ में हमने जिसे पुकारा।

हमारे पथ से किया किनारा।

छल, कपट से विश्वास में लेकर,

विश्वासघात का वज्र है मारा।

नहीं साथ कोई आएगा, राह मेरी अलबेली है।

सभी को हम हैं, मित्र मानते, सभी को माने सहेली है।।

नहीं हमारा कोई ठिकाना।

मालुम नहीं, कहाँ है जाना।

साथ में कोई क्यों आएगा?

आता नहीं, स्वार्थ का गाना।

जीवन पथ के सच्चे पथिक हैं, जीवन नहीं पहेली है।

सभी को हम हैं, मित्र मानते, सभी को माने सहेली है।।

हमको घर ना कोई बसाना।

हमको रोज कमाकर खाना।

धन, पद, यश, तुम्हें चाहिए,

हमको पथ ही लगे सुहाना।

कष्टों में पल बड़े हुए हम, मृत्यु से खेला-खेली है।

सभी को हम हैं, मित्र मानते, सभी को माने सहेली है।।

 


Sunday, June 13, 2021

भय भी हमें भयभीत न कर सके

हमको कौन डराएगा?

                                      


 सबके सुख की बातें करते, लेकिन दुःख ही बाँट रहे हो।

देख रहे हो, सबकी कमियाँ, अपने को ना आँक रहे हो।

औरों की नजरों में क्या हो? इस पर विचार करो तुम प्यारे,

अपनी ढपली-अपना राग, तुम, अपनी ही हाँक रहे हो।


भय भी हमें भयभीत न कर सके, हमको कौन डराएगा?

किसी से कोई होड़ नहीं, फिर, हमको कौन हराएगा?

प्रेम और विश्वास बिना, हमसे कुछ भी मिल न सकेगा,

नहीं ठहरना हमको कहीं पर, हमको कौन भगाएगा?


अपना काम मस्ती से किए जा, कर किसी की परवाह नहीं।

जो भी आए, स्वागत कर तू, करनी, किसी की चाह नहीं।

कोई न अपना, कोई न पराया, स्वार्थ से  है संबन्ध होते,

कहता कुछ, और करता कुछ, किसी के मन की थाह नहीं।


नहीं चाह है, नहीं कामना, कर्म पथ, जो मिले सही।

आज यहाँ है, कल वहाँ होगा, तेरे लिए सब खुली मही।

धन, पद, यश संबन्ध क्षणिक सब, प्यारे, इनसे मोह को तज,

कैसा भय? और कैसी चिंता? बेपरवाही की बाँह गही।


संग-साथ की इच्छा से आई, कैसे अकेली रह पाऊँगी?

साथ छोड़कर जाते हो यूँ, मैं रक्त के अश्रु बहाऊँगी।

अकेले छोड़कर जाना था तो, शादी क्यों की तुमने मुझसे,

काम-काज में बीतेंगे दिन, क्यूँ कर रात बिताऊँगी?


परदेश को प्यारे जाते हो, मैं यादों में अश्रु बहाऊँगी।

हर पल क्षण याद तुम आओगे, मैं गीत तुम्हारे गाऊँगी।

दिन में तो होगें काम बहुत, बीत जाएगा किसी तरह,

यह तो बतलाकर जाओ, रात को कैसे जी पाऊँगी?


Wednesday, June 9, 2021

पापों की तू रचना काली

 

    कभी न बने घरवाली है


बाहर से ही नहीं, सखी तू, अन्दर से भी काली है।

पापों की तू रचना काली, कभी न बने घरवाली है।।

छल-कपट, षड्यंत्र की देवी।

तू है, केवल धन की सेवी।

प्रेम का तू व्यापार है करती,

प्रेम नाम, प्राणों की लेवी।

धोखा देकर, जाल में फांसे, यमराज की साली है।

पापों की तू रचना काली, कभी न बने घरवाली है।।

धन से खुश ना रह पायेगी।

लूट भले ले, पछताएगी।

नारी नहीं, नारीत्व नहीं है,

पत्नी कैसे बन पाएगी?

पत्नी प्रेम की पुतली होती, तू तो जहर की प्याली है।

पापों की तू रचना काली, कभी न बने घरवाली है।।

साथ में सबके, कहे अकेली।

कपट के खेल कितने है खेली?

शाप किसी का नहीं लग सकता,

कैसे होगी? कालिमा मैली।

विश्वासघात कर, पत्नी कहती, लगे जंग की लाली है।

पापों की तू रचना काली, कभी न बने घरवाली है।।

दुष्टता से तू चाहे जीतना।

लूट रही तू, हमें रीतना।

दुरुपयोग कानूनों का करके,

कभी मिलेगा, तुझे मीत ना।

मोती सा फल चाह रही है, बंजर है, सूखी डाली है।

पापों की तू रचना काली, कभी न बने घरवाली है।।


Tuesday, June 8, 2021

समय नहीं है, अब बचपन का

समय आ रहा, अब पचपन का


अधर मंद, मुस्कान विराजे।

वक्षों पर काले, केश हैं साजे।

नयनों में है, प्यास प्रेम की,

कामना नयन, पलक हैं लाजे।


चाहत तुमरी, कह ना, पाऊँ।

पास में तुमरे,  कैसे  आऊँ?

वियोग व्यथा से, पीड़ित उर,

चेहरा तुम्हारा, देख न पाऊँ।


आओगी, यह वादा किया था।

दूर से पास के, क्षण को जिया था।

हम अब भी, यादों में जीते,

देख चित्र, जो तुमने दिया था।


वायदा अपना, भूल गयी हो।

हमारे लिए, नित ही नयी हो।

मैं तो खड़ा, प्रेम के पथ में,

प्रेम के पथ को, भूल गयी हो।


दुनियादारी मंे  खोई हो।

पाल रहीं, जिसको बोई हो।

हम यादों में, करवट बदलें,

चैन की नींद, प्यारी सोई हो।


जहाँ था, छोड़ा, वहीं खड़े हैं।

जीवन जीना,  भूल, अड़े हैं।

ठोकर मार, चली गईं तुम,

करते प्रतीक्षा, वहीं पड़े हैं।


वायदा किया था, वायदा निभाओ।

एक बार आ,  गले मिल जाओ।

बीस वर्ष का, प्रेम हुआ बालिग,

प्रेम को तज, ना, कायदा निभाओ।


समय नहीं है, अब बचपन का।

समय आ रहा, अब पचपन का।

तुम्हारी चाहत में हैं टूटे,

काम करें, हम फिर बचपन का।


कुछ ही पलों को, भले ही आओ।

प्रेम-सुधा का, इक, घूँट पिलाओ।

दुनियादारी भूलो,  कुछ पल,

कस के, हमको, गले लगाओ।


साथ भले ही, ना रह पायें।

इक-दूजे को, ना बिसरायें।

यादें मधुर हैं, फिर जी लेंगे,

मधुर पलों में, युग जी जायें।


Friday, June 4, 2021

तू ही अर्धांगिनी नहीं है मेरी

 मैं भी अर्धांग तेरा हूँ

                                        


तू ही अर्धांगिनी नहीं है मेरी, मैं भी अर्धांग तेरा हूँ।

तू दिल का राजा, कहती, रानी, मैं तेरा चेरा हूँ।।

नारी ने नर को चलना सिखाया।

नारी ने जन्मा, दूध पिलाया।

नारी बिन, अस्तित्व न नर का,

नारी प्रेम ने, नर को मिलाया।

जब-जब मैं भटका हूँ, पथ से, तूने ही तो टेरा हूँ।

तू ही अर्धांगिनी नहीं है मेरी, मैं भी अर्धांग तेरा हूँ।।

नारी प्रेरणा है, हर नर की।

नारी आधार है, इस भव की।

तुझसे ही तो, घर है बसता,

तू ही लक्ष्मी, है घर-घर की।

तू है, मेरे उर की शेरनी, मैं भी तो तेरा शेरा हू।

तू ही अर्धांगिनी नहीं है मेरी, मैं भी अर्धांग तेरा हूँ।।

तेरे बिन है, नीरस जीवन।

तू ही साज, तू ही है सीवन।

अधर तेरे अमृत के प्याले,

तू ही प्राण, तू ही संजीवन।

तू ही, मेरे प्राणों की कुटिया, मैं, भी, तेरा खेरा हूँ।

तू ही अर्धांगिनी नहीं है मेरी, मैं भी अर्धांग तेरा हूँ।।


Wednesday, June 2, 2021

ऊपर अब नारी चढ़ी,

नर को आती लाज

     


गए जमाने बीत वह, कहलाते थे नाथ।

हम तुमको ही नाथ दें, नहीं चाहिए साथ।।


पिजड़ों को हम तोड़कर, आज हुईं आजाद।

हमको घर ना चाहिए, ना सजने का साज।|


आई लव यू कह ठगी, ठग कर साधे काज।

विधान का कोड़ा चला, नर पर नारी  राज।।


छेड़छाड़ के केस में, पल में देत फंसाय।

किसकी मजाल, देख ले, बिन मर्जी कह हाय।।


सास-ससुर, चलती कहा, ना पति की है खैर।

झूठे दहेज केस से, निकले सारा वैर।।


हमने तो अब छोड़ दी, लाज, शर्म औ आन।

सब नर के जिम्मे किए, कहकर तुम हो जान।।


मरजी से सब कुछ करें, बलात्कार का केस।

नारी को जब खुश करें, बदल जात तब वेश।।


पढ़ी-लिखी नारी भली, करती है सब काज।

ऊपर अब नारी चढ़ी, नर को आती लाज।।


नारी नर को छोड़ कर, लग विकास की दौड़।

दोनों मिल आगे बढ़ो, करो न कोई होड़।।


नारी अब है जग रही, नर के चलती साथ।

शिक्षा में आगे बढ़ी, थामे नर का हाथ।।


Monday, May 31, 2021

प्रेम की चाहत, सबको रहती

 नर हो, या फिर नारी है

           



प्रेम की चाहत, सबको रहती, नर हो, या फिर नारी है।

नर, नारी को, प्यारा है तो, नारी, नर को प्यारी है।।

इक-दूजे बिन, रह नहीं सकते।

वियोग व्यथा वे, सह नहीं सकते।

इक-दूजे हित, सब कुछ अर्पण,

प्रेम है, इतना, कह नहीं सकते।

कोई किसी से, नहीं बड़ा है, कोई न किसी पर भारी है।

नर, नारी को, प्यारा है तो, नारी, नर को प्यारी है।।

नारी बिन, घर, भूत का डेरा।

नारी ही बनाती, स्वर्ग बसेरा।

नारी से रंगत, रजनी की है,

नारी ही से, शुभ है सबेरा।

नर प्रेम में, नहीं है जीता, नारी, कभी,  न  हारी है।

नर, नारी को, प्यारा है तो, नारी, नर को प्यारी है।।

नारी ने नर को, नित है दुलारा।

नर ने है पल-पल उसे पुकारा।

माता, सुता, भगिनी के रूप में,

पत्नी ने भी, पथ है  बुहारा।

नर देव है, देवी है नारी,  देव-देवी की  यारी है।

नर, नारी को, प्यारा है तो, नारी, नर को प्यारी है।।


Saturday, May 29, 2021

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है

 प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है


            


प्रेम अमर है,  कभी न मरता,  प्रेम,  प्रेम का, जीवन है।

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है, प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है।।

प्रेम न देखे, उम्र की सीमा।

प्रेम ही है, बस, प्रेम का बीमा।

परंपराओं में, प्रेम न बँधता,

प्रेमी को, प्रेम ही, बड़ी हसीना।

प्रेम,  प्रेम का, पथ प्रदर्शक, प्रेम विश्वास का, खीवन है।

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है, प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है।।

प्रेम ही जीने की इच्छा है।

प्रेमी न लेता,  परीक्षा है।

प्रेम ही चाह, प्रेम कामना,

प्रेम की, मिले न भिक्षा है।

प्रेमाराम की,  प्रेम कामना, प्रेम ही,  प्रेमा का, जीवन है।

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है, प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है।।

प्रेम ही नर है, प्रेम है नारी।

प्रेम, प्रेम पर, नहीं है भारी।

नर को नारी का प्रेम चाहिए,

नारी! प्रेम में, उतारे  सारी।

प्रेमी को, तन-मन सब अर्पण, प्रेम का, प्रेम ही, जीवन है।

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है, प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है।।

प्रेम नहीं है, केवल भावना।

प्रेमी करे न, कोई कामना।

सब कुछ देना, सब कुछ पाना,

नहीं है, केवल, हाथ थामना।

प्रेम में हँसना, प्रेम में रोना, पथिक को, प्रेम ही, जीवन है।

प्रेम ही पथ है, प्रेम पथिक है, प्रेम ही, प्रेम का, पूजन है।।


Friday, May 28, 2021

साथ चाहा था, हर पल तुमने,

  किंतु साथ हम रह न सके

                

हम प्यार करते हैं, कितना! कभी किसी से कह न सके।

साथ चाहा था, हर पल तुमने, किंतु साथ हम रह न सके।।

हम भी तड़पे, तुम भी तड़पी।

अलग हुए, तुम किसी ने हड़पी।

तुमने उस पर विश्वास किया,

इधर भी तड़पी, उधर भी तड़पी।

हम थे तुम्हारा विकास चाहते, प्रेम का मार्ग दिखा न सके।

साथ चाहा था, हर पल तुमने, किंतु साथ हम रह न सके।।

जिस पथ पर तुम हमें मिलीं थीं।

पड़ी हुई, अधकुचली कली थीं।

हम भी, यूँ ही, भटक रहे थे,

हम भी सँभले, तुम भी खिलीं थीं।

पथ था रोका, तुमने हमारा, किंतु हाय! हम रुक न सके।

साथ चाहा था, हर पल तुमने, किंतु साथ हम रह न सके।।

पथ कठिन, तुम चलतीं कैसे?

मेरे साथ, तुम रहतीं कैसे?

तुमको, सबको, अच्छा था दिखना,

सच के पथ पर, चलतीं कैसे?

कटु सत्य कह देते हैं हम, प्रेम गान कभी हम, गा न सके।

साथ चाहा था, हर पल तुमने, किंतु साथ हम रह न सके।।

तुमने सब कुछ सौंपा था हमको।

मैं न दे सका, कुछ भी तुमको।

चन्द क्षणों को, मिले भले ही,

विछड़न पीड़ा,  अब भी हमको।

प्रेम नहीं है, किसी से हमको, दिल से तुम्हें, मिटा न सके।

साथ चाहा था, हर पल तुमने, किंतु साथ हम रह न सके।।


Thursday, May 27, 2021

चरैवेति सृष्टि की चाल है

                                                                                  

          समय कभी ना रुकता है                            


ऊपर वह ही चढ़ पाता है, समय-समय जो झुकता है।

चरैवेति सृष्टि की चाल है,  समय कभी ना रुकता है।।

खुद ही बन लो, नहीं बनाओ।

स्वयं ही समझो, ना समझाओ।

लेना नहीं,  देना चाहे  बस,

व्यर्थ की सीख, न उसे सिखाओ।

समय सदुपयोग, पल पल कर, यह ही जीवन मुक्ता है।

चरैवेति सृष्टि की चाल है,  समय कभी ना रुकता है।।

कोई भी, स्थाई मित्र नहीं है।

रंग न उड़े, कोई चित्र नहीं है।

मरना सबको, सब नश्वर हैं,

लालच, धोखा विचित्र नहीं है।

उचित समय पर, सब छूटेगा, भले ही कितना युक्ता है।

चरैवेति सृष्टि की चाल है,  समय कभी ना रुकता है।।

साथ आज जो, वही मित्र है।

प्रेम ही जीवन, प्रेम  इत्र है।

सब कुछ अपना, ना है पराया,

षड्यंत्र फिर भी, कितना विचित्र है?

समय चक्र, कभी न रुकता, व्यवस्था बनी ये पुख्ता है।

चरैवेति सृष्टि की चाल है,  समय कभी ना रुकता है।।


Wednesday, May 26, 2021

कष्ट सारे, छूमन्तर होते

जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं


 नर-नारी मिल, साथ-साथ चल, सुख का माहोल बनाते हैं।

कष्ट सारे,  छूमन्तर होते,  जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं।।

साथ आए, सब चिंता छोड़ो।

दुख्खों से नाता, तुम तोड़ो।

कदम-कदम करे, मस्ती प्रतीक्षा,

सुख की ओर, मुख तुम मोड़ो।

वाद्य यंत्रों संग, मिलकर ही तो, सुर को, संगीत  बनाते हैं।

कष्ट सारे,  छूमन्तर होते,  जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं।।

शिकवा-शिकायत भूल जाओ तुम।

प्रेम गान मिल, नित  गाओ तुम।

पथ में, पग-पग पर हैं  बाधा,

पार करो, और बढ़ जाओ तुम।

अलग-अलग,  अकेले भटकन,  मिल परिवार बनाते हैं।

कष्ट सारे,  छूमन्तर होते,  जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं।।

साथी के साथ, खुश रहना सीखो।

रूकना नहीं, तुम  बहना  सीखो।

नारी बिन नर, नीरस जीवन,

जीवन रस, पीना, पिलाना सीखो।

नर-नारी मिल, प्रेम से रहकर, घर को स्वर्ग बनाते हैं।

कष्ट सारे,  छूमन्तर होते,  जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं।।

मिलने से, परिवार है बनता।

टूटेगा, यदि, कोई है छलता।

विश्वास बीज है, संबन्धों का,

विश्वास से ही है, प्रेम निकलता।

विश्वासघात कर, साथ, जो चाहें, खुद को मूर्ख बनाते हैं।

कष्ट सारे,  छूमन्तर होते,  जब,  प्रेम गान मिल  गाते हैं।।


बेटी की विदाई

जी भर रोया!!

                      श्री तेजपाल शर्मा, मथुरा


पाणिग्रहण की /रीति पूर्ण कर

सात वचन औ'/सात फेरों की/

रीति पूर्ण हुई/सजधज कर/

जब बेटी मेरी/चलने को तैयार /खड़ी थी/

कुछ मंगल गीतों की/धुन को कुछ महिलाएँ /ध्वनित कररही।

बेटी धीर धीरे/उनके साथ बढ़ रही।


पास में आई/मेरे तो मन व्यथित हुआ था/

देखा मेरे पार्श्व में/मेरा छोटा भाई/

विगलित होकर/अश्रु बहाकर/

बहुत दुखी था।


उसे देख/मैंने अपने /आंसुओं को रोका

जैसे मानो/हृदयहीन/

पाषाण हृदय मैं

और 

चाहकर भी मैं/इस क्षण रो न सका था।

कैसे रोता?

विकट प्रश्न था/

सबसे बड़ा/सभी को /मुझको ही तो/

सब कुछ समझाना था।


मुड़कर/बेटी मेरे संमुख/

जब थी आई/

खुश रहो!

खुश रहो!!

की आशीष/मैंने दुहराई


और 

गटक कर/सारे आंसू/पूर्ण वेदना

बेटी को/पाषाण हृदय /

दे रहा विदाई।


तो

क्या मैं/

कोई हृदयहीन/पाषाण हृदय था???

नहींं

नहींं/मैं सरल हृदय हूं/

अति भावुक हूं।

कोई पूछे

मुझसे /

कैसे?

सहन कर सका??

अपनी पीड़ा/

नहीं बहा/पाया मैं आंसू

किंतु

विदाई की वेला/बिटिया की देखी

सबसे छिपकर

विलख  विलख कर/

जी भर रोया!


जी भर रोया!!


औ'

बेटी की विदाई/

पर मैं

सचमुच रोया!

जी भर रोया!!

Tuesday, May 25, 2021

हाथ-थाम, जब, दोनों चलते

कोई पथ ना, इनको भारी

         
सीधा-सच्चा पथ है मेरा।
नहीं करता, मैं मेरा तेरा।
ना कोई अपना, ना है पराया,
सबका अपना-अपना घेरा।

नर-नारी का इक है डेरा।
मिलते जहाँ, वहाँ बने बसेरा।
नारी नर बिन, नहीं रह सकती,
नर, नारी का ही, है चेरा।

जीवन पथ पर पथिक हैं मिलते।
संबन्धों के, पुष्प हैं खिलते।
सह-अस्तित्व है, प्रकृति सिखाती,
संबन्धों को, प्रेम से सिलते।

आओ हम मिल, जग को सजायें।
जहाँ, मुस्काती हों, सभी फिजायें।
नर-नारी  में मैत्री  भाव हो,
ना, अपराध हो, ना हों  सजायें।

आओ देखें, हम, इक सपना।
कोई न पराया, हर है अपना।
मानवता के भाव हर उर में,
नहीं किसी को, पड़ेगा तपना।

भिन्न-भिन्न ना, नर और नारी।
वो है प्यारा,  वो है प्यारी।
इक-दूजे के हित हम जीते,
नारी नहीं है, नर से न्यारी।

नहीं किसी की, कोई बारी।
इक-दूजे की संपत्ति सारी।
हाथ-थाम, जब, दोनों चलते,
कोई पथ ना, इनको भारी।

Monday, May 24, 2021

अकेलेपन की साथी कविता

 जहाँ न पहुँच सकता है सविता

         

अकेलेपन  की साथी  कविता।

जहाँ न पहुँच सकता है सविता।

सुनती, रोती, गाती है  जो,

मेरी सखी,  सहेली कविता।


कोई न मेरी बात है सुनता।

मैं  अपने सपनों को बुनता।

संग-साथ  ना कविता छोड़े,

भाव-शब्द, निश-दिन हूँ चुनता।


कविता ने है, मुझे सँवारा।

पीड़ा में  है,  मुझे दुलारा।

हृदय से मेरे, निकल के आई,

जब-जब मैंने, उसे पुकारा।


कविता ने है, स्नेह लुटाया।

कभी नहीं, धन मान जुटाया।

हृदय में मेरे,  बसी हुई है,

कभी नहीं,  अधिकार जताया।


प्रेमिका जैसी, माँग नहीं है।

पत्नी की तकरार  नहीं है।

भावानुगामिनी  मेरे उर की,

किसी की करे परवाह नहीं है।


संबन्धों से पीड़ित जब होता।

बंधनों से, जब, है मन रोता।

कविता के आँचल में छिप,

लगाता प्रेम सुधा में गोता।


Saturday, May 22, 2021

अपने बनकर देते, धोखे

मिल  जाते हैं, उनको मौके

           


समय मिला, कुछ करना है।

मिलकर,  आगे बढ़ना   है।

शिखरों पर  चढ़कर के ही,

घाटियों में  हमें उतरना है।


प्रेम नहीं, आतंकित  करता।

बूँद-बूँद से, घड़ा है भरता।

गति के साथ, अविरल चल,

जन, जीवन यात्रा पूरी करता।


चिकने पथ भी, बहुत मिलेंगे।

चलेंगे उन पर, वह फिसलेंगे।

ऊबड़-खाबड़ पथ है अपना,

ठोकर खाकर भी  पहुँचेंगे।


पढ़े बहुत, पर नहीं हैं सीखा।

नेत्र भले ही, पथ नहीं दीखा।

समय बीत गया, पहुँच न पाए,

करते रहे,  औरों पर  टीका।


अवसर गया,  न फिर आएगा।

जो बोएगा,  वह ही खाएगा।

पल-पल समय का उपयोग कर,

वरना  बाद में  पछताएगा।


सुःख- दुःख आते जाते रहते।

जीवन में सब ही कुछ सहते।

रूक  जाना है, मृत्यु निशानी,

जीवित हैं, जो हैं, नित बहते।


अपने  बनकर  देते,  धोखे।

मिल  जाते हैं, उनको मौके।

विश्वासघात से घायल कर,

खुद ही लगाते, छक्के-चैके।


सब कुछ सहकर बढ़ना है।

कष्टों से खुद को गढ़ना है।

थकान हुई, विश्राम कुछ करो,

शिखरों पर तुम्हें चढ़ना है।


किसी वस्तु की चाह नहीं है।

अपनी भी  परवाह  नहीं है।

पढ़ना-लिखना भी  निरर्थक है,

बनाता यदि  इंसान नही है।


नेता और अधिकारी  बनते।

नौकरी के नित, ख्वाब हैं पलते।

आई ए एस, सी ए मिल जाते,

प्रबंधक मिलें, इंसान  न मिलते।


सब  अपना-अपना  राग अलापें।

मुश्किल पड़े,  ऐसी  में  काँपे।

निज  कर्तव्यों को समय न मिलता,

व्यर्थ शिकायतों से नहीं धाँपे।


मुफ्त का सबको, माल चाहिए।

कर्तव्य  नहीं, अधिकार चाहिए।

काम नहीं, नित माल मिले बस,

ऐसा सबको  रोजगार चाहिए।

 


Tuesday, May 18, 2021

सशक्तीकरण का, युग है भाई

 नारी नर पर भारी है

            

सशक्तीकरण का, युग है भाई, नारी नर पर भारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली, घर की पट रानी।

बड़े-बड़ों को, पिलाती पानी।

अप्रसन्न हो गयीं, किंचित भी,

नर को याद दिलाती नानी।

घर ही नहीं, कार्यस्थल पर भी, प्रेम से चलाती आरी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

शिक्षा में अब, नर से आगे।

गुस्से से अब, भूत भी भागे।

नर की इज्जत लूट रही है,

अधिकारों हित, नारी जागे।

अत्याचार सहे थे अब तक, अब नारी की बारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली का खिताब है छोड़ा।

कर्तव्यों से, रिश्ता  तोड़ा।

नर के पीछे दौड़ रही है,

कानून का ले, हाथ में कोड़ा।

नारी को अधिकार मिले सब, नर की जिम्मेदारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।


Sunday, May 16, 2021

सबका अपना-अपना चिंतन

 अपना-अपना राग है

          


सबका अपना-अपना चिंतन, अपना-अपना राग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


अपनी-अपनी ढपली सबकी, अपना-अपना राग।

कोई छल-कपट कर लूटे, कोई करता त्याग।

सीधे-सच्चे पथ पर, चलकर खोज रहा वो शांति,

दूजा दुनिया को, पाने को, करता भागम भाग।

विविधतामयी, विश्व ये देखो, पानी के संग आग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


दाल-रोटी पाकर केवल, वह रहता कितना शांत?

ऐश्वर्य में सुख, ढूढ़ रहा है, दूजा कितना भ्रांत।

प्रगति पथ प्रशस्त कर, दिखाए सबको  राह,

दूजा विध्वंश का बन नायक, जग को करे अशांत।

पिज्जा बर्गर को बिकती वह, इसको भाता साग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


चकाचैंध, रंगीली दुनिया, नहीं होती यहाँ, रात।

जहाँ, प्रेम के नाम पर, बिकते हैं, हर पल गात।

एक सेवा के पथ पर बढ़, देता खुद को त्याग,

दूजा आसमान में उड़ता, करे न, धरणि से बात।

इधर देर तक, नींद न खुलती, उधर भोर ही जाग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


Friday, May 14, 2021

पुदीने की पहचान

 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र युवा कवि  गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित मिट्टी की खुशबू का गान गाती कविता प्रस्तुत है-

खुद का दुख!

                                              गोलेन्द्र पटेल

दुख की दुपहरिया में

मुर्झाया मोथा देख रहा है

मेंड़ की ओर

मकोय पककर गिर रही है

नीचे

(जैसे थककर गिर रहे हैं लोग

तपती सड़क पर...)

और

हाँ,यही सच है कि पानी बिन

ककड़ियों की कलियाँ सूख रही हैं

कोहड़ों का फूल झर रहा है


गाजर गा रही है गम के गीत

भिंड़ी भूल रही है

भंटा के भय से

मिर्च से सीखा हुआ मंत्र

मूली सुन रही है मिट्टी का गान


बाड़े में बोड़े की बात न पूछो

तेज हवा से टूटा डम्फल

ताड़ ने छेड़ा खड़खड़ाहट-का तान


ध्यान से देख रही है दूब

झमड़े पर झूल रही हैं               अनेक सब्जियाँ

(जैसे - कुनरू , करैला, नेनुआ, केदुआ, सतपुतिया, सेम , लौकी...)


पास में पालक-पथरी-चरी-चैराई चुप हैं

कोमल पत्तियों पर प्यासे बैठे पतंगें कह रहे हैं

इस कोरोना काल में

पुदीने की पहचान करना 

कितना कठिन हो गया है


आह!                                     

आज धनिया खोटते-खोटते

खोट लिया मैंने                          

खुद का दुख!


जिंदादिली से जीना है तो

 कांटों में भी खिलना होगा

             

साथ न कोई चल पाएगा, अकेले पथ पर बढ़ना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

सुख-दुख जैसी, कोई चीज ना।

कायरता का, कहीं, पड़े बीज ना।

सबके हैं, अपने-अपने  स्वारथ,

धीरे-धीरे, तुझे पड़े, खीज ना।

साथी भले ही, साथ राह में, सावधान हो चलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

ना कोई अपना, ना है पराया।

मित्र दिखे, हर चेहरा मुस्काया।

विश्वास किया है, जिस पर तूने,

विश्वासघात का, अस्त्र थमाया।

आकर्षण पग-पग, जाल हैं, तुझको, उनसे बचना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

किसी से, करनी नहीं, शिकायत।

पढ़नी नहीं, मुझे, धर्म की आयत।

ठोकर खाकर, पग-पग बढ़ना,

कर्मवीर को, शुभ हैं, सब सायत।

काम बहुत है, समय ढल रहा, समय के साथ, ढलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।


Wednesday, May 12, 2021

जिनको अपना, समझ रहा था

 उनसे ही विष पीना  होगा

              


सब की खातिर, जीकर देखा, खुद की खातिर जीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

परिवर्तन का, दंभ भरा था।

संवेदना का,  दर्द हरा था।

कदम-कदम, ठोकर खाकर भी,

नहीं कभी, संघर्ष मरा था।

अपेक्षा सभी की, पूरी न होतीं, सब कुछ कर, कमीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

लीक से हटकर, चलता है जो।

समाज का कंटक बनता है वो।

उपलब्धि कितनी भी पा ले,

अंत में अकेला, मरता है वो।

करनी नहीं, किसी से आशा, बहाना खुद ही, पसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

अकेले ही, फिर से बढ़ना होगा।

थकान मिटा, फिर चढ़ना होगा।

निराश मिटा, जिंदा दिल बन,

कर्म का पाठ, फिर पढ़ना होगा।

चिंता छोड़, चिंतन भी तज तू, कर्म ही तेरी  हसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।


Tuesday, May 11, 2021

कोई साथ नहीं आता है

 सच की राह पर

          

सच की राह पर

चलने का, 

संकल्प लेकर,

चाहा था,

एक साथी।

चाहा, खोजा,

मनाया, प्रेम किया,

अपने आपको,

लुटाया।


बस,

एक ही इच्छा,

सच की राह पर,

साथी का हाथ पकड़,

जब मुश्किल घड़ी हो,

एक-दूसरे का हाथ जकड़,

साथ-साथ चलेंगे।

सच के पथ को,

नहीं तजेंगे।


मूर्ख था मैं,

ना समझ भी,

समझ न पाया।

सच की राह पर तो,

सच भी, 

साथ छोड़ जाता है।

अपना साया भी,

साथ नहीं आता है।

खुद को खुद का,

साथ भी नहीं भाता है।


कोई मूर्ख पथिक ही,

सच की यात्रा पर,

साथी का गान गाता है।

वास्तविकता तो यही है,

सच के पथ पर,

पथिक को अकेला ही,

चलना होता है।

कोई साथ नहीं आता है।


Monday, May 10, 2021

नर-नारी के एक होने से

 सृष्टि  जन्मती पलती है

            


इक-दूजे से शेयर करके, परिवार की गाड़ी चलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

सहयोग समन्वय से आगे बढ़ के।

साथ-साथ  बढ़,  सीढ़ी चढ़ के।

विकास पथ पर, आगे बढ़ो मिल,

मिट जाओगे, अकेले  अढ़ के।

इक-दूजे की देखभाल कर, प्रेम भावना बढ़ती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

केयरिंग-शेयरिंग, सूत्र यहाँ पर।

पारिवारिक हैं,  मूल्य जहाँ पर।

प्रेम, त्याग, समर्पण, निष्ठा,

साथ में जीते, स्वर्ग वहाँ पर।

छल, धोखा, कपट भावना, परिवार में सबको खलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

प्रेम से देखो, घर महकेगा।

दिखावे से तो, बस बहकेगा।

इक-दूजे हित जीना सीखो,

रोम-रोम फिर से चहकेगा।

ईष्र्या, द्वेष तज, प्रेम भाव से, सूरत घर की बदलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।


Sunday, May 9, 2021

आज सीख वह देता है

 


आखिर वह मेरा बेटा है

      

आज सीख वह देता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


उसके जन्म से बाप बना।

खुद को भूला, ताप बना।

होते हुए भी, अभाव दिए,

मजबूत बने, मैं घात बना।

ज्ञान में, उसे लपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


खेल-खिलोनों से दूर रखा।

वात्सल्य भी, नहीं  चखा।

योग्य बनाने के चक्कर में,

बना नहीं, मैं कभी सखा।

एकान्त ने दिया चपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


वह तकनीक की ओर चला।

जीवन से,  वह दूर  चला।

मोबाइल ही, है बस साथी,

सम्बन्धों से, वह, दूर चला।

बड़ा हुआ, अब  चेता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


संबंधों का,  बंधन तजकर। 

रहना नहीं, कहीं तू फंसकर।

उड़ ले, गगन में, जितना चाहे,

जीवन जीना तू बस हँसकर।

समझे न  कोई हेटा  है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


Monday, May 3, 2021

असफलता संग व्यथा रही

 मेरे जीवन की कथा रही

     


असफलता संग व्यथा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


पीड़ा से पीड़ित था बचपन।

भय से भयभीत था, छुटपन।

किशोर हुआ, अभाव मिले नित,

युवावस्था भी, थी बस ठिठुरन।

अकेलेपन की सजा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


किसी को कुछ भी दे न सका।

साथ आया जो,  वही  पका।

भटकर को ना, राह मिली,

टूटा सपना, पर नहीं थका।

राह ही जिसका, पता रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


राह में कुचली कली मिली।

दुलारा उसको, वही खिली।

राह अलग, उसको था जाना,

नहीं कभी वह, हिली-मिली।

साथ हमारे, बस सजा  रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


आदर्शो की कुछ राह चुनीं।

अपनों की भी, नहीं सुनी।

संघर्ष पथ पर साथ था खोजा,

मिली न अब तक कोई गुनी।

कोशिशों की बस  कज़ा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


Saturday, May 1, 2021

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता

साथ किसी के,  रो न  सके

               

साथ के सपने अपने भी थे, साकार कभी भी हो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

किसी का बुरा, कभी न चाहा।

किसी के दुख में, कहा न आहा।

अनजानों को गले लगाकर,

सबको नेह से, था अवगाहा।

हमने सबको, अपना समझा, पराया किसी को कह न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

धोखे से साथ में हमें फंसाया।

छल-कपट का जाल विछाया।

प्रहार आत्मा पर करने को,

विश्वासघात का अस्त्र चलाया।

षड्यंत्रों से हमको घेरा, सच के सपने,  खो  न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के, रो न  सके।।

हमने सब कुछ, सौंपा जिसको।

उसने  मूरख, समझा  हमको।

हमने सब कुछ खोल दिया था,

उसने सब कुछ छिपाया खुदको।

प्रेम बिना, है खेती सूखी, विश्वास के बीज, बो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के,  रो न  सके।।