जहाँ पर बीता मेरा बचपन,
भूल गया अब उम्र है पचपन।
नीम तले वो कंचे खेलना,
अम्मा का वो रोटी बेलना,
बरगद की वो झूला-डोरी,
रोते हुए भी दंड पेलना।
सोच रहा वापस घर जाऊँ,
बिसरे गीत गाँव के गाऊँ।
बदला-बदला गाँव का हाल,
नहीं बचा आँगन, ना चौपाल,
खेत बिके, बँट गए खलिहान,
हाथ में सबके मोबाइल-जाल।
माता-पिता भी वहाँ नहीं हैं,
कोई बुलाए, रहा नहीं है,
जाने को जी चाह रहा है,
प्रेम की कोई छाँह नहीं है।
बदल गया सब, घर कैसे पाऊँ,
वापस कैसे गाँव को जाऊँ?
गाँव वही है, लोग नए हैं,
रिश्ते-नाते रीत गए हैं,
जिन पेड़ों पर गाँव था बसता,
गिरे नहीं हैं, काटे गए हैं।
पक्की सड़क हैं, धूल नहीं है,
शेष बची कोई गूल नहीं है,
घर की कोई राह नहीं है,
डाली हूँ मैं, पर मूल नहीं है।
फिर भी चाह अभी भी बाकी,
जाकर कर आऊँ ताका-झाँकी,
जो गीत बिसरे बिरवा-खेत में,
याद हैं किस्से, पटेल-बुलाकी।
गाँव बुलाए तो जाऊँगा,
माटी को शीश नवाऊँगा,
पचपन की इस साँझ में अब तो,
बचपन को फिर जी आऊँगा।
राष्ट्रप्रेमी का गाँव है छूटा,
सच भी लगता मुझको झूठा,
गाय का ताजा दूध याद है,
गाय नहीं अब, नहीं रहा खूँटा।

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