Monday, July 5, 2010
ताकि कोई जनक आकर, उसे जमीन से निकाल न सके।
पढ़ना-लिखना साक्षर होने की पहचान है,
शिक्षित होने की नहीं।
साक्षर शिक्षित हो, यह आवश्यक नहीं,
निरक्षर अशिक्षित हो, यह अनिवार्य नहीं।
उच्च-डिग्रीधारी भी अशिक्षित मिल जाते हैं,
तो आज भी कबीर जगह-जगह पाये जाते हैं।
हम जानते हैं, उन्हें लिखना नहीं आता था,
और न ही कभी लिखने की कोशिश की।
वे नहीं जानते थे, पत्र-पत्रिका और ब्लॉग।
मैं लिखना जानता हूं और लिखता हूं।
लेकिन क्यों?
शायद इस भ्रम में कि
कविता, कथा और आलेख आदि
मेरे लेखन से बदल जायेगी दुनियां
ब्लॉगिंग करके कर लिया बहुत बड़ा काम
और सभी करेंगे मेरा अनुकरण
इस झूंठे अहम् में कब तक जीता रहूंगा मैं?
रचे जाते रहे हैं,
महाकाव्य, शास्त्र, पुराण और ग्रन्थ,
युगों-युगों से।
पढ़े व पढ़ाये ही नहीं,
रटे व रटाये भी जाते रहे हैं।
यही नहीं, हम करते रहते हैं, उनकी पूजा
और मन्दिर, मस्जिद और चर्चो में पारायण।
किन्तु परिवर्तन न हो सका आज तक,
सूपर्णखा की नाक आज भी काटी जा रही है
`ऑनर किलिंग´ के नाम पर भरी पंचायत में ही
मारा जा रहा है, सूपर्णखा को ही नहीं, उसके प्रेमियों को भी।
सीता की स्थिति में भी कोई सुधार नहीं आया है,
जमीन में दफनाई गई, जनक द्वारा निकाली गई,
शादी के बाद पति के साथ वनवास,
राज्यारोहण के बाद, पति के द्वारा वनवास
आखिर पृथ्वी से निकली थी, पृथ्वी में समाई
हम करते रहते हैं, पूजा किन्तु आज सीता,
गर्भ में ही जाती हैं गिराई।
विज्ञान का कमाल है, पढ़ने-लिखने का चमत्कार है
भ्रूण में ही जानकर, नष्ट कर सकते हैं,
जन्म देकर दफनाने की मजबूरी नहीं,
ताकि कोई जनक आकर, उसे जमीन से निकाल न सके।
प्रेमचन्द का होरी और गोबर,
आज भी वहीं है, महंगाई की मार से
आत्महत्या करने को मजबूर है।
रावण और कंस को बनाकर खलनायक,
लिखते रहें ग्रन्थ, कमाते रहें नाम और यश
जलाते रहें रावणों के असंख्यों पुतले हर वर्ष,
किन्तु राज आज भी रावण कर रहा है,
पुतलों के दहन का आयोजन भी वह स्वयं कर रहा है,
ताकि लोग पुतले को जलता देख मान ले रावण का अन्त,
और उसे पहचान न सके और अक्षुण्य रहे उसकी सत्ता
उसकी इच्छा के विरूद्ध हिलता नहीं पत्ता,
राष्ट्र को आतंक व रिश्वत से चूना लगाने वाला ही
आज जगह-जगह तिरंगा फहरा रहा है
और जन-गण-मन बूंदी के दो लड्डू खाकर खुश है
ताली बजा रहा है।
क्यों लिखूं?
मेरी समझ नहीं आता।
युगों-युगों के लेखन से भरे हैं ग्रन्थागार,
सीताओं के अपहरण, घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या का ग्राफ,
निरन्तर ऊपर चढ़कर रावण और कंस के अस्तित्व को,
प्रमाणित कर रहा है।
दहेज के विरूद्ध लिखने वाला,
दहेज हत्या कर रहा है।
हनुमान विकास की चमक में फ़ंस,
चेटिंग और ब्लोगिंग कर रहा है.
क्यों लिखूं?
लिखने की बजाय यदि,
बचा सकूं, एक सीता को अपहरण होने से,
बचा सकूं एक गीता को भ्रूण में नष्ट होने से,
सूपर्णखां को बचा सकूं ऑनर किलिंग से,
दहेज-हत्या रोक सकूं, सिर्फ एक ही,
शिक्षित कर सकूं एक बच्चा और
लगा सकूं एक पौधा,
तो क्या कविता लिखने और छपने से
बेहतर नहीं होगा.
नहीं मिलेगीं, ब्लॉग पर टिप्पणी,
नहीं आयेगा पत्र-पत्रिकाओं में नाम।
किन्तु आत्म सन्तुष्टि भी कोई चीज होती है।
Monday, June 7, 2010
धनी हो के जायेंगे
आये न जाने कितने, टिकट कटाए बिना
सोच-विचार कर, बच कर ही जाएंगे
जीवन गाड़ी लम्बी है, चैकर होगा एक ही
कितना भी ढूढ़ेगा नहीं हाथ आएंगे
भूल से भी यदि हम, नज़र में आ गए
डालकर उसे घास, साफ निकल जाएंगे
घास से न यदि हम, मना पाये उसको
मन्दिर में जाकर, माखन-मिश्री चढ़ाएंगे
नवागन्तुकों से कहें, आओ हमारे पास
गाड़ी में आरक्षण, हम दिलवाएंगे
टिकट वालों को कहें दूसरों में जायें आप
अधिकार हमारा, आप जाने नहीं पाएंगे
खड़े हो गेट पर, बन सेवक जनता के
भरी थी जिनकी जेब, खाली ले के जाएंगे
टिकट खरीदने को, न था धेला इनके पास
`राष्ट्रप्रेमी´ मेवा से धनी हो के जाएंगे
Monday, May 17, 2010
आंखों में लिये कुटिल मुस्कराहट
प्रस्तुत है अमित चोधरी की कविता
सफेदपोश शैतान
शरीर से रक्त
बहता है पसीना बनकर
कांटों को बुनती हुई
हथेलियां लहुलहान हो गयीं
अपनी मेहनत से पेट भरने वाले ही
रोटी खाते बाद में
पहले खजाना भर जाते हैं।
सीना तानकर चलते
आंखों में लिये कुटिल मुस्कराहट लेकर
लिया है जिम्मा जमाने का भला करने का
वही सफेदपोश शैतान उसे लूट जाते हैं।
4u sir
Tuesday, May 11, 2010
मेरे साथ हैं, मेरी मां सा
अज्ञान के क्षण
असहायता के पल
अज्ञात पथ
लड़खड़ाते पद
लांघी फिर भी हद
बढ़ता रहा कद
चूमा था माथ
मां थी मेरे साथ।
अंजाना शहर
तपती दोपहर
तन्हाई का कहर
बीते वो पहर
मां की थी महर।
पल-पल शिक्षा
कदम-कदम परीक्षा
उड़ने की इच्छा
लेनी नहीं भिक्षा
मां ने दी दीक्षा।
मर गईं सारी इच्छा
देनी नहीं परीक्षा
नहीं रही चाह
निकलती न आह
नहीं किसी की परवाह
नहीं किसी से आशा
कहां मिलेगी निराशा
आयेगी नहीं हताशा
मेरे साथ हैं, मेरी मां सा।
मौत से भी टकराऊं
कर्तव्य पथ पर मारा जाऊं
अपनी मेहनत का ही खाऊं
सच के गीत गाऊं
नहीं कभी ललचाऊं
न मोह में बांधा जाऊं
दु:ख में भी हरषाऊं
मां का आशीष पाऊं।
Tuesday, May 4, 2010
सरकारी सज्जनता?
उसने अपने मित्र को अपने एक अधिकारी की सज्जनता का बखान करते हुए कहा, "बड़े ही सज्जन पुरुष हैं." मैंने अपने जीवनमें इतने सज्जन अधिकारी दूसरे नहीं देखे.
मित्र ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा तो उन्होंने बात आगे बढ़ाई. उनके समय में हम अपनी इच्छानुसार काम करते थे. जब काम में मन न लगता बाहर निकल जाते. याद नहीं आता कभी सुबह कार्यालय के लिए देर से आने पर भी उन्होंने कभी डांट लगाई हो.
एक बार मोहन के पिताजी बीमार पढ़ गए और मोहन १८ दिन घर रहा, वापस आने पर उससे हस्ताक्षर करवा लिए, बेचारे की १८ दिन की छुट्टी बच गईं.
एक बार सद्यः ब्याहता महिला कर्मचारी के पति पहली बार उससे मिलने आये तो न केवल उस महिला को अपने पति के साथ दो दिन घूमने के लिए भेज दिया, वरन सरकारी गाड़ी भी उनके साथ भेज दी ताकि वे एन्जॉय कर सकें.
उनका मित्र सरकारी सज्जन की सरकारी सज्जनता की कहानी सुनकर गदगद हो गया और उसके मुह से निकला काश! ऐसे सज्जन अधिकारी के अधीन कार्य करने का मौक़ा मिलता.
Tuesday, April 27, 2010
चोर-चोर मौसेरे भाई
मिलकर सारे करें कमाई.
ईमानदार की करें कुटाई,
हम भी इनमें फंस गए भाई.
हसंते सारे लोग-लुगाई.
चोर-चोर मौसेरे भाई.
भ्रष्टाचार की कैसी लीला?
लेने को सबका कुरता ढीला.
रिश्वत की महिमा तो देखो,
खाई को दिखला दे टीला.
ईमान की देखो यहाँ हंसाई.
चोर-चोर मौसेरे भाई.
बेईमान की सुविधा के हित,
ईमानदार भी हो जाए चित.
सुविधा-शुल्क की महिमा न्यारी,
देते हैं जो, पाते वो नित.
बेईमानी सबको है भाई.
चोर-चोर मौसेरे भाई
लेने को ललचाते हैं सब,
देने में ही याद आये रब.
लेन-देन जब दोनों भायें,
समृद्धि पाता नर-पशु तब.
विरुदावली सबने हैं गाईं.
चोर-चोर मौसेरे भाई.
ईमानदार की सनद मिली है,
रिश्वत भाई देनी पड़ी है.
बेईमानी ही हुई भलाई.
चोर-चोर मौसेरे भाई
एक दिन हमने चोर को पकड़ा,
हम थे छोटे, चोर था तगड़ा.
उसने हम पर दावा ठोका,
हमने उससे किया क्यों झगड़ा?
अफसर ने हमारी करी कुटाई,
चोर-चोर मौसेरे भाई.
सच का आज दुश्मन है ज़माना,
झूंठ से मिलता उसे खजाना.
बाजार में गवाह हैं बिकते,
ईमानदार को पड़े लजाना.
सच अस्तित्व की लड़े लड़ाई.
चोर-चोर मौसेरे भाई.
Monday, April 19, 2010
नवीन पता-
डा. संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
स्नातकोत्तर शिक्षक हिंदी
जवाहर नवोदय विद्यालय
खुंगा-कोठी, जींद -१२६१०२
हरियाणा
Sunday, April 11, 2010
Thursday, April 8, 2010
निलंबन पर गर्व
काफी समय से ब्लॉग के माध्यम से संपर्क नहीं रख पा रहा हूँ . अत: क्षमा चाहता हूँ. अभी में out of station तो नहीं without station हूँ.
एक स्थान पा जाने के बाद पुन: संपर्क होगा ऐसी आशा है. फिलहाल मैं ईमानदारी के कारण निलंबन का आनंद उठा रहा हूँ और इस पर मुझे गर्व है.
Sunday, February 28, 2010
अबीर गुलाल उड़ाता आ रहा है फागुन
अबीर गुलाल उड़ाता आ रहा है फागुन
कितना प्यारा बसन्त ला रहा है फागुन
बाग बगीचे वाटिकाएं सभी लगते हैं रंगीले
जमीन पर आसमान पर छा रहा है फागुन
चहुं ओर है प्यार पावन होली के आने पर
उर-उर के तार झनका रहा है फागुन
नृत्य करती प्रकृति झूम कर चहुं ओर
गांव-गांव, जंगल-जंगल छा रहा है फागुन
कोयल करती शोर ,कैसा? नांच रहा है मोर
बाल-युवा-वृद्ध सबको, नचा रहा है फागुन
रंगो में हैं मस्त, बाल किशोर युवा और प्रौढ़,
कण-कण में अमृत रस झलका रहा है फागुन।
सबको ही बाटें मुस्कानें
फागुन है ऐसा मुस्काता
ज्यों कलियों में जीवन।
घर-घर सूरज है खिलता,
आंगन में सजता उपवन।
द्वार-द्वार है खुशी खेलती,
बाल वृद्ध सब हैं उत्साही।
कैसे घोल सकेगा कोई ,
इस उत्सव में स्याही।
लेकर नव संकल्प बढे़ हम,
नयी प्रेरणा होली से।
सबको ही बाटें मुस्कानें,
नहीं डरें हम गोली से।
Thursday, February 25, 2010
राग द्वेष के तेल से, दीप जलाने वालो !
ईर्ष्या द्वेष की होली को जलाओ रे !
मत भूलो समानता भाई चारे को,
ठुकराये हुओं को गले तो लगाओ रे !
ईर्ष्या, द्वेष, असमानता से लाभ उठाने वालो,
कुछ रंग जीवन के, इनको भी दिखलाओ रे!
नहीं झेल पाओगे तुम, किंचित भी,
मत विद्रोह की आग, ह्रदय में जलाओ रे!
उगते हुए सूरज को, नमस्कार करने वालो!
अस्त होते सूरजों को भी, पथ दिखलाओ रे!
प्रेम, स्नेह के भाषण ही न देते रहो,
रंग में समरसता के, डुबकी लगाओ रे!
दुर्व्यवस्था फैला के, लाभ उठाने वालो!
समाज में सुव्यवस्था भी, तुम अब लाओ रे!
स्वार्थ को ही तुमने अब तक पाला पोसा,
उसकी अब होली भी, तुम ही जलाओ रे!
Monday, February 8, 2010
Saturday, February 6, 2010
डॉ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
फटे हुए चिथड़े
पहनकर
बीती है सर्दी
आंसुओं की धार पीकर
बीती है सर्दी
पिया के सपने
लेकर
बीती है सर्दी
लम्बी काली रातें
जागकर
बीती है सर्दी
कम्पन,ठिठुरन,
जकड़न में
बीती है सर्दी
न लौटे कन्त
बड़े बेदर्दी
दस्तक दे ले बसन्त
समझ गई मैं
सर्दी का हुआ अन्त
किन्तु दरवाजा न खुलेगा
जब तक
आयेंगे न मेरे कन्त!
Friday, February 5, 2010
डॉ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
बेशर्म बसन्त,
फिर आ गया तू
अकेला
क्या?
भूल गया
मैंने कितनी बार
लौटाया है तुझे
इस दरवाजे से
कितनी बार?
बताया है तुझे
घर पर नहीं हैं पिया,
अकेले,
किसी के स्वागत को,
करता न मेरा जिया
लगता है डर,
कांपता है दिल,
रोजगार की खातिर
परदेश में हैं कन्त
मेरे दुखों का है न अन्त
यदि,
चाहता है तू
मुझे सुख पहुंचाना
पिया को साथ लेकर,
मेरे घर आना।
Monday, January 25, 2010
प्रकृति छटा को देख खुशी से
प्रकृति छटा को देख खुशी से,
मन मयूर है हरषाया।
मलयागिरि की पवन चले जब,
कण-कण कहे बसन्त आया।
अब तो भूल गये हैं सब ही,
सर्दी ने जो कहर ढाया।
प्रिया भूली गत वियोग को,
प्रियतम उसका घर आया।
हर्षित कैसी होती हैं अब,
मोटी-पतली सब काया।
हर मानव है मुदित हो रहा,
लाया कैसी है माया।
लता-लता अब फूल उठी है,
आम्र वृक्ष भी बौराया।
कौये की तो चौंच मढ़ गई,
कोयल ने गाना गाया।
कोयल की ये मधुर मल्हारें,
उसको लगतीं करुण पुकारें,
सबसे यही मनोती मॉगे,
प्रियतम आकर उसे दुलारें।
इन्द्रधनुष की सभी छटाएं,
उसको अंगारे बरसाएं,
कैसा बसन्त वह क्या जाने,
निशा वियोग की जिसे सताएं।
काक तू वैरी रोज पुकारे,
प्रियतम कौ सन्देश सुना रे,
मुझ विरहनि को धीर बधा के,
अपनी बिगड़ी जात बना रे।
Wednesday, December 30, 2009
नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक।
Thursday, October 15, 2009
ब्लॉग एक्शन डे
Tuesday, October 13, 2009
देखो तो तुम डरा अंधेरा सरपट भागा,
ज्ञान का दीप
गली-गली आंगन-आंगन में
ज्ञान का दीप जलाएं पावन
करें रोशनी रंग बिरंगी
भारत हो जाये शतरंगी
सबका हृदय लुभाये भारत
विश्व गुरू कहलाये भारत
देखो तो तुम डरा अंधेरा सरपट भागा,
देश हमारा इसने त्यागा
ज्ञान उजाला कैसा होगा
सूर्य चन्द्र के जैसा होगा
हरसेगा जन-गण का मन
हृदय बनेगा निर्मल पावन
दीपोत्सव आया मन-भावन।
Sunday, October 11, 2009
शादी क्यों ? लड़के शादी से पहले विचार करें!
१- कन्या भ्रूण हत्या मानवता के लिए अभिशाप है, इसे रोकने मे हम असफ़ल रहे है। यह केवल महिलाओं के लिए ही अन्यायपूर्ण नहीं है वरन सम्पूर्ण समाज के अस्तित्व के लिए ही घातक है। महिलाओं की कमी के कारण निम्न-मध्यम वर्ग शादी न हो सकनें की परेशानियों से अधिक जूझ रहा है। दहेज़ प्रतिष्ठा का विषय होने के कारण यह वर्ग लड़की पक्ष से गुप्त सौदा करता है कि वे लोग दिखाने के लिए दहेज़ दें। सम्पूर्ण खर्च लड़के वाले करते हैं किंतु दहेज़ का नाटक किया जाता है। कई बार तो शादी करने की एवज में अच्छी-खाशी रकम वसूल ली जाती है।
२- पैतृक संपत्ति में लड़की के अधिकार को क़ानून भले ही बन गया हो किंतु देश के बहुत बड़े भू-भाग में यह व्यवहार में नही है अर्थात पिता के यहाँ की संपत्ति में से भाग लड़की को नहीं मिलाता।
३-दहेज़ लड़किओं की कमी के कारण लगभग समाप्त हो चुका है। जहाँ शादी हो जाना ही बहुत बड़ी बात हो, वहां दहेज़ की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।
४-दहेज़ निषेध संबन्धी कानूनों के कड़े प्रावधान पारिवारिक मतभेदों में धमकाने के लिए प्रयुक्त किए जाने लगे हैं। धमकाने तक ही नहीं, अलगाव की स्थिति आने पर धन वसूल करने के लिए कानूनों का प्रयोग किया जाने लगा है। देखने में यह भी आ रहा है कि सभी परम्परों को तोड़कर होने वाले प्रेम विवाह करने वाली लड़की भी कुछ समय बाद दहेज़ के आरोप लगा देती है।
५-विचार करने की बात है कि-
क- लडकी पैतृक संपत्ति में से हिस्सा लेकर नहीं आती।
ख- दहेज़ गैर कानूनी और अव्यवहारिक है। दहेज़ के रूप में भी कुछ नही लिया जाता।
ग- अभी भी लड़कियों को लड़कों की तुलना में कम पढाया जाता है।
घ- अभी भी महिलाये सज-धजकर घर मे रहकर मालिकिन बनना ही पसंद करती हैं। परिवार में किसी के नियंत्रण में रहना नही चाहती। विवाद होने पर घर के सभी सदस्यों को फ़साने व अपने लिए ही नहीं अपने भाई-बहनों तक के लिए रकम वसूल करने की इच्छा रखती हैं और कई बार ऐसा ही होता है।
जब वह अपनी पैतृक सम्पत्ति मे से कुछ नही लाई, दहेज़ की तो बात ही ख़त्म हो गयी , उसने परिवार के दायित्वों के निर्वहन में भी रूचि नही ली। बिना किसी योगदान के वह केवल शादी की रस्म के निर्वहन करने से ही पति नाम के प्राणी से आजीवन वसूल करने की हकदार हो गयी क्या यह लड़के पर अत्याचार नहीं है? शादी करना यदि लड़के के लिए अपराध है तो क्यों न अकेले रहने पर विचार किया जाय? वर्तमान वातावरण ऐसा ही बन रहा है कि भविष्य मे लड़के शादियों से बचने लगेंगे जो समाज के अस्तित्व के लिए घातक हो सकता है।
Thursday, September 17, 2009
पापा जी भी दीप जलाएं।
बच्चो फिर से आई दिवाली
सबने अपनी ज्योति जला ली
पण्डित हरिजन हो या माली
सभी मनाते हैं दीवाली।
आओ हम सब दीप जलाएं
अन्धकार को दूर भगाएं
ईर्ष्या-द्वेष और भेद मिटाएं
आओ सब मिल दीप जलाएं।
हँसते रहे औरों को हँसा के
खुशियों के सूचक हैं धमाके
मिठाई खा और चकरी चला के,
नन्हे -नन्हे दीप जला के।
हम सब दीपावली मनाएं
स्वयं पढ़े औरों को पढ़ाएं
राष्ट्र को उन्नत शिखर चढ़ाएं
कर्मशील सब ही बन जाएं।
ठण्डा मौसम आया सुहाना
रजाई में बैठ पढ़े रोजाना
मच्छर जी अब नहीं सताएं
दीपावली के दीप जलाएं।
ज्यों-ज्यों आवें परींक्षा पास
महनत करते रहे न उदास
श्रेणी अच्छी जब हम लाएं
पापा जी भी दीप जलाएं।
Thursday, July 9, 2009
देश उठाना है ऊँचा तो नैतिकता को दूर भगाओ
आओ भाई झाँकी कर लें , पावन हिन्दुस्तान की।
पावन हिन्दुस्तान की , अपने देश महान की।।
इधर हिमालय की सोभा है, सागर उधर है जलराशि।
चन्दन की सुगन्ध आती है ,देखो रजपूतानी मॉटी।
जो स्वर्ग से नीचे उतर रही , पाप काट दे गंगा जी।
इसीलिए तो डरते नहीं है , पाप करने में भारतवासी।
भ्रष्टाचार , रिश्वत लेने में , नहीं हिचकता नेता।
ईश्वर भी भार उतारन को , अवतार यहीं पर लेता।
सन्त मारकर, शान्तिकामना करते आज जहाँन की।
रिश्वत ही पहचान बन गयी ,अपने देश महान की।
आओ भाई झाँकी कर लें , पावन हिन्दुस्तान की।
पावन हिन्दुस्तान की , अपने देश महान की ।।
तीन लोक से मथुरा न्यारी , ऐसा हमने सुन पाया है।
ऐसा ही कई एक नमूना , यहाँ दिखन में आया है।
भाई बहन भी करते मिलते, चर्चा प्रेमालाप की।
सब देशों से महिमा कम क्या? ऊपर लिखे आलाप की।
संस्कार संस्कृति सर्वोच्च है, वेद हमें बतलाते हैं।
बेटे को कर एक किनारे , शान्तनु वधू ले आते हैं।
मन से मन क्या मिलें? उर में क्षुधा है काम पिपासा की।
इतिहास चरित्रवानों का, फिर क्यूँ चिन्ता चरित्र महान की।
आओ भाई झाँकी कर लें , पावन हिन्दुस्तान की।
पावन हिन्दुस्तान की , अपने देश महान की।।
गुणवान, विद्यावानों से श्रेष्ठ, सभी बतलाते हैं।
शान्ति और दयालुता की ओर हमें पहुँचाते हैं।
काम करना हराम है नेता जी से शिक्षा पाओ।
देश उठाना है ऊँचा तो नैतिकता को दूर भगाओ।
निज स्वार्थो को पूरा करके ,भले ही जेल में जाओ।
थोड़े दिन की पिकनिक समझो,साफ बरी हो जाओ।
पाक से आओ दोस्ती करलें, शान्ति हमारे काम की।
आतंकवादियों को भेंट चढ़ाते, सेना और अवाम की।
आओ भाई झाँकी कर लें , पावन हिन्दुस्तान की।
पावन हिन्दुस्तान की , अपने देश महान की।।
Wednesday, July 8, 2009
सिसकत छोड़ी मीत गये
कली
कभी कली थी अल्हड़पन में,
बढ़ी जवानी के मधुवन में।
चार चाँद थे लग रहे तन में,
निकल जिधर जाये मधुवन में।
भ्रमरों से घिर जायें छन में,
मादकता छाये हर मन में।
अलि वे दिन तो बीत गये,
भ्रमर रसिक कब मीत भये।
अंग -अंग अब पीत भये,
प्रेम भरे नहीं गीत रहे।
सिसकत छोड़ी मीत गये,
रिश्ते नहीं पुनीत रहे।
अलि! वे अलि अब गये कहाँ ?
नव कली जहाँ वो होंग वहाँ।
यही रीति पालता जहाँ,
पूर्णेच्छा कर टालता जहाँ।
अलि आएं वो सुगन्ध कहाँ ?
पीने को मकरन्द कहाँ ?
अरी! नव कलि को बतलाना होगा ,
नव गीत उसे ही गाना होगा।
भ्रमरों से घिर जाना होगा,
कैसे ? उनसे बच पाना होगा।
मन चंचल समझाना होगा,
फिर नहीं बसन्त का आना होगा।
अरी घबड़ा मत वो दिन नहीं रहे,
ये भी न रहें सब कोई कहे।
जीवन परिवर्तन कष्ट सहे ,
समर्पण कर कुछ भी न लहे।
तन- मन-धन सब वही महे,
आदर्शों का सार यहे।
Monday, July 6, 2009
यदि तुम हो तैयार, चलने को यार
नहीं है
मुझे विश्वास
हो चुका
हताश
आश्वासन
वचन वायदों से।
नहीं है
लगाव
पंरपराओं
प्रथाओं
कायदों से।
नहीं है
मुझे डर
जीवन-मरण
यश-अपयश
नुकसान-फायदों से।
यदि
तुम हो तैयार
चलने को यार
सब कुछ त्यागकर
दुनियाँ से भागकर
महत्वाकांक्षाएं मारकर
धन,पद,प्रतिष्ठा के
बंधनो से मुक्त होकर
अपना पवित्र
निस्वार्थ
निश्चल प्रेम
समर्पित करने को।
Sunday, July 5, 2009
मैं फिर, मानवता का संदेश सुनाने आया हूँ.....
मैं फिर, मानवता का संदेश सुनाने आया हूँ।
कुछ नया बताने नहीं,पुरातन मूल्य बचाने आया हूँ।।
भारतीय हम संस्कृति अपनी, युगों-युगों तक अमर रहे।
दूधों की नदियां बहती थी,पानी को हम तरस रहे ।
घर-घर में तुलसी का पौधा बाग लगाना भूल गये।
पेड़ो को थे देव मानते उन्हें बचाना भूल गये।
विकास कर रहे किस कीमत पर यही बताने आया हूँ।
कुछ नया बताने नहीं,पुरातन मूल्य बचाने आया हूँ।।
अतिथि सेवा करने वाले पड़ासियों को भूल गये।
भूखे मरते भाई हमारे,स्व-धर्म निभाना भूल गये।
गाँव छोड़कर शहर में आये,माँ-बापों को भूल गये।
अधिकारों को भोग रहे नित कर्तव्यों को भूल गये।
कर्म छोड़कर सुविधा भोगी यही बताने आया हूँ।
कुछ नया बताने नहीं,पुरातन मूल्य बचाने आया हूँ।।
वसुधा थी परिवार हमारा,लगाते आज तुम प्रान्त का नारा!
देशभक्ति का खुला पिटारा, भाई-भाई का हत्यारा।
इन्तजार में जब थी कारा, जननायक का रूप है धारा।
समस्याओं से किया किनारा, बॉस से मिलकर हड़पा सारा।
नर-सेवा नारायण सेवा, याद दिलाने आया हूँ।
कुछ नया बताने नहीं,पुरातन मूल्य बचाने आया हूँ।।
गैरों को था गले लगाया, अपनों को भी अब ठुकराया ?
जाति-पाँति में पड़कर हमने झगड़ो को ही नित्य बढ़ाया।
लम्बा किया संघर्ष जिन्होंने देश की खातिर शीश चढ़ाया।
क्षुद्र स्वार्थ की खातिर हमने, पूर्वजों को आज भुलाया।
हाथी के पाँव में, सबका पाँव, यही बताने आया हूँ।
कुछ नया बताने नहीं,पुरातन मूल्य बचाने आया हूँ।।
Wednesday, July 1, 2009
सभी समस्याओं का समाधान
समाधान
सभी समस्याओं का समाधान,
आचरण में लायें, जो देते व्याख्यान,
नैतिकता, धर्म औरसदाचरण का,
एक है जन्तर,
हमारी कथनी और करनी में,
रहे न अन्तर।
जो करते औरों से अपेक्षा,
स्वयं न करें उसकी उपेक्षा,
निज आचरण में ढालें,
स्वयं सत्य के मार्ग पर चलें,
तब दूसरों को डालें।
जो जनता को सीख देत,
अपनी खाट भीतरी लेत,
ऐसे पाखण्डियों की करो उपेक्षा,
पहले दें वे स्वयं ही परीक्षा,
तत्पश्चात औरों को दीक्षा,
इसे बना लें आन,
सबका हो कल्यान,
यही है समाधान।
Monday, June 29, 2009
नव-पल क्षण ही प्रगति करे ,यह प्राणों से है प्यारा
ये गणतंत्र हमारा
युगो-युगो तक अमर रहे , ये गणतंत्र हमारा।
नव-पल क्षण ही प्रगति करे ,यह प्राणों से है प्यारा।।
यह भारत देश हमारा।।
वीरों ने दी थीं कुर्बानी ,बहनों ने थी राखी बाधीं।
माताओं ने आरती उतारीं,भाग्यशाली थीं,नहीं बिचारी।
था सुभाष भी भाई मेरे, माता का एक दुलारा।
नव-पल क्षण ही प्रगति करे ,यह प्राणों से है प्यारा।।
यह भारत देश हमारा।।
पहना था केसरिया बाना,जनमानस था हुआ दिवाना।
खून से लिखता था परवाना,राष्ट्रप्रेमी का रण का गाना।
इन्कलाब की बोली से था, गूँजा भारत सारा।
नव-पल क्षण ही प्रगति करे,यह प्राणों से है प्यारा।।
यह भारत देश हमारा।।
हमको है, कर्तव्य निभाना,स्वत्व नहीं, है राष्ट्र बढ़ाना।
सार्थक हो गणतंत्र मनाना,हमको ही है, पथ दिखलाना।
क्लान्त हुए जन मानस ने है, फिर से हमें पुकारा।
नव-पल क्षण ही प्रगति करे ,यह प्राणों से है प्यारा।।
यह भारत देश हमारा।।
Sunday, June 21, 2009
कोई बेटा नहीं तजता अपने ही बाप को.
पितृ-दिवस पर विशेष
काश!
बेटा समझ पाता,
उस वात्सल्यमयी डांट को,
माली की तरह की जाने वाली कांट-छांट को।
काश!
बेटा समझ पाता,
बाप की रोक-टोक को,
अपनी लुका-छिपी और नोंक-झोंक को।
काश!
बेटा समझ पाता,
प्रताड़ना के नेह को,
नाराज़ होकर नहीं तजता गेह को।
काश!
बेटा समझ पाता,
अंशी किस तरह सींच रहा अंश को,
भूलकर भी न करता, भावनाओं के ध्वंस को।
काश!
बेटा समझ पाता,
उन गालियों के अम्बार को,
दामन में भर लेता, स्नेह के भंडार को।
काश!बेटा समझ पाता,
कांटे चुनती छांह को,
कभी नहीं, जाता झटक कर बांह को।
काश!
बेटा समझ पाता,
बाप के उर के ताप को,
कोई बेटा नहीं तजता अपने ही बाप को.
पिता बनकर समझ आया
पिता बनकर समझ आया।
क्रोध मेरा,
उन्होंने झेला,
जेब में न था,
एक धेला,
माँगों का था,
बस झमेला
जब मैंने
आँसू बहाया,
दिल मैंने,
कितना दुखाया?
पिता बनकर समझ आया।
अभाव,
उन्होंने,
खुद थे झेले,
मुझको दिखाये,
फिर भी मेले,
मेरी मुस्कराहट की खातिर,
अपने दु:ख थे,
उन्होंने ठेले।
उनको,
कितना था रूलाया?
पिता बनकर समझ आया।
रोया, रूठा, भाग छूटा,
फिर भी
उन्होंने,
न,
तनिक कूटा,
ढूढ़कर वापस ले आये
आँसू पौंछ,
माँ से मिलाये,
खाया न कुछ भी,
बिना खिलाये।
जिद कर,
कितना सताया?
पिता बनकर समझ आया।
पढ़े, लिखें,
आगे बढ़े हम
कर्म उत्तम,
करते रहे हम,
चाह थी बस,
उनकी इतनी,
पूरी कर पाये हैं कितनी?
मारा क्यों था?
मुझमें जूता।
मारकर क्यों था मनाया?
पिता बनकर समझ आया।
भले ही घर से निकालूँ,
भले ही उनको मार डालूँ,
समझेंगे नहीं,
फिर भी पराया,
कहेंगे नहीं,
मुझको सताया।
कितना था ऊधम मचाया?
पिता बनकर समझ आया।
चाहते हैं मुझको कितना?
काश!
तब मैं समझ पाता,
दिल नहीं,
उनका दु:खाता।
ऋण नहीं है,
जो चुकाऊँ,
रकम दे पीछा छुड़ाऊँ।
मेरा नहीं कुछ,
जो दे पाऊँ,
चरणों में खुद को चढ़ाऊँ।
मैंने केवल गान गाया,
पिता बनकर समझ आया।
Thursday, June 18, 2009
जितने चेहरे मुरझाये हैं , वे सारे खिल जायेंगे
जगमग-जगमग
जगमग-जगमग दीप जलेंगे, ऐसा दिन हम लायेंगे।
जितने चेहरे मुरझाये हैं , वे सारे खिल जायेंगे।।
कहीं न कोई क्षुधित रहेगा, कहीं न कोई तृषित रहे।
अतृप्त आत्मा रहेगी जब तक, सूर्य-चन्द्र भी ग्रसित रहें।
हर बाला शिक्षालय जाये , ऐसा अलख जगायेंगे।
जितने चेहरे मुरझाये हैं , वे सारे खिल जायेंगे।।
मादा भ्रूण अस्तित्व मिटे तो, कैसे सुखी रह पायेगा नर।
दहेज प्रथा न मिटेगी जब तक, कैसे योग्य मिल पायेगा वर।
नारी नहीं सतायी जाये, हर नर को समझायेंगे।
जितने चेहरे मुरझाये हैं, वे सारे खिल जायेंगे।।
सु-शिक्षित हर बच्चा होगा, वस्त्र विहीन न कोई रहे।
हर सिर को आवास मिलेगा, अन्न विहीन न कोई रहे।
पूरीं हों सबकीं आकाँक्षा , सबको गले लगायेंगे।
जितने चेहरे मुरझाये हैं , वे सारे खिल जायेंगे।।
Wednesday, June 17, 2009
रहे न कोई भूखा यहाँ पर कोई वस्त्र विहीन न हो।
भारत भव्य बनाना है।
सहने पड़े कष्ट कितने भी, आगे बढ़ते जाना है।
हम दिन चार रहें न रहें,पर भारत भव्य बनाना है।।
रहे न कोई भूखा यहाँ पर कोई वस्त्र विहीन न हो।
शोषित पीड़ित रहे न कोई, कोई व्यक्ति दीन न हो।
कण्टक पूरित मारग अपना, अविचल चलते जाना है।
हम दिन चार रहें न रहें,पर भारत भव्य बनाना है।।
शास्त्र-शस्त्र दोनों ही को हम, खुशी-खुशी अपनायेंगे।
शस्त्र तो रक्षा के हित केवल , विश्व को पाठ पढ़ायेंगे।
पश्चिम से साँस्कृतिक युद्ध है, युवकों को समझाना है।
हम दिन चार रहें न रहें,पर भारत भव्य बनाना है।।
सदियों से संस्कृति चादर में कुछ धब्बे जो ठहर गये।
अमृत भरे घड़े अपने थे इन्हीं के कारण जहर भये।
विवेक त्याग के साबुन से अब चादर को चमकाना है।
हम दिन चार रहें न रहें, पर भारत भव्य बनाना है।।
देवासुर संग्राम तो भाई ,युग-युग से होता आया है।
नैतिकता जिसने अपनाई यश उसने ही पाया है।
भारत माँ की आज्ञा से अब कदम से कदम मिलना है।
हम दिन चार रहें न रहें,पर भारत भव्य बनाना है।।
Wednesday, June 10, 2009
खड़े हैं कब से चौराहे पर, नजारा ही बदल गया।
मुक्तक पढें होकर मुक्त
खड़े हैं कब से चौराहे पर, नजारा ही बदल गया।
करते-करते इन्तजार, जमाना ही बदल गया।
परीक्षा लोगी कब तक? हमारे इस जीवट की,
आ जाओ एक बार, तुम्हारा हुलिया ही बदल गया।
न देखा तुमने मुड़ के, हम दीदार न कर सके।
चाहा था हमने तुमको, तुम इन्कार न कर सके।
तुम नहीं हो हमारी अमानत, स्वीकार है हमें,
नादान हैं तुम्हें छोड़कर, प्यार ना कर सके।
हमारे दिल में है क्या हम इजहार ना कर सके।
तुम बैठे हमारे सामने, हम दीदार ना कर सके।
ठोकरें ही थीं पथ में, हम थे उसी गम में,
चाहकर भी हम तुमसे, इकरार ना कर सके।
बीत गये वे दिन रावी का बह गया वह पानी।
गुलिश्ता उजड़ गया, छाई है यहाँ वीरानी।
क्या करेगी आकर ? हे तितली! संभल जा,
नहीं है यहाँ राजा, न बन सकेगी तू रानी।
दर पर खड़े तुम्हारे हम घण्टी ना बजायेंगे।
तुमको खुश करने को, ना अपने को सजायेंगे।
इकरार और इंकार सब छोड़ते हैं तुम पर,
तुम्हारे गम में डूबे, नहीं अपने को बचायेंगे।
चाहा था तुमको हमने , करते रहे तुम्हें प्यार।
बीती हैं वर्षों देखो, नहीं कर सके हम दीदार।
कहा था तुमने ही, पत्थर भी हैं दुआ देते,
राष्ट्रप्रेमी बना पत्थर? आ के, कर जाओ इजहार।
नहीं थी आरजू फिर भी, तुम्हें दिल में बसाया।
दिल में हमारे बैठकर, हमें ही सताया।
तुम्हारी मुस्कराहट पर जीवन है निछावर,
काँटो में फूल खिले, जब भी तुमने मुस्काया।
Tuesday, June 9, 2009
अगले चौराहे से तुमको मुड़ के जाना।।
प्रेम है लुटाना
तुम पर नजर है,नहीं है निशाना।
मुझको अभी है बहुत दूर जाना।।
चाहा था तुझको बहुत हमने माना।
गा नहीं सकेंगे,केवल तेरा गाना।।
पथ का पथिक हूँ,नित ही चलते जाना।
राही हो तुम भी नहीं घर बसाना।।
लाये थे न कुछ भी नहीं हमको पाना।
हर मुस्कान पर, हमें, प्रेम है लुटाना।।
दे नहीं सके तो, नहीं तुमसे पाना।
लुटा देंगे सब कुछ,नहीं कुछ जुटाना।।
चलो तुम भी, आगे बहुत कुछ है पाना।
अगले चौराहे से तुमको मुड़ के जाना।।
जीवन-प्रश्न का उत्तर,
चाहता हूँ
चाहता हूँ मैं,
तुमसे बातें करना
लेकिन क्या?
बतला सकोगी?
चाहता हूँ मैं,
हो एक मुलाकात
लेकिन कब?
बतला सकोगी?
चाहता हूँ मैं,
साथ लेकर चलना
लेकिन किस पथ पर?
चलकर दिखला सकोगी?
चाहता हूँ मैं,
लड़ना-झगड़ना,
लेकिन किसके साथ?
समझा सकोगी?
चाहता हूँ मैं,
कंटकों पर चलना,
लेकिन क्यों?
समझा सकोगी?
चाहता हूँ मैं,
जीवन-प्रश्न का उत्तर,
बनेगा कौन?
बनकर दिखला सकोगी?
Monday, June 8, 2009
करोगे काम?
करोगे काम?
प्रेम क्या है?
एक पथ,
ईश्वर तक पहुँचने का।
प्रेम क्या है?
एक सच,
जीवन जीने का।
प्रेम क्या है?
एक नाटक,
दूसरों को फुसलाने का।
प्रेम क्या है?
एक तरकीब,
छिपे राज उगलवाने का।
प्रेम क्या है?
क्षणिक व्यापार,
मौज-मस्ती मनाने का।
प्रेम क्या है?
एक मजबूर सम्बन्धन,
साथ-साथ रहने का।
प्रेम क्या है?
करोगे काम?
राष्ट्रप्रेमी को समझाने का।
Saturday, June 6, 2009
प्रेमी को प्रेमिका से पत्र लिखवाइये,
उपदेश नीति और धर्म अगर चाहो,
विदुर रचित नीति शास्त्र मँगवाइये,
जोश रोश वीरता की आश लेके प्यारे,
वीर शिवाजी की जीवनी पढ़ जाइये।
देखना संयोग और वियोग तो,
प्रेमी को प्रेमिका से पत्र लिखवाइये,
प्रेम की पीर को बिना भोगे जानो तुम,
घनानन्द काव्यरस डुबकी लगाइये।
यूपी की राजनीति समझना यदि चाहो,
माया-मुलायम के भक्त बन जाइये,
आरक्षण राजनीति समझने हेतु यारो,
पासवान-लालू-सिब्बल के पीछे लग जाइये।
Tuesday, June 2, 2009
वणिक बुद्धि हावी है तुम पर, दिल की कैसे सुन पाओगी?
प्रेम नहीं कर पाओगी
वणिक बुद्धि हावी है तुम पर, दिल की कैसे सुन पाओगी?
चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।
पढ़ने-लिखने भर से कोई, श्रेष्ठ नहीं बन जाता है।
आत्मसात कर करे आचरण,वो ही कुछ कर पाता है।
हमने सब कुछ कह डाला है, तुम भी क्या कुछ कह पाओगी?
चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।
तुम्हे पाने की चाह नहीं थी,स्वार्थ भरी यह राह नहीं थी।
तुम्हारी खुशियों की खातिर ही,हमने तुम्हारी बाँह गही थी।
जाते हुए यह दुख है केवल तन्हा कैसे रह पाओगी?
चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।
काश तुम्हें खुशियां दे पाते, प्रेम तुम्हारे से मिलवाते।
तुमको जीवन रस मिल जाता,शायद हम भी खुश रह पाते।
सोचा था तुम बनोगी साथी, लेकिन तुम ना बन पाओगी।
चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।
