Wednesday, July 15, 2026

प्रेम तो है कर्म

 

*प्रेम नहीं शब्द* 
        *©डा संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी*

नहीं जानते, प्रेम क्या होता?
पाता है नर, जो है वह बोता।
पाने की, हर चाह मिट गई,
राष्ट्रप्रेमी लगाए, ज्ञान में गोता।

प्रेम भाव से मन है ओत-प्रोत,
मिट गई हर छोटी-मोटी खोट।
समर्पण है, नहीं है केवल साथ,
कितनी भी प्यारी,दे लो तुम चोट।

सुख-दुख से, नहीं रहा है मोह।
नहीं है चाह, नहीं है कोई छोह।
ढलान पर, कदम-कदम चल रहे,
उठने का अब, नहीं बचा कहीं रोह।

साथ रहने की तुमको नहीं चाह।
मेरे लिए अब,बची नहीं कोई राह।
पथिक हूँ, पथ है, पाथेय है न साथ,
चोट सहीं इतनी, निकले न अब आह।

अनिश्चितता का सागर है चहुँ ओर।
अंतर्मन का प्रकाश, नहीं हुई है भोर।
पथ पर अकेला, नहीं है साथी साथ,
फिर भी कहीं से, सुनाई देता शोर।

राह दिखाता, जो खुद चलता,
गलत से बचता, सत्य को पलता।
प्रेम का दर्द है कैसा प्यारा,
जलाते हुए भी नहीं है जलता।

राष्ट्रप्रेमी का प्रेम न सीमित।
प्रेमी नहीं होता है बीमित।
अपने सुख का सवाल नहीं है,
हृदय भरा है प्रेम असीमित।

प्रेम नहीं शब्द, प्रेम तो है कर्म,
निश्छल दिल में, बसता है धर्म।
राष्ट्र के चिंतन में, जीवन न्योछावर,
प्रेम नहीं समझा, नहीं समझा मर्म।

No comments:

Post a Comment

आप यहां पधारे धन्यवाद. अपने आगमन की निशानी के रूप में अपनी टिप्पणी छोड़े, ब्लोग के बारे में अपने विचारों से अवगत करावें.