Friday, July 31, 2020

मातृत्व का मान मिट रहा



            
चहुँ ओर व्यापार बढ़ रहा।
संबंधों का बाजार सज रहा।
दौलत संबंधों पर हावी,
मानव मन मिट-मिट मिट रहा।
वात्सल्य नीलाम हो रहा। 
मातृत्व का मान मिट रहा।।

भाव बिना संबंध हैं बनते।
प्यार के नाम धोखे हैं सजते।
प्रेमी हैं , तेजाब से जलते,
दहेज के झूठे केस हैं चलते,
रेप रेप बस रेप हो रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।।

प्रेम नाम व्यापार हो रहा।
बाजार में विश्वास बिक रहा।
भावना से स्टेज सज रहा।
नारी तन, व्यापार बढ़ रहा।
देवी का सम्मान गिर रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।

नारी भी मातृत्व है तजती।
लज्जा से वह अब नहीं सजती।
षड्यंत्रों की बनकर देवी।
प्रेम नाम ले, नर को छलती।
प्रतिस्पर्धा में घर है जल रहा।
मातृत्व का मान मिट रहा।

कोरोना के काल में


कोरोना के काल में, आवागमन है बन्द।

मंद-मंद जीवन चले, बाजार हुए है मंद।।


घर सबको अच्छा लगे, घर में बैठे धाय।

घर तब तक ही चलत है, बाहर से कुछ आय।।


लाॅकडाउन ने किया, सबको घर में बंद।

कुछ तो मस्ती लेत हैं, कुछ धंधे बिन अंध।।


वाइरसों का कहर है, दी है गहरी मार।

अमरीका से देश का, कर दिया बंटा ढार।।


मिलते-जुलते प्रेम से, रहते पल पल पास।

दूर-दूर रहने लगे, जीवन कितना खास।।


दूर-दूर हम रह रहे, पास न कोई मीत।

कोरोना ने सीख दी, दूर रहे से जीत।।


स्वागत सबका था कभी, खुला हुआ था द्वार।

हाथ दूर से, जोड़ते, इधर न आना यार।।


अभिवादन की रीत थी, खुल मिलते थे हाथ।

गले लगाना भूलकर, भूल चूमना माथ।।


मिट जाएं सब दूरियां, करते थे अरदास।

दूर-दूर अब करत हैं, खुद ना खुद के पास।।


चाहत को चाहत नहीं, चाहत रहे उदास।

प्रेम प्रेम से कहत हैं, भूल न आना पास।।


कोरोना का काल है, काल लगत है पास।

आओ बस घर में रहें, दबा मिलन की आस।।


कोरोना प्रेमी घणा, मिलत गुणत ये होत।

अंधेरा घर में करे, बुझा प्राण की जोत।।

साफ-सफाई जो रखें, खुद ही रहते दूर।

प्रेरक हम सबके बनें, जीते हैं भर पूर।।


आत्म हत्या, तुम ना करो, चलो न इतने पास।

दूर-दूर से प्रेम कर, बन जाओ तुम खास।।


आया है, सो जाएगा, तुम ना रहो, उदास।

कोरोना का काल भी, आएगा उसके पास।।


पढ़ो-लिखो, आगे बढ़ो, दूर-दूर रख गात।

दिल से दिल की बात कर, मोबाइल पर तात।।


कोरोना की चाल है, हमरे हाथ में मित्र।

साबुन से मर जात है, प्राणी बड़ा विचित्र।।

Monday, July 27, 2020

कोयल ज्यों गाती हो

बहुत याद आती हो!


          डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

 

 

आँखों के खुलते ही।

भोर में उठते  ही।

तुम से ही रोशनी,

बाहर निकलते ही।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

अनपढ़ भले ही तुम।

सब कुछ अभी भी तुम।

पास भले आज नहीं,

पास ही खड़ी हो तुम।

पचास का हो गया,

बच्चे सा बहलाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

मेरे साथ रह लोगी।

सब कुछ सह लोगी।

बनाकर खिलाओगी,

आँखों से बह लोगी।

मेरे दुःख में माँ तुम,

सो नहीं पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

छोटी सी गुड़िया तू।

नेह की पुड़िया तू।

अभी भी बच्ची है,

समझ में बुढ़िया तू।

बहन तुम छोटी हो,

बिटिया सी थाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

भागता था मन मेरा।

सहारा मिला था तेरा।

तेरी खातिर थम गया,

रूके जहाँ, बना डेरा।

कल की ही बात लगे,

गोद में चढ़ आती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

काम से था भाग रहा।

बिना देखे काज रहा।

प्रेरणा बन थाम लिया,

तुम से था फाग रहा।

दूर हुईं बहुत आज,

नहीं मिल पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

प्रातः भ्रमण पर जाता हूँ।

तुम्हें साथ नहीं पाता हूँ।

योग की, सुहानी वेला में,

क्यूँ?उदास हो जाता हूँ।

साथ में नहीं हो अब,

चटाई नहीं विछाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

महसूस मुझे होता है।

मेरा अर्धांग रोता है।

निकट अनुभूति बिना,

रात नहीं सोता है।

गुस्सा बहुत झेला पर,

उठ नहीं पाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

कलम लिए बैठा हूँ।

तुमसे कुछ ऐंठा हूँ।

बच्ची सा सभालती हो,

भले ही मैं जेठा हूँ।

जबरन उठाकर मुझे,

टूथब्रुश पकड़ाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

सब कुछ मिलता है।

इच्छा से पकता है।

खा नहीं पाता मैं,

भले ही महकता है।

सामने नहीं हो आज,

तुम नहीं खिलाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

मोबाइल अब हाथ में है।

लेपटॊप भी पास में है।

पढ़ नहीं पाता अब,

लेखन तेरी आस में है।

इंतजार करता हूँ,

कलम नहीं छुड़ाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

आती नहीं पाती है।

शनि साढ़े साती है।

तुम नहीं साथ आज,

राह नहीं बुलाती है।

मनाने को नहीं पास,

गुस्सा नहीं दिखाती हो।

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।

 

माता, बहिन नारी हो।

बेटी, पत्नी प्यारी हो।

कोई भी रिश्ता हो,

नर की दुलारी हो।

नारी बिना नर की कभी,

जिंदगी सुहाती हो। 

कोयल ज्यों गाती हो।

बहुत याद आती हो।।


मेरा असल क्या है?

दीपक मेहरा


मेरा असल क्या है? मेरी नकल कया होगी? लोग मूझे देखते है और बोलते है कि इसमे अक्ल क्य़ा होगी? मैं चूप हूँ लोगों के मुददे और विचारो को देखकर वो चेहरे पर चेहरे लगाये फिरते है उनकी शक्ल क्या होगी? मेरे सामने आने की हिम्मत नही है उनमे जो करते ह बात पीठ पीछे मूझे नीचा दिखाने की अब उन बे-अक्लो की अक्ल इससे बे-अक्ल क्या होगी?

Friday, July 24, 2020

मुझे अच्छा नहीं लगता


 रूपाली टंडन जी की लिखी ये कविता मुझे बहुत पसंद आई इसीलिए आप 


सबसे शेयर कर रहा हूं।...



शादीशुदा महिलाओ को कुछ बाते अच्छी नहीं लगती,पर वे किसी से 


कहती नहीं उन्ही एहसासों को इकट्ठा करके एक कविता लिखी है.....



" _मुझे अच्छा नही लगता_ "



मैं रोज़ खाना पकाती हूँ, तुम्हे बहुत प्यार से खिलाती हूं,
पर तुम्हारे जूठे बर्तन उठाना
मुझे अच्छा नही लगता।
कई वर्षो से हम तुम साथ रहते है,
लाजिमी है कि कुछ मतभेद भी तो होंगे।।
पर तुम्हारा बच्चों के सामने चिल्लाना मुझे अच्छा नही लगता।
हम दोनों को ही जब किसी फंक्शन मे जाना हो,
तुम्हारा पहले कार मे बैठ कर यू हार्न बजाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
जब मै शाम को काम से थक कर घर वापिस आती हूँ,
तुम्हारा गीला तौलिया बिस्तर से उठाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
माना कि तुम्हारी महबूबा थी वह कई बरसों पहले,
पर अब उससे तुम्हारा घंटों बतियाना
मुझे अच्छा नही लगता।
माना कि अब बच्चे हमारे कहने में नहीं है,
पर उनके बिगड़ने का सारा इल्ज़ाम मुझ पर लगाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
अभी पिछले वर्ष ही तो गई थी,
यह कह कर तुम्हारा,
मेरी राखी डाक से भिजवाना
मुझे अच्छा नही लगता।
पूरा वर्ष तुम्हारे साथ ही तो रहती हूँ,
पर तुम्हारा यह कहना कि,
ज़रा मायके से जल्दी लौट आना
मुझे अच्छा नही लगता।।
तुम्हारी माँ के साथ तो
मैने इक उम्र गुजार दी,
मेरी माँ से दो बातें करते
तुम्हारा हिचकिचाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
यह घर तेरा भी है हमदम,
यह घर मेरा भी है हमदम,
पर घर के बाहर सिर्फ
तुम्हारा नाम लिखवाना
मुझे अच्छा नही लगता।
मै चुप हूँ कि मेरा मन उदास है,
पर मेरी खामोशी को तुम्हारा,
यू नज़र अंदाज कर जाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
पूरा जीवन तो मैने ससुराल में गुज़ारी है,
फिर मायके से मेरा कफन मंगवाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
अब मै जोर से नही हंसती,
ज़रा सा मुस्कुराती हूँ,
पर ठहाके मार के हंसना
और खिलखिलाना
मुझे भी अच्छा नही लगता।।

Thursday, July 23, 2020

कोमलता के हाव-भाव तज

नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?


               डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



भौतिकता की भाग-दौड़ में, तुम, मशीन क्यों बनतीं नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना बन्दिनी नहीं हो नर की।
जीवन संगिनी तो हो नर की।
प्रतिस्पर्धी बन भटक रहीं क्यों?
कौन दिखाए? राह तुम्हें घर की।
घर जैसी! स्वर्गिक रचना को, खुद विनिष्ट क्यों करती नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, भटका, नर निज पथ से।
भटक गया नर, निज जीवन से।
तुम्हारी प्रेरणा, प्रेम, ममता बिन,
कौन लाएगा? पथ पर फिर से?
नैसर्गिक सुन्दरता तजकर, अशान्ति में क्यों? जलती नारी।
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, कामना, विवश कर रहीं।
इच्छाएँ तुम्हें, अधीर कर रहीं।
रोको, नर को अंधी दौड़ से,
तुम क्यों? उसका भाग बन रहीं।
तुम ही जीवन की सृष्टा हो, भटक, जीवन क्यों हरतीं नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, तुम ही शक्ति पुंज हो।
लेकिन तुम ही प्रेम कुंज हो।
नर को अपने पथ से हटाकर,
हो जाओगी, तुम भी, लुंज हो। 
संग-साथ संगीत है, सजता, नर को विलग क्यों करती नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?

Wednesday, July 15, 2020

तेरे बिन, मैं रहा अधूरा

प्रेमी संग तू पूरी है

                             डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।
संग साथ की चाहत मेरी, तेरी चाहत दूरी है।
प्रेम का तूने, राग अलापा।
अकेलापन मुझको है व्यापा।
षडयंत्रों को पूरा करने,
कोर्ट में जाकर, किया स्यापा।
प्राणों पर आघात किया, फिर कहती मजबूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।।
झूठ और छल करके, रानी।
तूने याद दिला दी, नानी।
मैंने तो विश्वास किया था,
विश्वासघात का, पिलाया पानी।
विश्वास कभी, पा न सकेगी, भले कानूनी सूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।।
कहीं भी जाकर, अब तू लड़ ले।
किसी के ऊपर, जाकर चढ़ ले।
जीवन में ना, शांति मिलेगी,
कितनी भी, तू जिद पर अड़ ले।
तेरी चाहत पूरी हो बस, मेरी रही अधूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।

Monday, July 13, 2020

पूरण करती, नर को नारी


               डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


सृष्टि की रचना, सबसे प्यारी।
सजती सृष्टि, जीवन क्यारी।
प्रेम डोर में, बाँधे नर को,
खुशियों की, वह है फुलवारी।

महानता की चाह न उसकी।
गहराई की थाह, न उसकी।
पिता, भाई, पति और पुत्र,
और कोई पहचान न उसकी।

घर में लाती है, खुशहाली।
माता, बहिन हो, पत्नी, साली।
गृह लक्ष्मी की बरकत से ही,
घर घर मनती है, दीवाली।

जन्मदात्री, नर की नारी।
पालन-पोषण, जाती बारी।
नर को समर्पित, अपना आपा,
प्रतियोगी नहीं, नर की, नारी।

नर की देखो, जान है नारी।
युगों-युगों से, शान है नारी।
सूपर्णखा, सीता या द्रोपदी,
नर जीवन की, आन है, नारी।

प्रकृति की श्रेष्ठ कृति, नर-नारी,
जिम्मेदारी है, उनकी सारी।
नारी को नर, पूरण करता,
पूरण करती, नर को नारी।

Sunday, July 12, 2020

साथ तेरा बस, मिल जाए तो




साथ तेरा बस, मिल जाए तो, और न कुछ हमें पाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
हमको धन की चाह नहीं है।
पद की भी कोई आह नहीं है।
तुझको कुछ पल, सुख दे पाऊँ,
दुनिया की, परवाह नहीं है।
भटकता फिरता, अनाड़ी था मैं, तुझसे मिल सब जाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
अलकों में उँगली दे खेलूँ।
पलकों में ले, सब कुछ झेलूँ।
समस्यायें कितनी भी आयें,
सबको ठेलूँ, सबको पेलूँ।
यादों में मैं, तड़प रहा हूँ, तुझको, क्यूँ कर आना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
प्रेम का जादू, तूने चलाया।
खुद आ बैठी, सबको भुलाया।
दिल के अन्दर किया कैद क्यूँ?
कभी हँसाया, कभी रुलाया।
पल-पल नई नवेली अब भी, मैंने ना पहचाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
संग-साथ आ, गले लगा ले।
नयनों से आ, नयन मिला ले।
प्रेम पथिक हूँ, प्यासा युग का,
आ! अधरों से, सुधा पिला दे।
झूठ, कपट, छल नहीं सहूँगा, प्रेम में मरना ठाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।

Saturday, July 11, 2020

कानूनों में, प्रेम न पलता

नहीं कोई, गन्तव्य निर्धारित, पथिक हैं, पथ पर जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
जात-पाँत, कोई, भेद नहीं है।
धोखा खाया, हमें, खेद नहीं है।
पथ की धूल, कभी, गयी न लूटी,
प्रेम तुम्हारा, कभी, ध्येय नहीं है।
आघात किया, अब, साथी जाओ, घायल ही हमें जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
पथ है, पथिक, पाथेय नहीं है।
पथ में, पथिक, कुछ हेय नहीं है।
पथ में, साथी, मिलें, आकर्षण,
पथ के सिवा, कोई ध्येय नहीं है।
जीवन-नद, जल प्लावन झेले, जल को बहते जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
नारी हो, पर, सदय नहीं हो।
बुद्धि हो, पर, हृदय नहीं हो।
कानूनों में, प्रेम न पलता,
भय देतीं, तुम, अभय नहीं हो।
नारीत्व बिन, नारी कैसी? नर को, जिसे फंसाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
हम पथिक, निज पथ है जाना।
सच है साथी, पथ, प्रेम है गाना।
धन-धान्य से, खुशी रहो तुम,
याद न करना, ना पछताना।
राह में राही, हमें जो मिलता, हमने, साथी माना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।

Friday, July 10, 2020

देवी! कहकर, ना तुम पूजो

मानवी ही स्वीकार करो




देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।
स्वाभाविक साथी है, नर की, इस सच को अंगीकार करो।
नर्क का द्वार, नारी को कहते।
अंधकार में,  वे,  नर रहते।
धर्म धुरी, धरणी, धात्री बिन,
अपूरणता का दंश हैं सहते।
धर्म के तत्व को, समझ न पाये, नारी पर अत्याचार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
धर्म के तत्व को, तुम पहचानो।
जीवन संगिनी की प्रकृति जानो।
आवश्यकतायें, आकाक्षायें, कुछ,
नारी की भी हैं, यह तुम मानो।
शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, इसे दो, पर्दा अस्वीकार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
बेटी-बेटे का भेद, ये कैसा?
बहिन को समझो, भाई जैसा।
ये घर तो, उसका अपना है,
ससुराल में भी, हाल हो ऐसा।
दान-दहेज का, पाप ये छोड़ो, स्वीकार अधिकार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
पराये घर की वस्तु न बेटी।
बहिन नहीं,   भाई से हेटी।
जन्म लिया, यह घर अपना है,
ससुराल में भी, नहीं है  चेटी।
सुखी रहोगे, सुख देकर के, सब कुछ देकर, प्यार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।

Thursday, July 9, 2020

सृष्टि का आधार प्रकृति है


नारी! प्रकृति का सार है



                                 डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।
बीज रूप है, पुरूष प्रकृति का, नारी! सृजन आधार है।।
काले-काले केश घटाएँ।
इंद्र धनुष सौन्दर्य छटाएँ।
भावों की लहरें, उर में ज्यों,
सागर की लहरें, लहराएँ।
पर्वत शिखरों को, मात जो देते, वक्ष स्थल के उभार हैं।
सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।।
सुरख लाल हैं, अधर तुम्हारे।
कपोल लालिमा, अलग पुकारे।
दीर्घ श्वांस संग, उरोज भी डोलें,
उर में हा! हा! कार मचा रे।
प्रेम लता, कलि, पुष्प बन खिलती, नर के गले का हार है।
सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।

Wednesday, July 8, 2020

किसी के लिए खास!

काश!
हम भी होते,
किसी के लिए खास!
कोई,
हमारे लिए भी,
करती अरदास।

कोई,
हमें भी,
करती पसंद,
डालती हमें भी,
प्रेम की गुलाबी घास।
मिलाती,
हमारे साथ छन्द,
नहीं रहने देती,
हमें स्वच्छन्द।

काश!
हमारा भी
करती कोई इंतजार
उमड़ता हमारे लिए भी,
थोड़ा सा प्यार,
बनती,
जीवन का आधार।

काश!
कोई,
हमें भी,
देर हो जाने पर,
करती बार-बार फोन।
और हम,
उसकी डाँट खाकर,
हो जाते मौन।
हमारे कार्य में,
व्यस्त होने के कारण,
फोन न उठा सकने पर
हो जाती नाराज।
और हमें,
उसे मनाने के लिए,
उठाने पड़ते,
उसके नाज।

काश!
हमारे भी,
ऐसा होता,
एक घर,
और एक घरवाली,
हमारा साथ पाने को,
वह रहती मतवाली
और हमें पिलाती,
प्रेम-सुधा की प्याली।
काश!

Thursday, July 2, 2020

धोखा खाकर, जश्न मनाओ

जीवन-पथ


जीवन पथ पर, पथिक है चलना।
राह में राही, सबसे है मिलना।
पथिक तो  आते, जाते रहते,
रूकना नहीं, है अविरल चलना।

आधा जीवन बीत रहा है।
नहीं, कभी संगीत रहा है।
हमने सब कुछ लुटा दिया,
फिर भी साथ न मीत रहा है।

साथ में जो भी, मीत ही समझो।
नहीं किसी से, कभी भी उलझो।
जीवन तो है, भूल-भुलैया,
सोचो, समझो और फिर सुलझो।

यहाँ, कोई तेरा मीत नहीं है।
हार-जीत, संगीत नहीं है।
पल-पल जी ले, तू मुस्काकर,
रोना यहाँ की, रीत नहीं है।

जीवन को क्यों काट रहे हो?
सुख को भी, दुख बाँट रहे हो।
दुख्खों के घेरे से निकलो,
व्यर्थ ही, खुद को डाँट रहे हो।

जीवन का आनन्द लुटाओ।
विध्वंसों में मौज मनाओ।
धोखा देना, फितरत उनकी,
धोखा खाकर, जश्न मनाओ।

Sunday, June 28, 2020

घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।

जग में सबको पाल रही है


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
गृह प्रबंधन की कला है आती।
कुशल प्रबंधन, जहाँ भी जाती।
सेनाओं का नेतृत्व कर रही,
स्वयं जगी, जग को है, जगाती।
बेटी, बहिन, पत्नी, माता बन, नारी नर की ढाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
क्रोध में आकर, दण्ड भी देती।
सहलाकर, पीड़ा, हर लेती।
स्नेह, प्रेम, वात्सल्य लुटाती,
दिन में, रात में, सुख ये देती।
अन्तर्विरोध, घर-घर में होते, प्रेम से पिरोती माल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
छल, कपट और झूठ भी बोले।
आँखों से ही सबको तोले।
घर, बाहर, तूफान हो कितना?
सब सभालती, हौले-हौले।
तृण-तृण से है नीड़ बनाती, सुख का बुनती जाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।


Saturday, June 27, 2020

एकान्त और अकेलापन

एक समय था,
जब मैं चाहता था,
एकान्त।

तब कुछ पढ़ने की,
कुछ बनने की,
किसी को पढ़ाकर,
कुछ बनाने की,
तीव्र इच्छा,
मुझे एकान्त के लिए,
मजबूर करती थी।

एक समय था,
जब साथी को चाह थी,
मेरे साथ की,
बेटे को चाह थी,
हर पल, हर क्षण,
हर दिन, हर राह,
मेरे साथ की,
मुझसे दुलार की।

और मैं,
उन्हें आगे बढ़ाने,
उन्हें कुछ सिखाने,
अपना करियर बनाने,
के चक्कर में,
अपने आपको भूल गया!
पता ही नहीं चला,
कब अपनी राह भूला,
और ठहर गया।

और आज
जब साथी साथ मिलने का,
इंतजार करते-करते,
प्रतीक्षा से थककर,
आगे बढ़ गया।
दूसरे शब्दों में कहूँ,
साथ अलग हो गया।

और आज
हर पल, हर क्षण
हर राह,
साथ चाहने वाला बेटा,
साथ रहना भूलकर,
एकान्त के पथ पर,
बढ़ गया।
एकान्तवासी बन गया।

और आज
मैं एकान्त से भी,
ठुकराया गया,
अकेला रह गया।
एकांत और अकेलेपन
का अंतर समझ आ गया।
अनुभव से
कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।

Tuesday, June 23, 2020

हर युग में, मैं छली गई हूँ

प्रेम से कहकर प्यारी हूँ

                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


काली, दुर्गा, सरस्वती नहीं हूँ, मैं साधारण सी नारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
जिम्मेदारी, मुझ पर डालीं।
काम सौंप दिया, कह घरवाली।
अधिकार सब, रखे पुरूष ने,
कर्तव्यों की, थमा दी, प्याली।
संस्कृति का भी भार बहुत है, थामो तुम, मैं हारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
पूजा मुझको, नहीं, चाहिए।
थोड़ा सा, सम्मान चाहिए।
मन की कहे, मन की सुने,
ऐसा पति का प्यार चाहिए।
संस्कार, नैतिकता, लज्जा, थामो तुम, मैं मारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
परमेश्वर नहीं, पति चाहिए।
स्वर्ग नहीं, कुछ हँसी चाहिए।
निर्णयों में, भागीदारी दे,
नर की ऐसी, मति चाहिए।
प्रेम, विश्वास, सम्मान मिले बस, फिर देखो, मैं थारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।

Sunday, June 21, 2020

घरवाली

भोर ही नहीं, रजनी में भी


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


समय, काम की, सीमा न कोई, नहीं, वेतन की माँग उठी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
सबसे पहले, जग जाती है।
शुभ हो दिन, मंगल गाती है।
साथ-सफाई का चक्र है चलता,
बार-बार कह, नहलाती है।
गृहलक्ष्मी, सबको है देती, चाह न कुछ भी, स्वयं लुटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
समय की नहीं, कोई सीमा है।
घर ही तो, इसका बीमा है।
अन्दर बाहर काम कर रही,
कभी तेज, कभी धीमा है।
स्वयं भले ही नहीं पढ़ पाई, संतान की शिक्षा हेतु पिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
संघर्षो में भी नहीं बुझी है।
सजती-संवरती, कितनी हंसी है?
काम काज सबके निपटाकर,
बिस्तर में भी, पति की खुशी है।
घर में ही नहीं, दफ्तर में भी, शालीनता कभी न मिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।

Thursday, June 4, 2020

संग साथ की, इच्छा थी, पर,

कोई भी साथ निभा न सकी


                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नहीं, चाह थी, रूप रंग की, मन की प्यास, बुझा न सकी।।
सीधे-सच्चे पथ पर चलना।
नहीं चाहिए, कोई छलना।
सब कह ले, सब कुछ सुन ले,
बाहों में उसके, चाहूँ मचलना।
प्रेम राह, मिल चलना चाहा, कोई भी, राह दिखा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।।
कामना रहित, प्रेम हो जिसका।
नहीं, किसी से, वैर हो उसका।
बुजुर्गो के प्रति, सेवा भाव हो,
हित जो चाहे, सदैव ही सबका।
अंग-अंग, सौन्दर्य भले ही, कर्मो से, मुझे लुभा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नारीत्व दिखा, अन्दर ना पाया।
झूठे ही, प्रेम का, गाना गाया।
छलना, छल का भेद, खुला जब,
पता चला, बस था, भरमाया।
कमनीय कामिनी की, झूठी अदायें, पथ से मुझे डिगा न सकीं।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।