Wednesday, April 7, 2021

जीवन का मर्म

 कर्म, कर्म, कर्म!

 



कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


सक्रियता ही,

जीवन की निशानी है।

इच्छाएँ, कामनाएँ,

बाधाएँ, पीड़ाएँ,

आस्थाएँ और भावनाएँ,

चुनौतियों का बीड़ा,

तर्क-वितर्क के होते हुए भी,

कर्म के बिना,

व्यक्ति है बस एक कीड़ा।

जीना ही है,

सबसे प्राचीन धर्म!

कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


छोटा हो या बड़ा,

अमीर हो या गरीब,

बैठा हा या खड़ा,

गतिमान हो या अड़ा,

चलना ही,

जीवन की निशानी है,

थम गया जो,

वह है मरा।

जो पड़ गया,

वो है सड़ा।

कर्म से कैसी शर्म?

कर्म ही है सच्चा धर्म।


कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


Sunday, April 4, 2021

एकान्त और अकेलापन

 

एक समय था,

जब मैं चाहता था,

एकान्त।


तब कुछ पढ़ने की,

कुछ बनने की,

किसी को पढ़ाकर,

कुछ बनाने की,

तीव्र इच्छा, 

मुझे एकान्त के लिए,

मजबूर करती थी।


एक समय था,

जब साथी को चाह थी,

मेरे साथ की,

बेटे को चाह थी,

हर पल, हर क्षण,

हर दिन, हर राह,

मेरे साथ की

मुझसे दुलार की।


और मैं,

उन्हें आगे बढ़ाने,

उन्हें कुछ सिखाने,

अपना करियर बनाने,

के चक्कर में,

अपने आपको भूल गया!

पता ही नहीं चला,

कब अपनी राह भूला,

और ठहर गया।


और आज

जब साथी साथ मिलने का,

इंतजार करते-करते,

प्रतीक्षा से थककर,

आगे बढ़ गया।

दूसरे शब्दों में कहूँ,

साथ अलग हो गया।


और आज

हर पल, हर क्षण

हर राह,

साथ चाहने वाला बेटा,

साथ रहना भूलकर,

एकान्त के पथ पर,

बढ़ गया।

एकान्तवासी बन गया।


और आज

मैं एकान्त से भी,

ठुकराया गया,

अकेला रह गया।

एकांत और अकेलेपन

का अंतर समझ आ गया।

अनुभव से

कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।


Thursday, April 1, 2021

सबके विकास की बातें करते

  आत्म विकास नहीं कर पाते


                 


ईर्ष्या, द्वेष,  नफरत है दिल में,  किंतु, प्रेम के गाने गाते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

करते रहे औरों की समीक्षा।

कैसे पूरी हो?  फिर इच्छा।

सबको सीख देत हो क्षण-क्षण,

खुद ही, खुद की, ले लो परीक्षा।

भ्रष्ट आचरण, कर्महीन धन,  उससे, कराते हो जगराते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

अहम ने, सबको, दूर भगाया।

दान के नाम, खुद को भरमाया।

खुद ही, खुद को, समझ न पाये,

पल-पल औरों को समझाया।

धैर्य, शान्ति की बातें करते, धैर्य बिना, कटें, खुद की रातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

कर में जो है, यहीं है पाया।

सीख रहे जो, केवल माया।

खुद तो भ्रम में जीते हर पल,

औरों को भी, है भरमाया।

सच क्या है? ईश्वर कैसा? जाना न, किसी ने, केवल बातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।


Wednesday, March 31, 2021

नर क्या समझे

 

               नारायण को,  नारी ने भरमाया है


प्रकृति सृष्टि का गूढ़ तत्व है, समझ न कोई पाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

नर, सागर की, गहराई नापे।

मौसम की कठिनाई भी भाँपे।

आसमान में उड़ता है नर,

इससे देखो, पर्वत काँपे।

नारी की मुस्कान ने जीता, प्रकृति की कैसी माया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

वेद ज्ञान से, भरे पड़े हैं।

कुरान और हदीस लड़े हैं।

नारी प्रेम की चाह में ये नर,

बुद्धिहीन से, पीछे खड़ें हैं।

सिद्धांत गढ़ो, कुछ भी कह लो, नर नारी का साया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

 उपदेश नहीं, कुछ कर दिखलाओ।

चाहो नहीं, बस प्यार लुटाओ।

सबको मुफ्त की सीख हो देते,

चलकर उन पर, खुद दिखलाओ।

छल, कपट, धोखे में फंसाकर, गान मिलन का गाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।


Monday, March 29, 2021

संग-साथ की इच्छा सबकी

किन्तु साथ कुछ को मिलता है

                  




पुष्प की चाह, सभी को होती, कुछ ही पल को वह खिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

चाहने से यहाँ, कुछ नहीं होता।

काटता है वही, जो व्यक्ति बोता।

कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे,

कदम-कदम वह, निश्चित रोता।

साथ उसी को, मिलता जग में, प्रेम सूत्र रिश्ते सिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

आकांक्षा और अभिलाषाएँ।

तरह-तरह की हैं आशाएँ।

चाहत किसी की पूरी न होतीं,

चुनौती देती, हैं निराशाएँ।

चाहत तजकर,  साथ निभाए, साथ उसी का, बस निभता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

प्रकृति का कण-कण साथ हमारे।

सुना न तुमने, हम थे पुकारे।

कर्तव्य पथ पर, बढ़ते रहेंगे,

मृत्यु भी, पग-पग, हमें दुलारे।

पथ ही साथी, जब हो पथिक का, ऐसे पथिकों से, जग हिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।


Saturday, March 27, 2021

समय का साधक, कर्म करे बस

 नहीं माँगता बस देता है।

  


अकेलेपन से जूझ रहे सब, साधक एकान्त का रस लेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

इक-दूजे से सब हैं जूझें।

मित्र कौन है?  कैसे बूझें?

प्रेम-प्रेम कह, लूट रहे नित,

भीड़ में अपना, ना कोई सूझे।

परिवार में ही महाभारत होता, अपना वही जो नाव खेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

खुद ही खुद से, जूझ रहे हम।

विश्वासघात नित, झेल रहे हम।

जिसको अपना साथी समझा,

घात से उसके, अचेत हुए हम।

विश्वास किया था, जिस पर हमने, चुंबन लेकर गला रेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

मित्र खोजना बंद करो अब।

अपने आपके मित्र बनो अब।

इसको-उसको, समय बहुत दिया,

खुद ही, खुद को, आज गढ़ो अब।

आगे बढ़कर,  पथ जो बनाये,  वही कहाता, प्रणेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।


Friday, March 26, 2021

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी

 प्रकृति न हमसे न्यारी है

  


प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।

महासागर,  पर्वतमालाएँ, प्रकृति ही,  नर और नारी है।।

प्रकृति का सूक्ष्म रूप है नारी।

ललित लालिमा कितनी प्यारी!

पर्वत हरीतिमा, ललचाती है,

गोलाइयों में, भटकाती नारी।

जीवन रस देती हैं नदियाँ,  पयस्वनी  माता नारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

प्रेम अश्रु में, डूबी नदियाँ।

सहनशील प्रथ्वी की तरियाँ।

प्रचण्ड अग्नि पुंज है नारी,

बाँह फैलाए, हैं वल्लरियाँ।

सर्पिल चितवन पर नर मर मिटता, वक्ष उरों पर आरी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

पर्वतों को, धूल चटाता जो नर।

सागर विजयी, कहलाता जो नर।

नारी नयन के,  अश्रु बिन्दु में,

गल बह जाता, कठोर हृदय नर।

विश्वामित्र ऋषि, हत हो जाते, जब मार मेनका मारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

विकास के लक्ष्य, बड़े जो होते।

प्रकृति के साथ ही, पूरण होते।

नारी साथ मिल, इच्छाशक्ति से,

नर आनन्द के,  खोले सोते।

विध्वंस पथों पर सृजन सजाती, नर-नारी की यारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।


Thursday, March 25, 2021

किसी से, किसी की, करो न शिकायत

 समाधान बनकर दिखलाओ

                 


समस्याओं से,  तुम कभी न भागो, सोचो, समझो और गले लगाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

रोते हुए को, कोई न देखे।

सबके अपने-अपने  लेखे।

समय की शिकायत करते हैं जो,

करते रहते, वही  परेखे।

बातों से,  कभी,  काम न होते,  चलो,  चलो और  चलते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

उसकी, उससे बातें करते।

समय नष्ट कर, क्यों हो मरते?

अपने आप से, बातें करके,

सिद्ध करो, तुम, नहीं हो डरते।

लीकों पर चल,  कहाँ पहुँचोगे?  तुम बाधाओं से, राह बनाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

विकास के पथ, तुम चलते जाओ।

कहते  हो जो,  कर दिखलाओ।

डर ही, शिकायत, इसकी, उसकी,

कर्म से,  डर को,  दूर भगाओ।

खुद पर, तुम विश्वास करो, फिर, शिखरों पर, तुम चढ़ते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

कर्म के पथिक को, कोई न पराया।

निराशा को, पल-पल,  ठुकराया।

कमियों को,  वो, नहीं खोजते,

जिनने खुद को खुद ही बनाया।

मरने की मन,  बात करो ना,  अकेले रहो,  सबको अपनाओ।

किसी से किसी की करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

Monday, March 22, 2021

अपने आपको मित्र बनाओ

 साथी न खोजो, साथ निभाओ

               



जब भी आपको साथ चाहिए, अपने साथी खुद बन जाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

खुद को अच्छी तरह से जानो।

क्षमताओं  को,  खुद पहचानो।

करो कभी ना, आत्म प्रशंसा,

सहयोग मिला, उसको भी मानो।

समय है सीमित, काम करो, काम के केवल गाने न गाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

खुद ही खुद को बढ़ना होगा।

पथ में पथिक हैं, मिलना होगा।

पथ में पथिक को, नहीं है बसना,

विश्राम किया, अब चलना होगा।

साथी की चाह, सभी को यहाँ पर, आगे बढ़कर गले लगाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

किसी की करनी, क्यों है प्रतीक्षा?

सबकी  अपनी-अपनी  इच्छा।

अपने आपको, समझ न पाए,

देते फिरते, जग को दीक्षा।

कोई व्यक्ति पूरण ना होता, खुद समझो तुम, ना समझाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।

ओरों  की ही, चर्चा  करते।

खुद ही खुद की ऊर्जा हरते।

कमी ओरों की निकाल रहे जो,

समझो, अपने आप से डरते।

विश्वास न खुद पर, साथी खोजो, साथ देकर, विश्वास कमाओ।

अपने आपको मित्र बनाओ, साथी न खोजो, साथ निभाओ।।


Saturday, March 20, 2021

प्रेम और विश्वास मिले बस

 मन-मयूर, मन करेगा नर्तन

            


नर-नारी संबन्ध निराला।

पत्नी, बेटी हो या खाला।

इक-दूजे को देखे बिन,

गले से उतरे नहीं निवाला।


नारी को कहते घरवाली।

कभी न रहती है वह खाली।

घर ही नहीं, बाहर भी वह,

नर की प्रेरणा डाली-डाली।


इक-दूजे को बहुत सताते।

इक-दूजे  के गाने  गाते।

इक-दूजे की कमी निकालें,

इक-दूजे बिन नहीं रह पाते।


कोई क्षेत्र न रहे अछूता।

नारी का ही है, ये बूता।

प्रेम लता में बांधे रहती,

वरना चल जाते हैं जूता।


नारी नर को कोष रही है।

फिर भी उसको पोष रही है।

पिता, भाई और पति की खातिर,

पल-पल मर, मदहोश रही है।


प्रतियोगी तुम नहीं हो समझो।

इक-दूजे के गुणों को समझो।

नर नारी बिन रहे अधूरा,

नर बिन नारी, क्या है समझो?


नर वीर है, सिंह लगाता।

सदैव युद्ध के गाने गाता।

नारी के आँचल की छाव में,

अहम मिटे, तब ही सुख पाता।


इक-दूजे के साथ में चलकर।

हाथ थाम लें, आगे बढ़कर।

चढ़े विकास की सीढ़ी तब ही,

गले लगा लें, सबको हँसकर।


भाई-बहिन का रक्षा बंधन।

माता का दुलार है बंधन।

जग में देखो अतुलनीय है,

पति-पत्नी का गृह प्रबंधन।



नरक देखना, कर लो घर्षण।

स्वर्ग की चाह, करो समपर्ण।

इक-दूजे की शक्ति बनो तुम,

यही है पूजा, यही है दर्शन।


करो न केवल, पे्रम प्रदर्शन।

दिल का दिल से कर लो अर्चन।

प्रेम और विश्वास मिले बस,

मन-मयूर, मन करेगा नर्तन।


Friday, March 19, 2021

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से

 सृष्टि की रचना होती है

                                    


नारी उर में, दीप सजाती, नर बिखराता ज्योती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

भिन्न प्रकृति है, भिन्न मही है।

दोनों ही अपनी जगह सही हैं।

दोनों मिल जब साथ में चलते,

दानों की राह, आनन्द मयी है।

नर भी सुख से जी नहीं सकता, नारी जब भी रोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

आपस में संघर्ष ये कैसा?

किसी को बोलो न ऐसा-वैसा।

मिल विकास की राहें खुलतीं,

अविश्वास विध्वंस है प्रलय जैसा।

नर जब पथ से विचलित होता, नारी भी पथ खोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।

सच पर ही विश्वास है पलता।

संबन्धों का पुष्प है खिलता।

समर्पण से अलगाव है मिटता,

मिट जाती है, सारी कटुता।

पारदर्शी व्यवहार ही समझो, मानवता का मोती है।

प्रकृति-पुरुष के सम्मिलन से, सृष्टि की रचना होती है।।


Wednesday, March 17, 2021

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

 किसी की कोई, परवाह नहीं है

                 


बहुत है झेला, बहुत है भोगा,

शेष रही कोई, चाह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


प्रताड़ना रूपी, प्रेम था पाया।

अभावो ने भी था ठुकराया।

तप्त धरा पर नंगे पाँव चल,

हमने बसंत का राग सुनाया।।

बचपन भूख से पल-पल खेला,

जवानी काल कुछ याद नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


जन्म लिया, तब घर नहीं अपना।

अकेलेपन में, पड़ा था तपना।

शिक्षा काल, ठहराव हुआ ना,

नहीं किसी का, नाम थ जपना।

युवावस्था संघर्ष में बीती,

पूरी हुई कोई चाह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


कर्म के पथ पर, अडिग रहे हम।

स्वार्थ के आगे, नहीं झुके हम।

भीड़ में भी, हम रहे अकेले,

अपने कहकर, लूटे गए हम।

पीड़ाओं का अभ्यास हो गया,

भरते अब हम, आह नहीं है।

कुछ भी कहो, कुछ भी करो,

किसी की कोई, परवाह नहीं है।।


Tuesday, March 16, 2021

हर प्राणी, चैन की नींद सोता है

 घर तो आखिर, घर होता है

               

हर प्राणी, चैन की नींद सोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


कण-कण में, प्रेम है रमता।

दादी दुलार में बचपन पलता।

चंचलता अगड़ाई लेती जहाँ,

सीमा टूटतीं, युवा मचलता।

प्रेम के आँसू, जो रोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


अभावों में भी जीवन खिलता।

टूटे दिलों को, प्रेम है सिलता।

मिट्टी में है प्रेम की खुशबू,

रोने में है, हास्य झलकता।

गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


बचपन की शरारतें छिपी हुई हैं।

प्रेम इबारतें, लिखी हुई हैं।

दूर-दूर रह, दिल हैं मिलते,

दिल से दिल की, जमी हुई है।

अंकुर बढ़, पौधा होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


युवा काम हित बाहर जाते।

बाहर रह कर, घर को चलाते।

यादों का अंबार, जमा जहाँ,

आते हैं, जब छुट्टी पाते।

घर चल, पगले, क्यों रोता है?

घर तो आखिर, घर होता है।।


घर छोड़ा, मजबूरी दाम की।

मिली न हमें मजदूरी नाम की।

सपने लेकर, शहर थे आए,

मिलती थी, मजदूरी काम की।

वापस, घर जाना होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


समय बदला, फिजाएं बदलीं।

शहरों की अब, हवाएं बदली।

लाॅकडाउन ने जीवन रोका,

वापसी की अब, राह भी बदलीं।

हर, मजदूर मजबूर होता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


बची नहीं, अब छत की छाया।

ना कुछ पीया, ना कुछ खाया।

पैदल ही, अब राह नापनी,

साथ छोड़ता, विपत्ति में साया।

मर-मर कर जीवन बोता है।

घर तो आखिर, घर होता है।।


Sunday, March 14, 2021

उठकर आगे, बढ़ेंगे फिर से

 गलती से, यदि हम फिसलेंगे

                   


हम अपनी ही राह चलेंगे।

सुविधाओं को ना मचलेंगे।

उठकर आगे, बढ़ेंगे फिर से,

गलती से, यदि हम फिसलेंगे।


धोखे अब तक बहुत ही खाये।

सच के गान हैं, फिर भी गाये।

हमने सब कुछ सौंप दिया था,

तुमने छल के तीर चलाये।


नारी का सम्मान है करते।

नहीं किसी का मान है हरते।

सहयोग करते कदम कदम पर,

लेकिन धोखा, नहीं, सह सकते।


नारी विशेष है, हम हैं मानते।

डरते हैं, नहीं, रार ठानते।

कर्म प्रधान है, जग में भाई,

लिंग भेद नहीं, कर्म मानते।


कोई न अपना, ना कोई पराया।

झूठ जो बोला, वो ठुकराया।

धन, पद, यश, संबन्ध न बाँधें,

सहयोग दिया, पर साथ न पाया।


नहीं रूप की, चाह हमें है।

ना ही, धन की आह हमें है।

ज्ञानवान की चाह नहीं है,

पारदर्शी की चाह हमें है।


सच बोले, ऐसा मित्र चाहते।

मुक्त भाव, माहोल चाहते।

मन की कहे, मन की सुन ले,

ऐसा बस एक साथ चाहते।


नर नारी का, मित्र स्वाभाविक

 नर की कामना, नारी है

            

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।

इक-दूजे के लिए बने हैं, फिर, रण की क्यों तैयारी है?

शब्द ही युग्म है, नर-नारी का।

पीड़ा हरे, आँचल साड़ी का।

नारी, नर पर, हो न्यौछावर,

नर है सजाता, पथ प्यारी का।

भिन्न-भिन्न हों, राह भले ही, अटूट दोनों की यारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।

आमने-सामने, आज खड़े हैं।

अपनी जिद पर, दोनों अड़े हैं।

समलिंगी, पशुता है बढ़ती,

प्रथा, परंपरा, आज सड़े हैं।

सृजन की देवी, ममता की मूरत, विध्वंश की खेले पारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।

सिर्फ विकास की बातें होतीं।

पवित्र  भावनाएँ,  हैं खोतीं।

नर-नारी प्रतियोगी बनकर,

नष्ट कर रहे, जीवन मोती।

अब भी सभलो, संग-साथ रह, सींचो प्रेम की क्यारी है।

नर नारी का, मित्र स्वाभाविक, नर की कामना, नारी है।।


Friday, March 12, 2021

जन्मने दो, शिक्षित होने दो

 नारी के अरमान

     



नहीं चाहिए, दुआ किसी की, नहीं देवी का मान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

सहायता नहीं, सहयोग चाहिए।

नहीं कोई,  हमें आन चाहिए।

पथ अपना हम, खुद चुन लेंगी,

नहीं कोई, व्यवधान  चाहिए।

हमको क्या सुरक्षा दोगे? खतरों में तुम्हारी जान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

सुरक्षा के नाम, हमें ना बाँधो।

षड्यंत्रों से, हित  ना साधो।

शिक्षा, चिकित्सा, रक्षा हम करें,

घर में बैठो, माटी  के माधो।

घरवाली बन, घर था, चलाया, बढ़ायें देश की शान है।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।

देवी की पूजा, नाटक करते।

प्राण हमारे, गर्भ में  हरते।

जन्मने दो, ना पाप करो नर,

हमसे क्यों? तुम इतना डरते।

हाथ थाम, मिल साथ चलें, गायें विकास के गान हैं।

जन्मने दो,  शिक्षित होने दो,  नारी के अरमान हैं।।


Wednesday, March 10, 2021

एक नारी ने, जन्म दिया था

 दूजी ने मौत की राह दिखाई!

                  


एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।

विश्वासघातिनी ने सब छीना, पर, नारी से विश्वास न जाई।।

जन्म दिया, और, नारी ने पाला।

पिलाया पल पल प्रेम का प्याला।

कपट जाल में, नर को फंसाकर,

नारी ने ही,  मुँह  किया काला।

प्रेम बहिन का, याद करूँ, या कुलटा की चाल, जो हैं चलाई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।

औकात से बढ़, जब नारी चाहे।

पाप के,  सागर में,  अवगाहे।

काम पिपासा, धन की आशा,

कटरा हो, या हो फिर माहे।

बेटी, बहिन और माँ की महानता, नारी ही, बनती हरजाई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।

नारी पर विश्वास है अब भी।

धोखा खाया, प्रेम है तब भी।

प्रेम नाम, कुछ धोखा देतीं,

कुछ की पूजा, करता रब भी।

विश्वासघातिनी, कुलटा,  इधर है, प्राण दात्री नारी माई।

एक नारी ने, जन्म दिया था, दूजी ने, मौत की राह दिखाई।।


हम सच के गाने गाते हैं

 तुम कपट गान ही गाओगी

           


हम आजीवन, रहे अकेले, अब क्या साथ निभाओगी?

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

जीवन में कुछ नहीं छिपाना।

सच ही जीवन, सच अपनाना।

छल-कपट का, जाल यूँ बुनकर,

मुझे चाहतीं, तुम धमकाना।

धन, पद, यश, संबन्ध चुरा लो, किन्तु साथ ना पाओगी।

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

जीने की भी, चाह नहीं अब।

कष्टों में भी, आह नहीं अब।

धोखे से, विश्वास है तोड़ा,

विश्वास बिना, प्रेम हुआ कब?

कितनी भी पीड़ा पहुँचाओ, मजबूर नहीं कर पाओगी।

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।

बंदी भले ही, हमें बना लो।

झूठे कितने? केस चला लो।

हमको पथ से, डिगा न सकोगी,

चाहे जितनी, सजा दिला लो।

धन तो क्या? प्राण भी ले लो, विश्वास कहाँ से लाओगी?

हम सच के गाने गाते हैं, तुम कपट गान ही गाओगी।।


Monday, March 8, 2021

लोरी गाते-गाते माँ ने

 

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

तकनीक भी, अपनायी है

 

 

नारी नहीं अब घर तक सीमित, चहुँ ओर अब छायी है।

लोरी गाते-गाते माँ ने, अब, तकनीक भी, अपनायी है।।

अहिल्या बाई, आनन्दी बाई।

इंदिरा नुई ने धाक जमाई।

अंतरिक्ष की हुई कल्पना,

टेसी थामस जग में छाई।

दुर्गा भाभी को याद करें नित, मैरी काम हरषाई है।

लोरी गाते-गाते माँ ने, अब, तकनीक भी, अपनायी है।।

बछेंद्री और जीजाबाई।

संगीत को है लता सजाई।

सरोजिनी है प्रेरणा देती,

राह दिखाती लक्ष्मीबाई।

प्रगति के पथ पर, चलती है नित, नारी की तमन्ना छाई है।

लोरी गाते-गाते माँ ने, अब तकनीक भी, अपनायी है।।

सावित्री बाई ने मार्ग दिखाया।

सुधा मूर्ति ने नाम कमाया।

राष्ट्रीय भावों से ओत प्रोत हो,

सुभद्रा कुमारी ने काव्य सुनाया।

बहुआयामी व्यक्तित्व निखरता, नारी करती अगुआई है।

लोरी गाते-गाते माँ ने, अब तकनीक भी, अपनायी है।।

Saturday, March 6, 2021

तुम अपनी दुनिया में खुश हो

 तुम्हारी यादों में जीते हैं

 

 

तुम अपनी दुनिया में खुश हो, हम तुम्हारी यादों में जीते हैं।

वर्तमान और भविष्य को छोड़ा, हम भूत का रस ही पीते हैं।।

निराशा से हम भरे हुए थे।

जीवन से ही ठगे हुए थे।

तुमसे ही थी, मिली प्रेरणा,

जिसके सहारे रूके हुए थे।

तुम ही अब भी शक्ति हमारी, तुम बिन बिल्कुल रीते हैं।

तुम अपनी दुनिया में खुश हो, हम तुम्हारी यादों में जीते हैं।।

नहीं कह सके, तुम से दिल की।

बनीं हुईं थी, और की फिरकी।

समय की ठोकर दूर गिरे हम,

तुमने कर ली अपने मन की।

भटक रहे थे, कण्टक पथ पर, तुम्हारे पथ थे, सुभीते हैं।

तुम अपनी दुनिया में खुश हो, हम तुम्हारी यादों में जीते हैं।।

थक हुए थे, जीते-जीते।

दुनिया में बिष पीते-पीते।

तुम प्रेरणा बनकर आईं थीं,

याद आएं क्षण, जो थे बीते।

हम तो जग में, प्रेम पथिक हैं, नहीं बने कभी चीते हैं।

तुम अपनी दुनिया में खुश हो, हम तुम्हारी यादों में जीते हैं।। 

Tuesday, March 2, 2021

साथ भले ही नहीं आज हो

 अहसास किंतु अब भी बाकी है


साथ भले ही नहीं आज हो, अहसास किंतु अब भी बाकी है।

इक-दूजे के साथ के वे पल, यादों में खिलती झांकी है।।

सीधा सच्चा उर था कितना?

नहीं किसी का था कोई सपना।

जिस पथ पर तुम खड़ी मिली,

सब कुछ सौंप दिया था अपना।

कोई चाहत नहीं थी, उस पल, आज भी नहीं कोई शाकी है।

साथ भले ही नहीं आज हो, अहसास किंतु अब भी बाकी है।।

मिलने की कोई आस नहीं है।

दूरी नहीं, पर पास नहीं हैं।

तुम मिलने को नहीं तड़पती,

बुझे मिलन की प्यास नहीं है।

जीवन का पैमाना टूटा, मिली नहीं, अब तक साकी है।

साथ भले ही नहीं आज हो, अहसास किंतु अब भी बाकी है।।

तुम बिन जीना भूल गए हैं।

फूल भी हमको शूल भए हैं।

काम में डूबे, खुद को भूले,

सुनते सबकी, कूल भए हैं।

कदम-कदम ठोकर हैं झेलीं, मिलन चाह अब भी बाकी है।

साथ भले ही नहीं आज हो, अहसास किंतु अब भी बाकी है।।


चाह नहीं तुमसे कुछ पाऊँ

 चाह रही, तुमको सुन पाऊँ




चाह नहीं तुमसे कुछ पाऊँ।

चाह रही, तुमको सुन पाऊँ।।


नासमझी में ठुकराया था।

अहम अधिक ही गदराया था।

अपनी चाहत समझ न पाया,

जिद ने हमको भरमाया था।

तुम्हारे बिना जिंदा रह पाऊँ?

चाह रही, तुमको सुन पाऊँ।।


षड्यंत्रों में घिरे आज हैं।

कुटिल कामिनी रचे राज है।

कपट जाल में फंसाया ऐसा,

जीवन के ना रूचें साज हैं।

प्रेम के गान अब, किसे सुनाऊँ?

चाह रही, तुमको सुन पाऊँ।।


सीधी सच्ची राह थी तेरी।

माँग नहीं थी, कोई घनेरी।

मन से मन की नहीं सुन सका,

अब तो बहुत हो गई देरी।

अब भी गीत तुम्हारे गाऊँ।

चाह रही, तुमको सुन पाऊँ।।


Sunday, February 28, 2021

नारी नर की चिर आकषर्ण

 नारी प्रेम की डोरी है

               


नारी नर की चिर आकषर्ण, नारी प्रेम की डोरी है।

नारी सृष्टि का केन्द्र बिन्दु है, काली हो या गोरी है।।

प्रकृति-पुरुष हैं, आदि काल से।

नर चलता है,  नारी चाल से।

नारी हित, ये, जीता-मरता,

नारी सुरक्षित, नर की ढाल से।

कदम-कदम, नारी ही प्रेरक, नर बिन नारी कोरी है।

नारी नर की चिर आकषर्ण, नारी प्रेम की डोरी है।।

अधरों की,  मुस्कान,  ने हेरा।

कपोल लालिमा, बनाया चेरा।

रमणी की बंकिम चितवन ने,

उर को भेदा, डारा डेरा।

वक्षस्थल की गोलाइयों ने, नर उर की, की चोरी है।

नारी नर की चिर आकषर्ण, नारी प्रेम की डोरी है।।

नारी चित, चलती, चतुराई।

नर को फंसाकर, है, हरषाई।

अंग-अंग कमनीय, कामिनी,

नर को खींचे, बने हरजाई।

प्रेम भाव, विश्वास, जन्मता, नर-नारी की जोरी है।

नारी नर की चिर आकषर्ण, नारी प्रेम की डोरी है।।


Saturday, February 27, 2021

जितने भी सम्मान हैं, जग में,

 सबसे ऊपर माता है

                


जितने भी सम्मान हैं, जग में, सबसे ऊपर माता है।

शहीद होता सीमा पर सैनिक, माँ! का सपूत कहलाता है।

नारी से ऊपर है माता।

पत्नी से भी, ऊपर माता।

जन्मदात्री नहीं है केवल,

प्राणों से, पाले है माता।

प्रसव पीड़ा सह जीवन देती, सैनिक बस खून बहाता है।

जितने भी सम्मान हैं, जग में, सबसे ऊपर माता है।।

माता केवल जन्म न देती।

पल-पल पाले सब सह लेती।

प्रसव भार सह प्रसव वेदना,

जीने के संस्कार भी देती।

माँ को आँचल, नद है प्रेम का, पल-पल प्रेम लुटाता है।

जितने भी सम्मान हैं, जग में, सबसे ऊपर माता है।।

दुनिया में सबसे टकराये।

मृत्यु को भी आँख दिखाये।

मातृत्व सुख के आगे माता,

स्वर्गिक सुख को भी ठुकराये।

राष्ट्रप्रेमी,  माँ के चरणों में,  जीवन पुष्प चढ़ाता है।

जितने भी सम्मान हैं, जग में, सबसे ऊपर माता है।।


Friday, February 26, 2021

काश! लौट आते वे दिन

 काश! लौट आते वे दिन

              



काश!

लौट आते वे दिन।


तुम चाहती थीं,

मुझे कितना?

हर पल-क्षण

संग साथ रहने की,

व्याकुलता थी,

तुम्हारे रोम-रोम में।


काश!

लौट आते वे दिन।


नयनों में,

अधरों में,

कपोलों की लालिमा में,

वक्षस्थल की गोलाइयों में,

कोमल कलाइयों में, 

तुम्हारे अंग-अंग में,

स्पर्श पाने की कामना,

उत्कट प्रेम की,

वो भावना।


काश!

लौट आते वे दिन।


मेरी छवि को,

पीने की ललक।

चित्र था मेरा,

तुम्हारा हृदय फलक।

तन को तन की,

मन को मन की,

स्पर्श पाने की, 

कैसी थी कसक?


काश!

लौट आते वे दिन।


समर्पित किया था,

तन-मन-धन,

सब कुछ।

कैसी चाहत थी?

हर पल,

हर क्षण,

हर रन्ध्र से मुझे,

अपने अन्दर लेने की,

आतुरता,

व्याकुलता,

और परेशानी।

आज स्मरण कर,

मैं हूँ हैरान!


काश!

लौट आते वे दिन।


Thursday, February 25, 2021

तेरे बिन, ये जीवन नीरस

 तू ही तो है मेरी नूरा

             


तेरे बिन, यह जग है अधूरा, तेरे बिन, मैं नहीं हूँ पूरा।

तेरे बिन,  ये जीवन नीरस,  तू ही तो है मेरी नूरा।।

जीवन में कुछ रास न आये।

जब तक तू मेरे पास न आये।

साथ में होती, नूरा-कुश्ती,

दूरी मुझको, बहुत सताये।

आकर के तू खुद ही देख ले, तेरे बिन हुआ जीवन चूरा।

तेरे बिन,  ये जीवन नीरस,  तू ही तो है मेरी नूरा।।

वक्ष स्थल बिन, नींद न आये।

अधर पान बिन, रहा न जाये।

तेरे स्पर्श का, जादू ही है,

सुबह-शाम, मुझको तड़पाये।

नारी बिन, नर दुर्बल कितना, नारी बनाये, नर को सूरा।

तेरे बिन,  ये जीवन नीरस,  तू ही तो है मेरी नूरा।।

अधरों की वो तेरी लाली।

प्रेम भरी आँखों की प्याली।

उष्ण उरोजों की ऊष्मा बिन,

कैसे जीऊँ? हालत  माली।

अकेले-अकेले मन है सीझता, आकर इसको कर दे पूरा।

तेरे बिन,  ये जीवन नीरस,  तू ही तो है मेरी नूरा।।


Tuesday, February 23, 2021

सोचो, समझो, सभलो, नारी

 खुद ही, खुद को, ठगो न नारी


 साथ भले ही ना रह पाये।

किन्तु साथ के गाने गाये।

माया तजकर सन्त कहें जो,

महफिल में, नारी ही आयें।


नारी को नर्क का द्वार बताया।

उनको भी, नारी ने,  जाया।

संन्यासियों के जलसों में भी,

जमघट महिलाओं का आया।


नर-नारी मिल खीचें गाड़ी।

बुर्का पहनें, या पहने साड़ी।

मिलकर कर्म से, किस्मत लिखते,

रेखा तिरछी हों, या आड़ी।


नारी बिन कोई, घर नहीं चलता।

कली बिना, कोई पुष्प न खिलता।

सृष्टि, सृजन, समर्पण नारी।

नारी बिन ना, पत्ता हिलता।


नारी है, सदगुणों की, थाती।

प्रातः वन्दन, रात की बाती।

नर निराश, जब हो जाता है,

मधुर वचन से आश जगाती।


नारी, नर को, देव बनाती।

सदगुणों से, उसको नहलाती।

नर के, यदि अवगुण अपना ले,

निष्ठाहीन कुलटा बन जातीं।


सोचो, समझो, सभलो, नारी।

नर की कुराह, चलो न नारी।

झूठ, छल, कपट, कर नर से,

खुद ही, खुद को, ठगो न नारी।


Monday, February 22, 2021

बुद्धि से जीती, दिल से टूटी

 हावी,  पेशेवर  चतुराई

                                     

धन संपदा बहुत कमाई।

सोचो लाॅरी कब थी गाई?

प्रेम भाव है, कहाँ खो गया?

हावी,  पेशेवर  चतुराई।


स्पद्र्धा के पथ पर नारी।

भूल रही, अपनी ही पारी।

मातृत्व का भाव मर रहा,

प्रतियोगिता की है तैयारी।


युवावस्था संघर्ष में बीती।

प्रौढ़ अवस्था रीती-रीती।

शादी के सपने भी खोये,

खुद हारकर, दुनिया जीती।


प्रेम भाव था प्रस्फुट होता।

कैरियर में था लगाया गोता।

स्थिर हुई, अधिकारी बनकर,

घर का डूब गया है, लोटा।


सखी-सहेली, सजना, संवरना।

बहाने बनाकर, पिय से मिलना।

हिसाब किताब में सब छूटा,

संबन्धों को, प्रेम से सिलना।


बच्ची खोई, किशोरी भी छूटी।

युवती,  जीवन रण  ने लूटी।

काम करन को बाहर निकली,

बुद्धि से जीती, दिल से टूटी।


Saturday, February 20, 2021

नारी की माँगो के आगे

 नर सदैव ही हारा है


कैसा प्यार, नहीं हैं समझे, माँगों का खुला पिटारा है।

नारी की माँगो के आगे, नर सदैव ही हारा है।।

प्रेम प्रदर्शन करती भारी।

अंगों से है उतरी सारी।

मुस्कान की आरी चलती,

नर की मति जाती है मारी।

नारी से पीड़ित नर को भी तो नारी का ही सहारा है।

नारी की माँगो के आगे, नर सदैव ही हारा है।।

कभी प्रेम से पागल करती।

सब कुछ सौंप समर्पण करती।

नजरें जब टेढ़ी करती है,

बड़ों-बड़ों के होश है हरती।

घायल करती, मरहम बनती, बच्चे जैसा दुलारा है।

नारी की माँगो के आगे, नर सदैव ही हारा है।।

रस्सी बिन बांधे नर को।

पूरण करती है जीवन को।

प्रेम में करती सब है अर्पण,

कपट मात देती नर को।

नर ने अपने कदम-कदम पर, नारी को ही पुकारा है।

नारी की माँगो के आगे, नर सदैव ही हारा है।।


Friday, February 19, 2021

सबसे अनूठा सबसे प्यारा

 नर नारी का संगम है


सबसे अनूठा सबसे प्यारा, नर-नारी का संगम है।

कोई देश हो, कोई भाषा, देखो दृश्य विहंगम है।।

इक-दूजे के लिए बने हैं।

इक-दूजे के लिए तने हैं।

इक-दूजे की चाहत है बस,

शिकायत भी तो प्रेम सने हैं।

नारी नर को प्यारी पल-पल, नारी हेतु नर सिंघम है।

कोई देश हो, कोई भाषा, देखो दृश्य विहंगम है।।

पल-पल नर का साथ खोजती।

जन्म देती है और पोषती।

बेटी, बहिन माता के रूप में,

पत्नी भी तो प्रेम रोपती।

अलग-अलग नर-नारी अधूरे, मिलकर खिलते रंगम हैं।

कोई देश हो, कोई भाषा, देखो दृश्य विहंगम है।।

नर, नारी बिन रहे अधूरा।

नारी मिल करती है पूरा।

नारी बिन अस्तित्व न नर का,

नारी बनाती, उसको शूरा।

इक-दूजे के भाव ही मिलकर, जीवन भर की च्युंगम हैं।

कोई देश हो, कोई भाषा, देखो दृश्य विहंगम है।।