Friday, July 17, 2026

ऐसा इन्हें भगवान् चाहिए

 ज्ञान नहीं जो पोथी में।

ज्ञान वही जो ज्योति में।

स्मृति नहीं जो वीथि में। 

स्मृति वही जो रीति में।  


ज्ञान के नाम विछा वितंडा।

तर्क-वितर्क से होता ठंडा।

मार-काट यहाँ मच जाती है,

पहले थी मुर्गी या पहले अंडा।


नहीं किसी को ज्ञान चाहिए।

धन, पद और सम्मान चाहिए।

बिना किए सब कुछ दे जाए,

ऐसा इन्हें भगवान् चाहिए।


ज्ञान वही जो चेतन में।

संग्रह होय अवचेतन में।

मृत्यु का आभास कराए,

मानव जीए अचेतन में।


ज्ञान की देखो राह निराली।

जिसने ज्योति से ज्योति जलाली।

ज्ञान कर्ममय हो जाता है,

वरना राह अज्ञान ने पाली।


राष्ट्रप्रेमी स्वयं का माली।

देता नहीं किसी को गाली।

ना आरोप, नहीं शिकायत,

यात्रा रूपी मंजिल पाली। 

Wednesday, July 15, 2026

प्रेम तो है कर्म

 

*प्रेम नहीं शब्द* 
        *©डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी*

नहीं जानते, प्रेम क्या होता?
पाता है नर, जो है वह बोता।
पाने की, हर चाह मिट गई,
राष्ट्रप्रेमी लगाए, ज्ञान में गोता।

प्रेम भाव से मन है ओत-प्रोत,
मिट गई हर छोटी-मोटी खोट।
समर्पण है, नहीं है केवल साथ,
कितनी भी प्यारी,दे लो तुम चोट।

सुख-दुख से, नहीं रहा है मोह।
नहीं है चाह, नहीं है कोई छोह।
ढलान पर, कदम-कदम चल रहे,
उठने का अब, नहीं बचा कहीं रोह।

साथ रहने की तुमको नहीं चाह।
मेरे लिए अब,बची नहीं कोई राह।
पथिक हूँ, पथ है, पाथेय है न साथ,
चोट सहीं इतनी, निकले न अब आह।

अनिश्चितता का सागर है चहुँ ओर।
अंतर्मन का प्रकाश, नहीं हुई है भोर।
पथ पर अकेला, नहीं है साथी साथ,
फिर भी कहीं से, सुनाई देता शोर।

राह दिखाता, जो खुद चलता,
गलत से बचता, सत्य को पलता।
प्रेम का दर्द है कैसा प्यारा,
जलाते हुए भी नहीं है जलता।

राष्ट्रप्रेमी का प्रेम न सीमित।
प्रेमी नहीं होता है बीमित।
अपने सुख का सवाल नहीं है,
हृदय भरा है प्रेम असीमित।

प्रेम नहीं शब्द, प्रेम तो है कर्म,
निश्छल दिल में, बसता है धर्म।
राष्ट्र के चिंतन में, जीवन न्योछावर,
प्रेम नहीं समझा, नहीं समझा मर्म।

Sunday, July 12, 2026

जीवन के लिए

 जब जागे  हैं, तभी सबेरा।

जगना अब जीवन के लिए। 

पढ़ना-लिखना हुआ बहुत, 

लिखना अब जीवन के लिए। 

धर्म कर्म में बीता जीवन, 

करना अब जीवन के लिए। 

नाम की खातिर बहुत कमाया,

कमाना अब जीवन के लिए। 

 बंधन बहुत सहे हैं अब तक, 

खोलो अब जीवन के लिए। 

जो गिरा है उसे उठाना, 

उठना अब जीवन के लिए। 

जो भूला है उसे सिखाना,

सीखना अब जीवन के लिए। 

जो टूटा है उसे जोड़ना,

जुड़ना अब जीवन के लिए। 

हाथ से हाथ मिले बहुत,

मिलना अब जीवन के लिए। 

अंधियारा है पथ में बाधक, 

मिटना है जीवन के लिए। 

दीये ने संदेश सुनाया, 

जलना है जीवन के लिए। 

कलम ने क्रांति लिखीं बहुत,

क्रांति अब जीवन के लिए। 

चरित्र से इतिहास बनाना,

गढ़ना अब जीवन के लिए। 

मान की खातिर खून हुए, 

मान हो अब जीवन के लिए। 

जहाँ रुके हैं, वहीं बसेरा,

बसना अब जीवन के लिए।

राम भी देखो वन-वन भटके, 

भटके थे जीवन के लिए। 

अपने लिए तो जिए बहुत,

जीना अब जीवन के लिए।

राष्ट्रप्रेमी है प्रेम अधूरा, 

प्रेम करो जीवन के लिए। 

Monday, July 6, 2026

अपने घर में खुद ही चोरी



कैसा रिश्ता, कैसा हिस्सा, लालच बढ़ा, विश्वास मर गया। 

अपने घर में  खुद ही चोरी, सुन करके,परिहास मर गया। 

सोंधी थी आँगन की मिट्टी, उसका ईमान आज बिक गया। 

अपनों के ही दस्तखत से अब, तुलसी का हर घाट मिट गया।

रोटी के टुकड़े गिन-गिन कर, अपनेपन को मार दिया। 

खून के रिश्ते नहीं बचे हैं, क़र्ज़ का रिश्ता फाड़ दिया।

सच को छोड़ा, हमको तोड़ा, झूठ से रिश्ता जोड़ लिया। 

चांदी चुन, ईमान बेचकर, दिल का रिश्ता तोड़ दिया।

मंदिर-मस्जिद सब खामोश हैं, प्रार्थना का भी सार लुट गया। 

दुआएँ बिकतीं बाज़ारों में, आस्था का चंदा भी चुरा लिया।

दिल का दीया, कर्म की बाती, जलता है, दिल छला गया।

रिश्तों की वहाँ राख उड़ रही, सोने को जहाँ चुना गया।

इंसानियत भी बची नही बस, तुमने तमाशा बना दिया।

राख में आग हम ढूँढ रहे थे, तुमने हमको उड़ा दिया। 

नफरत की दीवार उठ रहीं, नेह का चांद है आज ढल गया।

अन्तरमन में तड़प उठी जब, हार के पीछे प्यार जल गया।

धन के पीछे भाग रहे हो, कर्म का दीया तुम्हारा बुझ गया।

जो अपना था कल तक साथी, ठुकरा कर अब चला गया।

सपनों का घर बिखर गया यूँ, जैसे रेत का महल ढह गया।

भरोसे की नाजुक डोरी को, स्वार्थ का चाकू काट गया।

हिम्मत थी, हार न मानी, विश्वास आज फिर छला  गया।

राष्ट्रप्रेमी, है पथिक प्रेम का, धोखा खा कर बिखर गया।

धैर्य रखा जिसने भी मन में, हर संकट वो पार कर गया।

सत्य-राह पर चलने वाला, जिंदा है, बस हार गया।

हम पहले ही मरे हुए थे, विश्वास बचा था आज मर गया। 

अपने घर में  खुद ही चोरी, सुन करके,परिहास मर गया।

Sunday, July 5, 2026

देत जीत को मात

 कर्महीन के पास हैं, चिंता और अवसाद। 

कर्मयोग के साथ हैं, फर्स अर्श की खाद।।


कर्ता को ना चाह है, आए कोई साथ। 

कर्म सदा ही साथ है, ले हाथों में हाथ।। 


समय प्रतीक्षा ना करे, चलता है दिन-रात। 

व्यक्ति प्रतीक्षा करत जो, देत जीत को मात।। 


जीवन का इक राज है, चलने में है जीत। 

रुकने में ना काज है, नहीं बचत है प्रीत।। 


प्रेम जहाँ, है चाह ना, ना बंधन, ना रीत। 

जहाँ मौन में गान है, हार यहाँ है जीत।। 


प्रेम प्रेम जग गा रहा, पाया कोई जान? 

खुद में खुद को खोजता, प्रेमी वही महान।।