चाहो जो तुम लूट लो, दो न प्रेम का घाव।
लुटकर भी जीते रहें, प्रेम घात है दाव॥
वास्तविकता जी सखे, प्रेम मिले ना ख्वाब।
सबसे प्रेम से बातें, बनी रहेगी आब॥
प्रेम नाम धोखे बिछे, होते नित उतपात।
सावधान! विशवास में, होना है आघात॥
"मुझे संसार से मधुर व्यवहार करने का समय नहीं है, मधुर बनने का प्रत्येक प्रयत्न मुझे कपटी बनाता है." -विवेकानन्द
जब जागे हैं, तभी सबेरा। जगना अब जीवन के लिए। पढ़ना-लिखना हुआ बहुत, लिखना अब जीवन के लिए। धर्म कर्म में बीता जीवन, करना अब जीवन के लिए।...
"स्वतन्त्र भारत में नारी को मिले वैधानिक अधिकारों की कमी नहीं- अधिकार ही अधिकार मिले हैं, परन्तु कितनी नारियां हैं जो अपने अधिकारों का सुख भोग पाती हैं? आप अपने कर्तव्यों के बल पर अधिकार अर्जित कीजिए। कर्तव्य और अधिकार दोनों का सदुपयोग कर आप व्यक्ति बन सकती हैं। आपको अपने कर्तव्यों का भान है तो कोई पुरुष आपको भोग्या नहीं बना सकता-व्यक्ति मानकर सम्मान ही करेगा। इसी तरह आने वाली पीढ़ी आपकी ऋणी रहेगी।"