Monday, July 6, 2026

अपने घर में खुद ही चोरी



कैसा रिश्ता, कैसा हिस्सा, लालच बढ़ा, विश्वास मर गया। 

अपने घर में  खुद ही चोरी, सुन करके,परिहास मर गया। 

सोंधी थी आँगन की मिट्टी, उसका ईमान आज बिक गया। 

अपनों के ही दस्तखत से अब, तुलसी का हर घाट मिट गया।

रोटी के टुकड़े गिन-गिन कर, अपनेपन को मार दिया। 

खून के रिश्ते नहीं बचे हैं, क़र्ज़ का रिश्ता फाड़ दिया।

सच को छोड़ा, हमको तोड़ा, झूठ से रिश्ता जोड़ लिया। 

चांदी चुन, ईमान बेचकर, दिल का रिश्ता तोड़ दिया।

मंदिर-मस्जिद सब खामोश हैं, प्रार्थना का भी सार लुट गया। 

दुआएँ बिकतीं बाज़ारों में, आस्था का चंदा भी चुरा लिया।

दिल का दीया, कर्म की बाती, जलता है, दिल छला गया।

रिश्तों की वहाँ राख उड़ रही, सोने को जहाँ चुना गया।

इंसानियत भी बची नही बस, तुमने तमाशा बना दिया।

राख में आग हम ढूँढ रहे थे, तुमने हमको उड़ा दिया। 

नफरत की दीवार उठ रहीं, नेह का चांद है आज ढल गया।

अन्तरमन में तड़प उठी जब, हार के पीछे प्यार जल गया।

धन के पीछे भाग रहे हो, कर्म का दीया तुम्हारा बुझ गया।

जो अपना था कल तक साथी, ठुकरा कर अब चला गया।

सपनों का घर बिखर गया यूँ, जैसे रेत का महल ढह गया।

भरोसे की नाजुक डोरी को, स्वार्थ का चाकू काट गया।

हिम्मत थी, हार न मानी, विश्वास आज फिर छला  गया।

राष्ट्रप्रेमी, है पथिक प्रेम का, धोखा खा कर बिखर गया।

धैर्य रखा जिसने भी मन में, हर संकट वो पार कर गया।

सत्य-राह पर चलने वाला, जिंदा है, बस हार गया।

हम पहले ही मरे हुए थे, विश्वास बचा था आज मर गया। 

अपने घर में  खुद ही चोरी, सुन करके,परिहास मर गया।

No comments:

Post a Comment

आप यहां पधारे धन्यवाद. अपने आगमन की निशानी के रूप में अपनी टिप्पणी छोड़े, ब्लोग के बारे में अपने विचारों से अवगत करावें.