Sunday, May 19, 2024

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका,

 हर रूप में सदैव अनूठी हो

13.02.2024


ब्रह्माणी सृजन करती हो, जीवन की तुम ही बूटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

सरस प्रेम की मूरत हो।

सदगुण निधि खुबसूरत हो।

ज्ञान की देवी, हो सरस्वती,

क्रोध में काली, भय पूरत हो।

आकषर्ण में सबको बाँधा, गृहस्थ धर्म की खूँटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

प्रथम षिक्षिका तुम मानव की।

विध्वंसक हो तुम दानव की।

कभी मृत्यु की देवी हो तुम,

प्रेम भरी फुहार सावन की।

रहस्य नीति से छलती जग को, प्रेम से जग को लूटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

काम की देवी रति तुम्ही हो।

वेदों की भी ऋचा तुम्हीं हो।

लक्ष्मण की तुम रेख न लांघो,

रामायण की सीता तुम्हीं हो।

वैभव की देवी लक्ष्मी हो, शक्ति स्रोत, ना चूँटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

गंभीरता की खान तुम्हीं हो।

हल्की होकर पान तुम्हीं हो।

सहनषीलता की देवी तुम,

षिक्षा की तो शान तुम्हीं हो।

पुरुषार्थ असफल हो जाता, किस्मत संगिनी रूठी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।


Sunday, May 12, 2024

एकादश दोहे-मां


१. पत्नी जब माता बने, मां का देते मान।   

पत्नी की ही शान है, मातृ दिवस बस गान।।

2. फोटो ही हैं खिंच रहे, छपते हैं संदेश। 

 मिलने को मां तरसती, कब आएगा देश।।

3. बाहर मां का दिवस है, घर में है अंजान।  

खाने को है तरसती, कैसा मिलता मान।।

4. घड़ी घड़ी हमने पिया,  मां का पावन दूध। 

खाना हम ना दे सके, वाह वाह हो खूब।।

5. ना कोई मुझको कमी, सच ना मां के बोल।

 भूखी रह कर जी रही, पीकर विष के घोल।।

6. मां तो मां है आज भी,  सब कुछ देती वार। 

भूखी भी आशीष दे, सहे भूख की मार।।

7. सब कुछ उसको मिल रहा, झूठे बोले बोल। 

सच हमसे ना कह सके, यही हमारी पोल।।

8. रोटी सुत ना दे सके, जीवन को धिक्कार। 

व्यर्थ मान सम्मान है, हम हैं बस मक्कार।।

9. कितना अक्षम आज में, कितना हूं लाचार। 

मां को साथ न मिल सका, नीच हुआ आचार।।

10. कदम-कदम पर अब तलक, होता आया फेल।                  

जीने में जीवन नहीं, जीवन जलती जेल।।

11. जननी को ही मान ना, रोटी को है रार।  

जीवन का कुछ मोल ना, जीवन है बस खार।।

Thursday, April 11, 2024

रिश्तों का गुलदस्ता तो बस

 प्रेम रंग से खिलता है


पल में तोला, पल में माशा, पल में मन बन जाता है।

पल में बोला, पल में खोला, पल में रिश्ता बन जाता है।

परिवर्तन है मूल जगत का, मानव पशु बन जाता है।

स्वारथ यहाँ पर प्रेम कहाता, प्रेमी मौत बन आता है।

आकर्षण होता है विष में, शातिर विश्वास जमाता है।

काले लोग हैं, काले दिल हैं, प्रेम ठगी का नाता है।


विश्वास से ही है धोखा होता, विश्वासघात कहलाता है।

नारी स्वार्थ बस, नारीत्व बेचती, वह धंधा बन जाता है।

कानूनों से खेल खेलते, जीवन खिलवाड़ बन जाता है।

शातिर औरत शिकार खेलती, मर्द शिकार बन जाता है।

झूठे दहेज के केस हैं होते, फर्जी, बलात्कार हो जाता है।

व्यक्ति और परिवाह हैं मिटते, विश्वास ढह जाता है।


विश्वास, प्रेम, निष्ठा से ही, समाज का आधार बनता है।

आस्था और समर्पण से, परिवार का आँगन सजता है।

तेरा-मेरा, अपना-पराया, रिश्तों का बाजा बजता है।

अधिकारों के संघर्ष से, घर का, ताना-बाना विखरता है।

कानूनों से प्रेम न उपजे, सिर्फ अपराध उपजता है।

रिश्तों का गुलदस्ता तो बस, प्रेम रंग से खिलता है। 


जीवन साथी नहीं है कोई,

आओ कुछ पग साथ चलें


जीवन का कोई नहीं ठिकाना, कैसे जीवन साथ चले?

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



चन्द पलों को मिलते जग में, फ़िर आगे बढ़ जाते है।

स्वार्थ सबको साथ जोड़ते, झूठे रिश्ते-नाते हैं।

समय के साथ रोते सब यहां, समय मिले तब गाते हैं।

प्राणों से प्रिय कभी बोलते, कभी उन्हें मरवाते हैं।

अविश्वास भी साथ चलेगा, कुछ करते विश्वास चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



कठिनाई कितनी हों? पथ में, राही को चलना होगा।

जीवन में खुशियां हो कितनी? अन्त समय मरना होगा।

कपट जाल है, पग-पग यहां पर, राही फ़िर भी चलना होगा।

प्रेम नाम पर सौदा करते, लुटेरों से लुटना होगा।

एकल भी तो नहीं रह सकते, पकड़ हाथ में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



शादी भी धन्धा बन जातीं, मातृत्व बिक जाता है।

शिकार वही जो फ़से जाल में, शिकारी सदैव फ़साता है।

विश्वास बिन जीवन ना चलता, विश्वास ही धोखा खाता है।

मित्र स्वार्थ हित मृत्यु देता, दुश्मन मित्र बन जाता है।

कुछ ही पल का साथ भले हो, डाल गले में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥


Thursday, April 4, 2024

दोहा सबका मित्र है

 दोहा छोटा छन्द है, अभिव्यक्ति का नूर।

चन्द पलों में ही बनें, सीख देत भरपूर॥१॥


चार चरण में बनत है, दो हैं विषम कहात।

मात्रा तेरह विषम में, ग्यारह सम में आत॥२॥


पहला तेरह से बने, ये है विषम कहात।

तृतीय भी तो विषम है, तेरह से ही बात॥३॥


दूजे को सम कहत हैं, ग्यारह में हो बात।

चौथा इसका मित्र है, एक प्राण दो गात॥४॥


दोहा सबका मित्र है, सरल, सहज ओ नीक।

राष्ट्र्प्रेमी की चाह, आओ सब लो सीख॥५॥

Wednesday, April 3, 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२०

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति का, एक ही है मन्तव।

शिक्षित हों सब नागरिक, सब पहुंचे गन्तव्य॥१॥

गुणवत्ता की दौड़ में, शिक्षा करे सहाय।

कुशल, समर्थ, सक्षम बन, सब मिल करें उपाय॥२॥

पांच वर्ष आधार बन, तीन में हों तैयार।

तीन वर्ष का मध्य है, चार माध्यमिक पार।।३॥

साक्षरता संख्यांक से, निर्मित हो आधार।

कुशल और सक्षम बनें, विकसित कारोबार॥४॥

शिक्षक कुशल सक्षम बनें, विकसित हों संस्थान।

विद्यार्थी हो केन्द्र में, विश्व गुरु का मान॥५॥

नर-नारी में भेद ना, समावेश है नीक।

साथ-साथ सब मिल बढ़ें, कदम-कदम है सीख॥६॥


Friday, March 29, 2024

रेखा धन की खिच गई

 निन्यानवे के फ़ेर में भूल गए सब शौक।

पैसा हावी हो गया, नौकरी को बस धौक।

सम्बन्धों के जाल में, मरने लगा विश्वास,

रेखा धन की खिच गई, मिट गए सारे शौक॥

Tuesday, March 7, 2023

तुमको भी शुभ कामना

 नया मिले फिर यार


होली की शुभकामना, सब ही सबको देत।

खा पीकर हुल्लड़ करें, नहीं किसी का फेथ।।1।।

रंगों की बारिस करें, प्रेमी सब हर लेत।

संस्कृति के नाम पर, संस्कारों की भेंट।।2।।

पवित्र यह त्यौहार है, सबको माने यार।

इक दूजे को छल रहे, नर हो या फिर नार।।3।।

प्राकृतिक अब हैं नहीं, रंग हुए बे मेल।

खुशियों की होली जली, दिल होते हैं फेल।।4।।

नहीं राग रस रंग है, नहीं प्रेम की डोर।

मिलने के अब रंग ना, सबके अपने छोर।।5।।

नायक धन से तुल रहा, ठगिनी दिल की चोर।

होली अब होली नहीं, केवल होता शोर।।6।।

केवल बाकी चाहतें, आहत हैं नर-नार।

केमीकल के रंग हैं, नहीं प्रेम की धार।।7।।

जीवन है नीरस हुआ, अंकों का है खेल।

धन से दिल हैं बिक रहे, प्रेम हुआ है फेल।।8।।

ना शुभ है, ना कामना, प्रेम हुआ है फेक।

कॉपी, कट ओ पेस्ट है, होली की नव टेक।।9।।

हुल्लड़ से बचने चले, बचा न कोई यार।

शादी का सौदा हुआ, प्रेमी एसिड वार।।10।।

हुरियारे हैं खेलते, छल के कैसे खेल?

धन की खातिर होत हैं, नर नारी के मेल।।11।।

तुमको भी शुभ कामना, नया मिले फिर यार।

जीवन जीना प्रेम से, करना ना फिर वार।।12।।


Saturday, March 4, 2023

जीवन की कीमत पर देखो

 धन और पद ये जुटाते हैं

                                           

सभी प्रेम के गाने गाकर, नफरत चहुँ ओर लुटाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

संबन्धों के, भ्रम में, हम जीते।

सुधा के भ्रम, गरल हैं पीते।

कपट करें कंचन की खातिर,

खुद ही खुद को, लगाएं पलीते।

कंचन काया नष्ट करें नित, फिर कुछ कंचन पाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

प्रेम नहीं कहीं हैं मिलता।

फटे हुए को है जग सिलता।

नवीनता का ढोंग कर रहे,

जमा रक्त है, नहीं पिघलता।

अपनत्व ही जाल बना अब, अपना कहकर खाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

अपनों का हक मार रहे हैं।

संबन्ध इनकी ढाल रहे हैं।

स्वारथ पूरा करने को ही,

संबन्धों को साध रहे हैं।

अपना कह कर लूट रहे नित, अपना कह भरमाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।


Friday, March 3, 2023

क्या चरित्र की परिभाषा है?

समझ नहीं कुछ भी आता है


 क्या चरित्र की परिभाषा है? समझ नहीं कुछ भी आता है।

कागज के टुकड़े से व्यक्ति, चरित्रवान बन जाता है।।

कदम-कदम पर झूठ बोलता।

रिश्वत लेकर पेज खोलता।

चरित्र प्रमाण वह बांट रहा है,

जिसको देखे, खून खोलता।

देश को पल पल लूट रहा जो, जन सेवक कहलाता है।

क्या चरित्र की परिभाषा है? समझ नहीं कुछ भी आता है।।

चरित्र की परिभाषा कैसी?

छल-कपट की ऐसी-तैसी।

राष्ट्र की जड़ को खोद रहे जो,

तिलक लगाते ऋषियों जैसी।

संन्यासी खुद को बतलाकर, मठाधीश बन इठलाता है।

क्या चरित्र की परिभाषा है? समझ नहीं कुछ भी आता है।।

नर-नारी संबन्ध निराले।

प्रेम से बने, प्रेम के प्याले।

प्रेम में सारे बंधन तोड़ें,

प्रेम लुटाते हैं मतवाले।

निजी प्रेम संबन्धों से कोई, क्यों चरित्रहीन बन जाता है।

क्या चरित्र की परिभाषा है? समझ नहीं कुछ भी आता है।।

बेईमान चरित्रवान क्यों?

चरित्र प्रमाण बांट रहा क्यों?

नारी नर को लूट रही है,

बन जाता नर ही दोषी क्यों?

राष्ट्रप्रेमी प्रेम ये कैसा? प्रेमी प्रेम को मरवाता है।

क्या चरित्र की परिभाषा है? समझ नहीं कुछ भी आता है।

Tuesday, February 7, 2023

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल

पल पल सबको प्रेम लुटाते


सबके हित में कर्म करें, बस नहीं प्रेम के गाने गाते। 

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल, पल पल सबको प्रेम लुटाते।।

कर्तव्य पथ पर अविचल चलते।

बाधाओं से कभी न डरते।

प्रेम नाम धोखे खाकर भी,

नहीं प्रेम के पथ से हटते।

प्रेम नहीं अधिकार जताता, समर्पण से दिल जीते जाते।

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल, पल पल सबको प्रेम लुटाते।।

प्रेमी न करते कोई दावा।

नहीं पूजते काशी-काबा।

चाहत तो वासना होती है,

प्रेम नहीं है, कोई ढाबा।

प्रेम नाम षड्यंत्र जो रचते, नफरत और घृणा ही पाते।

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल, पल पल सबको प्रेम लुटाते।।

प्रेम की नहीं कोई है सीमा।

प्रेम नहीं, शादी का बीमा।

बदले में जो प्रेम माँगता,

वासना वह, जहर है धीमा।

प्रेमी प्रेम को सजा न चाहे, प्रेमी प्रेम को नहीं मरवाते।

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल, पल पल सबको प्रेम लुटाते।।

प्रेम को कोई समझ न पाया।

सिर्फ प्रेम का गाना गाया।

प्रेम पात्र पर ऐसिड फेंका,

ऐसे प्रेम से, प्रेम लजाया।

पिशाच प्रेम का स्वांग रचाते, प्रेमिका के टुकड़े हो जाते।

प्रेम पुजारी हैं, हम केवल, पल पल सबको प्रेम लुटाते।।

 

Monday, February 6, 2023

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की,

  नहीं जेल, अब जेल है

                                     

चाह नहीं अब रही किसी की, सबने खेला खेल है।

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की, नहीं जेल, अब जेल है।।

कर्म कर्म के लिए करें हम।

कदम कदम हैं छले, जले हम।

नहीं किसी से कोई शिकायत,

खुद ही खुद के साथ चलें हम।

पथिकों का है आना-जाना, जीवन चलती रेल है।

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की, नहीं जेल अब जेल है।।

छिनने का कोई भय नहीं हमको।

लूट का माल, मुबारक तुमको।

षड्यंत्रों से मुक्ति मिले बस,

पी जाएंगे सारे गम को।

स्वार्थ-वासना की आँधी में, संघर्ष की रेलम पेल है।

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की, नहीं जेल अब जेल है।।

विश्वास करे, विश्वास घात है।

कर्म हैं काले, काली रात है।

तुम से, प्यारी सीख मिली है,

नीच कर्म ही नीच जात है।

राष्ट्रप्रेमी को, प्रेम,  प्रेम से, स्वारथ से ना मेल है।

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की, नहीं जेल अब जेल है।।

नहीं प्रेम की बातें करते।

नहीं किसी का सोना हरते।

जितना चाहो उतना लूटो,

लुटने से हम नहीं हैं डरते।

झूठ का इत्र मुबारक तुमको, हमको सच का तेल है।

चाह नहीं है, हमें स्वर्ग की, नहीं जेल अब जेल है।।


Sunday, February 5, 2023

पैसा ही है, सार जगत का

                        पैसे से सब खेल है

                                     


पैसा ही है, सार जगत का, पैसे से सब खेल है।

पैसे खातिर हत्या होतीं, पैसे हित ही मेल है।।

पैसे से हैं रिश्ते-नाते।

प्रेम गीत पैसे हित गाते।

पैसे के सब संगी साथी,

पैसे से बच्चे बिक जाते।

पैसा देख शादी होती हैं, षड्यंत्रों की रेल है।

पैसा ही है, सार जगत का, पैसे से सब खेल है।।

पैसे से सुविधा मिलती हैं।

पैसे से झांकी सजती हैं।

पैसे से सब स्वारथ पूरे,

पैसे से रमणी रमती है।

पैसे की ही माया देखो, होटल बनती जेल है।

पैसा ही है, सार जगत का, पैसे से सब खेल है।।

पैसा ही है, पति, पत्नी का।

पैसा ही नायक रमणी का।

राष्ट्रप्रेमी है दास प्रेम का,

मोल नहीं कोई दमड़ी का।

पैसा, प्रेमी, तुम्हें मुबारक, निकला हमारा तेल है।

पैसा ही है, सार जगत का, पैसे से सब खेल है।।


Thursday, January 26, 2023

शोभा है गणतंत्र की

 

                                     

कर्म, विज्ञान, विश्वास है, निराशाओं का अंत।

शोभा है गणतंत्र की, खिला हुआ है आज बसंत।।

गणतंत्र नहीं सत्ता तक सीमित।

सामूहिक हित में, हैं सब बीमित।

गण के तंत्र को जीना सीखें,

क्षण-क्षण इसके लिए ही जीवित।

बासंती रंग में रंग कर के, वसुधा हित हम बने हैं संत।

शोभा है गणतंत्र की, खिला हुआ है आज बसंत।।

विरोधों का सम्मान करें हम।

कर्म हेतु ही कर्म करें हम।

मृत्यु हमारी चिर प्रेयसी,

पल पल को उत्सर्ग करें हम।

राष्ट्रप्रेमी तो प्रेम पथिक है, सेवक है बस, नहीं महंत।

शोभा है गणतंत्र की, खिला हुआ है आज बसंत।।

बलिदानों के हैं हम आदी।

देश की खातिर पहनी खादी।

कण-कण के हैं प्रेम पुजारी,

प्रकृति से कर ली हमने शादी।

बसंत से खिले, यौवन सबका, पतझड़ पर लग जाय हलंत्।

शोभा है गणतंत्र की, खिला हुआ है आज बसंत।।


Sunday, January 1, 2023

तेईस का स्वागत! बाईस को टाटा!

राष्ट्रप्रेमी है प्रेम लुटाता।


सर्दी से सब ठिठुर रहे हैं।
मौसम को हम झेल रहे हैं।
रूस यूक्रेन में युद्ध हो रहा,
जीवन से ही खेल रहे हैं।

कोरोना की आहट फिर से।
नहीं किसी की चाहत फिर से।
दो हजार बाईस बीत गया यूँ,
तेईस की गरमाहट फिर से।

आओ नई कुछ आस जगाएं।
संबन्धों में गरमाहट लाएं।
शांति और अहिंसा की खातिर,
नफरत तजकर गले लगाएं।

युद्ध का, ये,  समय नहीं है।
विकास हो सबका, यही सही है।
जो बीत गया, वह बीत गया है,
प्रकृति प्रेम की बांह गही है। 

मिलकर आगे बढ़ना होगा।
बाधाओं को तजना होगा।
दिखावा बहुत किया है अब तक,
यथार्थ के पथ पर चलना होगा।

युद्ध में, ये,  वर्ष न बीते।
हाथ नहीं, रह जाएं रीते।
बुद्धि से सब काम करें पर,
दिलों से, दिलों को आओ जीतें।

जबरन के संबन्ध न थोपें।
कोई किसी को छुरा न भोंके।
नर-नारी मिल बढ़ें प्रेम से,
तन से सिर, ना जुदा हो, रोकें।

लिव इन में, तुम रहो भले ही।
प्रेम से, प्रेम को, सहो भले ही।
साथी को, कोई घाव न देना,
प्रेम से हो अलगाव भले ही।

नव वर्ष का आनंद मनाओ।
ध्वनि प्रदूषण नहीं बढ़ाओ।
उत्सव में हो, जीवन प्यारा,
पर्यावरण को ना क्षति पहुँचाओ।

आओ! मिल, परिवार बचाएं।
समाज को ना क्षति पहुँचाएं।
वैयक्तिक स्वातंत्र भले लो,
वसुधा कुटुंब है, इसे सजाएं।

ईर्ष्या द्वेष नफरत को छोड़ें।
बम और पटाखे, न फोड़ें।
बाल, वृद्ध, महिलाओं की सुरक्षा,
आओ, दिलों को दिलों से जोड़ें।

राष्ट्रप्रेमी है प्रेम लुटाता।
नहीं किसी का शीश झुकाता।
सबका अपना-अपना पथ है,
तेईस का स्वागत! बाईस को टाटा! 



Saturday, July 9, 2022

मानव बनाना है

 

               

मेरे भारत को क्या हो रहा है ?       

एक अपनी जिन्दगी के लिए,           

कईयों की जिन्दगी ले रहा है.          

मानव ही मानव को

                          अपने अत्याचारों से किए है पीड़ित,

गान्धी आजाद विवेकानन्द के, 

विश्वास भंग किए जा रहे हैं

मेरा ही मन, 

धिक्कार रहा है मुझे,

                          मेरे ही भारत को कोई उजाड़ रहा है.

अगर बचाना है मुझे,

अपना राष्ट्र, स्वाभिमान और अस्तित्व,

तो अपने स्वार्थो को भुलाना है,

विश्वास बदल न जाए अविश्वास में,

इसे ध्यान में रख,

                             अपने को रक्तरंजित नदी में डुबाना है, 

भारत को बचाना है,

मगर तेरे इस बलिदान से क्या होगा ?

दूसरों को भी इसी मोड़ पर लाना है,

जो खून बह रहा पानी की तरह,

                              उसका तुझे मानव बनाना है.

इस तरह भारत को करना,

अपने विचारों को झंकृत,

राष्ट्रप्रेमी यदि कवि है तू सच्चा,

जान जायगा देश का बच्चा-बच्चा

और तुझे भरने भारत में शुद्ध भाव.


Thursday, May 19, 2022

लेन-देन तो होता सौदा

 हम तो केवल प्रेम हैं करते, बदले में कोई चाह नहीं है।

लेन-देन तो होता सौदा, जिसकी हमको थाह नहीं है।।

कितने भी हो प्रेमी तुम्हारे।

हक मिल जाएं, तुम्हें तुम्हारे।

पाने की कोई चाह न हमको,

प्राण बख्स दो सिर्फ हमारे।

माँगे तुम्हारी पूरी करेंगे, मिलने की कोई राह नहीं है।

लेन-देन तो होता सौदा, जिसकी हमको थाह नहीं है।।

प्रेम, समपर्ण निष्ठा माँगे।

प्रेमी, प्रेम की भिक्षा माँगे।

तुम्हें मुबारक प्रेमी तुम्हारा,

हम घटनाओं से शिक्षा माँगे।

धन, पद, यश, संबन्ध मिटे सब, भरते कोई आह नहीं है।

लेन-देन तो होता सौदा, जिसकी हमको थाह नहीं है।।

लुट जाएंगे, मिट जाएंगे।

तुम चाहो तो मर जाएंगे।

जब तक जीवन, निर्भय विचरें,

समझो मत हम डर जाएंगे।

विश्वास घात की चोट जो मारी, उसकी भी परवाह नहीं है।

लेन-देन तो होता सौदा, जिसकी हमको थाह नहीं है।।


तुम तो प्यारी अंदर हो

 नहीं कोई रिश्ता है तुमसे, तुम तो दिल की मंदर हो।

हम प्यार करते हैं खुद से, तुम तो प्यारी अंदर हो।।

तुमसे है अस्तित्व हमारा।

तुमही हो बस मात्र सहारा।

तुमने ही जीना सिखलाया,

तुम ही नदी, तुम ही किनारा।

प्रेम की डोर बधें हम पुतले, तुम ही हमारी कलंदर हो।

हम प्यार करते हैं खुद से, तुम तो प्यारी अंदर हो।।

तुमसे नफरत नहीं कर सकते।

खुद ही खुद को नहीं छल सकते।

प्रारंभ और अंत भी तुम हो,

नारी बिन नर, जी नहीं सकते।

नहीं हो केवल प्रेम सरोवर, तुम तो पूरी समंदर हो।

हम प्यार करते हैं खुद से, तुम तो प्यारी अंदर हो।।

तुम हमसे कभी विलग नहीं हो।

चिंगारी बन सुलग रही हो।

शीतल अग्नि प्रेम की मधुरा,

अंर्धाग हो मेरी, अलग नहीं हो।

तूफानी खतरों में हम फँसते, तुम ही हमारी लंगर हो।

हम प्यार करते हैं खुद से, तुम तो प्यारी अंदर हो।।


Monday, May 16, 2022

मिटने की परवाह नहीं हैं

 नहीं चाह बाकी अब कोई।

बेशर्मी की ओढ़ी लोई।

पति पत्नी की भेंट चढ़ गया,

पत्नी जा यारों संग सोई।


जीने की अब चाह है खोई।

फसल काटते, जो थी बोई।

आँख बंद विश्वास किया था,

घात है गहरा, आश न कोई।


मिलने की कोई चाह नहीं है।

वियोग की भी आह नहीं है।

भंवरों को सौंपा है खुद को,

खोजते कोई राह नहीं हैं।


विश्वासघात की चोट है गहरी।

हम गंवार हैं, तुम हो शहरी।

कपट से कंचन महल बनाओ,

लूटेंगे तुम्हें, तुम्हारे प्रहरी।


जिसकी कोई चाह नहीं है।

बाकी कोई राह नहीं है।

सब कुछ मिटा दिया है तुमने,

मिटने की परवाह नहीं हैं।


Saturday, May 14, 2022

जीवन की कीमत पर देखो

धन और पद ये जुटाते हैं 


सभी प्रेम के गाने गाकर, नफरत चहुँ ओर लुटाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

संबन्धों के, भ्रम में, हम जीते।

सुधा के भ्रम, गरल हैं पीते।

कपट करें कंचन की खातिर,

खुद ही खुद को, लगाएं पलीते।

कंचन काया नष्ट करें नित, फिर कुछ कंचन पाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

प्रेम नहीं कहीं हैं मिलता।

फटे हुए को है जग सिलता।

नवीनता का ढोंग कर रहे,

जमा रक्त है, नहीं पिघलता।

अपनत्व ही जाल बना अब, अपना कहकर खाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।

अपनों का हक मार रहे हैं।

संबन्ध इनकी ढाल रहे हैं।

स्वारथ पूरा करने को ही,

संबन्धों को साध रहे हैं।

अपना कह कर लूट रहे नित, अपना कह भरमाते हैं।

जीवन की कीमत पर देखो, धन और पद ये जुटाते हैं।।


Monday, May 9, 2022

बताओ प्यारी, क्या पाया तुमने?

 नहीं, प्रेम की, कोई सीमा, प्रेम, नहीं कोई बंधन है।

संबन्धों का मधु प्रेम है, संबन्धों को प्रबंधन है।।

प्रेम हमें हैं शेष जगत से।

केवल नहीं, किसी भगत से।

खुद ही खुद से प्रेम करें हम,

प्रेम नहीं है, किसी तखत से।

प्रेम सरोवर, वास हमारा, नहीं कोई यहाँ क्रंदन है।

संबन्धों का मधु प्रेम है, संबन्धों को प्रबंधन है।।

कपट झूठ का लेश नहीं है।

असंतोष यहाँ शेष नहीं है।

प्रेम नशीली वस्तु नहीं है,

प्रेमी कोई मदहोश नहीं है।

प्रेम में क्रोध नहीं होता है, प्रेम तो शीतल चंदन है।

संबन्धों का मधु प्रेम है, संबन्धों को प्रबंधन है।।

कपट जाल बिछाया तुमने।

कानूनों में, उलझाया तुमने।

प्रेम शब्द को, कलंकित करके,

बताओ प्यारी, क्या पाया तुमने?

प्रेम नहीं, हथियार लूट का, प्रेम, प्रेम का वंदन है।

संबन्धों का मधु प्रेम है, संबन्धों को प्रबंधन है।।


Thursday, May 5, 2022

मिलें प्रेम की ढेरों खुशियाँ,

ऐश्वर्य तुम्हारा बना रहे


 चेहरे पर मुस्कान रहे नित, प्रेम तुम्हारा बना रहे।

मिलें प्रेम की ढेरों खुशियाँ, ऐश्वर्य तुम्हारा बना रहे।।

कभी याद ना हमको करना।

कभी किसी से ना तुम डरना।

सह लेंगे हम घात तुम्हारे,

तुमको मिले खुशियों का झरना।

हम लुटने को राजी नित, कोष तुम्हारा बना रहे।

मिलें प्रेम की ढेरों खुशियाँ, ऐश्वर्य तुम्हारा बना रहे।।

नहीं कोई है चाह हमारी।

तुम्हें मिले, प्रेमी की क्यारी।

तुमसे मुक्ति मिल जाए हमको,

एक यही है आह हमारी।

कोई सजा न हमको भारी, इकबाल तुम्हारा बना रहे।

मिलें प्रेम की ढेरों खुशियाँ, ऐश्वर्य तुम्हारा बना रहे।।

धन की चाहत, तुम्हारी पूरी।

प्रेमी बिन, ना, रहो अधूरी।

विश्वासघात हम झेल चुके हैं,

आरिफ की चाह, करो तुम पूरी।

हम तो एकल ही जी लेंगे, साथ तुम्हारा बना रहे।

मिलें प्रेम की ढेरों खुशियाँ, ऐश्वर्य तुम्हारा बना रहे।।


Monday, May 2, 2022

प्रेम सुधा को तुम अब पी लो

                            मानव हो मानव बन जी लो


प्रेम सुधा को तुम अब पी लो।

मानव हो मानव बन जी लो।।


सबसे मिलकर रहना सीखो।

दुःख में भी खुश रहना सीखो।

सब ही मित्र नहीं कोई दुश्मन,

माँगों नहीं, लुटाना सीखो।

कपट गरल तुम हँस पी लो।

मानव हो मानव बन जी लो।।


नहीं किसी से लेना बदला।

खुद को ही हमने है बदला।

आहत हुए कदम-कदम पर,

प्रेम से ही है चुकाया बदला।

सच बोलो, झूठ को पी लो।

मानव हो मानव बन जी लो।।


किसी से कोई आश नहीं है।

साथी  कोई साथ नहीं है।

अकेले ही हम खुश रह लेते,

साथ के लिए मजबूर नहीं हैं।

अकेलेपन का रस भी पी लो।

मानव हो मानव बन जी लो।।


खुद ही खुद के साथी है हम।

सृजन के, संगी साथी है हम।

विश्वासघात से आहत होकर,

विश्वास के सदैव, साथी है हम।

जीओ और जीवन रस पी लो।

मानव हो मानव बन जी लो।।


Friday, April 29, 2022

जीवन तो है खेल जगत का

 प्राणी एक खिलोना है


नहीं किसी से नफरत हमको, नहीं किसी को रोना है।

जीवन तो है खेल जगत का, प्राणी एक खिलोना है।।

प्रेम मुहब्बत की, बातें हैं।

चन्द दिनों की, मुलाकातें हैं।

स्वारथ पूरा करने को फिर,

चलतीं कानूनी लातें हैं।

नहीं कोई है मित्र यहाँ पर, सबको एक दिन खोना है।

जीवन तो है खेल जगत का, प्राणी एक खिलोना है।।

नहीं है कोई अपना पराया।

स्वारथ हित ही ब्याह रचाया।

कपट के यहाँ पर जाल बिछे हैं,

झूठ का, सुंदर अंग सजाया।

धन की खातिर रिश्ते नाते, ईमान की कीमत सोना है।

जीवन तो है खेल जगत का, प्राणी एक खिलोना है।।

नहीं प्रेम की बातें करनी।

नहीं किसी की जान हड़पनी।

तुम अपने पथ जाओ प्यारी,

आजादी बस चाह है अपनी।

नहीं चाहिए हमको कुछ भी, खुद ही खुद को धोना है।

जीवन तो है खेल जगत का, प्राणी एक खिलोना है।।


Thursday, April 28, 2022

प्रेम को नहीं, चाह प्रेम की

प्रेम ही है मंतव्य हमारा



 प्रेम पथिक हूँ, प्रेम ही पथ है, प्रेम ही है गंतव्य हमारा।

प्रेम को नहीं,  चाह प्रेम की, प्रेम ही है मंतव्य हमारा।।

प्रेम ही जीवन सार प्रेम का।

प्रेम न करता, वार प्रेम का।

देने की वश,  चाह प्रेम में,

प्रेम न करे, इंतजार प्रेम का।

प्रेम तो केवल प्रेम ही करता, धोखे का यहाँ नहीं दुधारा।

प्रेम को नहीं,  चाह प्रेम की, प्रेम ही है मंतव्य हमारा।।

प्रेम नहीं, परिधि में सीमित।

प्रेम नहीं करता है बीमित।

प्रेम प्रेम का गुलाम नहीं है,

प्रेम की सीमा, सदैव असीमित।

प्रेम तो केवल, प्रेम लुटाता, प्रेम न चाहे कोई सहारा।

प्रेम को नहीं,  चाह प्रेम की, प्रेम ही है मंतव्य हमारा।।

प्रेम नहीं प्रेम को लूटे।

प्रेमी नहीं होते हैं झूठे।

प्रेम तो करता सहज समर्पण,

प्रेमी किसी को नहीं खसूटे।

प्रेम में, कानून न चलता, प्रेम नहीं है, गणित पहारा।

प्रेम को नहीं,  चाह प्रेम की, प्रेम ही है मंतव्य हमारा।।


भले ही सुंदर वस्त्र तुम्हारे

तुम उनसे भी सुंदर हो


 गोल गोल गोलाइयाँ सुंदर, गहराइयों में समंदर हो।

भले ही सुंदर वस्त्र तुम्हारे, तुम उनसे भी सुंदर हो।।

फोटा बहुत देखे हैं हमने।

वार तुम्हारे सहे हैं हमने।

चाह कर भी चाह न सकते,

विश्वासघात देखें हैं हमने।

बाहर से ना दिखलाओ केवल, दिखलाओ कैसी अंदर हो?

भले ही सुंदर वस्त्र तुम्हारे, तुम उनसे भी सुंदर हो।

जहरीली सोने की गागर।

बन ना सकी प्यार का सागर।

अपराधी को छोड़ के जाओ,

बन नहीं सकते, अब कभी नागर।

सुंदरता बाहर की केवल, अंदर से चंचल बंदर हो।

भले ही सुंदर वस्त्र तुम्हारे, तुम उनसे भी सुंदर हो।।

हमने तो था सब कुछ सौंपा।

तुमने दिल में छुरा ही भौंका।

नहीं अभी भी नफरत हमको,

किंतु बन नहीं सकतीं लोपा।

होटल की हो तुम आकर्षण, ना गुरूद्वारे की लंगर हो।

भले ही सुंदर वस्त्र तुम्हारे, तुम उनसे भी सुंदर हो।।


Sunday, April 24, 2022

नहीं किसी की चाह रही अब

नहीं किसी से द्वेष रहा है 


सहते सहते, सहनशील सह, आक्रोश नहीं अवशेष रहा है।

नहीं किसी की चाह रही अब, नहीं किसी से द्वेष रहा है।।

नहीं क्रोध है तुम पर कोई।

काटोगी तुम, जो हो बोई।

अकेले पन का तोहफा हमें दे,

तुम प्रेमी संग जाकर सोईं।

हम खुद ही, खुद के साथी, साथ का नहीं कोई लोभ रहा है।

नहीं किसी की चाह रही अब, नहीं किसी से द्वेष रहा है।।

नहीं द्वेष है, नहीं है नफरत।

नहीं रही अब कोई हसरत।

लुटकर भी खामोश रहें हम,

देख रहे कुदरत की कसरत।

नहीं दोष है तुम्हारा कोई, नहीं हमें अब मोह रहा है।

नहीं किसी की चाह रही अब, नहीं किसी से द्वेष रहा।।

तुमने की थी अपने मन की।

हमको पालना, करनी पन की।

छलना ही है, कर्म तुम्हारा,

नहीं चाह, हमको, पद धन की।

नहीं है तुमसे, कोई शिकायत, अपना ही बस दोष रहा है।

नहीं किसी की चाह रही अब, नहीं किसी से द्वेष रहा है।।

संबन्धों का नहीं है बंधन।

भूल गए हैं आज प्रबंधन।

तुम अपनी खुशियों को खोजो,

हम व्यर्थ का करते क्रंदन।

नहीं रहा कोई मीत हमारा, शेष न मन का कोश रहा है।

नहीं किसी की चाह रही अब, नहीं किसी से द्वेष रहा है।।


Saturday, April 23, 2022

छल, छद्म की छवि सुंदर

षड्यंत्र लालिमा सजती हो


 छल, कपट, धोखे की पुतली, कमाल कालिमा लगती हो।

छल, छद्म की छवि सुंदर, षड्यंत्र लालिमा सजती हो।।

काजल कीचड़ सी हो शोभित।

भूखी सदैव, पैसे की लोभित।

झूठ से चलती सांस तुम्हारी,

सच से सदैव हो जाती क्रोधित।

लगड़ाती सी, चालें चलकर, गोलाइयों से ठगती हो।

छल, छद्म की छवि सुंदर, षड्यंत्र लालिमा सजती हो।।

पैसा ही है लक्ष्य तुम्हारा।

पैसा ही है भक्ष्य तुम्हारा।

पैसे के लिए हद ना कोई,

पैसा ही, प्रेमी, पति, तुम्हारा।

फटी आवाज है, फटे गले की, फनकार सी फबती हो।

 छल, छद्म की छवि सुंदर, षड्यंत्र लालिमा सजती हो।।

अंधेरे में खो जाती हो।

सोने के साथ सो जाती हो।

रिश्तों से तुम खेल हो करतीं,

मालामाल तुम हो जाती हो।

कानूनों को करो कलंकित, कुल की कालिमा लगती हो।

छल, छद्म की छवि सुंदर, षड्यंत्र लालिमा सजती हो।।


Thursday, April 21, 2022

रिश्ते की जड़ों में मट्ठा डालना

तुम्ही को फबता है 


रिश्ते बनाकर, धन यूँ कमाना,  तुम्हीं को जँचता है।

रिश्ते की जड़ों में मट्ठा डालना, तुम्ही को फबता है।।


प्रेम नाम पर, चोट जो मारी, हर चोट पे हँसता है।

कीकर को कह आम, बेचना, तुम्हारी सफलता है।।


काली लुगाई की, काली कमाई, लोहा चमकता है।

पुरखों की यूँ जात बदलना, जग भी हँसता है।।


धन की खातिर, धोखे के रिश्ते, बाजार भी बचता है।

दिल की कालिमा, भतीजा लालिमा, धन यूँ कमता है।।


ऊसर को कह बाग, बेचना, तुम्हीं को सजता है।

किन्नर को यूँ रति समझकर, दिल यूँ मचलता है।।


तुम्हें याद कर, अब हर छलिया, छोटा लगता है।

तलवारों से हमको, अब कोई, घाव न लगता है।।


चोर, उचक्का, झूठा, छलिया, बुरा न लगता है।

तुम्हें याद कर, गिरगिट भी, हमें अच्छा लगता है।।


नफरत की यूँ रेखा खीचना, तुम्हीं को जँचता है।

दिल का इतना सस्ता बिकना, बुरा तो लगता है।। 


कानूनों का घात, प्रेम पर, छल भी हँसता है।

रिश्ते की जड़ों में मट्ठा डालना, तुम्ही को फबता है।।


Wednesday, April 20, 2022

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी!


 शिकार बने हम, याद रहेगा


धोखे की हो,  पुतली सुंदर,   प्रेम कपट,  ये याद रहेगा।

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी! शिकार बने हम, याद रहेगा।।

कपट का प्रेम, गजब का नाटक।

तोड़ दिया है, दिल का फाटक।

रिश्तों को भी, व्यापार बनाकर,

कानूनी जाल बुन, वसूला हाटक।

लुटने का कोई दुःख नहीं हमको, वार! तुम्हारा याद रहेगा।

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी! शिकार बने हम, याद रहेगा।।

नहीं चाहिए, कुछ भी हमको।

धन-दौलत मिल जाए तुमको।

मौत को हँसकर गले लगाए,

प्रेमी तुम्हारा मिल जाए तुमको।

मुफ्त का धन,  हो तुम्हें मुबारक!  यार! तुम्हारा याद रहेगा।

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी! शिकार बने हम, याद रहेगा।।

कदम परे ना कभी हटाना।

बिना किए, सारे सुख पाना।

रिश्तों की लाशों पर हँसकर,

प्रेम गान, प्रिये तुम गाना।

झूठ को सच, हो कैसे बनातीं? हार! तुम्हारा याद रहेगा।

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी! शिकार बने हम, याद रहेगा।।

जाति बदल, हैसियत बदली।

धोखे से है, कैफियत बदली।

विश्वास का खून यूँ करके,

निशाप्रिये! खैरियत बदली।

नहीं हो केवल, रंग की काली, सार! तुम्हारा याद रहेगा।

कुशल शिकारी हो तुम प्यारी! शिकार बने हम, याद रहेगा।।

 

Tuesday, April 19, 2022

जहाँ प्रेम का मरहम लगता

चोट सभी भर जाती हैं


 

जहाँ प्रेम का मरहम लगता, चोट सभी भर जाती हैं।

अंधकार की रात बीतती, चिढ़ियाँ फिर से गाती हैं।

इक दूजे का हित चिंतन।

नहीं रहा है कोई अकिंचन।

समर्पण, त्याग और प्रेम ही,

करता संबन्धों का मंचन।

विश्वास घात की चोट एक, सब मटियामेट कर जाती है।

जहाँ प्रेम का मरहम लगता, चोट सभी भर जाती हैं।।

लोग प्रेम का गाना गाते।

खुद को ही हैं वे भरमाते।

अधिकारों के संघर्ष में ही,

टूट रहे सब रिश्ते नाते।

नर नारी को कोस रहा है, नारी खून कर जाती है।

जहाँ प्रेम का मरहम लगता, चोट सभी भर जाती हैं।।

प्रेम नाम पर लूट रहे हैं।

लालच में बोल झूठ रहे हैं।

प्रेम जाल से शिकार कर रहे,

अपना कहकर कूट रहे हैं।

शिक्षित शातिर बनीं शिकारी, खुद ही खुद को भरमाती हैं।

जहाँ प्रेम का मरहम लगता, चोट सभी भर जाती हैं।।

धन हित रिश्ता खोज रही हैं।

नित, संबन्धों को तोड़ रही हैं।

कानूनों के जाल में फंसकर,

नारी नर को छोड़ रही है।

प्रेम का मर्म नहीं तू जाने, बाजार में खुद को सजाती है।

जहाँ प्रेम का मरहम लगता, चोट सभी भर जाती हैं।।


Sunday, April 17, 2022

सच और विश्वास जहाँ हो

वह ही रिश्ता चल पाता है


गलती को स्वीकार, सुधारे, आगे वह ही बढ़ पाता है।

सच और विश्वास जहाँ हो, वह ही रिश्ता चल पाता है।।

कर्तव्य पथ पर जो चलता है।

आकर्षण से वह बचता है।

फूलों से कोई पथ नहीं बनता,

पथिकों से ही पथ सजता है।

झूठ और कपट के बल पर, रचा भेद जो, खुल जाता है।

सच और विश्वास जहाँ हो, वह ही रिश्ता चल पाता है।।

 षडयंत्रों से परिवार न चलते।

विष से तो विषधर ही पलते।

कानूनों से नहीं, रिश्ते तो,

प्रेम और विश्वास से खिलते।

सच में से विश्वास निकलता, विश्वास से रिश्ता बन जाता है।

सच और विश्वास जहाँ हो, वह ही रिश्ता चल पाता है।।

प्रेम में कोई माँग न होती।

देने की बस चाह है होती।

स्वार्थ, लालच, लिप्सा की छाव में,

कभी न जलती प्रेम की जोती।

धन, पद, यश, संबन्ध की चाह से, प्रेम का नहीं कोई नाता है।

सच और विश्वास जहाँ हो, वह ही रिश्ता चल पाता है।।

जिसकी कोई चाह नहीं है।

अपनी कोई परवाह नहीं है।

बचकर चलना फिर भी उनसे,

जिनकी कोई थाह नहीं है।

ईर्ष्या, द्वेष, स्वारथ पूरित, प्रेम गान फिर भी गाता है।

सच और विश्वास जहाँ हो, वह ही रिश्ता चल पाता है।।



Saturday, April 16, 2022

दोषारोपण कर ओरों पर,

 हम पाक साफ बन कर सोते हैं


व्यक्ति कभी भी गलत न होता, गलत सदैव कारण होते हैं।

दोषारोपण कर ओरों पर, हम पाक साफ बन कर सोते हैं।।

छल, कपट, षडयंत्र करें नित।

संबन्धों के नाम पर, साधें हित।

स्वारथ की खातिर विश्वासघात कर,

अपने कह कर, करते हम चित।

गला काट कर लूट रहे हैं, फिर भी हम प्रेमी होते हैं।

दोषारोपण कर ओरों पर, हम पाक साफ बन कर सोते हैं।।

मर्यादा रिश्तों की टूटी।

पत्नी बनती हैं अब झूठी।

झूठे केस दहेज के करके,

जाने कितनों को हैं लूटी।

कानूनों से ठगी हैं करती, प्रेमी से संबन्ध होते हैं।

दोषारोपण कर ओरों पर, हम पाक साफ बन कर सोते हैं।।

नर नारी की अस्मत लूटे।

नारी केस करे अब झूठे।

रिश्ते हैं बाजार में बिकते,

दोनों के विश्वास हैं टूटे।

इक दूजे की हत्या करते, प्रेम के नाम खून होते हैं।

दोषारोपण कर ओरों पर, हम पाक साफ बन कर सोते हैं।।


Friday, April 15, 2022

धोखेबाज, झूठ की हांड़ी,

 चढ़ती बारंबार नहीं


प्रेम बिना कोई राष्ट्र नहीं है, प्रेम बिना परिवार नहीं।

जिसको किसी से प्रेम न होता, उसका कोई घरबार नहीं।।

प्रकृति के घटक सभी हैं यहाँ पर।

नर-नारी बिन सृजन कहाँ पर?

नव सृजन नव सृष्टि होती,

प्रकृति पुरूष का साथ जहाँ पर।

जब भी मिलो, प्रेम से जिओ, मिलना होता हरबार नहीं।

जिसको किसी से प्रेम न होता, उसका कोई घरबार नहीं।।

मिलने से ही संस्था बनतीं।

मिलने से ही कली विहँसतीं।

मिलने ही की खातिर सृष्टि,

नर-नारी का रूप विरचती।

प्रेम बिना कोई युद्ध न होता, प्रेम बिना दरबार नहीं।

जिसको किसी से प्रेम न होता, उसका कोई घरबार नहीं।।

प्रेम को कपट नहीं सुहाता।

धोखे का यह नहीं अहाता।

छल, कपट कर जीतना चाहे,

बचा न सकता, प्रेम विधाता।

धोखेबाज, झूठ की हांड़ी, चढ़ती बारंबार नहीं।

जिसको किसी से प्रेम न होता, उसका कोई घरबार नहीं।।