Sunday, June 28, 2026

संदेह से संश्लेषण तक



विज्ञान नहीं संदेह बिना।  

समझ नहीं स्पष्ट बिना। 

स्पष्ट नहीं विश्लेषण बिना।  

संपूर्ण नहीं संश्लेषण बिना।

निष्कर्ष नहीं अन्वेषण बिना। 


शोध नहीं है प्रश्न बिना।  

प्रश्न नहीं है कष्ट बिना। 

कष्ट नहीं है तप बिना। 

तप नहीं है लक्ष्य बिना।

लक्ष्य नहीं संकल्प बिना। 


स्वर्ग न कोई आप बिना। 

निश्चित नहीं है माप बिना। 

स्वार्थ नहीं है शाप बिना। 

हरियाणा नहीं खाप बिना। 

मार्ग नहीं है बाप बिना।


संबंध नहीं है रोप बिना। 

क्रोध नहीं है कोप बिना। 

युद्ध नहीं है तोप बिना। 

गाम नहीं है गोप बिना। 

आत्मा नहीं है लोप बिना। 


सत्य नहीं है तर्क बिना।  

तर्क नहीं है अर्क बिना। 

अर्क नहीं है उत्कर्ष बिना। 

उत्कर्ष नहीं परमार्थ बिना। 

परमार्थ नहीं आत्मार्थ बिना।


Wednesday, June 24, 2026

जनता जनार्दन को सुविधाओं का भोग

 जनता जनार्दन

            डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

राजा नहीं, सेवक चुनते लोग  

कुर्सी पर बैठना, नहीं है संयोग  

न सोने का सिंहासन, न चाँदी का काम  

जनता जनार्दन को सुविधाओं का भोग  


वोट की स्याही से, बनता है जोग  

उठती है उँगली, मिटते हैं रोग  

महल की दीवार से ऊँचा नाद  

गली-नुक्कड़ पर करते हैं योग


टैक्स का पैसा, पसीने का दाम  

खाते में जाए, या बने गोदाम?  

हिसाब माँगती हर एक शाम  

क्योंकि मालिक असली है आम  


अफसर की कलम, नेता का नाम  

चलते नहीं गर भूखा है गाम  

रोटी का सवाल, शिक्षा का काम  

पहले सुलझे, फिर बाकी प्रणाम  


हर लोक सेवक को ये पैगाम  

सेवा का मौका, नहीं आराम  

जनता रुठे तो छिने तमाम  

क्योंकि लोक में बसता घनश्याम  


जन जन सेवक, राष्ट्रप्रेमी आम  

जनता जनार्दन के प्रेम का जाम  

इसी से चमके भारत महान  

आनन्द से पूरित, शहर और गाम  


Wednesday, June 10, 2026

अकेलापन

 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।


चेहरे हज़ारों पास मेरे,  

आँख से आँख फिर भी अजनबी,  

हँसी के शोर में भी देखो,  

मन का कोना सन्नाटा मानता है।  


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


शब्द उछलते कानों तक,  

अर्थ कोई छूता नहीं,  

रिश्ते सब रोजनामचे,  

नाम बस नाम को मानता है।


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


कंधे से कंधा टकराए,  

फिर भी दूरी योजन भर,  

मैं "मैं" को ही ढो रहा,  

साथ में चलते हुए साथ नहीं मानता है। 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


काश कोई इतना कह दे,  

"रुको, सुनो, तुम हो तो सही",  

स्फोट सा फूटे भीतर तब,  

टूटे भ्रम का पर्दा, सत्य पहचानता है।  


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


भीड़ नहीं, बस एक मन चाहिए,  

जो "तू" कहे, "मैं" मिट जाए,  

फिर न साले अकेलापन,  

जब अपना होना खुद को जानता है। 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  

Saturday, June 6, 2026

साईकिल की सवारी

 बाल, किशोर, युवा, वृद्ध, सबको भाए सबको प्यारी।

साईकिल की करो सवारी, इसकी शान है सबसे न्यारी।। 

पर्यावरण के लिए सुखारी।

सबके लिए ही है हितकारी। 

स्वास्थ्य का पैकेज नहीं है भारी, 

साईकिल निकाल करो तैयारी। 

जिम की नहीं है कोई जरूरत, कसरत होती इससे सारी। 

साईकिल की करो सवारी, इसकी शान है सबसे न्यारी।। 

पेट्रोल, डीजल नहीं चाहिए। 

लाइसेंस बिन चलते जाइए। 

नहीं शोर, नहीं वायु प्रदूषण, 

मस्त चाल से चलते जाइए। 

रोगों पर चलती बनकर आरी,घंटी लगती कितनी प्यारी। 

साईकिल की करो सवारी, इसकी शान है सबसे न्यारी।। 

अपने क्षमता, अपनी गति है। 

साईकिल सवार की तीक्ष्ण मति है। 

साइकिल से मंजिल पर जाओ, 

जिसको खुद से और घर से रति है। 

भिन्न आकार, रंग भिन्न हैं, बजट नहीं है इसका भारी। 

साईकिल की करो सवारी, इसकी शान सबसे न्यारी।। 

Tuesday, June 2, 2026

कर्म का कोई विकल्प नहीं है

 अविरल चलना जीवन पथ पर, यात्रा है, कोई संकल्प नहीं है।

कर्म बिना कोई जी नहीं सकता, कर्म का कोई विकल्प नहीं है।। 

चाह से चुनी हो या अनचाहे। 

दुख में या सुख में  अवगाहे। 

यात्रा का आनंद ले प्यारे, 

गंतव्य पहाड़ हो या हो माहे। 

जीवन जिओ,आनंद का पथ है, जीवन,कोई प्रकल्प नहीं है। 

कर्म बिना कोई जी नहीं सकता, कर्म का कोई विकल्प नहीं है।। 

नफरत से भी प्यार करें हम। 

चाह करें क्यूँ? विश्वास करें तुम। 

पैसा सब कुछ तुम्हारे लिए है, 

हमारे लिए तो सब कुछ हो तुम। 

कर्म के बल पर मिला जो पथ पर, पर्याप्त है वह, स्वल्प नहीं है। 

कर्म बिना कोई जी नहीं सकता, कर्म का कोई विकल्प नहीं है।। 

कर्म ही केवल,विकास के पथ हैं। 

कर्म ही सबके, जीवन के रथ हैं। 

कर्म के बिन निष्क्रिय मृत शरीर, 

कर्म ही सबके जीवन का अथ है।

कर्म समाया है अंग-अंग में,  कर्म बिन कोई अभिकल्प नहीं है।

 कर्म बिना कोई जी नहीं सकता, कर्म का कोई विकल्प नहीं है।।