Thursday, January 14, 2021

बुद्धि से जीती, दिल से टूटी

 

                     खुद हारकर, दुनिया जीती               

धन संपदा बहुत कमाई।

सोचो लारी कब थी गाई?

प्रेम भाव है, कहाँ खो गया?

हावी,  पेशेवर  चतुराई।

 

स्पर्धा के पथ पर नारी।

भूल रही, अपनी ही पारी।

मातृत्व का भाव मर रहा,

प्रतियोगिता की है तैयारी।

 

युवावस्था संघर्ष में बीती।

प्रौढ़ अवस्था रीती-रीती।

शादी के सपने भी खोये,

खुद हारकर, दुनिया जीती।

 

प्रेम भाव था प्रस्फुट होता।

कैरियर में था लगाया गोता।

स्थिर हुई, अधिकारी बनकर,

घर का डूब गया है, लोटा।

 

सखी-सहेली, सजना, संवरना।

बहाने बनाकर, पिय से मिलना।

हिसाब किताब में सब छूटा,

संबन्धों को, प्रेम से सिलना।

 

बच्ची खोई, किशोरी भी छूटी।

युवती,  जीवन रण  ने लूटी।

काम करन को बाहर निकली,

बुद्धि से जीती, दिल से टूटी।


Tuesday, January 12, 2021

नहीं, कोई भी, दोयम जग में

 

अद्वितीय भूमिका

                                

नहीं, कोई भी, दोयम जग में, नहीं, कोई भी भारी है।

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

प्रकृति का सृजन, अजब निराला।

कोई    इसे,  झुठलाने वाला।

अनुपम है, हर  प्राणी,  जग में,

निकृष्ट नहीं, कोई गोरा-काला।

कोई समान प्रतिरूप नहीं यहाँ, पूरक हैं, सब, तैयारी है।

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

नारी बिन, अस्तित्व न, नर का।

नारी अकेली,  कारण डर का।

अकेले-अकेले, दोनों भटकें,

मिलने से, सृजन हो, घर का।

नारी खुद को, समर्पित करती, नर को नारी, प्यारी है।

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

समानता, संघर्ष व्यर्थ  है।

पूरकता ही, सही अर्थ है।

इक-दूजे बिन, दोंनो अधूरे,

मिलकर के वे, सृष्टि समर्थ हैं।

संघर्ष से विध्वंस करो ना, मिलकर सीचों क्यारी है।

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

Friday, January 8, 2021

ठहरो नारी

 

क्या करती हो?

 

 

क्या करती हो? ठहरो नारी।

प्रतिस्पर्धा है, दिल पर आरी।

स्वाभाविक गुण तजती हो तुम,

कीमत चुकाएगी, सृष्टि भारी।।

 

सभी विलक्षण, सब ही अनुपम।

जवान, वृद्ध हो, या हो बचपन।

नहीं कोई भी, समान सृष्टि में,

बंद करो ये, नंगा नचपन।।

 

नर नारी के समान नहीं है।

नारी श्रेष्ठ है, यही सही है।

विलक्षण गुणों से भूषित नारी,

ज्ञान की देवी, वही मही है।।

 

जीवन मूल्यों से नर भटका।

अंधेरी गलियों में अटका।

कालिदास सा मूरख है नर,

विद्योत्तमा लगाओ झटका।।

 

दया, करुणा, प्रेम और ममता।

स्नेह भाव से, सौहार्द्र सजता।

परिवार, समाज, देश है तुम से,

तुमरे बिन, नर जोगी, रमता।।

 

राष्ट्रप्रेमी का सदैव समर्पण।

प्रेम भाव से सब कुछ अर्पण।

साथ-साथ मिल आगे बढ़ेगे,

संघर्ष भाव का कर दें तर्पण।।

Thursday, January 7, 2021

केवल नहीं घरवाली हो

 जीवन से, तुम प्यारी हो

 

              

केवल नहीं घरवाली हो।

तुम ही प्रेरक नारी हो।

संकेतों से जीवन चलता,

जीवन से, तुम प्यारी हो।

 

तुम प्रेम की मूरत हो।

दिल की खुबसूरत हो।

कर्तव्य पर तुम हुई निछावर,

सृष्टि की रचना न्यारी हो।

 

नर को शिक्षित करती हो।

पीड़ा सारी हरती हो।

प्रसव वेदना पीकर माता,

तुम सृजन की क्यारी हो।

 

तुम ही नेह की डोरी हो।

नयन आज क्यों? मोड़ी हो।

भले ही कितनी दूरी पर हो,

जहाँ भी हो, तुम म्हारी हो।

 

नहीं कोई अब दूरी हो।

तुम प्रेम से पूरी हो।

तुमरे बिन नर सदैव अधूरा,

नर बिन तुम भी अधूरी हो।


Wednesday, January 6, 2021

मुक्त गगन में

 

तेरी खुशी में आज मगन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


बचपन तेरा घुटकर बीता।

मजबूरी में दूध था पीता।

बंधन इतने किए आरोपित,

साहस और उत्साह है रीता।

छोड़ रहा अब खुले चमन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


बचपन के दिन लौट न पाएं।

बचा नहीं कुछ गाना गाएं।

इच्छा तेरी दबी थी मन की,

समझ न आता क्यूँ हरषाएं।

समय बीत गया सिर्फ दमन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


समय बीत गया उड़ गए तोते।

रोना आता पर नहीं हैं रोते।

पास हमारे नहीं शेष कुछ,

भव सागर में लगा तू गोते।

आहुति दी है खुद की हवन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


तू अब अपनी खुशियाँ जी ले।

जीवन अमी, जी भर पी ले।

अपनी राह अब चुन ले खुद ही,

हमारे तेवर पड़ गए ढीले।

मौत भी देखें, नहीं कफन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


हमारा युग अब बीत रहा है।

मन शरीर सब रीत रहा है।

शिक्षा पा अब विमुक्त हुए तुम,

तुमको पा मन जीत रहा है।

परेशान ना होना तपन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


नहीं चाह कोई, नहीं लक्ष्य है।

पौष्टिकता ही, तेरा पथ्य है।

सहयोग समन्वय प्रेम मिले तुझे,

जीवन पथ में प्रेम भक्ष्य है।

संभल तू उड़ना, तेज पवन में।

उड़ ले पंक्षी मुक्त गगन में।।


Thursday, December 3, 2020

दोहा सह्स्त्रावली के कुछ दोहे

 अवसर आवत हाथ में, सभी उठावें लाभ।

अपना कह कर लूटते, लेते हैं परिलाभ॥1012

 

प्रेम और समर्पण कर, इक दूजे को मात।

बेचत या फ़िर ठगत हैं, इक दूजे का गात॥1013

 

झूठ और बस झूठ ही, बोलत हैं कुछ लोग।

बिना स्वार्थ भी बोलते, झूठ लगाते भोग॥1014

 

 

ना कोई साथी रहा, ना कोई है मीत।

जो भी मिलता प्रेम से, अन्दर से भयभीत॥1015

 

लोग दिखावत प्रेम है, गात प्रेम के गीत।

जितने आते पास हैं, हम उतने भयभीत॥1016

 

जीत-हार सब व्यर्थ हैं, ना है धन की चाह।

कोई अपना है नहीं, सभी चलत निज राह॥1017

 

इक दूजे को वचन दे, थाम लिया था हाथ।

छल, कपट और झूठ ने, झुका दिया है माथ॥1018

 

प्रेम समर्पण नाम ले, रंग-रंग के भाव।

धोखा दे छल कपट से, दिखा दिए फ़िर ताव॥1019

 

हमने तो चाहा नहीं, यूं नारी का साथ।

छल, कपट और झूठ से, पकड़ा काटा हाथ॥1020

 

नर नारी को चाहता, सब कुछ देता बार।

माया में फ़ंस कर मिटे, नारी से ना पार॥1021

 

प्रेम नहीं सम्पत्ति है, नहीं हो सके लूट।

प्रेमी जन में लोभ ना, नहीं पड़त है फ़ूट॥1022

 

प्रेम चाह सबको रही, नहीं हो सकी लूट।

जो भी इसको लूटता, प्रेम जात है रूठ॥1023

 

प्रेम होत सौदा नहीं, ना कोई है आन।

गलती पग-पग होत है, क्षण-क्षण पकड़ें कान॥1024

Thursday, September 17, 2020

चन्द दोहे

 हम करते ऐसी दुआ, मिट जायें सब रोग।

सुबह शाम घूमों जरा, कर लो हल्का योग॥

किताबों में कुछ तथ्य हैं, कुछ अनुभव हैं मीत।
शिक्षा इसको कह रहे, सब गाते हैं गीत॥

अपना कोई है नहीं, बिखर पड़े हैं राह।
ठोकर से आगे बढ़ें, निकल जात है आह॥

जिसका कोई मित्र ना, साथ हमारे आय।
हानि-लाभ को छोड़ कर, दो पल जी लें गाय॥

अपना-अपना करत ही, जीवन जाता खोय।
साथ साथ कुछ चलत हैं, अन्त अकेले होंय॥

हम खुद के ना हो सके, औरों से क्या आस?
अपना अपना चुग रहे, ना आवत हैं पास॥

जब तक पूरी आस हो, अपना है वह मित्र।
काम होत ही जायगा, देखत रहना चित्र॥

मनुष्य संपदा है नहीं, नहीं किसी का दास।
कोई किसी का है नहीं, सबकी अपनी आस॥

कोई तुम्हारा नहीं, रोते हो दिन-रात।
तुम किसके हो सोच लो, मन की कह दो बात॥

इच्छा किसी की आज तक, पूरी न हुई मित्र।
कल्पना से कविता बने, बन जाते हैं चित्र॥

साथ किसी के हैं नहीं, सबकी अपनी राह।
हम तो तुम्हारे साथ हैं, कह करते गुमराह॥

जो चाहे लिखते रहो, पढ़ लेते कुछ लोग।
सब अपने मन की करें, अपना अपना भोग॥

Friday, July 31, 2020

मातृत्व का मान मिट रहा



            
चहुँ ओर व्यापार बढ़ रहा।
संबंधों का बाजार सज रहा।
दौलत संबंधों पर हावी,
मानव मन मिट-मिट मिट रहा।
वात्सल्य नीलाम हो रहा। 
मातृत्व का मान मिट रहा।।

भाव बिना संबंध हैं बनते।
प्यार के नाम धोखे हैं सजते।
प्रेमी हैं , तेजाब से जलते,
दहेज के झूठे केस हैं चलते,
रेप रेप बस रेप हो रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।।

प्रेम नाम व्यापार हो रहा।
बाजार में विश्वास बिक रहा।
भावना से स्टेज सज रहा।
नारी तन, व्यापार बढ़ रहा।
देवी का सम्मान गिर रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।

नारी भी मातृत्व है तजती।
लज्जा से वह अब नहीं सजती।
षड्यंत्रों की बनकर देवी।
प्रेम नाम ले, नर को छलती।
प्रतिस्पर्धा में घर है जल रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।

कोरोना के काल में


कोरोना के काल में, आवागमन है बन्द।

मंद-मंद जीवन चले, बाजार हुए है मंद।।


घर सबको अच्छा लगे, घर में बैठे धाय।

घर तब तक ही चलत है, बाहर से कुछ आय।।


लाॅकडाउन ने किया, सबको घर में बंद।

कुछ तो मस्ती लेत हैं, कुछ धंधे बिन अंध।।


वाइरसों का कहर है, दी है गहरी मार।

अमरीका से देश का, कर दिया बंटा ढार।।


मिलते-जुलते प्रेम से, रहते पल पल पास।

दूर-दूर रहने लगे, जीवन कितना खास।।


दूर-दूर हम रह रहे, पास न कोई मीत।

कोरोना ने सीख दी, दूर रहे से जीत।।


स्वागत सबका था कभी, खुला हुआ था द्वार।

हाथ दूर से, जोड़ते, इधर न आना यार।।


अभिवादन की रीत थी, खुल मिलते थे हाथ।

गले लगाना भूलकर, भूल चूमना माथ।।


मिट जाएं सब दूरियां, करते थे अरदास।

दूर-दूर अब करत हैं, खुद ना खुद के पास।।


चाहत को चाहत नहीं, चाहत रहे उदास।

प्रेम प्रेम से कहत हैं, भूल न आना पास।।


कोरोना का काल है, काल लगत है पास।

आओ बस घर में रहें, दबा मिलन की आस।।


कोरोना प्रेमी घणा, मिलत गुणत ये होत।

अंधेरा घर में करे, बुझा प्राण की जोत।।

साफ-सफाई जो रखें, खुद ही रहते दूर।

प्रेरक हम सबके बनें, जीते हैं भर पूर।।


आत्म हत्या, तुम ना करो, चलो न इतने पास।

दूर-दूर से प्रेम कर, बन जाओ तुम खास।।


आया है, सो जाएगा, तुम ना रहो, उदास।

कोरोना का काल भी, आएगा उसके पास।।


पढ़ो-लिखो, आगे बढ़ो, दूर-दूर रख गात।

दिल से दिल की बात कर, मोबाइल पर तात।।


कोरोना की चाल है, हमरे हाथ में मित्र।

साबुन से मर जात है, प्राणी बड़ा विचित्र।।

Monday, July 27, 2020

कोयल ज्यों गाती हो

बहुत याद आती हो!


          डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

 

 

आँखों के खुलते ही।

भोर में उठते  ही।

तुम से ही रोशनी,

बाहर निकलते ही।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

अनपढ़ भले ही तुम।

सब कुछ अभी भी तुम।

पास भले आज नहीं,

पास ही खड़ी हो तुम।

पचास का हो गया,

बच्चे सा बहलाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

मेरे साथ रह लोगी।

सब कुछ सह लोगी।

बनाकर खिलाओगी,

आँखों से बह लोगी।

मेरे दुःख में माँ तुम,

सो नहीं पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

छोटी सी गुड़िया तू।

नेह की पुड़िया तू।

अभी भी बच्ची है,

समझ में बुढ़िया तू।

बहन तुम छोटी हो,

बिटिया सी थाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

भागता था मन मेरा।

सहारा मिला था तेरा।

तेरी खातिर थम गया,

रूके जहाँ, बना डेरा।

कल की ही बात लगे,

गोद में चढ़ आती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

काम से था भाग रहा।

बिना देखे काज रहा।

प्रेरणा बन थाम लिया,

तुम से था फाग रहा।

दूर हुईं बहुत आज,

नहीं मिल पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

प्रातः भ्रमण पर जाता हूँ।

तुम्हें साथ नहीं पाता हूँ।

योग की, सुहानी वेला में,

क्यूँ?उदास हो जाता हूँ।

साथ में नहीं हो अब,

चटाई नहीं विछाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

महसूस मुझे होता है।

मेरा अर्धांग रोता है।

निकट अनुभूति बिना,

रात नहीं सोता है।

गुस्सा बहुत झेला पर,

उठ नहीं पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

कलम लिए बैठा हूँ।

तुमसे कुछ ऐंठा हूँ।

बच्ची सा सभालती हो,

भले ही मैं जेठा हूँ।

जबरन उठाकर मुझे,

टूथब्रुश पकड़ाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

सब कुछ मिलता है।

इच्छा से पकता है।

खा नहीं पाता मैं,

भले ही महकता है।

सामने नहीं हो आज,

तुम नहीं खिलाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

मोबाइल अब हाथ में है।

लेपटॊप भी पास में है।

पढ़ नहीं पाता अब,

लेखन तेरी आस में है।

इंतजार करता हूँ,

कलम नहीं छुड़ाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

आती नहीं पाती है।

शनि साढ़े साती है।

तुम नहीं साथ आज,

राह नहीं बुलाती है।

मनाने को नहीं पास,

गुस्सा नहीं दिखाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

माता, बहिन नारी हो।

बेटी, पत्नी प्यारी हो।

कोई भी रिश्ता हो,

नर की दुलारी हो।

नारी बिना नर की कभी,

जिंदगी सुहाती हो। 

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।