Monday, May 20, 2024

योजना, कर्म, संतुष्टि के बिन,

असमय ही मर जाते हैं

20/05/2024
टारगेट जब तनाव देत हैं, कर्म न हम कर पाते हैं।
योजना, कर्म, संतुष्टि के बिन, असमय ही मर जाते हैं।।
जीवन का है अर्थ समझना।
नहीं किसी को गलत समझना।
संदर्भ और प्रयोग समझकर,
जिज्ञासु! वाक्व का अर्थ समझना।
जीवन का ही लक्ष्य न समझे, लक्ष्य का गाना गाते हैं।
योजना, कर्म, संतुष्टि के बिन, असमय ही मर जाते हैं।।
कर्म तुम्हारे हाथ सही है।
यही सीख गीता में कही है।
यात्रा का आनंद उठाओ,
आगे भी तो वही मही है।
कर्म बीज है, धैर्य सिचाई, समय से फिर फल आते हैं।
योजना, कर्म, संतुष्टि के बिन, असमय ही मर जाते हैं।।
राष्ट्रप्रेमी की नहीं है इच्छा।
कदम-कदम है मौज परीक्षा।
कर्म की खातिर कर्म करो बस,
अनुभव देता सच्ची दीक्षा।
फल नहीं, बस कर्म लक्ष्य है, छात्रों को समझाते हैं।
योजना, कर्म, संतुष्टि के बिन, असमय ही मर जाते हैं।।

Sunday, May 19, 2024

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका,

 हर रूप में सदैव अनूठी हो

13.02.2024


ब्रह्माणी सृजन करती हो, जीवन की तुम ही बूटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

सरस प्रेम की मूरत हो।

सदगुण निधि खुबसूरत हो।

ज्ञान की देवी, हो सरस्वती,

क्रोध में काली, भय पूरत हो।

आकषर्ण में सबको बाँधा, गृहस्थ धर्म की खूँटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

प्रथम षिक्षिका तुम मानव की।

विध्वंसक हो तुम दानव की।

कभी मृत्यु की देवी हो तुम,

प्रेम भरी फुहार सावन की।

रहस्य नीति से छलती जग को, प्रेम से जग को लूटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

काम की देवी रति तुम्ही हो।

वेदों की भी ऋचा तुम्हीं हो।

लक्ष्मण की तुम रेख न लांघो,

रामायण की सीता तुम्हीं हो।

वैभव की देवी लक्ष्मी हो, शक्ति स्रोत, ना चूँटी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।

गंभीरता की खान तुम्हीं हो।

हल्की होकर पान तुम्हीं हो।

सहनषीलता की देवी तुम,

षिक्षा की तो शान तुम्हीं हो।

पुरुषार्थ असफल हो जाता, किस्मत संगिनी रूठी हो।

माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, हर रूप में सदैव अनूठी हो।।


Sunday, May 12, 2024

एकादश दोहे-मां


१. पत्नी जब माता बने, मां का देते मान।   

पत्नी की ही शान है, मातृ दिवस बस गान।।

2. फोटो ही हैं खिंच रहे, छपते हैं संदेश। 

 मिलने को मां तरसती, कब आएगा देश।।

3. बाहर मां का दिवस है, घर में है अंजान।  

खाने को है तरसती, कैसा मिलता मान।।

4. घड़ी घड़ी हमने पिया,  मां का पावन दूध। 

खाना हम ना दे सके, वाह वाह हो खूब।।

5. ना कोई मुझको कमी, सच ना मां के बोल।

 भूखी रह कर जी रही, पीकर विष के घोल।।

6. मां तो मां है आज भी,  सब कुछ देती वार। 

भूखी भी आशीष दे, सहे भूख की मार।।

7. सब कुछ उसको मिल रहा, झूठे बोले बोल। 

सच हमसे ना कह सके, यही हमारी पोल।।

8. रोटी सुत ना दे सके, जीवन को धिक्कार। 

व्यर्थ मान सम्मान है, हम हैं बस मक्कार।।

9. कितना अक्षम आज में, कितना हूं लाचार। 

मां को साथ न मिल सका, नीच हुआ आचार।।

10. कदम-कदम पर अब तलक, होता आया फेल।                  

जीने में जीवन नहीं, जीवन जलती जेल।।

11. जननी को ही मान ना, रोटी को है रार।  

जीवन का कुछ मोल ना, जीवन है बस खार।।

Thursday, April 11, 2024

रिश्तों का गुलदस्ता तो बस

 प्रेम रंग से खिलता है


पल में तोला, पल में माशा, पल में मन बन जाता है।

पल में बोला, पल में खोला, पल में रिश्ता बन जाता है।

परिवर्तन है मूल जगत का, मानव पशु बन जाता है।

स्वारथ यहाँ पर प्रेम कहाता, प्रेमी मौत बन आता है।

आकर्षण होता है विष में, शातिर विश्वास जमाता है।

काले लोग हैं, काले दिल हैं, प्रेम ठगी का नाता है।


विश्वास से ही है धोखा होता, विश्वासघात कहलाता है।

नारी स्वार्थ बस, नारीत्व बेचती, वह धंधा बन जाता है।

कानूनों से खेल खेलते, जीवन खिलवाड़ बन जाता है।

शातिर औरत शिकार खेलती, मर्द शिकार बन जाता है।

झूठे दहेज के केस हैं होते, फर्जी, बलात्कार हो जाता है।

व्यक्ति और परिवाह हैं मिटते, विश्वास ढह जाता है।


विश्वास, प्रेम, निष्ठा से ही, समाज का आधार बनता है।

आस्था और समर्पण से, परिवार का आँगन सजता है।

तेरा-मेरा, अपना-पराया, रिश्तों का बाजा बजता है।

अधिकारों के संघर्ष से, घर का, ताना-बाना विखरता है।

कानूनों से प्रेम न उपजे, सिर्फ अपराध उपजता है।

रिश्तों का गुलदस्ता तो बस, प्रेम रंग से खिलता है। 


जीवन साथी नहीं है कोई,

आओ कुछ पग साथ चलें


जीवन का कोई नहीं ठिकाना, कैसे जीवन साथ चले?

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



चन्द पलों को मिलते जग में, फ़िर आगे बढ़ जाते है।

स्वार्थ सबको साथ जोड़ते, झूठे रिश्ते-नाते हैं।

समय के साथ रोते सब यहां, समय मिले तब गाते हैं।

प्राणों से प्रिय कभी बोलते, कभी उन्हें मरवाते हैं।

अविश्वास भी साथ चलेगा, कुछ करते विश्वास चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



कठिनाई कितनी हों? पथ में, राही को चलना होगा।

जीवन में खुशियां हो कितनी? अन्त समय मरना होगा।

कपट जाल है, पग-पग यहां पर, राही फ़िर भी चलना होगा।

प्रेम नाम पर सौदा करते, लुटेरों से लुटना होगा।

एकल भी तो नहीं रह सकते, पकड़ हाथ में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥



शादी भी धन्धा बन जातीं, मातृत्व बिक जाता है।

शिकार वही जो फ़से जाल में, शिकारी सदैव फ़साता है।

विश्वास बिन जीवन ना चलता, विश्वास ही धोखा खाता है।

मित्र स्वार्थ हित मृत्यु देता, दुश्मन मित्र बन जाता है।

कुछ ही पल का साथ भले हो, डाल गले में हाथ चलें।

जीवन साथी नहीं है कोई, आओ कुछ पग साथ चलें॥


Thursday, April 4, 2024

दोहा सबका मित्र है

 दोहा छोटा छन्द है, अभिव्यक्ति का नूर।

चन्द पलों में ही बनें, सीख देत भरपूर॥१॥


चार चरण में बनत है, दो हैं विषम कहात।

मात्रा तेरह विषम में, ग्यारह सम में आत॥२॥


पहला तेरह से बने, ये है विषम कहात।

तृतीय भी तो विषम है, तेरह से ही बात॥३॥


दूजे को सम कहत हैं, ग्यारह में हो बात।

चौथा इसका मित्र है, एक प्राण दो गात॥४॥


दोहा सबका मित्र है, सरल, सहज ओ नीक।

राष्ट्र्प्रेमी की चाह, आओ सब लो सीख॥५॥

Wednesday, April 3, 2024

राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२०

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति का, एक ही है मन्तव।

शिक्षित हों सब नागरिक, सब पहुंचे गन्तव्य॥१॥

गुणवत्ता की दौड़ में, शिक्षा करे सहाय।

कुशल, समर्थ, सक्षम बन, सब मिल करें उपाय॥२॥

पांच वर्ष आधार बन, तीन में हों तैयार।

तीन वर्ष का मध्य है, चार माध्यमिक पार।।३॥

साक्षरता संख्यांक से, निर्मित हो आधार।

कुशल और सक्षम बनें, विकसित कारोबार॥४॥

शिक्षक कुशल सक्षम बनें, विकसित हों संस्थान।

विद्यार्थी हो केन्द्र में, विश्व गुरु का मान॥५॥

नर-नारी में भेद ना, समावेश है नीक।

साथ-साथ सब मिल बढ़ें, कदम-कदम है सीख॥६॥


Friday, March 29, 2024

रेखा धन की खिच गई

 निन्यानवे के फ़ेर में भूल गए सब शौक।

पैसा हावी हो गया, नौकरी को बस धौक।

सम्बन्धों के जाल में, मरने लगा विश्वास,

रेखा धन की खिच गई, मिट गए सारे शौक॥