Tuesday, September 15, 2026

सबका स्वागत

 जीवन खुली किताब है, छिपा न कोई राज।

अपनी अपनी राह है, अपना अपना काज।।1।।


जीवन साधन साधना, ना कोरी यह आस।

बोए बिना किसान को, मिलती नहीं कपास।।2।।


पुष्प चढ़ाना धर्म है, पुष्प खिलाना कर्म।

कर्म बिना पूजा सभी, नहीं धर्म का मर्म।।3।।


तिलक-दीप से क्या मिले, मन माहि अंधकार।

हल-कलम-कुदाल से, बनता है संसार।।4।।


माँग-माँग कर क्या मिला, खाली रहे हैं हाथ।

कर्म-बीज जो बो गया, फल भी पाया साथ।।5।।


गीता पढ़ना तो सरल, कठिन गीता सी चाल।

कथनी मीठी लगत है, करनी में ही ढाल।।6।। 


एकाकी जपते सभी, सबकी अपनी चाह।

संग-संग तपता यहाँ, वही पकड़ता राह।।7।।


मंदिर-मंदिर ढूँढता, भटके चारों ओर।

मन को मंदिर कर लिया, अंदर बाहर भोर।।8।।


शब्द रटे से क्या भला, भाव न हो जब पास।

बीज बिना धरती धरे, उगती नहीं कपास।।9।।


राष्ट्रप्रेमी कर्म कर, कर न किसी की आस।

इससे बढ़कर जगत में, धर्म नहीं है खास।।10।। 


सबका स्वागत कर रहे, आए जो भी साथ।

जिसको चलना साथ है, उसका थामें हाथ।।11।।

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