Thursday, September 17, 2026

वापस कैसे गाँव को जाऊँ?

जहाँ पर बीता मेरा बचपन,

भूल गया अब उम्र है पचपन।


नीम तले वो कंचे खेलना,

अम्मा का वो रोटी बेलना,

बरगद की वो झूला-डोरी,

रोते हुए भी दंड पेलना।


सोच रहा वापस घर जाऊँ,

बिसरे गीत गाँव के गाऊँ।


बदला-बदला गाँव का हाल,

नहीं बचा आँगन, ना चौपाल,

खेत बिके, बँट गए खलिहान,

हाथ में सबके मोबाइल-जाल।


माता-पिता भी वहाँ नहीं हैं,

कोई बुलाए, रहा नहीं है,

जाने को जी चाह रहा है,

प्रेम की कोई छाँह नहीं है।


बदल गया सब, घर कैसे पाऊँ,

वापस कैसे गाँव को जाऊँ?


गाँव वही है, लोग नए हैं,

रिश्ते-नाते रीत गए हैं,

जिन पेड़ों पर गाँव था बसता,

गिरे नहीं हैं, काटे गए हैं।


पक्की सड़क हैं, धूल नहीं है,

शेष बची कोई गूल नहीं है,

घर की कोई राह नहीं है,

डाली हूँ मैं, पर मूल नहीं है।


फिर भी चाह अभी भी बाकी,

जाकर कर आऊँ ताका-झाँकी,

जो गीत बिसरे बिरवा-खेत में,

याद हैं किस्से, पटेल-बुलाकी।


गाँव बुलाए तो जाऊँगा,

माटी को शीश नवाऊँगा,

पचपन की इस साँझ में अब तो,

बचपन को फिर जी आऊँगा।


राष्ट्रप्रेमी का गाँव है छूटा,

सच भी लगता मुझको झूठा,

गाय का ताजा दूध याद है,

गाय नहीं अब, नहीं रहा खूँटा।


Tuesday, September 15, 2026

सबका स्वागत

 जीवन खुली किताब है, छिपा न कोई राज।

अपनी अपनी राह है, अपना अपना काज।।1।।


जीवन साधन साधना, ना कोरी यह आस।

बोए बिना किसान को, मिलती नहीं कपास।।2।।


पुष्प चढ़ाना धर्म है, पुष्प खिलाना कर्म।

कर्म बिना पूजा सभी, नहीं धर्म का मर्म।।3।।


तिलक-दीप से क्या मिले, मन माहि अंधकार।

हल-कलम-कुदाल से, बनता है संसार।।4।।


माँग-माँग कर क्या मिला, खाली रहे हैं हाथ।

कर्म-बीज जो बो गया, फल भी पाया साथ।।5।।


गीता पढ़ना तो सरल, कठिन गीता सी चाल।

कथनी मीठी लगत है, करनी में ही ढाल।।6।। 


एकाकी जपते सभी, सबकी अपनी चाह।

संग-संग तपता यहाँ, वही पकड़ता राह।।7।।


मंदिर-मंदिर ढूँढता, भटके चारों ओर।

मन को मंदिर कर लिया, अंदर बाहर भोर।।8।।


शब्द रटे से क्या भला, भाव न हो जब पास।

बीज बिना धरती धरे, उगती नहीं कपास।।9।।


राष्ट्रप्रेमी कर्म कर, कर न किसी की आस।

इससे बढ़कर जगत में, धर्म नहीं है खास।।10।। 


सबका स्वागत कर रहे, आए जो भी साथ।

जिसको चलना साथ है, उसका थामें हाथ।।11।।

Monday, September 14, 2026

केवल करें क्यों आराधना?

 जीवन साधना 

            डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


केवल करें क्यों आराधना? 

आओ मिल हम करें साधना।।


आराधना में हमें, मिले मंत्र हैं। 

साधना में, सफलता का तंत्र है। 

विकास पथ पर आनंद से चलना, 

साधक साध्य है, नहीं यंत्र है। 


आराधना में, माँग है छिपी,

साधना में, उर आग है जगी।

एक में हाथ फैलाए मांगते, 

दूसरा लिखे, विकास की लिपी।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


पुष्प है, चढ़ाया, आराधना,

पुष्प है, खिलाया, है साधना।

मूर्ति पर जल चढ़ा, मांगना,

साधना सृजन है, नहीं कामना।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


तिलक-दीप-धूप आराधना,

हल-कुदाल-कलम, साधना।

मंदिर में शीश झुका कामना,

राष्ट्र पर शीश, कोई, आवाज ना।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


शब्द रटना है, बस आराधना,

भाव को जी लेना, है साधना।

गीता पाठ तो बड़ा सरल है,

गीता मिल कर्म, नहीं कोरी भावना।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


एकाकी जपना आराधना,

कर्म संग तपना, है साधना।

आराधना है कुछ चाहना,

साधना में बचे, कोई चाह ना।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


राष्ट्रप्रेमी चले, करे आह्वान यही,

पूजा करो, न करो, सब सही।

जब तक मानव मन, बने राष्ट्र-मंदिर,

तब तक कर्म-दुग्ध, साधना दही।।


केवल करें क्यों आराधना?

आओ मिल हम करें साधना।।


Sunday, September 13, 2026

जीवन जीना इस तरह

 करते केवल कर्म हैं, नहीं चाहिए ताज। 

कल की चिंता ना करें, जीते हैं बस आज।।

जीवन खुली किताब है, ना है कोई राज। 

आगा-पीछा छोड़ कर, जीते हैं बस आज।।

लुटने का ही शौक है, नहीं चाहते लूट। 

हमें साथ की चाह थी, तुमने चुन ली सूट।।

बसने की ना चाह है, चाहत नहीं मकान। 

हमने जी ली राह है, आहत नहीं दुकान।।

साथी तो सब जात हैं, सबकी अपनी राह। 

दुख भी, सुख ही देत हैं, निकले ना अब आह।। 

ना चाहत है भीड़ की, एकाकी ही ठीक।

अपनी धुन में मग्न हैं, अपनी ही है लीक।।

ना मंदिर से बैर है, ना मस्जिद से प्यार।

जो दिल में है सत्य बस, वह ही है करतार।।

 कांधे पर ना बोझ है, दिल की अपनी चाल।

जितना कम सामान है, उतना ही कम जाल।।

बिना थके हम चलत हैं, चलते हैं दिन-रात।

मंजिल का ना मोह है, मुरझाता ना गात।।

चाह नहीं है मान की, ना गम है अपमान।

जो है, उसी में मस्त हैं, अपना है ये गान।।

रोटी जितनी चाहिए, उतना ही है नीर।

प्यास बुझी बस, ठीक है, नहीं चाहिए खीर।।

दुनिया भागे दौड़ में, हम बैठे हैं शांत।

कर्म की चादर ओढ़ के, मन में है एकांत।।

जेब भले  खाली रहे, दिल पूरित हो नेह।

सोच हमारी महल है, चाह झोपड़ी गेह।।

ताना कोई मारता, हम हंस देते टाल।

जो अपना समझा नहीं, उसका कैसा हाल ।।

राष्ट्रप्रेमी कह रहा, सुनो,यही है सार।

जीवन जीना इस तरह, जैसे बहे बयार।।