Tuesday, July 29, 2008

समानता का नारा,लगता बड़ा प्यारा

आओ सभी नर और नारी

समानता का नारा,

लगता बहुत प्यारा,

उठते जो प्रश्न,

करते सभी किनारा।

समानता : एक कृत्रिम शब्द,यथार्थ में,

दिखती नहीं समानता

किसी भी पदार्थ में।

यहां तक कि एक ही व्यक्ति के,

दो अंगों में भी नहीं होती समानता,

हर स्थान पर है असमानता,

यह असमानता जरूरी है,

क्योंकि यही करती सृष्टि को पूरी है।

सभी एक-दूसरे के बिन अधूरे हैं।

आपस में मिलकर ही होते सब पूरे हैं।

विभिन्न असमानतायें मिलकर ही,

पूर्णता की ओर ले जाती हैं।

समानता एक यक्ष प्रश्न?

जिसका उत्तर,

कब खोज पाया युधिष्ठर?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओ सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पडें प्रश्नों पर भारी।
क्या दो नर, या दो नारी,

आपस में समान होते हैं?

क्या दो जुड़वा भी,

एक जैसे महान होते हैं ?

क्षमता, दक्षता या निष्ठा में,

अन्य किसी भी विशेषता में।

क्या नहीं समेटे होते?

कोई न कोई असमानता?

प्रश्न है फिर हम क्यों?

आग और पानी पर समानता थोप रहे हैं।

चांद और सूरज को एक ही,

तराजू में तोल रहे हैं।

समानता के नाम पर,

प्रकृति के सृजन में,

क्यों छुरा भोंक रहे हैं?

एक-दूसरे के पूरक,

प्राकृतिक मित्र नर-नारी में,

समानता के नाम पर,

जगाकर प्रतिस्पर्धा,

क्यों बना इनको जौंक रहे हैं?

क्यों नर को लगने लगी नारी- एक वैश्या?

क्यों नारी को लगने लगा नर- जंगली और भेिड़या?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों नारी भ्रूण को,

कोख में ही नष्ट किया जा रहा है?

क्यों मानवता को मिटाया जा रहा है?

क्यों लक्ष्मी को ही किया जा रहा है?

पैतृक सम्पत्ति से वंचित!

वंचित करके दी जाती रही हैं :

जो छोटी-छोटी भेंटें।

दहेज के नाम पर गरियाकर,

उनसे भी वंचित किये जाने का,

रचा जा रहा है 'षड्यंत्र?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों देखते हैं सदैव,

पुरुष ही हो बड़ा,शिक्षा, शक्ति,

सामर्थ्य ही नहीं,उम्र में भी।

क्यों शिक्षा से वंचित,

किया जाता रहा है- सरस्वती को ही,

क्यों शक्ति से वंचित किया जाता रहा है:

साक्षात शक्ति रूपा नारी को ही।

क्यों धन, शिक्षा,स्वास्थ्य, शक्ति से वंचित करके?

पिता कर देता है दान :

एक वस्तु की तरह!

या फिर बेच देता है :

दामाद रूपी ग्राहक को!

और कल्पना करता है कि,

उसकी दान की हुई

या बेची हुई पुत्री,

पूजी जायेगी दूसरे घर में?

विवाद की स्थिति में,

हो जायेगी निर्वाह-व्यय की हकदार?

क्यों ? क्या है इसके पीछे तर्क?

पति रूपी नर के लिए?

क्या शादी करना है अपराध?

जो एक पुरूष,केवल एक परंपरा के निर्वाह मात्र से,

कुछ पल/दिन/माह/वर्ष के साथ से,

ही पा जाता है पति का तमगा

और विवाद की स्थिति में,

मजबूर किया जाता है-

जीवन भर निर्वाह भत्ता देने को।

दोनों हों शिक्षित,

दोनों हों समर्थ,

दोनों का अधिकार,

अपनी-अपनी पैतृक व

अपनी कमाई गयी, सम्पत्ति में।

दोनों हों समान तो क्यों कोई,

किसी पर निर्वाह व्यय के लिए,

क्यो बने भार!क्या है इसका आधार ?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों चरित्र की परिभाषा,

सीमित है शारीरिक सम्बन्धों तक,

क्यों झूठ, कपट, छल, धूर्तता,रिश्वतखोरी,

देशद्रोह, लाटरी, जुआऔर मदिरापान,

चरित्र का निर्धारण करते समय,

विचारणीय नहीं होते,

क्या पति-पत्नी द्वारा,

एक-दूसरे पर बलात्कार नहीं होते?

क्यों `वैश्या´ शब्द प्रयुक्त होता है -

केवल स्त्री के लिए,

जबकि पुरुष के बिना ,स्त्री

कुछ कर ही नहीं सकती,

प्राकृतिक व्यवस्था है,

स्त्री शारीरिक सम्बन्धों में,

एक सहयोगी होती है, प्रेरक होती है,

किन्तु निष्क्रिय पार्टनर मानी जाती है,

वह नहीं कर सकती, पुरुष के साथ,

भौतिक रूप से बलात्कार,

फिर भी वही क्यों दोषी है,

वही क्यों `वैश्या´ है?

उसके पास जाने वाले,

उसको वहां तक पहुंचाने वाले,

वैश्या की श्रेणी में क्यों नहीं आते?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओ सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों नारी को ही सहारे की,

मानी जाती है जरूरत,

जबकि पुरुष है हर पल :

नारी पर आश्रित,

नहीं आ सकता,

जमीन पर नारी के बिना,

नहीं जी सकता,

नारी-दुग्ध के बिना,

चाहिए नारी का स्नेह, दुलार,

प्रेम,मार्गदर्शन व प्रेरणा कदम-कदम पर

नहीं चल सकता,

नारी के बिना,

एक कदम भी,

नहीं सो सकता मां की लौरी,

पत्नी की हमसौरी के बिना,

एक क्षण को भी,

मां के अभाव में धाय,

पत्नी के अभाव में या फिर वियोग में प्रेमिका,

वह भले ही बाजारू हो या वास्तविक,

नारी ही साथी बनती है।

फिर नर-नारी में समानता की,

प्रतिस्पर्धा क्यों चलती है?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओं सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।

Monday, July 28, 2008

प्रेम क्या है?क्षणिक व्यापार,मौज-मस्ती मनाने का?

करोगे काम?


प्रेम क्या है?

एक पथ,

ईश्वर तक पहुचंने का?


प्रेम क्या है?

एक सच,

जीवन जीने का?


प्रेम क्या है?

एक नाटक,

दूसरों को फुसलाने का?


प्रेम क्या है?

एक तरकीब,

छिपे राज उगलवाने का?


प्रेम क्या है?

क्षणिक व्यापार,

मौज-मस्ती मनाने का?


प्रेम क्या है?

एक मजबूर सम्बन्ध

साथ-साथ रहने का?


प्रेम क्या है?

करोगे काम?

राष्ट्रप्रेमी को समझाने का?

Sunday, July 27, 2008

हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।

मुस्कान लुटाएं
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
अपरिचित दोंनो परिचित हो गये
रंगरीले ख्वावों में खो गये
बिताने को मिलकर के ,
प्रेम भरे गाने कुछ गायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
हम राही से एक हो गये
दिल दोंनो मिल सुखी हो गये
अगले चौराहे से ही तो
अलग-अलग रस्ते हो जायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
पथ बदले और पथिक भी बदले,
दुनियां के सब प्राणी बदले
अपनी-अपनी राहों पर
सबको मुस्कान लुटायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।

Wednesday, July 23, 2008

महिला सशक्तिकरण की पोल खोलता पायल का यह खत

महिला सशक्तिकरण की पोल खोलता पायल का यह खत
अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त जोधपुर निवासी 26 वर्षीय पायल के खत से आपको समाज की असली तस्वीर दिखाई देगी, जिसे दैनिक भास्कर ने बुधवार, 25 जुलाई 2008 को मधुरिमा परिशिष्ट में आवरण कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। मैं दैनिक भास्कर का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए, हूबहू, इसे साभार इंटरनेट पर प्रस्तुत कर रहा हूं।
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है बल्कि सत्य से लबरेज एक मर्मस्पर्शी कथा है। ये दास्तां है हमारे देश की हर लड़की की, जो शादी योग्य हो चली है। पायल की कहानी केवल उसकी कहानी नहीं है बल्कि देश की लड़कियों की कहानी भी है।
मैं अपनी बात कहना शुरू करती हूं, जब मैं कालेज में थी, तब हमारी अपनी जिन्दगी होती थी। मैं, मेरे दोस्त और बहुत सारी मस्ती............ कोई जिम्मेदारी नहीं, कोई फिक्र नहीं। बस दिन भर मौज-मस्ती करना और अपने सपनों के बारे में बात करना ........... उस वक्त हर बात को लेकर बहुत उत्सुकता होती थी। हर नई चीज हम सीखना चाहते थे। उन दिनों सबके अपने-अपने सपने थे। सबसे हसीन सपना था शादी का सपना........सबके अलग-अलग सपने, ज्यादा कुछ मालुम नहीं था, बस अपनी बड़ी दीदियों को देखते थे। जब उनकी शादी होती थी तो उन्हें मिलने वाले नए कपड़े, गहने ये अट्रेक्ट करते थे। वे जब ससुराल से आतीं थीं, तो उनका जो स्वागत होता था, वो सब बहुत अच्छा लगता था। हमस ब यही सोचते थे कि जब हमारी शादी होगी, तो हमें भी इसी तरह से इन सबका प्यार मिलेगा यानि कुल मिलाकर सपनों की दुनियां सब कुछ ऐसे ही चल रहा था, जब तक कि हम लोगों का पोस्टग्रेजुएशन नहीं हो हुआ। फिर धीरे-धीरे हम लोगों का सच्चाई से सामना हुआ। आहिस्ता-आहिस्ता शादी को लेकर देखे गए, हमारे सपने एक कड़वी सच्चाई में तब्दील हो गए। पढ़ाई पूरी होने के बाद जब मैं घर में रहने लगी, तो शुरू-शुरू में तो सबकुछ ठीक रहा, फिर जब रिश्ते आने लगे तो कुछ परिवर्तन सा महसूस किया। पता चला कि शादी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है `आपका रंग´। लड़की का गौरा होना उसके सारे दोषों को छुपा देता है और रंग सांवला हो या काला तो कोई भी गुण मायने नहीं रखता। एक परिचिता ने मेरे लिए कहा था, `मैं सेकंड क्लास में भी सेकंड ग्रेड की लड़की हूं´ ये वाक्य पहला था, जिसने मुझे बुरी तरह से हिलाकर रख दिया था। इसलिए तो इसे कभी मैं भूल नहीं पाती पर यह तो सिर्फ शुरूआत थी। उसके बाद रिश्ते आने का सिलसिला जारी रहा तो आज लगता था कि शादी मेरी है, जिंदगी मेरी है, तो मेरी सोच मेरी पसंद-नापसंद ही सब कुछ होगी।



ऐसा एक बार हुआ भी था। बैंगलोर का रिश्ता था, अच्छी जानी-मानी फैमिली थी, लड़के ने एम.बी.ए. किया हुआ था। वे लोग मेरी फोटो मा¡ग रहे थे। जब हमने लड़के की फोटो मा¡गी, तो लड़के का जबाब देखिए, ``मैं कोई लड़की हू¡ क्या, जो अपनी फोटो दू¡? मेरी फोटो से क्या फर्क पड़ता है?´ मैंने कह दिया कि जिस लड़के की सोच ऐसी है, उसने एमण्बीण्एण् किया हो मैं मान ही नहीं सकती।
फिर समय गुजरने लगा और मेरी उम्र बढ़ने लगी। ये सारी बातें मेरे अन्दर चिड़चिड़ाहट भरने लगीं। पहली बार बात देखने दिखाने पर पहु¡ची। परिवार बहुत अच्छा था, लड़का दिखने में एवरेज था। उसके भी कई रिश्ते सिर्फ उसके लुक्स की वजह से नहीं हुए थे। कहने का अर्थ यह है कि वह भुगत-भोगी था। वो लोग जब मुझे देखने आये, सब बढ़िया था। जिन चाची ने रिश्ता बताया था, उन्होंने उनको हा¡ में जबाब दे दिया था, पर हमें कोई उत्तर नहीं दिया। फिर थोड़े दिन बाद पता चला कि उन्होंने रिश्ता जयपुर में तय कर दिया है। कारण था- जब वे लोग देखने आने वाले थे, तब मैंने सिर्फ ये कहा था, `मैं लड़के से एक बार मिलना चाहती हू¡, ऐसा न हो कि आप लोग बिना मुझे दिखाये हा¡ कह दें।´ मेरे पापा भी यही चाहते थे पर इस बात ने इतना बड़ा रूप ले लिया। घर में सब लोगों ने पापा को इतनी भली-बुरी सुनाई, `क्या हम पर विश्वास नहीं है? क्या जो तुम करोगे वो ठीक होगा..............? पायल में इतनी अक्ल है क्या? वो क्या देखेगी´ और न जाने कितनी ही बातें कहीं। मुझे नहीं मालुम था कि मुझे इतना भी हक नहीं कि मैं लड़के को देख सकू¡। जब उन लोगों ने ही मना कर दिया तो सारी बात खत्म हो गई। अब समाज के लोगों ने मुझे ताने मारने शुरू कर दिये। कई लोगों के तो घर पर फोन आए, `बधाई हो लड़की की सगाई कर दी और हमें बताया भी नहीं।´ मुझ से कहा गया `उन लोगों ने मना कर दिया और तेरे चेहरे पर कोई फर्क ही नहीं दिख रहा? यानि ि कवे मुझसे कहना चाह रहे थे कि मुझे रोना चाहिए क्योंकि मेरा रिश्ता नहीं हुआ।
अब बताती हू¡ जब कोई देखने आता है, तो क्या होता है- हम लड़की वाले हैं, तो सारे इन्तजाम परफैक्ट होने ही चाहिए। इसके अलावा सबकी सलाह यह पहनना, ऐसे बैठना, ऐसे बात करना, ज्यादा मत बोलना वगैरह। मतलब गलती को कोई गुंजाइश नहीं, उस वक्त हम एक कठपुतली होते है ............... । कहना होगा कि हमसे तो निचले तबके की लड़किया¡ अच्छी, जिन्हें न तो पढ़ाया जाता है, न उनमें सोचने समझने की शक्ति होती है। कम से कम उन्हें इन सब बातों का कोई असर नहीं होता। यहा¡ तो खुद की सोच रहते हुए भी ऐसे ही रहना पड़ता है जैसे हमारा कोई अस्तित्व ही न हो। हमारी कोई पहचान ही नहीं है। हमारा कोई वजूद ही नहीं है। भले ही हमारे देख में महिला सशक्तिकरण का नगाड़ा पीटा जाता है पर सच्चे मायने में स्त्री को वो दर्जा हासिल है, जो उसे मिलना चाहिए?
अभी मेरे साथ एक वाकया हुआ था। लड़के के पापा ने पूछा शादी के बाद जॉब करना चाहोगी? मैंने कहा, `हा¡, यदि मौका मिला तो।´ इस पर लड़के की मा¡ ने कहा जरूरी है क्या जॉब करना? मैंने कहा, `नहीं´। फिर दुबारा लड़के के पिता ने पूछा फ्यूचन प्लानिंग कया है? क्या सोचा है आगे?´ आपको नहीं लगता यहा¡ पर यह सवाल बेमानी था। अब बताइए मैं क्या जबाब देती? उन लोगों के जाने के बाद मेरे ताऊजी ने कहा, `तुमने उत्तर क्यों नहीं दिया?´ क्या जबाब देती क्या वाकई एक लड़की की एक सोच होती है? अपना कोई फ्यूचर होता है? शादी से पहले सब बातें पापा, भाई या मा¡ तय करते हैं, हमें निर्णय लेने की भी इजाजत नहीं होती। हम तो सिर्फ वहा¡ फैसला लेते हैं जहा¡ ये तय करना होता है कि आज क्या पहनना है? कौन से रंग का नेल पेंट लगाना है, हेयर कट कौन सा होगा, बस। बाकी सारे बड़े निर्णय बड़ ही लेते हैं और शादी के बाद पति ................ फ़िर बाद में बच्चे।
हमें तो प्यार करने की भी इजाजत नहीं होती। क्यों हमेशा परिवार की इज्जत का बोझ लड़की के सिर पर ही होता है? यदि वह अपना मनपसन्द जीवन साथी चुन ले, तो खानदान की इज्जत पर दाग लग जाता है। जब लड़का अपने माता-पिता को घर से निकालकर बाहर खड़ा कर दे, तब परिवार की इज्जत नहीं जाती?
और मिठाई कब खिला रही हो? ............... ये वाक्य जब भी घर से बाहर निकलो, 4-5 बार सुनाई देना तो मामूली बात है, ये लोगों के ताने देने का तरीका है। अब तो इतनी ज्यादा आदत हो गई है ये सुनने की कि कभी-कभी तो मै जबाब दे देती हू¡, `हमारे हाथ में नहीं मिठाई खिलाना, नहीं तो कब के खिला चुके होते ..... ?
ऐसा हर लड़की के साथ होता है- मेरी कई सहेलिया¡ हैं, उनसे जब भी बात होती है, कहती हैं, `अब तो जल्दी से जो किस्मत का फैसला है, जो जाए।´ लड़कियों को फिब्तया¡ कसने या शोषण का िशकार होने से नहीं बक्शा जाता, लेकिन बात जीवन साथी की आए, तो तमाम मापदण्ड सामने रख दिए जाते हैं। सच तो यह है कि स्त्रिया¡ महज देह हैं, जिनका हर पल, हर मोड़ पर शोषण किया जाता है। हमको तो घरवालों के शोषण का भी िशकार होना पड़ता है- लड़कियों की भेड़-बकरियों की तरह नुमाइश लगाकर।

Sunday, July 20, 2008

जो जातिवाद की नफरत की आग में देश को में झोंकते

प्रस्तुत है डाक्टर एस के मित्तल द्वारा प्रेषित रचना समय की पुकार
समय की पुकार


समय की पुकार आज की दरकार
जाग दोस्त सुन भारत माता की पुकार


जो दंगा करते हैं
जो नर संहार करते है
जो जातिवाद की नफरत की आग में देश को में झोंकते
राम- रहीम -इसा - गुरु -गाँधी -बाबा की बात करते है

इन आस्तीन के सांपो से
सावधान ख़बरदार होशियार
मेरे देश वासिओं कसलो कमर,
होजाओ त्यार

इन पापिओं को सबक सिखाना होगा
हर हथियार काम में ला इन्हें उडाना होगा


देर बहुत हो जायेगी
मानवता कराहयेगी
जब देश ही ना रहा
तो नींद कहाँ से आएगी
आज की ताजा ख़बर ...............
कश्मीर जल रहा है
काबूल आतंकियों से थर्रा रहा है

गुलाम इस्तीफ़ा दे दिल्ली चल रहा है
मनमोहन टोकियो में बुश से चोंचे लड़ा रहा है
वाम हका बका मुलायम अवसर ताक रहा है
महंगाई का नाग डस रहा किसान जहर खा रहा है
भारतमाँ का मुकट खतरे में है केन्द्र थर्रा रहा है

समय की पुकारआज की दरकार
जाग दोस्त सुन भारत माता की पुकार

Monday, July 14, 2008

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है

जो भी तुमको प्यारा है


तुमने तन ही दिया भले हो, हमने मन भी बारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

नहीं किसी से ईर्ष्या हमको

नहीं बाधंना चाहें तुमको।

हमें भले ही ना मिल पाया,

जीवन-रस मिल जाये तुमको।

हिमगिरि तब था भाया हमको, अब सागर का किनारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

नेत्रों से जल, कभी न निकसे

ह्रदय-कुमुद रहे हरदम विकसे।

अधरों पर मुस्कान रहे नित,

आप नहीं, अब हम ही सिसके।

स्वार्थों की मारी मति ने ही तो, प्रेम से छीना सहारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

मृग-मरीचिका है अब अपनी,

मरूथल में है माला जपनी।

अपनी जान जहां में खोई,

नहीं किसी की जान हड़पनी।

विस्तृत जग आमिन्त्रत करता, याद तुम्हारी कारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

क्षिति जल पावक गगन समीरा

तुम बिन कैसे भये अधीरा ?

अवशोषण नासूर बना अब,

कौन लगाये इसको चीरा?

धरा ही नहीं, आसमान भी, देखो हमने फाड़ा है।

जिसने सबको हरा दिया है, वह खुद से ही हारा है।।

जल भी, हमने नहीं बख्शा,

वायु भी फ़ैलाये गमछा।

पावक को भी बांधा नर ने,

कब तक इसका चलेगा चमचा।

प्रकृति के आड़ोलन ने ही, भय का झण्डा गाड़ा है।

जिसने सबको हरा दिया है, वह खुद से ही हारा है।।

Thursday, July 10, 2008

धर्म के नाम पर, कब तक?

कब तक?



धर्म के नाम पर,

कब तक?

सती होंगी ललनाए¡

जीवन-भर

त्रासदी सहेंगीबाल-विधवाए¡।


धर्म के नाम पर,

कब तक?

संलेखना/संथारा के द्वारा

आत्महत्याए¡

होती रहेंगी।

पढ़ने की उम्र में,

अबोध बालक/बालिकाए¡,

दीक्षा लेकर,

साधु और साध्वी बनती रहेंगी।



यश-अपयश,

लोक-परलोक के नाम पर

कब तक?

गृहस्थ जीवन को

हीन बताया जाता रहेगा।


धर्म के नाम पर,

कब तक?

शाहबानो, गुडिया ,

इमराना, लतीफ़ुन्निसा,

तलाशती रहेंगी अपना वजूद।



बाल-दीक्षित समताओं को,

शादी रचाने के लिए

कब तक?

करने होंगे

चमत्कारों के दिखावे।


धर्म में हो आस्था,

स्वेच्छया हो उसका पालन,

स्वेच्छा से बनें साधु और संन्यासी,

समाज के हित में।

न हो कोई मजबूरी,

न हो कोई दबाब,

जब चाहे,

कर सकें वापसी,

गृहस्थ जीवन में।


कब तक?

मिल पायेगी

स्वतन्त्रता

पूजा की

आराधना की!

आस्था की!

और सबसे आगे बढकर,

जीवन जीने की!

Sunday, July 6, 2008

माँ

अबला-सबला,
हँसना-रोना,
सोना-जागना,
उसको होता हर्ष,
सन्तान का उत्कर्ष।

सरल,विनीत और विनम्र,
सन्तान का सब कुछ क्षम्य,
हृदय है अगम्य,
हो जाये भ्रष्ट,
सन्तान हो ना नष्ट।

व्यष्टि-समष्टि,
सारी ये सृष्टि,
भले ही जायें,
सिद्धियां अष्ट,
सन्तान न पाये कष्ट.

Saturday, June 28, 2008

तुम नहीं हो हमारी अमानत, स्वीकार है हमें,

मुक्तक

खड़े हैं कब से चौराहे पर, नजारा ही बदल गया।
करते-करते इन्तजार, जमाना ही बदल गया।
परीक्षा लोगी कब तक? हमारे इस जीवट की,
आ जाओ एक बार, तुम्हारा हुलिया ही बदल गया।


न देखा तुमने मुड़ के, हम दीदार न कर सके।
चाहा था हमने तुमको, तुम इन्कार न कर सके।
तुम नहीं हो हमारी अमानत, स्वीकार है हमें,
नादान हैं तुम्हें छोड़कर, प्यार ना कर सके।


हमारे दिल में है क्या हम इजहार ना कर सके।
तुम बैठे हमारे सामने, हम दीदार ना कर सके।
ठोकरें ही थीं पथ में, हम थे उसी गम में,
चाहकर भी हम तुमसे, इकरार ना कर सके।

बीत गये वे दिन रावी का बह गया वह पानी।
गुलिश्ता उजड़ गया, छाई है यहा¡ वीरानी।
क्या करेगी आकर ? हे तितली! सभंल जा,
नहीं है यहा¡ राजा, न बन सकेगी तू रानी।


दर पर खड़े तुम्हारे हम घण्टी ना बजायेंगे।
तुमको खुश करने को, ना अपने को सजायेंगे।
इकरार और इंकार सब छोड़ते हैं तुम पर,
तुम्हारे गम में डूबे, नहीं अपने को बचायेंगे।


चाहा था तुमको हमने , करते रहे तुम्हें प्यार।
बीती हैं वर्षों देखो, नहीं कर सके हम दीदार।
कहा था तुमने ही, पत्थर भी हैं दुआ देते,
राष्ट्रप्रेमी बना पत्थर? आ के कर जाओ इजहार।


नहीं थी आरजू फिर भी, तुम्हें दिल में बसाया।
दिल में हमारे बैठकर, हमें ही सताया।
तुम्हारी मुस्कराहट पर जीवन है निछावर,
का¡टो में फूल खिले, जब भी तुमने मुस्काया।

Friday, June 27, 2008

जब तक चाहो तुम,साथ चलते जाना।

आगे बढ़ते जाना
जब तक चाहो तुम,साथ चलते जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

पथ के पथिक हैं, पाथेय तुम ले लो।
नदी है, नौका है, साथ मिल इसे खे लो।
कश्ती हुई पुरानी, भंवर इससे टकरायें,
धैर्य और साहस से ,तूफानों को मिल झेलो।
पथिक हैं जितने भी साथ लेके जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

समय नहीं है अब, आगे हमको बढ़ना होगा।
कष्ट आयें कितने भी सबको ही सहना होगा।
भटके हुओं की खातिर, यदि कुछ कर पायें,
राह पर लाना है तो ,पास उनके जाना होगा।
हमने तो तुमको, बस अपना साथी माना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

हवा में उड़ने की, तमन्ना नहीं रही मेरी।
मधु रस पीने की, तमन्ना नहीं रही मेरी।
श्रम और कौशल से काँटों में भी फूल खिलें,
खिलाकर, पुष्प,चढ़ाने की,तमन्ना रही है मेरी।
बगिया लगाकर के, आगे बढ़ते जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

Thursday, June 26, 2008

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।जीवन भर का प्यार चाहिए।।

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए

दहेज एक विलक्षण शब्द है। इसके उन्मूलन के लिए विभिन्न कार्यक्रम व आन्दोलन संस्थाओं द्वारा चलाये जाते हैं तो सरकारों द्वारा विभिन्न कानून बनाये जाते हैं। संस्थाओं व सरकारों द्वारा औपचारिक रूप से किए गए समस्त प्रयासों के विपरीत व्यक्तियों द्वारा अधिकतम दहेज प्राप्त करने या देने पर ही जोर दिया जाता है। यद्यपि कुछ अपवाद भी मिल सकते हैं तथापि दहेज का विरोध करना एक फैशन है और अधिकतम् दहेज प्राप्त करना या देना खान्दान की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। दहेज देते समय हम दहेज मा¡गने वालों को गरिया भी सकते हैं, किन्तु दहेज प्राप्त करना हमारे लिए किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं होता। दहेज एक ऐसी परंपरा है जिसका जितना ज्याादा विरोध किया जाता है, यह उतना ही अधिक प्रसार पाती है। वास्तव में दहेज एक शब्द नहीं शब्द-युग्म है, `दान-दहेज´। दान-दहेज इस बात को इंगित करता है कि पिता के द्वारा बेटी को दान के रूप में दहेज दिया जाता है। मूल रूप से विवाह को कन्यादान कहा जाता रहा है। दान के साथ दक्षिणा के रूप में पिता श्रद्धानुसार धन दिया जाता है। इस प्रकार दान-दहेज की अवधारणा पूर्ण होती है। दान-दहेज की अवधारणा के मूल में है बेटी को पिता द्वारा अपने घर का सदस्य न मानना, उसे पराया धन कहना। कन्या दान इसी बात को इंगित करता है कि बेटी वस्तु है और उसे दान करके पिता पुण्य का अधिकारी है। यह अवधारणा नारी को व्यक्ति के रूप में स्वीकार ही नहीं करती। बेटी को भाइयों के समकक्ष परिवार का सदस्य संपत्ति में उत्तराधिकारी ही नहीं मानती। दहेज को समाप्त करने की बात पर जितना जोर दिया जाता है, उतना संपत्ति में अधिकार देने की बात पर नहीं। दान-दहेज की आड़ में अभी तक नारी को उसके संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जाता रहा है, दहेज को संपत्ति का अधिकार दिए बिना समाप्त करना, उसके साथ घोर अन्याय करना है। नारी को संपत्ति में अधिकार देने के बाद कुछ शतािब्दयों में दहेज स्वयं ही समाप्त हो जायेगा।

प्राचीन काल से ही धर्म की आड़ लेकर नारियों को छला जाता रहा है और उसी का एक रूप है दान-दहेज। अब हम समझने लगे हैं कि बेटी भी बेटे की तरह पिता की ही नहीं, संयुक्त परिवार की संपत्ति में भी बराबर की अधिकारी हैं, इसलिए दान-दहेज की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है। लेकिन अभी तक सरकारों ने कानून बनाए हैं, उन्हें व्यक्तियों ने अंगीकार नहीं किया है। दहेज को गालिया¡ तो देते हैं, किन्तु दहेज बंद करके पिता की संपित्त में बेटी के अधिकार को मान्यता नहीं दे रहे। कानून भले ही बन गया हो किन्तु कितने लोग बेटी को उसका हिस्सा देने को तैयार हैं? कितनी बेटिया¡ इसकी हिम्मत जुटा पा रहीं हैं कि वे भाई से अपने अधिकार की मा¡ग कर सकें? कितने भाई बहन को उसका हिस्सा देकर उसके साथ प्रेम और सौहार्द्र से जीवन भर व्यवहार करने को तैयार हैं? कोई बहन बिना कानूनी कार्यवाही के पिता की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकती और कानूनी कार्यवाही के बाद भाई कह देते हैं कि अब उससे हमारा कोई रिश्ता नहीं। ऐसा ब¡टवारे के बाद भाइयों में तो नहीं होता कि आपस में उनका कोई रिश्ता ही न रहे फिर बहन के साथ सामान्य ब¡टवारा क्यों नहीं स्वीकार किया जा सकता? बेटी का पिता की संपत्ति में अधिकार देने से दान-दहेज स्वयं ही समाप्त हो जायेगा। किसी कानूनी, संस्थागत या जनान्दोलन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

जब बेटी पिता की संपत्ति में अपना अधिकार प्राप्त करके विवाह करे तो पति के साथ उसकी संपत्ति में बराबर की अधिकारी भी होगी। वर्तमान स्थिति में उसे निर्वाह व्यय के लिए भी पापड़ बेलने पड़ते हैं, जबकि निर्वाह व्यय देने की बात ही कहा¡ आती है? वह अपने पति के साथ समस्त संपत्ति में परिवार के एक सदस्य के रूप् में अधिकारी होनी चाहिए। बेटे-बेटियों को मा¡-बाप द्वारा भेदभाव रहित प्यार-दुलार मिले, उनका पालन-पोषण भेदभाव रहित वातावरण में हो, िशक्षा के अवसर देकर दोनों को ही विकास के अवसर मिलें और समय आने पर दोनों को ही पारिवारिक सदस्य होने के नाते पारिवारिक सम्पत्ति में भाग मिले। शादी के बाद परिस्थितियों को देखकर पति-पत्नी निर्धारित करें कि स्थाई रूप से उन्हें पत्नी या पति के पैतृक स्थान किस स्थान पर रहना है। नर-नारी की प्राकृतिक भिन्नताओं के बाबजूद अपनी-अपनी प्रकृति, आवश्यकताओं व क्षमताओं के अनुरूप उन्हें अपने-अपने कौशल के विकास के अवसर मिलें ताकि वे समाज के लिए अच्छे से अच्छा कर पायें। समान क्षमताओं व अधिकारों से सम्पन्न स्त्री-पुरूष पति-पत्नी के रूप में मिलेंगे तो उनमें अधिक सामंजस्य व प्रेम होगा और हम एक आदर्श समाज की और बढ़ सकेंगे। सभी के लिए अवसर मिलने पर समानता के संघर्ष से भी बचा जा सकेगा, जो किसी भी दृिष्ट से समाज के लिए उपयोगी नहीं है। समान अवसरों की अवको व्यवहार में लागू कर देने से दहेज अपने आप समाप्त हो जायेगा। दहेज और संपत्ति का ब¡टवारा दोनों को साथ-साथ लेकर चलना होगा। संपत्ति में अधिकार के साथ-साथ मायके व ससुराल दोनों ही स्थानों पर परिवार के सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी। आज की नारी की यही मा¡ग है:-

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।

जीवन भर का प्यार चाहिए।।

Tuesday, June 24, 2008

अविश्वास भरा विश्वास, सन्देह भरा समर्पण,

आपका हंसता हुआ वो चेहरा याद आता है,

होठों का मुस्काता गुलाब, अब भी याद आता है।


मधुरता लिए हुए वो गुस्सा था कितना मनोहर,

नयनों में बसा वो प्रेम, अब भी याद आता है।


मुस्कराने की वो अदा, वो ढलती हुई जवानी,

इंकार में छिपा आमंत्रण, अब भी याद आता है।


कुछ भी करने की चाहत, वो संदेहों के घेरे,

साथ निभाने का वायदा, अब भी याद आता है।


अविश्वास भरा विश्वास, सन्देह भरा समर्पण,

लोक-भय भरा आलिंगन, अब भी याद आता है।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

प्रेम नहीं कर पाओगी

वणिक बुद्धि हावी है तुम पर, दिल की नहीं सुन पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

पढ़ने-लिखने भर से कोई,श्रेष्ठ नहीं बन जाता है।

आत्मसात कर करे आचरण,वो ही कुछ कर पाता है।

हमने सब कुछ कह डाला है, तुम भी क्या कुछ कह पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

तुम्हे पाने की चाह नहीं थी, स्वार्थ भरी यह राह नहीं थी।

तुम्हारी खुशियों की खातिर ही, हमने तुम्हारी बा¡ह गही थी।

जाते हुए यह दुख है , केवल तन्हा कैसे रह पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

काश तुम्हें खुशियां दे पाते, प्रेम तुम्हारे से मिलवाते।

तुमको जीवन रस मिल जाता,शायद हम भी खुश रह पाते।

सोचा था तुम बनोगी साथी, लेकिन तुम ना बन पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

Monday, June 23, 2008

विचार करें और बतायें

महाराष्ट्र से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका लोक-यग्य के अप्रैल-जून २००८ के अंक के सम्पादकीय में सुप्रसिद्ध कहानीकार अमरकान्तजी की दयनीय स्थिति को उजागर किया गया है कि वे आजकल अपने गांव में दाने-दाने को तरस रहै है. इसी प्रकार का एक समाचार २००६ में बिहार के बढईया के कवि श्री कान्त प्रसाद सिंह का भी मिला था. इस प्रकार के उदाहरण साहित्य-जगत में भरे पढे हैं. भावनात्मक रूप से यह विषय साहित्यकार की सहायता की मांग करता है किन्तु यह प्रश्न भी उठ्ता है कि सन्सार को सीख देने वाला एक बुध्दिजीवी इतना असहाय क्यों हो जाता है कि उसे रोटी के लिये हाथ फ़ैलाना पडे? मेरा विचार है साहित्य जीविकोपर्जन का साधन नहीं है, यह केवल एक शौक, एक जज्बा है समाजसेवा जैसा. इसको समाज सेवा की तरह ही लेना चाहिये, इससे जो आजीविका कमाना चाहेगा, उसका ऐसा ही हश्र होगा. यद्यपि कुछ लोगों ने साहित्य से मलाई भी उडाई है किन्तु वे अपवाद हैं और साहित्य की राजनीति करने वाले रहै हैं. सामान्य सहित्यकार के लिये यह संभव नहीं है. वर्तमान समय मैं हिन्दी के कवियों से तो छापने के भी रुपये मांगे जा रहै हैं, पुरस्कार बेचे जा रहै हैं, ऐसी स्थिति में विचारणीय है कि अलग आजीविका का साधन रखकर ही इस मार्ग पर बढा जाय ताकि हमको रोटी के लिये दान या भीख के लिये हाथ न फ़ैलाना पढे.

Sunday, June 22, 2008

मेरी चाहत का जनाजा

मुक्तक
मेरी चाहत का जनाजा

मेरी चाहत का क्या जनाजा निकाला है तुमने,
मेरी गलतियों का अहसास कराया है तुमने,
मैंने तुम्हें अपना मानने का भ्रम पाला था जो,
गलत था, खुबसूरती से आभास कराया है तुमने ।


तुम्हारे सोने,जागने,बतियाने का साक्षी होता था मैं,
तुम्हारे पढ़ने,पढ़ाने, हरषाने का चिन्तन करता था मैं,
न समझा, न जाना, न पहचाना,इसमें मेरा क्या दोष?
तेरे हित में प्रबंधन हर-पल किया करता था मैं।



मैं आया था सीख देने,सीख लेकर जा रहा हूँ ,
निज नियम,सिद्धांत,कार्यविधि गलत पा रहा हूँ,
तुम्हारी दृष्टि में, निर्दयी था,छुटकारा तुमको देकर,
पथ में विछी हों कलियां, दुआएं देता जा रहा हूँ।


तुमको छोटा,ना समझ,नादान समझ बैठा था मैं,
न थी इच्छा-शक्ति, सामर्थ्य,विवेक,जो मान बैठा था मैं,
चाहा था स्वच्छन्दता से जीना,बाधक बन बैठा था मैं,
हो सके तो माफ करना,गलतियां जो कर बैठा था मैं।


अनिश्चित, दुर्गम, नीरस यात्रा, दुआएं, देता जा रहा हूँ मैं।
अविरल,अनविरत,निर्भय बढ़ो,कामना करता जा रहा हूँ मैं।
अबाधित,अकण्टक,अभयता,असीमितता हो, विकास पथ पर,
चिर प्राप्त्याशा,फलागम हो तुझे,तू रह सुखी, जा रहा हूँ मैं।


चहुँ ओर सुख की छाया, सरस हो तुम्हारा जीवन,
कुसुम पूरित हो पथ,पल-पल पाओ पराग संजीवन।
कण्टक,कष्ट,कठिनाई,मिल जायं मुझे,तुम्हें बहारें,
जन्नत और स्वर्ग मिलें,इस भू पर ही तुम्हें आजीवन।

Wednesday, June 18, 2008

लालच का फल

मुकुंदपुर एक छोटा सा गांव था। गांव में ठाकुर रहते थे। अत: मुकुन्दपुर ´´ठाकुरों का नगला इस नाम से भी जाना जाता था। गांव के सभी लोग खेती का काम करते थे। गांव के किसानों की स्थिति सम्पन्न नहीं तो अच्छी थी यह तो कही ही सकते है। इसी गांव के पुरोहित पण्डित जी बगल के गांव में रहते थे। मुकुन्दरपुर में एक छोटा सा परिवार था जिसमें केवल दो सदस्य थे। स्वयं ठाकुर रामसिंह एवं उनकी नई नवेली पत्नी रामदेई। घर के सभी काम काज को निपटाकर वह दरवाजे पर आ बैठी थी। बेचारी करती भी क्या ? ठाकुर रामकिसं भोर पांच बजे ही खेत पर निकल जाता था। ठकुराइन को दोपहर बारह बजे खाना खेत पर पहुंचाना होता। सुबह का कलेवा पहुंचाने के लिए ठाकुर मना ही कर गया थ। ठाकुर ठकुराइन को बहुत स्नेह करते थे। खेत दूर था। अत: उसे बार-बार परेशान करना उचित न था।सुबह सुबह पण्डित जी घोड़ी पर सवार गांव में आ गये, जरूर अगले गांव में जा रहे होगें। पण्डित जी को प्रणाम कर घोड़ी से उतर कर विराजने का आग्रह किया। पण्डित जी रस पानी पीकर ही आगे बढ़ो, पण्डित ने ठकुराइन के स्नेह अभरे आग्रह को ठुकराना उचित न समझा। पण्डित जी ने घोड़ी दरवाजे पर बांधी तब तक ठकुराइन पण्डित जी के लिए आंगन में चारपाई डालकर घोड़ी के आगे घास डल चुकी थी। गांव के सीधे-सादे लोग पण्डित जी के साथ-साथ पण्डित जी की घोड़ी को भी पूज्य समझते थे। पानी-वानी पिलाय के व कुशल-क्षेम पूछने के बाद ठकुराइन बोली महाराज, ``आप तो भूत, भविष्य, वर्तमान सब जानते हो, सो कृपा करिके हमारे दिन देख कर यह बताओें कि हमारे उनके और मेरे दिन कैसे चल रहे है। पण्डित जी ने पहले तो थोड़ी सी ना नूकर करी। लेकिन जब ठकुराइन ने पण्डित जी के चरणों में सवा पांच रूप्ये रख दिये तो पंचाग निकाल कर दिन बताने लगें।पण्डित जी बोले, ´´ठकुराइन और तो सब ठीक है, किन्तु आज को दिन तेरे लिये ठीक नहीं। शनि और राहू को योग है पिटाई होइवे की सम्भावना अधिक है। बेचारी ठकुराइन घबड़ा गई। वह आज तक ठाकुर के यहां बडे़ ही प्रेम पूर्वक रह रही थी। वह घबड़ा कर पण्डित जी के चरण पकड़कर बोली।´´महाराज जब आपने इतनी कृपा करी कि हमारे घर पर पधारे और दिन बतायें। आप तो बहुत ही विद्वान है। याको कोई न कोई उपाय भी अवष्य होइगो। कृपा करिके उपाय बताओं। पण्डित जी महाराज पहले तो कुछ चिन्तित हुए किन्तु अचानक उनकी आंखों मे चमक आ गई। आज के दिन के लिए किसी ने पण्डित को निमन्त्रण भी नहीं दिया था। अत: उन्होंने सोेचा आज का निमन्त्रण पक्का कर लिया जाय।पण्डित जी गम्भीर होते हये बोले, ``ठकुराइन शनि को प्रकोप कठिन है इस से बचने को उपाय तो है। लेकिन तू कर नहीं पायेगी।ठकुराइन कुछ आष्वस्त होकर बोली `` महाराज बताओं तो सही ऐसो कौन सौ उपाय है, जाय मैं करि नाय सकूं।``पण्डित जी बोले ठकुराइन `` आज की तिथि में अगर काऊ विद्वान ब्राह्मणको भोजन करा दे तो तेरे ऊपर से शनि को प्रकोप टल सके। अब मैनें तौकू उपाय बताय दियो, अब मैं चलू हु¡।ठकुराइन ने तुरन्त पण्डित जी के पैर पकड़ लिये `` महाराज ये कोई कठिन काम नाय¡, हमा तुम्हारे जिजमान है। यह तो आप जानो कि हम आपके सिवा और काहू कूं नाय बुलावें। यह तो आप देख ही रहे हो कि घर से ठाकुर साहब है नाय। आपको बुलाइवे कौन जावेगा। कृपा करिके दस मिनट ठहरो। दूध गर्म हो रहयो है वामे चावल डाल के खीर बनाऊ¡। कढ़ाई में घी देकर पूड़ी निकालू¡।पहले तो पण्डित जी राजी न हुए किन्तु जब ठकुराइन ने अधिक आग्रह कि तो उसकी मजबूरी को समझकर बोले, अच्छा मैं यहा¡ बैठो हु¡, तू जल्दी कर सब्जी बनाइयो मत, नहीं तो देर लगेगी। खीर में चीनी अधिक डाल दियो। मैं वाई ते पूड़ी खइ लुंगो। पण्डित जी को चारपाई पर बिठाकर पण्डित जी के लिए ठकुराइन रसोई बनाने लगी। दूध गर्म था चावल डाल दिये, खीर बनने में कोई देर नहीं लगी। आटा भी बना हुआ था तुरन्त पूड़ी भी बनाली। थाली लगाते समय चीनी डालने में ठकुराइन ने कंजूसी की, व पण्डित जी को भोजन कराने बिठा कर पड़ोस से सब्जी लेने चली गई।पण्डित जी को कम मीठी खीर अच्छी न लगी। वह ठकुराइन को मन ही मन गाली देने लगे। फिर यह सोचकर ठकुराइन नेजिस बर्तन में से चीनी डाली थी वह रसोई में ही रखा है। उसमें से उठकर चीनी डालने में कोई हानि नहीं पंडित जी अपने स्थान से खड़े होकर रसोई में गये। रसोई में एक जैसे दो बर्तन थे एक में तो चीनी थी एक में नमक, पण्डित जी ने नमक को ही चीन समझा और मन भरक चीनी डाली।पण्डित जी ने जब पुन: आकर भोजन प्रारम्भ किया तो खीर मु¡ह में भी रखी जाये। पण्डित जी चक्कर में पड़ गये। आधी छोड़ एक कू धायें, दोनौ में एक भी ना पाये। अब क्या किया जाय ? यह खीर नहीं खाई जा रही है। अत: पण्डित जी ने खी को फेंकने का निर्णय लिया। फेंकने की भी समस्या पण्डित जी खीर फेंकने का स्थान देखने लगे। ठाकुर के आंगन में एक कुआ था। पण्डित जी ने तुरन्त सोचा क्यों न यह खीर कूए में डाल दी जाय। पण्डित जी ने खड़े होकर कूएं में खीर डालने का काम किया कि खीरके साथ पण्डित जी के हाथ से थाली भी छूटकर कूंए में जा गिरी।क्या किया जाय ? ठकुराइन आ गई तो चक्कर पड़ जोगा यह सोचकर पण्डित जी ने थाली निकालने के लिए कूए में उतरने की योजना बनाई। पण्डित जी ने रस्सी कूए के पास बांधी व उसे पकड़ कर कूए में उतरने लगे। रस्सी काफी पुरानी थी पण्डित जी का दुभाZग्य पण्डित जी के नीचे पहूंचने से पहले ही रस्सी टूट गयी खैर भगवान का शुक्र था पण्डित जी को कोई चोट नहीं आयी।ठकुराइन को पड़ोस से सब्जी लाने में देर हो गई, जब ठकुराइन सब्जी लेकर वापिस आई तो वहां पण्डित जी को न देख सन्न रह गयी। ठकुराइन पण्डित जी को इधर-उधर देखने लगी। घोड़ी अभी तक दरवाजे पर खड़ी घास खा रही थी अत: पण्डित जी के जाने का तो सवाल ही नहीं था, वह बैचेनी से इधर-उधर देखने लगी ठकुराइन की नजर अचानक कूऐ की तरफ गई तो पण्डित जी के जूते एवं बंधी हुई रस्सी दिखाई दी। पण्डित जी को कूऐ में आवाज लगाई तो पण्डित जी बोले, `` ठकुराइन कोई रस्सी लेके पहले मोकू निकाल लें, बाद में बात बताऊ¡गो।ठकुराइन ने घर में से नई रस्सी निकाली व रस्सी पकड़ कर कूएं की मेढ़ पर खड़ी को गई। पण्डित जी को कूएं से निकलने की जल्दी थी उन्होंने यह ध्यान नहीं दिया कि ठकुराइन ने रस्सी बांधी है या नहीं। पण्डित ने जैसे ही रस्सी पकड़ी ठकुराइन झुक कर तो खड़ी ही थी झटके के साथ कूएं में जा गिरी। किन्तु इतनी भगवान की कृपा थी कि अब भी ठकुराइन या पण्डित जी के कहीं चोट नहीं आयी थी।ठकुराइन व पण्डित जी दोनों को कूए में काफी समय हो गया दोपहर का एक बज चुका था। खेत पर ठाकुर रामसिंह ठकुराइन का इन्तजार करते-करते परेशान हो गया तो अपने बैलों को पेड़ से बांध पैना (बैलों को छांकने वाला) लेकर अपने घर आया। दोपहर का समय था। ठाकुर का मुंह गुस्से से लाल हो रहा था। किन्तु दरवाजे पर पण्डित जी की घोड़ी को देखकर कुछ आश्वस्त हुआ। कोई बात नहीं पण्डित जी आ गये है। इसी कारण से से ठकुराइन खेत पर न आ सकी। ठाकुर पण्डित जी का बहुत आदर करता था रामसिंह घर में घुसा तो दखा दरवाजा खुला पड़ा है किन्तु ठकुराइन व पण्डित जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे। वह रसोई में गया तो खीर पूड़ी बनीं रखी है। ठाकुर रामसिंह अब झल्लाता हुआ ठकुराइन को खोजने लगा।क्ाफी देर बात रामसिंह की नजर कूएं पर गई। उसने रस्सी लटी देखकर आश्चर्य से कूएं में देखा। ठकुराइन व पण्डित जी को कूएं में देखकर ठाकुर के गुस्से का ठिकाना न रहा। पूरा घर छोड़कर इनहें रंग-रेलिया¡मनाने के लिये कुआ मिला। पण्डित जी इतने नीच होगें आज से पहले उसने कभी सोचा भी न था। वह गुस्से में हाथ में पैना लेकर ही कूएं में कूद पड़ा। ठाकुरो का गुस्सा तो प्रसिद्ध होता है। उसने गुस्से में पण्डित ही व ठकुराइन को लहूलुहान कर दिया। इसके पश्चात ठाकुर ने जैसे तैसे उन दोंनो को कूए से बाहर निकाला।बहर निकालने के पश्चात बोला, ´´पंण्डित जी महाराज अब बताओ का बात भई हती।``पण्डित जी ने कहा, ´´ भइया ठकुराइन को पिटवे को योग हो। मैंने लालच किया बाकी सजा मिली, लेकिन अब बात कू मत पूछौ।ठाकुर रामसिंह बोला, ´´ पण्डित जी महाराज बात तो बतानी ही पड़ेगी। बिना बात बतायें जाने नाय दु¡गो। पण्डित जी ने सारा किस्सा सुनाया और बोले ठाकुर अगर ठकुराइन ने खीर में चीनी डालवे में लालच नाय¡ किया होतो या मैंने लालच न कियो हा तो काउकी पिटाई नाये होती। लालच का फल बुरा होता है।

Tuesday, June 17, 2008

सरकारी कर्मचारी

सरकारी कर्मचारी

रिश्वत लेते कर्मचारी को,

अधिकारी ने पकडा

पहले तो जा जकड़ा,

फिर चिल्लाकर कहा

बेईमान रिश्वत लेता है,

हमको कुछ नहीं देता है,

कार्ड लिया झटक

लिखने लगे रपट

पहले नाम और पता लिखाया

तारीख तीस थी तीस हजार पकडाया

अधिकारी थोडा सकुचाया,

थोड़ा मुस्काया बोला,

पहले क्यों नहीं बताया?

बेकार में इतना सताया

राष्ट्रप्रेमी राष्ट्रकार्य करो,

हिचकिचाना नहीं,

सरकारी आदमी होकर,

सरकार से सकुचाना नहीं।

Sunday, June 15, 2008

अपराधियों का निर्माण अपराधियों का निर्माण

अपराधियों का निर्माण

आज जग्गू धीरे-2 सीधा चला जा रहा था, वह गा¡व छोड़कर कल भागा था। कल से लगातार चलते-चलते थक गया है। गर्मियों के दिन हैं, नंगे पैर हैं पानी के कहीं दशZन नहीं है आ¡खों में निद्रा है या बेहोशी पता नहीं। कुल मिलाकर जग्गू को आज सान्त्वना है वह जानता है कि वह आज जिस रास्ते पर जा रहा है। उसके माध्यम से वह अपनी बहन के हत्यारों से एक न एक दिन बदला अवश्य ले लेगा।उसे इन्तजार है उस दिन का जब चम्बल की घाटी में नये डाकू जग्गू का नाम गू¡जेगा। जब जग्गू चार वषZ का था तो उसके माता पिता उसे एक शरीफ, सज्जन एवं प्रतििष्ठत (जिसकी समाज में इज्जत हो) आदमी बनाना चाहते थे। मा¡ बाप के आशीZवाद एवं अपने परिश्रम से जग्गू शहर का माना हुआ डाक्टर बन गया। आज उसके पास बड़ी दूर-2 से मरीज आया करते थे। मा¡ बाप के सामने ही जग्गू ने घर की स्थिति सभा¡ल ली थी। जग्गू के माता पिता एवं स्वयं जग्गू भी प्रसन्न था। जिस दिन जग्गू के माता पिता का स्वर्गवास हुआ था जग्गू फूट-फूटकर रो पड़ा था। माता-पिता द्वारा दिये गये प्यार को जग्गू कैसे भुला सकता था। जग्गू के एक छोटी सी बहन थी। जग्गू उसे बहुत प्यार करता था, वह उसकी प्रत्येक इच्छा की पूर्ति करने को तत्पर रहता था। जग्गू प्यार में अपनी बहन को पिंकी कहकर पुकारा करता था। वैसे उसकी पूरा नाम प्रेमलता था। जग्गू ने पिंकी को कालेज में दाखिल कर दिया था। वह प्रतिदिन सुबह साढ़े नौ बजे पिंकी को कालेज छोड़ने एवं साढ़े तीन बजे वापस लेने उसके पश्चात ही वह क्लीनिक पर पहु¡चता। वह पिंकी को किसी भी प्रकार कष्ट नहीं होने देता। पिंकी अपने भाई को भाई ही नहीं पिता के समान मानती थी। वह उसका अत्यन्त आदर करती थी। उसे अपनी बहन से ही प्यार नहीं था उससे भी अधिक अपने कर्तव्य से प्यार था। वह एक अच्छे व समाज सेवी डॉक्टर के कर्तव्यों को भली प्रकार जानता व पालन करता था। वह प्रत्येक मरीज की देखभाल इतनी तन्मयता के साथ करता कि उस समय वह अपने को भी भूल जाता। वह जानता था कि डॉक्टर का कर्तव्य होता है मरीज की जी जान से सेवा करें भले ही मरीज उसका दुश्मन ही क्यों न हो। इसी कर्तव्यनिष्ठा के कारण जग्गू आज सम्पूर्ण शहर में मशहूर था। एक प्रतििष्ठत डॉक्टर होने के नाते जग्गू का सम्र्पक अक्सर बड़े-2 अधिकारियों से होता रहता था। जग्गू अपने कर्तव्य पालन में व्यस्त रहता उसे अधिकारियों से कोई लगाव नहीं था। वह स्वयं कर्तव्य पालन करता था उसी प्रकार चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करे। इस वषZ जग्गू के यहा¡ नये जिलाधिकारी ट्रान्सफर होकर आये। जहा¡ तक अनुभव था पुराने जिलाधिकारी के समय जिला प्रशासन व्यवस्थित रूप से चलता था। नये जिलाधिकारी के आते ही प्रशासन का स्तर गिरने लगा था। जग्गू को सुनने को मिलता कि फल¡ा स्थान पर ``निर्दोष राहगीर को पुलिस ने पीटा।´´ या फला¡ स्थान पर कुछ लोगों ने अबोध बालिका के साथ बलात्कार किया-----फला¡ स्थान पर-----। जग्गू ऐसे समाचार सुनकर या पढ़कर दु:खी होता लेकिन वह क्या कर सकता था। पुलिस ने प्रत्येक दुकानदार से मासिक चौथ वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। कोई दुकानदार पुलिस द्वारा वसूली का विरोध करता तो पुलिस उसे थाने पकड़कर ले जाती और झूठे मुकदमे मड़ देती। बेचारे निर्दोष नागरिकों की परेशानिया¡ बढ़ती जा रहीं थी। एक दिन जग्गू अपने चिकित्सालय से पिंकी को लेने कालेज जा रहा था कि रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी और वह पिंकी को लेने देर से पह¡चा । वह कालेज के गेट पर पहु¡चा ही था कि उसने पिंकी की चिल्लाने की आवाज सुनी वह चौंका उसने सामने ही एक युवक, पिंकी को जबरन अपनी गाड़ी में बिठाने का प्रयास कर रहा था उसके साथ चार गुण्डे और थे। जग्गू का चेहरा क्रोध से लाल पड़ गया वह अपनी गाड़ी खड़ी करके उस युवक के पास पहु¡चा ही था कि युवक के साथियों ने जग्गू को पकड़ लिया और धक्का मारकर एक तरफ गिरा दिया। वह बदमाश जग्गू की बहन को आ¡खों के सामने ही उठाकर ले गये जग्गू रोक न सका। जग्गू पागल सा हो गया वह क्या करे समझ में नहीं आ रहा था। उसे उठने सोचने व निर्णय पर पह¡चने में लगभग आधा घण्टा लगा, वह गाड़ी स्टार्ट कर के थाने की ओर चल दिया। थाना कालेज से एक किलोमीटर दूर था कि उसे गड्ढे में अस्त व्यस्त कपड़ों में पिंकी दिखायी पड़ी वह मानो पागल हो गया था गाड़ी रोककर उसे देखता ही रहा तब तक पिंकी आकर उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। उन पा¡च गुण्डों ने पिंकी के साथ बलात्कार किया था। वह चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थी भैया अब तुम कुछ नहीं कर सकते थाने न जाओ वह एक बड़े पुलिस अधिकारी का पुत्र है। किन्तु जग्गू कानून को इतना गिरा हुआ न समझता था वह पिंकी को साथ लेकर थाने पहु¡चा। उसने लाख मिन्नत की थानेदार की किन्तु थालेदार ने रिपोर्ट न लिखी। उसे थाने से धमकाकर भगा दिया। जग्गू समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। एक ऐसा भाई जिसकी बहन के साथ बलात्कार हुआ हो आखिर चुप कैसे बैठ सकता था। जग्गू को उच्चाधिकारियों से कुछ आशा थी इसलिये जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक के पास िशकायत भेजी किन्तु वहा¡ से भी एण् डीण् के सिवा कुछ प्राप्त नहीं हुआ। जब जग्गू को िशकायत भेजे महीने बीत गये तो उसनेे वकील के माध्यम से मुकदमा चलाने का विचार किया व एक अच्छे वकील को फीस देकर नोटिस दिया। नोटिस पर आखिर कोई न कोई प्रतिक्रिया होनी ही थी। प्रतिक्रिया स्वरूप एक दिन जग्गू के घर पर चार सिपाही आ धमके दरवाजे पर डण्डे पीटे। जग्गू बाहर निकला तो बोले,``चल तुझे सीण् आईण् साहब ने बुलाया हे और प्रकार हो गया जग्गू के साथ मारपीट व धमकी देने का सिलसिला। अब तो जग्गू थाने पर बुलाया जाता मार-पीट कर धमकाया जाता व समझाया जाता कि वह मुकदमा वापस ले ले। मुकदमा वापस ले ले वरना हम तुझे दस्यु विरोधी अधिनियम में जेल भेज देगेंं। तेरा घर चौपट हो जायेगा किन्तु मुकदमा वापस लेने को राजी नहीं हुआ। उसे न्याय मिलने की आशा जो थी। जब जग्गू ने मुकदमा वापस लिया तो एक दिन थानेदार साहब आये और जग्गू को थाने में ले जाकर हवालात में बन्द कर दिया और सलाखों पर डन्डा मारकर विजय पूूर्ण कुटिल मुस्कान में बोले,``हमने बड़े-2 बदमाश ठीक किये हैं।´´ जग्गू किन्तु ``लातों के देव बातों से नहीं मानते।´´ रात्रि को थाने में जग्गू की खूब पिटायी की गयी और सुबह 6 बजे उसे छोड़ दिया। सुबह जग्गू घर पहु¡चा। दरवाजा अन्दर से बन्द था जग्गू ने कई आवाज लगाई व दरवाजे को पीटा किन्तु जब अन्दर से कोई प्रतिक्रिया न हुई तो अनापेक्षित आश¡का से जग्गू के चेहरे पर हवाइया¡ उड़ने लगी। पड़ोसियों की सहायता से दरवाजा तोड़ा गया। दरवाजा टूटने पर जब जग्गू बेड रूम में पहु¡चा तो वहा¡ का दृश्य देखा तो जग्गू के काटो तो खून नहीं पिकीं अस्त व्यस्त हालत में पड़ी थी उसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी पास में पिकीं के हाथ का लिखा हुआ पत्र पड़ा था जिसमें लिखा था-प्रिय भैया , अब में इस संसार से परेशान हो चुकी हू¡। एक ऐसी दुनिया में जा रही हू¡ जहा¡ स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु नहीं समझा जाता। तुम्हारे जाने के बाद वही लड़का आया था जिसने पूर्व में मेरी इज्जत लूटी थी। आज भी मेरे साथ मु¡ह काला किया और यह कहकर चला गया कि कह देना अपने भैया से लड़े मुकदमा और लड़े। भैया कानून अन्धा है तुम अब मेरी मृत्यु का समाचार भी पुलिस को न देना। तुम्हारी अभागिन पिकीं जग्गू ने पत्र पढ़ा। पत्र पढ़ते-2 उसका चेहरा कठोर हो चुका था। इस कानून से विश्वास उठ चुका था। जग्गू पिकीं की लाश को उसी हालत में छोड़कर भागा जा रहा था। भागा जा रहा था और उसके पैर चम्बल की खािड़योंं की तरफ बढ़ रहे थे।

Friday, June 13, 2008

समानता का नारा- वास्तविक समस्या?

वास्तविक समस्या ?

वर्तमान समय में नारी समस्या ,नारी सशक्तीकरण,नारी कल्याण, नारी अत्याचार, नारी मुक्ति आदि विषय किसी भी मीडिया संगठन के लिये आकषZक, मनोहारी, आदशZवादी ,सहज उपलब्ध ,सर्वस्वीकृत व अपने आप को आधुनिक प्रगतिशील सिद्ध करने में सहायक विषय हैं। इन विषयों पर प्रकािशत आलेखों, विभिन्न चर्चाओं व प्रसारित कार्यक्रमों से ऐसा आभास होता है कि भारत में अचाानक नारी पर अत्याचार बढ़ गये हैं। यदि कहीं ऐसा है भी तो उसके लिए केवल पुरूष को उत्तरदायी ठहराना उसके साथ अन्याय करना है। आधुनिक स्वच्छन्दता ही इसके लिए उत्तरदायी है। जन्म से लेकर शादी तक बेटी को दुलार से पालने वाला, बेटी की सुरक्षा व संरक्षा में अपनी जान की बाजी लगाने वाला, बेटी की िशक्षा व शादी के लिए कोल्हू के बैल की तरह काम करके व पेट काटकर धन इकट्ठा करने वाला, जीवन-पर्यन्त बेटी की इच्छा व परंपरा के अनुरूप विभिन्न उपहार पहु¡चाने वाला पिता भी एक पुरूष ही है। जबकि जन्म से पूर्व बेटा की कामना करने वाली,गर्भस्थ भ्रूण की जा¡च व नष्ट करवाने को मजबूर करने वाली या स्वीकार करने वाली ,पालन-पोषण के समय बेटा-बेटी में भेद करने वाली , शादी के बाद बहू को ताने देने वाली भी एक महिला ही होती है क्योंकि कोई भी परिवार हो घर पर नियंत्रण स्त्री का ही होता है। इसीलिए तो वह गृहिणी कहलाती है। पुरूष बेटी को दुलारता है, बहन की राखी के लिए सब कुछ न्यौछावर करता है ,पत्नी की सलाह के अनुसार चलता है तथा माता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म समझता है। अपवादों को छोड़ दें तो पुरूष स्त्री पर अत्याचार कर ही नहीं सकता क्योंकि वह नारी के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। वह जो भी करता है किसी स्त्री की सलाह, पे्ररणा, आज्ञा या जिद पर ही करता है। वह तो एक कठपुतली की तरह नारी के इशारों पर ना¡चता है। युगो-युगों से यही होता आया है और यही होता रहेगा। नारी के नयनों के एक संकेत पर अपनी जान की बाजी लगाने वाला पुरुष किस प्रकार नारी पर अत्याचार कर सकता है ? विशेष कर भारत के सन्दर्भ में, जहा¡ स्त्री के बारे में कहा जाता रहा है कि जहा¡ नारी की पूजा होती है वहा¡ देवता वास करते हैं। यही कारण है कि विदेशी नारियां भी भारतीय पुरूष से शादी करने की अभिलाषा रखतीं हैं। हो सकता है कि इस उक्ति का आज के सन्दर्भ में विशेष महत्व न हो किन्तु नारी के बिना नर का एक कदम भी चलना संभव नहीं। हो सकता है कुछ परिवारों में नारी को तात्कालिक रूप से निर्णयों में भागीदारी नहीं मिलती हो किन्तु अपवादों की कमी नहीं होती। यदि अपवादों को ही देखा जाय तो ऐसे पुरूष भी मिल जायेंगे जिनकी जिन्दगी को नारी ने तबाह कर दिया है और उसे चैन से जीने नहीं देतीं। कहने का आशय यह नहीं है कि नारी पर किसी भी प्रकार के अत्याचार नहीं हो रहे, वास्तविकता यह है कि अत्याचार तो हर जगह हर क्षण देखने को मिल जायेंगे। किन्तु अत्याचारों के लिए हमारे यहा¡ की व्यवस्था व युगों-युगों से स्थापित अंधविश्वास, कुछ गलत धारणाए¡ व कुप्रथाए¡ हैं। अगर कहीं महिला पर अत्याचार भी होता है तो महिला की सहायता करने आने वाला भी पुरूष ही होता है। मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि नारी पर किसी भी प्रकार का अत्याचार या अन्याय नहीं हो रहा है या सुधार की आवश्यकता नहीं है। सुधार की आवश्यकता तो सदैव रहती ही है।अत्याचार एवं अन्याय से केवल नारी ही पीिड़त नहीं बल्कि पुरूष भी अत्याचार झेलते हैं।किसी भी समस्या पर विचार करते समय हमें पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।नर या नारी दोनों में से किसी के प्रति पक्षपात न रखते हुए ,स्वतंत्र व खुले दिमाग से विचार करके ही हम किसी उचित निष्कषZ पर पहु¡च सकते हैं।अपनी परंपराओं को गलत सिद्ध करके ही हम अपने को सुधारक सिद्ध करना चाहें तो यह भी उचित नहीं। हमें किसी भी परंपरा,अवधारणा,मान्यता व स्थापित मानदण्डो का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं करना चाहिए। परंपराओं व संस्कृति की श्रेष्ठता व उदात्ता से किसी समाज के चरित्र का विकास व उसके नागरिकों के जीवन का निर्माण होता है। अत: हमें विचार करना चाहिए कि समाज में विभिन्न प्रकार की नयी-नयी समस्याओं के उदय का कारण हमारे द्वारा संस्कृति का विकृत किया जाना तो नहीं है। हमें विचार करना चाहिए कि समाज केिन्द्रत विचारधारा स्वार्थकेिन्द्रत क्यों होती जा रही है ? बढ़ते हुए बलात्कारों ,अपहरणों ,दहेज हत्याओं व भ्रूण हत्याओं का कारण सांस्कृतिक पतन,मानसिक विकृति व हमारी संकीर्णता तो नहीं है? नर या नारी किसी एक को इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर हम केवल बौिद्धक विलासिता की पूर्ति ही कर रहे होते हैं। हमारी कथनी व करनी में कितनी समानता है स्वयं अपने अन्दर झा¡ककर देखने की आवश्यकता है। वास्तविक समस्या का समाधान अवधारणाओं, मान्यताओं व वास्तविकता को समझे बिना संभव नहीं है। वर्तमान समय में हमने ऐसा वातावरण बना दिया है जैसे कि नर-नारी एक दूसरे के दुश्मन हों। नर-नारी को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है। प्राकृतिक रूप से ही एक-दूसरे के पूरक, प्राकृतिक मित्र व प्राकृतिक सहचर होने के बाबजूद यह धारणा बना लेना कि पुरूष महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है या महिलाओं पर अत्याचार करता है, किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। आज नारी पुरूष समानता की बात करके, नारी अधिकारों की बात करके नर और नारी को एक दूसरे का प्रतियोगी बना दिया है। परिवार, समाज व राष्ट्र समानता के लिए तराजू रखकर बैठने से नहीं चलते। सभी की मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों,सभी को िशक्षा मिलें,सभी को विकास के अवसर मिलें तथा सभी को गौरव पूर्ण मानव जीवन मिले, प्रयास इसके लिए किये जाने की आवश्यकता है। कभी भी किसी को एक दूसरे के समान नहीं बनाया जा सकता। प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति का अपना महत्व होता है। किसी को किसी के स्थान पर प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। नर और नारी की समानता की तो बात ही दूर की बात है दो नारिया¡ भी समान नहीं होतीं। प्रकृति से ही प्रत्येक वस्तु,पदार्थ व प्राणी की भूमिका निर्धारित हैं। उनकी भूमिकाओं में किसी भी प्रकार का परिवर्तन व छेड़छाड़ विनाश को आमिन्त्रत करना है। हम प्रकृति से छेड़छाड़ करके ही पर्यावरण को इतना प्रदूषित करते जा रहे हैं कि एक दिन जिन्दा रहना ही समस्या बन जाने वाला है। यदि हम इसी प्रकार चलते रहे तो पृथ्वी से जीवन समाप्त हो जायेगा। इसी प्रकार नर और नारी की भी भूमिकाए¡ प्रकृति ने निर्धारित कर दी हैं। हम उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते और करेंगे तो उसके कुपरिणाम भी भोगने पड़ेंगे। समस्या प्रकृति प्रदत्त भूमिकाओं में परिवर्तन करके और बढ़ाई जा रही है। आज स्थिति यह है कि युगों-युगों से नारी जिस मातृत्व के कारण अपने आप को गौरवािन्वत महसूस करती रही है। वात्सल्य की जो नदी उसके उर के सागर में बहती है, आज उसी को गाली दी जा रही है। वात्सल्य,ममता व प्रेम लुटाने में कितने आनन्द की अनुभूति होती है इसे एक नारी ही बता सकती है। आज कहा जा रहा है कि नारी बच्चे पैदा करने वाली मशीन नहीं है। ये किसने कहा कि नारी मशीन है। एक जीता-जागता व्यक्तित्व एक मशीन कैसे हो सकता है। मशीन बनाने के प्रयत्न तो आज हो रहे हैं। आज नारी को ही नहीं पुरूष को भी एक मशीन बनाया जा रहा है। जिस समानता की बात की जा रही है वह समानता मशीन व उपकरणों में ही खोजी जा सकती है और आज मानव को संवेदनहीन प्राणी ही बना दिया है। केवल स्त्री को ही नहीं पुरूष को भी एक मशीन बना दिया गया है। इस समानता के नारे ने ही आज परिवार जैसी आधारभूत संस्था पर ही संकट खड़ा कर दिया है। स्त्री के रूप में परिवार का जो आधारभूत स्तम्भ था केवल वही नहीं पुरूष भी भौतिकता को अधिक महत्व दिये जाने के कारण धन कमाने की मशीन ही बन गया है। पति-पत्नी,माता-पिता,बाप-बेटा,भाई-बहन,बाप-बेटी तक के रिश्तों में कुछ नहीं रह गया है। इसके लिए हमारी गलत धारणाए¡,भौतिकता की अंधी दौड़,प्रकृति के विरूद्ध समानता का नारा जिम्मेदार है। जब परिवार का आधारभूत स्तम्भ नारी भी धन कमाने की मशीन बन गई तो परिवार का अस्तित्व कहा¡ रहेगा इसका तात्कालिक परिणाम तो यही आ रहा है कि हमारे बुजुगोZं के लिए ओल्डएज होम बनाने पड़ रहे हैं। यदि बहुत शीघ्र ही हमने इन गलत अवघारणाओं, मान्यताओं, कुप्रथाओं, भौतिकता की अंधी दौड़ तथा प्रकृति विरूद्ध समानता के राग से मुक्त नहीं हुए तो क्या होगा? कल्पना करना कितना कठिन है? कहा नहीं जा सकता।

Monday, June 9, 2008

माया-मुलायम के भक्त

भक्त बन जाइये

उपदेश नीति और धर्म अगर चाहो,
विदुर रचित नीति शास्त्र म¡गवाइये,
जोश रोष वीरता की आश लेके प्यारे,
वीर शिवाजी की जीवनी पढ़ जाइये।

देखना संयोग और वियोग तो,
प्रेमी को प्रेमिका से पत्र लिखवाइये,
प्रेम की पीर को बिना भोगे जानो तुम,
घनानन्द काव्यरस डुबकी लगाइये।

यूपी की राजनीति समझना यदि चाहो,
माया-मुलायम के भक्त बन जाइये,
आरक्षण राजनीति समझने हेतु यारो,
राजस्थान में आज-कल भ्रमण कर जाइये।

Wednesday, June 4, 2008

अभागी देवी

अभागी देवी
आज जगदेव पूरी तरह निराश हो गया था। उसने मुकदमों के सारे कागजातों को फाड़कर हीटर पर डाल दिया। उसके धैर्य का बांध टूट चुका था। उसकी पत्नी रमा अन्दर बैठी रो रही थी। अभी मुश्किल से पांच वर्ष ही तो हुए होंगे शशी की शादी को। शशी रमा के एकमात्र पुत्री थी। उसके एक भाई था दिलीप, वह शशी से छोटा था। शशी को अपने माता एवं पिता का अपार प्यार मिला था। शशी के पिता ने शशी की शशी की शादी पर क्या नहीं दिया था ? शशी की शादी में अपना सारा धन खर्च कर दिया था। अपनी पुत्री की खुशी के लिये। वे यह नहीं जानते थे कि दहेज दहेज की भूख कभी शान्त नहीं होती। शशी जब पहली बार ससुराल से आयी तभी उसे कोई प्रसन्न नहीं देख पाया इसका एकमात्र कारण था शशी की उपेक्षा। ससुराल से दस हजार रूपये की मांग की गयी थी। जगदेव ने शशी की खुशी का ख्याल रखकर कर्ज लेकर ससुराल की मांग पूरी की तथा उसे ससुराल विदा किया। किन्तु ससुराल में उसे फिर भी प्यार नहीं मिला । छह महीने बाद शशी के हाथ द्वारा लिखा पत्र आया कि यहाँ पर मुझे बहुत परेशान किया जा रहा है। मुझ से यह पत्र जबरदस्ती लिखवाया जा रहा है कि मै मोटर साइकिल की मांग करूँ । इसके बाद पांच पत्र और आये तरह-तरह की धमकियां भरे। और छठंवा पत्र आया था शशी के पति द्वारा लिखित जिसमें शशी की मौत की सूचना दी थी। सूचना शशी की लाश जलाने के बाद दी गयी थी। बताया गया था कि उसने फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली। जगदेव ने वहाँ जाकर सारा वाकया जानना चाहा तो पड़ोसियों ने बताया कि शशी ने बहुत शोर मचाया था किन्तु उन्हें उसके पास तक शशी के ससुर ने नहीं जाने दिया था। मामला स्पष्ट आत्महत्या का न होकर हत्या का था। किन्तु कोई गवाह तैयार नहीं था। जगदेव ने पूरे चार साल तक मुकदमा लड़ा किन्तु न्याय नहीं मिला। आज उसका धैर्य टूट चुका था। उसके हृदय से एक ही बात निकल रही थी कि क्यों ? जन्म लेती है भारत में अभागी देवी ! क्यों यहाँ के देवताओं में समझ नहीं आता? देवियों के बिना इनका अस्तित्व संभव ही नहीं है। क्यों देवियों को उनकी पैतृक सम्पत्ति में अधिकार नही दिया जाता ताकि उनको किसी दान-दहेज की आवश्यकता ही न रहे और उन्हें किसी को दान में दिये जाने वाली वस्तु न बनना पड़े।

Sunday, June 1, 2008

मन्दिर वहीं बनायेगी

मन्दिर

चुनाव का समय,

निकट आया

परिषद को राम नाम भाया

कुछ भी हो

वह राम नाम जाप करायेगी

वोट बैंक बढ़ायेगी

राष्ट्र रहे न रहे

मन्दिर वहीं बनायेगी।

Wednesday, May 28, 2008

सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते

सुरसा के मुहँ की तरह बढ़ते वेतन व भत्ते
छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आ गई है। पहले दिन तो लोगों की प्रतिक्रिया ठीक-ठाक ही थीं, किन्तु जैसे-जैसे उनका अर्थ समझा गया आपस में विचार-विमर्श हुआ, रिपोर्ट का विरोध किया जाने लगा। कर्मचारी-गण वेतन आयोग की रिपोर्ट से सन्तुष्ट नहीं हैं। उन्हें और अधिक चाहिए। आंकडे प्रस्तुत किये जा रहे हैं कि वेतन आयोग की रिपोर्ट में लगभग 40 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिशें की गईं हैं किन्तु यह चालीस प्रतिशत की सिफारिशें कर्मचारियों को मान्य नहीं, कर्मचारियों की मांग को देखते हुए वेतन आयोग की रिपोर्ट का अध्ययन कर सुझाव देने के लिए एक और समिति का गठन कर दिया गया है, जो निश्चित रूप से और अधिक फायदा देने के लिए ही सिफारिशें प्रस्तुत करेगी। चुनावी वर्ष है। सरकार को सिफारिशें मान भी लेनी हैं क्योंकि वह कर्मचारियों के इतने बड़े तबके को नाराज करना नहीं चाहेगी। असंगठित किसान व मजदूरों पर संगठित कर्मचारी प्राथमिकता पा ही जाते हैं। दूसरी बात विधायिका व न्यायपालिका अपने वेतन-भत्तों को स्वयमेव जब इच्छा होती है, बढ़ा ही लेती हैं। ऐसी स्थिति में नौकरशाही को खुश रखना भी उनकी मजबूरी है। अन्तत: काम तो इनसे ही लेना है। जनसेवक के रूप में दिखाकर अपने स्वार्थों की पूर्ति तो इन्हीं से होनी है। अत: सरकार यह भी अपना पावन कर्तव्य समझती है कि वह अपने कर्मचारियों को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट रखे। अत: होता यही है कि सरकार कर्मचारियों के हितों की सिफारिशों को तो मान लेती है किन्तु उन पर नियन्त्रण लगाने की सिफारिशों को नहीं मानतीं। छुट्टी कम करने व काम में सुधार करने की सिफारिशों को नजरअन्दाज कर दिये जाने की संभावना अधिक है।अब एक नजर पांचवे वेतन आयोग से पूर्व के वेतन पर डाली जाय। यहा पर सभी वेतनमानों का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है और न ही व्यावहारिक। हम याद करें 1400 व 1600 से प्रारंभ होने वाले वेतनमानों को क्रमश: 5500 व 6500 के वेतनमान दिये गये थे। जो लगभग चार गुना वृद्धि थी। वर्तमान छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू होने पर इन्हें क्रमश: 13770 व 15510 रुपये 1 जनवरी 2006 से मिलेगा जो वर्तमान स्थिति में 20000 से कुछ ही कम भले रहे। वेतन में ये वृद्धि अभी हो रही हो, ऐसी बात नहीं है। सेवा अवधि के अनुसार वार्षिक वृद्धि का प्रावधान भी होता है। मह¡गाई की दर को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक छ: माह में मह¡गाई भत्ता घोषित किया जाता है। इस प्रकार छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट को लागू होने से पूर्व भी वषZ में तीन बार कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि होती रही है। एक बार वार्षिक वेतन वृद्धि के समय तथा दो बार मह¡गाई भत्ता घोषित होने के साथ 1 जनवरी व 1 जुलाई से। कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि किस कदर होती है, इसे एक उदाहरण से समझना काफी होगा। मैं एक विद्यालय में छोटा सा अध्यापक हू¡। मैंने नवम्बर 2001 में सेवा में प्रवेश किया था। प्रवेश के समय से मेरा वेतनमान 6500-200-10500 है। इस वेतनमान के अन्तर्गत मुझे प्रारंभ में दिसम्बर 2001 में 9425 रुपये मिले थे, जो दिसम्बर 2007 में 16286 रुपये हो गये थे। इस प्रकार छ: वषZ के अन्दर ही मेरे वेतन में 6861 की वृद्धि हुई। एक छोटे से अध्यापक के वेतन में वृद्धि का यह हाल है तो बड़े-बड़े अधिकारियों के वेतन में वृद्धि का अनुमान लगाया ही जा सकता है। यह स्थिति छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने से पूर्व की हैं। सिफारिशें लागू होने के बाद की स्थिति तो और भी आश्चर्यजनक होगी।कर्मचारियों में भी छोटे कर्मचारियों को झेलना ही पड़ता है। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों में भी वेतन में 1 : 12 का अन्तर दिखाया गया है। अब कहा¡ एक रुपया और कहा¡ 12 रुपये। एक रुपये पाने वाला भी सरकारी कर्मचारी और 12 रुपये पाने वाला भी सरकारी कर्मचारी। 1 जनवरी 2006 को वेतन निर्धारण के समय एक कर्मचारी को 5740 रुपये पगार मिलेगी तो दूसरे को 90000 रुपये पगार के रुप में मिलेंगे। दोनों ही सरकार के कर्मचारी होंगे। यह अन्तर लगभग सोलह गुना बैठता है। यह ठीक है कि सभी कर्मचारी समान नहीं होते और कार्य की प्रकृति के आधार पर वेतन में विभिन्नता आवश्यक है किन्तु इतना अधिक अन्तर कहा¡ तक न्यायोचित है? विचार करने की बात है। वेतन में वृद्धि के पीछे मह¡गाई की दर को आधार बनाया जाता है। मह¡गाई की दर में वृद्धि की दलील देकर विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के वेतनों में मनमानी वृद्धि हो जाती है। निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को मिलने वाले बड़े-बड़े पैकेजों को भी वेतन-वृद्धि का एक कारण प्रस्तुत किया जा रहा हैं। इसका आशय यही है कि निजी क्षेत्र में व्यवसायी वर्ग अनियिन्त्रत लाभ कमा रहा है, जो एक प्रकार से जनता का शोषण ही है। पू¡जीवादी अर्थव्यवस्था मेें व्यवसायी वर्ग अपने मुनाफे को आसमान की और ले ही जाता है।देश के आधार किसान व मजदूरों की स्थिति की चिन्ता किसी को भी नहीं है। यह ध्यान किसी को भी नहीं है कि मह¡गाई की मार उनको भी प्रभावित करती है। खाद्यान्नों की वृद्धि पर तो चिन्ता जाहिर की जा रही है किन्तु यह नहीं देखा जा रहा कि किसान के द्वारा उपभोग की जा रही प्रत्येक वस्तु की कीमत आसमान छू रही हैं, फिर उसके द्वारा उत्पादित खाद्यान्न की कीमत को लेकर ही इतना हो हल्ला क्यों मचाया जा रहा है? यहा¡ यह सुनििश्चत करने की आवश्यकता है कि खाद्यान्नों में होने वाली वृद्धि का लाभ किसानों को मिले। किसान व असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन लोगों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है जो िशक्षा व स्वास्थ्य जैसी आधारभूत आवश्यकताओं के बारे में भी सोच नहीं पाते क्योंकि उनको अभी पेट की भूख शान्त करने से ही होश नहीं है। जनता की सेवा के नाम पर मौज लेने वाले जनसेवकों को काश! जनता की भी थोड़ी बहुत चिन्ता होती तो सुरसा के मुह¡ की भा¡ति वेतन-भत्तों में होती वेतन-वृिद्ध का उपभोग करते हुए भी जनता को विभिन्न समाज कल्याण योजनाओं के अन्तर्गत दिये जा रहे अनुदानों को चट नहीं कर जाते। किसी आलेख में पढ़ा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने किसी स्थान पर कहा था कि मैं अपने कर्मचारियों को इतना वेतन देना सुनििश्चत करू¡गा कि उन्हें भ्रष्टाचार की आवश्यकता न पड़े। यहा¡ पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि भ्रष्टाचार आवश्यकता की नहीं, मनोवृत्ति की उपज है। जिस प्रकार वेतन व भत्तों में वृद्धि हो रही है, उसी प्रकार भ्रष्टाचार में भी वृद्धि हो रही है। क्योंकि व्यवस्था लागू करने वाले लोग ही भ्रष्टाचार के संरक्षक हैं। इस स्थिति पर नियंत्रण न किया गया तो शीघ्र ही देश में अराजकता पैदा होने की संभावना बलवती होगी। ज्यों-ज्यों असमानता बढ़गी, त्यों-त्यों जनता में असंतोष बढेगा और सामाजिक सोहार्द्र की स्थिति खराब होगी। अत: अच्छा यही होगा कि सामाजिक मुद्दों को सामाजिक स्तर पर ही हल किया जाय। बढ़ते हुए वेतन-भत्तों को नियंत्रित किया जाय। न्यूनतम् मजदूरी अधिनियम से काम नहीं चलता, उसके साथ-साथ अधिकतम मजदूरी अधिनियम भी बनाया जाय।

Tuesday, May 20, 2008

आतंक का मौसम

आतंक का मौसम

आतंक का मौसम आया रे! आतंक का मौसम, भारत में बहार है। सभी को वोटों की दरकार है। भारत हो या पाक दोनों और खींचातान है। आतंकवादियों पर किसी की नहीं लगाम है। सभी आतंक को करते सलाम है। परवेज मुशरफजी के हाथ से निकल चुकी कमान है। मजबूरी में ही सही, अमेरिकी दबाब में आतंकवादियों के विरुद्ध मुशरफजी ने कुछ उठाये थे कदम। आज मुशरफजी खुद ही हो चुके हैं बेदम। गिलानी हो या जरदारी, नवाज शरीफ से हार न मानी। जज करने में बहाल, सभी को आ गयी नानी याद। आतंकवादियों से किया समझौता। स्वात घाटी का कर दिया सौदा। सरकार ने दी गांरटी नहीं करेगी, उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही, उनको भी वायदे की याद दिलाई। पाक में आतंक नही मचायेंगे। सारे भारत में खेल रचायेगें। वही उनकी कर्मभूमि है। पाक में तो खानी बस पूरी हैं। भारतीय भी धर्मभीरू हैं। अतिथियों को देवता मानते हैं। वे आतंकवादियों को भी गले से लगायेंगे। भले ही संसद में सांसद मारे जायेंगे। उनके खिलाफ कोई कानून नहीं बनायेंगे। वे अहिंसक हैं, न्यायालय से फांसी बुल जाने पर भी फांसी नहीं लगायेंगे। जरूरत पड़ी तो हवाई जहाज में बिठाकर पाक में पहुचायेंगे। जहाँ से वे पुन: अपना खेल दिखाएँगे । पाक में भी अब नहीं है इनके लिए काम, भारत में भी चुनावी मौसम में इनके खिलाफ नहीं हो सकता कोई भी कठिन प्लान। बर्फ भी पिघल रही है। डगर आसन बन रही है। अत: अगले वर्षों में ये भारत में ही खून बहायेंगे। सारे भारत पर अपने आतंक का शासन फैलायेंगे।

Wednesday, May 14, 2008

सत्ता

सत्ता

भाजपा

आगामी चुनाव के बाद

सरकार अवश्य बनाएगी
राम ने साथ न दिया तो,

काशीराम, मायावती,कम्यूनिज्म

या मुस्लिम लीग को,

गले लगायेगी

क्योंकि सत्ता-सिद्धान्त के आगे
सभी मुद्दे बोने हैं,

सत्ता के लिए

राम, कश्मीर, आचार संहिता
तथा चरित्र तो खिलौने हैं।

Tuesday, May 6, 2008

चरित्र का फण्डा-कैसा है ये झण्डा?

चरित्र का फण्डा-कैसा है ये झण्डा?
भारत देश महान है। सर्वगुणों की खान है। ये मेरा हिन्दुस्तान है। जो ये नारा लगाते हैं, वे तो कम से कम महान नहीं होते। नारे लगाने से कोई महान नहीं हो सकता। राम ने हमारे यहाँ जन्म लिया इस तथ्य से हम सभी राम तो नहीं हो जाते? जिस प्रकार रावण ने हमारे यहाँ जन्म लिया तो हम सभी रावण नहीं हो जाते? वस्तुत: भूतकाल में हम क्या थे? यह महत्वपूर्ण तो है, किन्तु यह हमारी महानता का परिचायक नहीं है। हमारी वर्तमान स्थिति का आकलन वर्तमान जीवन पद्धति व आचरण से ही होगा। उस समय की सामाजिक व्यवस्था भिन्न थी। आज की भिन्न है। यदि हम उस समय की सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करें तो कुछ भी हाथ नहीं लगने वाला है, क्योंकि राम की तरह आज कोई भी गद्दी को त्यागने को तैयार नहीं है। सोनिया जी प्रधानमंत्री पद को भले ही लेने से मना कर दें किन्तु वनवास पर जाने के लिए तो कोई भी तैयार नहीं है। क्या हुआ हम कुर्सी पर नहीं बैठे, हम कुर्सी के नियामक बनकर उसको संचालित तो करते ही हैं। हो सकता है कि हम स्वयं भ्रष्टाचार न करते हों किन्तु हम भ्रष्टाचारियों का बचाव तो करते ही हैं। क्या हुआ? हम उच्च मूल्यों की बात करते हैं। हम उन मूल्यों की स्थापना के लिए कुछ भी त्यागने या भोगने को तैयार नहीं हैं। हम सत्य की बात तो करते हैं किन्तु सिर्फ चन्द रुपयों या स्वार्थ के कारण सत्य को सरे राह नीलाम करने को तैयार बैठे हैं। हम दूसरों को चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी, कुमार्गी व पापी कहते हैं किन्तु हम स्वयं यह भी विचार नहीं करते कि इन शब्दों की परिभाषा क्या है? कहीं हम भी इनकी हद में नहीं आ रहे?
एक शब्द को ही लेते हैं- चरित्र। यह सर्वाधिक प्रचलित शब्द है। देश के कौने-कौने में इसका प्रचलन देखने को मिलेगा। बड़ा व्यापक है- चरित्र का फण्डा, यह बन जाता है लोगों के लिए धंधा और चरित्रहीन ही उठाते हैं, इसका झण्डा। चरित्र की बात करते हैं सभी, सभी चरित्र के नाम पर करते हैं दिल्लगी। चरित्रवान का प्रमाण-पत्र सभी पा जाते हैं और चरित्रहीन होकर चरित्र के गीत गाते हैं। चरित्र की बात सभी करते हैं, किन्तु क्या कभी हम इसकी अवधारणा पर विचार करते हैं? विचार करने की बात है- क्या बिना टिकिट यात्रा करने वाला, क्या पंक्ति तोड़कर आगे जाने वाला, क्या धनराशी लेकर भी यात्री को टिकिट न देने वाला, क्या परीक्षाओं में नकल करने वाला, क्या परीक्षाओं में नकल कराने वाला, क्या रिश्वत लेने वाला, क्या रिश्वत देकर सार्वजनिक सेवा में स्थान पाने वाला, क्या मिलावट करने वाला, क्या पड़ोसी को धोखा देने वाला, क्या जाति के आधार पर वोट देने वाला, क्या भाषा के नाम पर दंगे भड़काने वाला, क्या धर्म या जाति के नाम पर राजनीति करने वाला, क्या सार्वजनिक सम्पत्ति को नियमों का दुरुपयोग करके स्वयं हथियाने वाला, क्या अपने कर्तव्य में कोताही बरत कर राष्ट्र व समाज को नुकसान पहु¡चाने वाला, क्या प्रदूषण फैलाकर धरती व आसमान को ही संकट में डालने वाला आदि चरित्रवान, पुण्यवान व सदाचारी है? यदि ऐसे लोग चरित्रवान हैं तो कम से कम मेरे विचार में ऐसे चरित्रवानों से भगवान बचाये। ऐसे लोग किसी भी राष्ट्र या समाज के लिए धीमा जहर हैं जो उसे धीरे-धीरे खोखला कर रहे हैं।
दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को निश्चित समय पर गंभीरता के साथ पूरा करता है, रिश्वत नहीं लेता है, रिश्वत नहीं देता है, किसी को धोखा नहीं देता है, समाज को हानि पहु¡चाने वाले किसी भी कृत्य में सिम्मलित नहीं होता है। जिसका जीवन सार्थक व पारदर्शी है। जो न केवल स्वप्नदर्शी है, वरन् व्यावहारिक भी है( जो व्यावहारिकता के नाम पर झू¡ठ नहीं बोलता) जो कहता है, वही करता है और जो करता है वही कहता है, जो अपने कुकर्मो को छिपाकर अपना चरित्र नहीं गढ़ता है। उसके वैयक्तिक जीवन को लेकर, वे लोग जो अपने आप को उससे हीन समझते हैं, अपनी हीनता के भाव के वशीभूत उसे दुनिया¡ की नजर में से गिराने के लिए या अपने आपको श्रेष्ठ मानकर अह्म पालने के लिए उसके चरित्र को लांक्षित करते हैं। चरित्र का आशय केवल स्त्री-पुरुष सम्बन्धों से ही क्यों लिया जाता है? प्रसिद्ध व्यंगकार श्री हरिशंकर परसाई के अनुसार, `चरित्र केवल दोनों टा¡गों के बीच की ही विषय-वस्तु क्यों है?´ व्यक्ति का जो व्यवहार उसके और उसके साथी के बीच ही सीमित है, जिससे वह या उसका साथी कोई भी असंतुष्ठ नहीं है, जिससे किसी को भी कोई कष्ट नहीं है केवल ऐसे व्यवहार से तो व्यक्ति को चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है किन्तु जो लोग अपने कृत्यों से सार्वजनिक जीवन को ही कष्टप्रद बना रहे हैं, जो लोगों के प्राणों को ही संकट में डाल रहे हैं। जो वैयक्तिक स्वार्थों की पूर्ति की खातिर रिश्वत लेकर या देकर सार्वजनिक सेवाओं को ही कमजोर कर रहे हैं, जिनके कृत्यों से समुदाय का अस्तित्व ही संकट में पड़ रहा है, जो सत्ता के लिए झू¡ठ पर झू¡ठ बोले जा रहे हैं, जो दुश्मन को भी गले का हार बता रहे हैं और अपने भाई का ही गला काट रहे हैं। इस प्रकार के लोग कैसे चरित्रवान हैं? विचार करने की बात है।
सार्वजनिक जीवन की अपेक्षा वैयक्तिक जीवन की शुचिता या योन व्यवहार को ही व्यक्ति के मूल्यांकन का मापदण्ड क्यों माना जाता है। यह मापदण्ड व्यक्ति को सबल बनाता है या नहीं संदिग्ध है किन्तु समुदाय को कमजोर अवश्य करता है। चरित्र को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। भ्रष्टाचारियों , मिलावटखोरों, झू¡ठ में पारंगत हस्तियों, धर्म के ठेकेदारों, आडम्बरी साधुओं, कर्तव्य विमुख नेताओं व अधिकारियों को चरित्रहीनों के खिताब से नवाज कर उनका सार्वजनिक बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता? अपनी आर्थिक मजबूरियों व सामाजिक अत्याचारों के फलस्वरुप अपनी देह को बेचकर अपनी आजीविका कमाने वाले महिला/पुरुष लोगों के अंगों को बेचकर मालामाल होने वाले सफेदपोश डाक्टरों, अधिकारियों या नेताओं की तुलना में कहीं अधिक श्रेष्ट क्यों नहीं हैं? अपने पर्दे के पीछे कुकृत्यों को छिपाने वाले महिला/पुरुषों से अपनी मजबूरियों या सामाजिक अन्याय के चलते कोठों पर कार्य करने वाले, वैश्या-वृत्ति को ही ईमानदारी से अपनी आजीविका मानने वाले व्यक्ति श्रेष्ट क्यों नहीं हैं? वास्तविकता यह है कि चरित्र के बारे में हमारी अवधारणाए¡ एकांगी है, जिन्हें व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की आवश्यकता है। जिस प्रकार श्लीलता और अश्लीलता की अवधारणाए¡ समय सापेक्ष हैं, उसी प्रकार चरित्र की अवधारणा भी एकांगी नहीं समाज सापेक्ष है या होनी चाहिए। जो व्यक्ति समाज के लिए उपयोगी व समर्पित है और जो किसी के साथ भी किसी प्रकार का अत्याचार, अन्याय व जबरदस्ती करने का विचार भी मन में नहीं लाते, ऐसे व्यक्तियों को किसी से भी चरित्र-प्रमाण पत्र हासिल करने की आवष्यकता नहीं है, खासकर ऐसे लोगों से जो स्वयं ही भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे होने के कारण चरित्रहीन है, जो वैयक्तिक स्वार्थों को सर्वोच्चता देने के कारण स्वयं ही समुदाय को हानि पहु¡चा रहे हैं, जो लोकसेवक होते हुए भी लोक का अहित करने के कारण समाज विरोधी हैं जो लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को हानि पहु¡चाकर देष को कमजोर कर रहे हैं, जो अपनी कमजोरियों के चलते समाज के उन्नयन में बाधक हैं, ऐसे लोगों के पीछे चलने की अपेक्षा, हमें ऐसे लोगों के पीछे नही, साथ चलना चाहिए जिनका सामाजिक जीवन सुचिता व पवित्रता लिए हुए है। वास्तव में चरित्र की अवधारणा ऐसे व्यक्तियों के कृत्य ही निर्मित करेंगे।

Wednesday, April 30, 2008

यहाँ वही है हंसता दिखता

स्वार्थ ही हमको नित्य रुलाता, स्वार्थ ही नित तड़फाता है।

यहाँ वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।।

तू काँटों को फूल समझ ले,

आग को ही तू कूल समझ ले

भूल हुई जो सुधर न सकती,

खुशियाँ अपनी धूल समझ ले।

जो भी बनता साथी यहाँ पर, रस लेकर उड़ जाता है।

यहाँ वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।।

हँसने वाले मिलेंगें बहुत

चंद क्षणो को साथ चलेंगे।

सुविधा जब तक दे पाए

साथ में तेरे चलते रहेगें।

जिसको तेरी चाहत होती, उसको नहीं तू भाता है।

यहाँ वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।।

मृत्यु मित्र है, आनी ही है,

प्रेम से गले लगानी ही है

स्वार्थ-दहेज की आकांक्षा क्यों?

मृत्यु-प्रेयसी पानी ही है।

दुनिया में जो प्रेम ढूढ़ता, अश्रु वही छलकाता है।

यहाँ वही है हंसता दिखता, नित रोकर जो गाता है।।

Thursday, April 24, 2008

रोता नभ ?

रोता नभ ?

रोता नभ है, पृथ्वी रोती, सागर भी व्याकुल रोता है।

प्रकृति का कण-कण, रोकर भी आशा का अंकुर बोता है।।

मुस्कान सभी को नहीं मिल पाती,

खुशियाँ नहीं किसी की थाती।

व्याकुलता हर उर में बसती,

नहीं मिले चाहत मदमाती।

कोयल अपना रोना गाती, मयूर नृत्य कर रोता है।

प्रकृति का कण-कण, रोकर भी आशा का अंकुर बोता है।।

जिन्दा जब , तक जीना होगा

अमी नहीं, विष पीना होगा।

जहाँ -जहाँ, रोतीं मुस्कानें,

रोकर भी मुस्काना होगा।

भव-सागर में प्रेम ही मोती, चुगने को लगा ले, गोता है।

प्रकृति का कण-कण, रोकर भी आशा का अंकुर बोता है।।

Tuesday, April 22, 2008

संतोषी सदा सुखी

एक मुकुन्दपुर नाम का एक गॉव था। गॉव के पास ही एक कच्ची सड़क थी वह सड़क ही मुख्यत: वहा¡ से आने जाने का एक साधन थी। उसी गॉव में राधा नाम की एक औरत रहती थी, बेचारी के एक बेटा था। वह दिन भर कड़ा परिश्रम करती तब जाकर खाने पीने की व्यवस्था कर पाती। खाने-पीने के बाद धन बचाकर बच्चे की पढ़ाई में लगा देती। इसी प्रकार मेहनत करके उसने अपने बेटे को हाईस्कूल करा दिया था। उसके बेटे का नाम था रमेश। रमेश भी पढ़ने में मेहनती था अत: वह चाहती थी कि उसका बेटा खूब पढ़े और एक बड़ा आदमी बने।रमेश को पढ़ाने के लिये राधा ने और अधिक काम करना प्रारम्भ किया और जैसे तैसे रमेश को पढ़ने के लिये शहर भेज दिया। रमेश शहर में जाकर कालेज में पढ़ने लगा। उसकी मा¡ महीने के महीने पैसे भेज देती। इसी प्रकार रमेश ने बीण्एण् किया और एक दिन उसकी नौकरी भी लग गयी।राधा को जब यह पता लगा रमेश की नौकरी लग गयी है उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। अब उसके सपने पूरे होने का समय जो आया था।

वह सोच रही थी कि अपने बेटे की धूमधाम से शादी करेगी। घर में एक बहू आयेगी तो उसे भी कुछ आराम मिलेगा। राधा एक दिन बैठी पड़ोसिन से बातें कर रही थी कि उसका बेटा कितना अच्छा है? नौकरी लग गयी है---------आदि। उसी समय डाकिया ने उसको एक पत्र दिया जो रमेश का ही था उसमें लिखा था, ``मा¡ मैनें अपने साथ की एक खूबसूरत लड़की से शादी कर ली है।´´ तुम इस बारे में न सोचना। पत्र पढ़ते-2 बेचारी राधा का तो दिल ही टूट गया। बुढ्डी हो गयी जिसकी आशा में उसके भी यही हाल। अब तो बेचारी राधा काम करने लायक भी नहीं रही। क्या करेगी वह। वह कई दिन तक अपने घर में बैठी-2 रोती रहती कई दिन तो घर से बाहर भी न निकली। उसके चार-पा¡च दिन तो बीत गये बिना कुछ खाये पीये।

एक दिन एक साधू भिक्षा मा¡गते-2 आया तो उसने बुढ्ढी को रोते हुये देखा। साधू ने राधा से पूछा कि वह क्यों रो रही है तो उसने उसे सारा दुख कह सुनाया। साधू ने कहा, ``धीरज रखो रोने से क्या होगा,´´ सन्तोष रखो सन्तोषी सदैव सुखी रहता है। यह कहकर वह चला गया। साधू के चले जाने पर वह गा¡व से बाहर सड़क के किनारे झोंपड़ी में रहने लगी। वह वहा¡ से गुजरने वालों को पानी पिलाती। कुछ समय बाद वह स्थान ही प्याऊ के नाम से मशहूर हो गयी। उसे सभी प्याऊ वाली अम्मा कहकर पुकारते वह उसे वहीं खाना दे जाते। वह अब सुखी थी चिन्ता मुक्त थी। वह सभी से कहती बेटा ``सन्तोषी सदा सुखी´´

Tuesday, April 15, 2008

का वर्षा जब कृषि सुखाने?

का वर्षा जब कृषि सुखाने

आशा का पांच वर्ष का साथ था उसके साथ, वह उसे बहुत प्यार करती थी। कितना चाहती थी वह गोविन्द को। गोविन्द ही तो उसका सब कुछ था मित्र, साथी, प्रेमी कौन था गोविन्द के सिवा जिसको आशा अपना समझती। जिस समय कॉलेज में प्रवेश लिया था तो गोविन्द से ही उसे सहारा मिला था कॉलेज में पढ़़ने का। वह ऊबने लगी थी कॉलेज की जिन्दगी से, अगर गोविन्द सही समय पर उसे न मिला होता तो वह कॉलेज छोड़कर चली गयी होती घर वापस । वही गोविन्द, जिसने उसे सबसे अधिक चाहा था, वही गोविन्द जो उसकी आ¡खों का तारा था, आज उसे अच्छा नहीं लग रहा था किन्तु फिर भी वह उसे नहीं भुला पा रही थी। वह सोच रही थी क्या यही वह गोविन्द है जिसने उससे वायदा किया जीवन भर साथ देने का। आज उसने ही कह दिया था कि तुम्हारी हैसियत मेरे लायक नहीं है। क्यों नहीं हू¡ मैं गोविन्द के लायक, क्या कमी है मुझमें? रूप-----रंग--शिक्षा सभी कुछ तो है मेरे पास ! क्या पैसा ही सब कुछ होता है? वह पूरी रात रोती विलखती रही थी कि क्यों नहीं हो सकती मैं गोविन्द के लायक? और उसने निश्चय किया था कि वह गोविन्द की हैसियत के लायक बनेगी। खूब मेहनत करेगी। खूब कमायेगी पैसा और क्या चाहिये उसे? कहा¡-कहा¡ नहीं भटकी वह नौकरी की तलाश में, कितनी कम्पनियों, फैिक्ट्रयों में दिये थे इन्टरव्यू आशा ने। किन्तु आशा को कहीं से भी आशा नहीं मिली, केवल निराशा ही हाथ लगती उसको किन्तु आशा हार मानने वाली नहीं थी। वह ढं़ूढ़ती रही नौकरी और उसे आखिर मिल गयीण् एक स्कूल में मास्टरी की नौकरी। वह परिश्रम पूर्वक स्कूल में पढ़ाती बच्चों को। केवल नौकरी से ही सन्तोष नहीं हुआ आशा को। स्कूल समय के बाद और पहले वह अपने कमरे पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी। बड़ी ही व्यस्त थी आशा। सुबह चार बजे उठना, चाय पीकर पा¡च बजे से पढ़ाना शुरू कर देती बच्चों को। पा¡च बजे से 9 बजे तक लगातार पढ़ाती रहती थी। और दस बजे से पा¡च बजे तक का स्कूल, फिर रात के दस बजे तक ट्यूशन। आशा जैसे पागल हो गयी थी। पैसा केवल पैसा ही से प्यार था आशा को। अब उसने अपना एक लैट खरीद लिया था, जिसमें वह उसके माता-पिता तीनों रहते थे किन्तु आशा की व्यस्तता में कोई कमी न थी। आशा के माता-पिता बड़ी चिन्ता करते थे उसकी शादी के बारे में, किन्तु वह तो कुछ सुनती ही न थी। उसे कार जो खरीदनी थी गोविन्द की हैसियत की बराबरी करने को। आज आशा बहुत प्रसन्न थी। आज वह नयी कार खरीदकर लायी थी। आज वह अपने को गोविन्द की हैसियत का पाकर बड़ी प्रसन्न थी। वह कार लेकर सीधे लैट पर गयी, माताजी ने भोजन करने के लिये कहा तो इन्कार कर दिया क्योंकि आज तो उसे भूख ही न थी। वह तैयार होकर सीधी गोविन्द के लैट पर पहु¡ची तो सन्न रह गयी जब उसने यह सुना कि गोविन्द यह लैट बेचकर पीछे गली में एक छोटे से मकान में पहु¡च गया है। वह पता लेकर वहा¡ गयी तो दरवाजा गोविन्द ने ही खोला। वह आशा को देखकर चौंक पड़ा। गोविन्द की शादी हो चुकने के तीन वषZ बाद उसकी पत्नी ने उसकी उदासीनता के कारण तलाक ले लिया। माता पिता का देहान्त हो गया था। आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण लैट बेचना पड़ा। वह इस दुविधा में अकेला रह गया था। पछता रहा था अपने बीते हुये कल पर। वह आशा की याद में घुट रहा था। आज आशा को देखकर चौंक पड़ा किन्तु आज आशा को पहली बार आभास हुआ था कि वह शादी की अवस्था पार कर चुकी है। जिसके लिये वह इतनी मेहनत कर रही थी उसको पाया किन्तु ``का वषाZ जब कृषि सुखाने।´´

Saturday, April 12, 2008

शिक्षक

शिक्षक
गुरू पद छोड़ा मास्टर बन गये, शिक्षा को कैसे पहचानें।
शिक्षक तो बन जाते हम सब, पर शिक्षा का मर्म न जानें।।
काम,क्रोध,पद,लिप्सा से घिर,अपने मन को कलुषित करते।
शिक्षा को व्यवसाय बनाकर,सरस्वती को नंगा करते।।
शिक्षा तो संस्कारित करती, संस्कारों को ये क्या जानें?
शिक्षक तो बन जाते हम सब, पर शिक्षा का मर्म न जानें।।
शिक्षक का पद पाकर के,वणिकों की बुद्धि अपनाते।
बच्चों के खाने को आता, कमीशन खाया,घर म¡गवाते।
असत्य भ्रष्टता स्वार्थों से घिर,व्यक्तित्व विकास,ये क्या जाने?
शिक्षक तो बन जाते हम सब, पर शिक्षा का मर्म न जानें।।
छात्रों को शिक्षा दे पाते,नव निर्माण कर वे दिखलाते।
त्याग बिना जो भोग करें नित,मानव वंश का दंश बढ़ाते।
पहले खुद को शिक्षित कर लें, शिक्षार्थी भी खुद को मानें।
शिक्षक तो बन जाते हम सब पर शिक्षा का मर्म न जानें।।

Tuesday, April 1, 2008

दहेज-पहला पति

दहेज-पहला पति

रमेश कार्यालय में काम करते-करते थक गया था। थकान भी स्वभाविक एवं नियमित होने वाली थी क्योंकि कार्यालय की आठ घन्टे की डयूटी थकान तो पैदा करेगी ही। रमेश ने अपने दरवाजे पर आते ही घन्टी बजायी। वह काफी समय प्रतीक्षा करता रहा किन्तु अन्दर से कोई हलचल नहीं हुई। पुन: घन्टी बजाने पर उमा ने कहा, `पिछला दरवाजा खुला है, पीछे होकर आ जाओ। रमेश पीछे के दरवाजे में से होकर अन्दर पहु¡चा तो उमा पलंग पर लेटी-2 पत्रिका पढ़ने में मशगूल थी मानो उसे रमेश के आने की जानकारी ही न हो। रमेश ने कपड़े उतारे, जूतों के तस्मे खोलकर जूते उतार दिये एवं कपड़े पहनने के लिये कपड़े खोजकर बाथरूम में घुस गया। कपड़े बदलने के बाद पानी पीकर उमा के पास पहु¡चा तो उसे देखकर उमा ने कहा, किचिन में खाना रखा है जाकर खालो। वह चुपचाप खाना खाने चला गया। रमेश व उमा की शादी लगभग दो वषZ पूर्व दिसम्बर में हुई थी। उमा के पिता ने रमेश के पिताजी को एक लाख रूपये नकद एवं अन्य भौतिक सुख-सुविधा का सामान दिया था। शादी के बाद से ही उमा ने कभी भी रमेश को महत्व नहीं दिया । प्रारम्भ में तो रमेश ने उमा की उदासीनता को उसका संकोच समझा था कि उसकी पत्नी का पहला पति होकर वह न होकर उसके पिता द्वारा दिया गया दहेज है।

Saturday, March 22, 2008

पूजा का प्रतिफल ?

पूजा का प्रतिफल ?

वह सुबह-सुबह घूमने जा रहा था। रास्ते में द्रुत गति से जाते मैस प्रभारी दिखाई दिए। उनके हाथ में माचिस व अगरबत्ती लगी थी। उसने उन्हें प्रणाम किया और पूछा, `सुबह-सुबह कहा¡ चले सर ?´ उन्होंने उसी गति से चलते हुए जवाब दिया, ``बालाजी के मिन्दर जा रहा हू¡, पूजा करने के बाद मैस में निकल जाउ¡गा। वहा¡ भी देखभाल करनी पड़ती है। जिम्मेदारी का काम है।Þ वह यह विचार करता हुआ कि ये सर इस उम्र में भी कितनी शीघ्रता से कामों को निपटाते हैं, उनके प्रति श्रद्धावनत हो गया। वापसी के समय वे मैस से वापस आते दिखाई दिये। उनके साथ मैस का एक कर्मचारी भी था, जिसके हाथ में सामान की एक गठरी थी। सामने पड़ते ही मैस प्रभारी व मैस कर्मचारी दोनों उसे देखकर अचकचा गये और बातचीत का मौका दिए बिना, प्रभारी जी मुख्य द्वार से अपने क्वाटर में गए तो मैस कर्मचारी ने पीछे के दरवाजे से उसी क्वाटर में प्रवेश किया। पूजा का प्रतिफल इतनी शीघ्रता से मिलता देखकर वह आश्चर्य-चकित रह गया।

मुबारक होली

चाँद की चाँदनी, बसंत बाहर।
फूलों की खुसबू, हमारा प्यार।
गाओ गीत, बिखेरो मुस्कान,
आपको मुबारक होली का त्यौहार।

प्यार के रंग से भरो पिचकारी,
स्नेह से रंग दो दुनिया सारी।
रंग न जाने भाषा, न कोई बोली,
आपको मुबारक हो, मित्रो होली।

Friday, March 21, 2008

नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की

नैतिकता- इक्कीसवीं सदी की

मैं विद्यालय से वापस लौटा ही था। पहले से ही मूड़ खराब था, रास्ते में एक घटना और घट गई( जिसने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। मैं चिन्तित हो उठा, `यह क्या होता जा रहा है, नैतिकता का पतन और कहा¡ तक होगा? आजकल के युवा दूसरों का सम्मान करना तो जानते ही नहीं, अपने मा¡-बाप व िशक्षकों तक का भी नहीं, और तो और लड़किया¡ भी इस कदर बेशर्म हो जायेंगी, आज से पचास वषZ पूर्व कोई सोच भी सकता था क्या?´ मैं इसी चिन्तन में था कि मेरा मित्र भविष्यवक्ता उपदेशक आ टपका। आते ही चाय-नाश्ते के लिए ऑर्डर दिया, गोया मेरे घर में नहीं किसी होटल में पधारा हो। मेरी और एक मुस्कान फेंकी और तुरन्त ही मेरी दयनीय स्थिति को समझते हुए बोला, `` अरे! आज फिर आपके सड़े-गले सिद्धान्तों और चौंदहवी सदी की नैतिकता का खून हो गया और आप उसका मातम मना रहे हैं? ´´ वह खिलखिलाकर ह¡सता रहा। जब मुझे अधिक गम्भीर देखा तो समझाने के अन्दाज में बोला, `` हम इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में जी रहे हैं। क्रांतिकारी परिवर्तनों की सदी- इक्कीसवीं सदी। धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक व नैतिक मानदण्डों को बदलने वाली इक्कीसवीं सदी। उन नवीन मानदण्डों को अपनाने व नई पीढ़ी के साथ समन्वय करने की क्षमता पैदा करो मेरे मित्र। इक्कीसवी सदी के अन्त तक कितना विकास हो चुका होगा, उसकी कल्पना करो मेरे मित्र। इक्कीसवीं सदी जिसमें बच्चे का जन्म मा¡-बाप के शारीरिक संसर्ग का परिणाम नहीं होगा। शारीरिक सम्पर्क तो चाहे जिससे आनन्द प्राप्ति के लिए किया जा सकेगा। लेकिन इस शारीरिक सम्पर्क के कारण बच्चे का जन्म, राम! राम! कैसी पिछड़ी बातें सोचते हो। इक्कीसवीं सदी में बच्चा पैदा करने से पूर्व गहन विचार मन्थन किया जायेगा। मा¡, वैज्ञानिक सिद्धान्तों, कार्य-कारण व परिणामों का विश्लेषण कर यह तय करेगी कि वह किस व्यक्ति के शुक्राणुओं पर कृपा कर उन्हें गर्भ में ठहरने की अनुमति दे। इस वैज्ञानिक सोच व वैज्ञानिक विचार मन्थन के पीछे एक वैज्ञानिक उद्देश्य होगा कि भविष्य में पैदा होने वाला जीव वैज्ञानिक लड़का हो। ठीक इसी प्रकार बाप भी विचार मन्थन, विश्लेषण व संश्लेषण के द्वारा यह तय करेगा कि वह किस महिला की कोख को पवित्र करे ताकि उच्चकोटि का वैज्ञानिक बच्चा ही उत्पन्न हो। किसी महिला के साथ आनन्द के लिए संसर्ग करना एक अलग बात है और अपने शुक्राणुओं से बच्चा पैदा करना एक अलग बात। हा¡, वैज्ञानिक बच्चा, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वैज्ञानिक प्रबन्धन, वैज्ञानिक प्रशासन, वैज्ञानिक श्रम, वैज्ञानिक विचार, वैज्ञानिक राजनैतिक व्यवस्था व वैज्ञानिक नैतिकता, जिसे धर्म की गन्ध तक न लगी हो( ठीक उसी प्रकार धर्म, नैतिकता व सदाचरण निरपेक्ष वैज्ञानिक बच्चा। इक्कीसवीं सदी जिसमें मा¡-बाप अपने बच्चे को प्रेरणा देंगे कि वह नौकरी करने के स्थान पर किसी ख्याति-प्राप्त राजनीतिक तन्दूरी डाकू के चमचों में अपना स्थान बनाये। मा¡, अपनी बेटी के लिए मनौती मा¡गेगी कि वह किसी लाइसेन्स सुदा वैज्ञानिक वैश्यागृह में, जिसे पर्यटन व संस्कृति विभाग से मान्यता प्राप्त हो, महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करे। वह इस सड़ी-गली नैतिकता की हवा भी अपनी पुत्री को नहीं लगने देगी। वह उसको ऐसे अत्याधुनिक वैज्ञानिक स्कूल में, क्षमा करें स्कूल में नहीं, कोचिंग सेन्टर में भर्ती कराएगी जिसमें, वैज्ञानिक आकर्षण कला (artofattrection) क्या है? कामशास्त्र तो पुरातन भारतीयता का प्रतीक है सेक्स विज्ञान का अध्ययन, वैज्ञानिक, वाणििज्यक व व्यवहारिक प्रयोग, वैज्ञानिक लाभ प्राप्त करने के लिए किस प्रकार किया जा सकता है? के अध्ययन के साथ-साथ अमेरिकन मुक्त योनाचार का प्रयोग कराने के लिए उच्च-स्तर की अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला भी हो। जिसमें प्रिशक्षण दिया जाता हो कि कैसे अपने उभरे अंगो को प्रदर्शित करके भ्रष्टाचारी नेताओं व अधिकारियों को रिझाकर उनके बिस्तर पर पहु¡चा जाता है? इक्कीसवीं सदी के अन्त में उच्च-स्तर के वैज्ञानिक विद्यालयों के विज्ञापन प्रकािशत व प्रसारित होंगे- `` अपने बच्चों के शानदार व उज्ज्वल भविष्य के लिए हमारे यहा¡ प्रवेश दिलाएं। हमारे यहा¡ अनुभवी व फर्जी डिगि्रयों से विभूषित महान झू¡ठे, महान लुटेरे, महान बेईमान, महान सैक्स विषेशज्ञ िशक्षक नियुक्त हैं। हमारे प्राचार्य महोदय तो `राष्ट्रीय झू¡ठवक्ता´ व `भ्रष्टाचार िशरोमणि´ जैसी मानद् उपाधियों से कई बार विभूषित किए जा चुके हैं। कुछ अतिरिक्त शुल्क देकर वैज्ञानिक झू¡ठे, वैज्ञानिक लुटेरे, वैज्ञानिक बेईमान, वैज्ञानिक बलात्कारी व वैज्ञानिक सैक्सकला विशेषज्ञों की सेवाए¡ भी प्राप्त की जा सकती हैं। सभी के लिए सैक्स लैब की सुविधा नि:षुल्क है, जिसमें वैज्ञानिक ढंग व वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से, प्रिशक्षित किया जाता है कि किस प्रकार संसर्गजनित रोगों से पूर्णत: मुक्त रहते हुए, निडर होकर चाहे किसी के साथ, वैज्ञानिक ढंग से शारीरिक सम्बंध बनाकर मनोंरंजन के साथ-साथ व्यवसायिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। छात्र-छात्राओं को अनुशासन के नाम पर परेशान नहीं किया जाता, उन्हें कृत्रिम प्राकृतिक वातावरण में अपनी गतिविधियों को संचालित करने के लिए पूर्णत: उन्मुक्त छोड़ दिया जाता है। ध्यान रहे हमारे यहा¡ की डिगि्रयों को अमेरिकन राष्ट्रपति सैक्स संस्थान, भारतीय भ्रष्टाचार बढ़ाओं समिति व अन्तर्राष्ट्रीय पाक आतंकवाद संस्थान द्वारा ए प्लस की मान्यता प्राप्त है।´´ उपदेशक कुछ पलों के लिए रूका, कुछ चिन्तनोपरान्त मुझे समझाने लगा। यदि तुम्हें इस शताब्दी में सफल होना है तो परम्परागत नैतिकता के लबादे को त्यागकर वैज्ञानिक नैतिकता को अपनाना होगा। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य की अपनी अवधारणाए¡ बदलनी होंगी। अवधारणायें यू¡ ही नहीं बदलतीं, इसके लिए अपने खान-पान को बदलना होगा। तूूमने सुना ही होगा, `जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन्न´। यदि तुम अपनी कमाई का अशुद्ध अन्न ही खाओगे तो तुम्हारी बुिद्ध का विकास कैसे होगा। तुम्हें शर्म आनी चाहिए, खाने की चोरी को चोरी कहते हो( यह चोरी नहीं बरजोरी है, जिसमें राधा-श्याम की होरी का मजा आता है और संसार गुणगान भी गाता है। बुिद्ध का विकास तो तभी होगा, जब तुम किसी सरकारी भण्डार का माल लूटकर खाओगे। ऐसा अन्न तुम्हारे मस्तिष्क का विकास करेगा। अपने लिए नहीं तो अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही सही, आखिर नई शताब्दी के साथ अपने आप को समायोजित करना ही पड़ेगा। नई शताब्दी ही नहीं, सहस्राब्दी भी बदल गई है और तुम हो कि चौदहवीं शताब्दी की अवधारणाओं को लिए घूम रहे हो। हमें प्रो-एिक्टव होकर एडवान्स में सब-कुछ बदलना होगा अन्यथा पाकिस्तान हमसे आगे निकल जायेगा और हम पिछड़े ही रह जायेंगे। अब तो समझना ही होगा, ईमानदार, सत्यवक्ता, समानतावादी, ध्येयनिष्ठ, महिलाओं व बुजुगोZ के लिए सम्मान की बात करने वाले पापी हैं। अपने बच्चों को इनकी छाया से भी बचाना होगा। ये सब कहना भी भयंकर गालिया¡ देने के बराबर है। आशीवार्द देना भी नए सिरे से सीखना होगा अन्यथा लोग अभिवादन करना भी बन्द कर देंगे। नई सहस्राब्दी में आशीर्वाद दिया जाना चाहिए-- अन्तर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचारी बनो, ईश्वर करे लूटमार विशेषज्ञ बनकर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करो, सैक्स व्यापार में कुशलता प्राप्त कर अन्तर्राष्ट्रीय सप्लायर बनो, अन्तर्राष्ट्रीय पाक आतंकवाद संघ के मुखिया चुने जाओ। इन्टरनेट पर जब दो महिलाओं में झगड़ा हो जायेगा तो पहली दूसरी को गालिया¡ देगी, `तेरा बेटा ईमानदार हो जाय, तेरा बेटा वास्तविक देशभक्त हो जाय, तेरे बेटे को भ्रष्टाचार में स्नातक की उपाधि न मिले, तेरी बेटी का अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक वैश्यालय का लाइसेन्स जब्त हो जाय।´ इन सब गालियों से स्वाभाविक है कि सहनशील से सहनशील महिला भी ताव में आ जायेगी। गुस्से में लाल-पीली होकर गाली बम छोड़ेगी, ``तेरी बेटी सुधारवादी नैतिकतावादी पारम्परिक िशक्षक से शादी कर ले।´´ यह सबसे बड़ी गाली होगी क्योंकि शादी करना महिलाओं के लिए अपराध की श्रेणी में गिना जायेगा तथा ऐसी महिला को प्रगतिशील महिला मंच की सदस्यता से वंचित होना पड़ेगा। शादी करने वाली ही नहीं, उसके परिवार के लोग भी प्रगतिशीलता के विरोधी समझे जायेंगे तथा समाज से बहिष्कृत होने के हकदार होंगे। इक्कीसवी सदी के अन्त तक शादी की प्रथा समाप्त हो जायेगी। शादी, वह भी नैतिकता के रोग से ग्रस्त सुधारवादी िशक्षक से। राम! राम! इससे तो अच्छा था कि वह वैज्ञानिक ढंग से आत्महत्या ही कर लेती। बेचारी! लड़की के मा¡-बाप के पास उनके मित्र लुक-छिपकर संवेदना प्रकट करने आयेंगे। छिपकर इसलिए कि उनके पास जाने के कारण, उन्हें भी प्रगतिशीलता का विरोधी न समझ लिया जाय। पाठक कृपया भूल सुधार लें, लड़की के स्थान पर महिला पढ़ें। लड़किया¡ क्या शादी करेंगी? चालीस तक की उम्र तो सीखने-सिखाने की उम्र होती है। जब तक दो-चार बार गर्भपात न करा दिया हो तब तक तो शादी के बारे में विचार उत्पन्न होना संभव ही नहीं। उपदेशक ने आगे समझाया, िशक्षण कार्य के साथ-साथ लेखनी को भी पूर्ण विराम दे दो मित्र। अन्यथा संकट में फ¡स जाओगे। मैं कब तक और कहा¡-कहा¡ बचाऊ¡गा? सदी के अन्त तक लेखन को अपराध घोिशत कर दिया जायेगा और लेखक भगोड़ा अपराधी। लेखन कर्म अत्यन्त खतरनाक होने के कारण इसके लिए लाइसेन्स लेना अनिवार्य होगा। जिसके लिए किसी ऐसे लेखक का चमचा रहने का बीस साल का अनुभव आवश्यक होगा, जिसे अक्षर ज्ञान न हो व कलम पकड़ना न आता हो। जिसकी चोरी की रचनाए¡, न केवल स्वघोषित राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकािशत हो चुकी हों, वरन् इन्टरनेट पर जानी-मानी लेखिकाओं के साथ हमबिस्तर होने की खबरें भी प्रकािशत व प्रसारित होती रहती हों। यही नहीं कम से कम बीस सुन्दरियों को, जो अपने साथ हमबिस्तर होने के पुरुस्कार स्वरूप, कवयित्रियों के रूप में स्थापित करवा चुका हो। यही नहीं उसे परमाणुशक्ति संपन्न अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादी संघ की केन्द्रीय समिति द्वारा मान्यता भी प्राप्त हो।

Wednesday, March 19, 2008

कैसा बसन्त?

कैसा बसन्त?

कोयल की ये मधुर मल्हारें,

उसको लगतीं करुण पुकारें,

सबसे यही मनोती मॉगे,

प्रियतम आकर उसे दुलारें।


इन्द्रधनुष की सभी छटाएं,

उसको अंगारे बरसाएं,

कैसा बसन्त वह क्या जाने ,

निशा वियोग की जिसे सताएं।


काक तू वैरी रोज पुकारे,

प्रियतम कौ सन्देश सुना रे,

मुझ विरहनि को धीर बंधा के,

अपनी बिगड़ी जात बना रे।

Monday, March 17, 2008

मुस्कान का राज

मुस्कान का राज ?
वह सी.बी.एस.ई। से सम्बद्ध केन्द्र सरकार द्वारा संचालित विद्यालय में कार्यरत था। उसी विद्यालय में विद्यालय के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का लड़का भी पढ़ता था। उस लड़के के बारे में सभी अध्यापक आपस में बातचीत करते, ``यह कभी पास नहीं हो सकता, उसे लिखना ही नहीं आता, पास क्या होगा ?, उसके पिता को कौन समझाये ? अच्छा रहे, यदि वह इस बच्चे को यहा¡ से हटाकर किसी हिन्दी माध्यम वाले विद्यालय में भर्ती करा दे, आदि' एक दिन उसने उस बच्चे के पिता को विश्वास में लेकर समझाया कि बच्चे को राज्य के किसी हिन्दी माध्यम वाले विद्यालय में भर्ती करा दे। इस सम्बन्ध में बच्चे के परीक्षा परिणाम व अन्य अध्यापकों के विचारों को भी उसके सामने रखा। रुपये पैसे की समस्या हो तो अपनी तरफ से सहयोग का आश्वासन भी दिया। किन्तु उस कर्मचारी ने उसकी बात को महत्व न देकर, मुस्कराकर कहा, `विचार करूँगा , बच्चे से बात करूँगा ।´ उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह कर्मचारी अपने बच्चे के प्रति गम्भीर होने की जगह मुस्करा क्यों रहा है ? मार्च में सीण्बीण्एसण्ईण् की परीक्षा प्रारंभ हुई। उस दिन दसवीं का पहला प्रश्न-पत्र था। सभी िशक्षक आपस में काना-फूसी कर रहे थे, `और कोई पास हो या न हो, उसका लड़का अवश्य पास होगा, पास ही नहीं होगा, अच्छे अंक भी लायेगा।´ उसने साथी िशक्षकों से जानने की कोिशश की तो पता चला कि उसने जिस कर्मचारी को अपने बच्चे को विद्यालय से हटाने के लिए कहा था। उस बच्चे के स्थान पर कोई दूसरा छात्र परीक्षा दे रहा है। उसने पुिष्ट के लिए विद्यालय के वरिष्ठतम् िशक्षक से पूछा तो मालुम पड़ा कि छात्र के हाथों पर पटि्टया¡ बगैरा बा¡ध कर, चिकित्सक से प्रमाण-पत्र बनवाकर, उसे कृत्रिम रूप से अस्वस्थ दिखाकर, सीण्बीण्एसण्ईण् के नियम के तहत कक्षा 9 के एक योग्य छात्र को उसके पास लिखने के लिए सहायक के रूप में बिठाया गया था तथा उसके बैठने की व्यवस्था भी दूसरी जगह की गई थी। सहायक के रूप में जिस छात्र का चयन किया गया था, उसके बारे मेें सभी अध्यापकों को विश्वास था कि वह न केवल पास होगा, बल्कि अच्छे अंक भी लायेगा। आज उसे उसकी मुस्कराहट का राज समझ में आ गया था। साथ ही यह भी कि वह मुस्कराहट उसकी स्वयं की नहीं बल्कि प्राचार्य महोदय की मुस्कराहट की छाया थी, जिन्होंने उसे अच्छे कार्य के लिए पुरस्कृत करने की योजना बनाई थी। परीक्षा प्रभारी, केन्द्राधीक्षक सहित सभी अधिकारी सहित सभी िशक्षण व िशक्षणेत्तर कर्मचारियों का प्रत्यक्ष व तटस्थ समर्थन प्राप्त था ही।

Sunday, March 16, 2008

मुबारक होली

मुबारक होली

होली रहे मुबारक तुमको, जीवन में खुशहाली लाए।

फूले-फले परिवार तुम्हारा, बहुरंगो से तुम्हें सजाए।

महके हरदम तन का उपवन, मन खुशियों से गाए।

खुशियों में तुम डूबो इतनी नहीं याद हमारी आए।
होली की दें मुबारकवाद हम, क्रोध नहीं हम पर करना।

पारदर्शिता जीवन में हो, नहीं किसी से तुमको डरना।

सारे कष्ट, दु:ख और चिन्ता पायें हम तुमसे है हरना।

तन्हाई में खुश हो लेंगे , तुम्हारी महफिल में हों सजना।


एक वर्ष है होने वाला हमने दर्शन पाए थे।

दो दिन ही बस पास रहे जो हमरे मन में भाए थे।

हम तो राह देखते अब भी, तुमने ही तरसाए थे।

तुम्हारे सानिध्य में हम, उस दिन कितने हरषाए थे।
गुलाबी कपोल, अधरों पर मुस्कान।

बोली में जिसके कोयल गाए गान।

मानिनी का मन-मयूर नृत्य करे हर-पल।

भाग्यशाली कितना, मिली जिसे सुख-खान।
होली लाए खुशहाली, फूल उठे डाली-डाली।

महक उठे अंग-अंग, मन नहीं रहे खाली।

कपोलों पे अरूणाई, सुधा भरी अधर-प्याली।

कलियों से पुष्प खिलें, सीचें बगिया को माली।

Thursday, March 13, 2008

प्रवचन

'ये संत दारू पीते हैं और भी न जाने क्या-क्या करते हैं? मैं अपने छात्र-छात्राओं से कहती हूँ कि इनकी बातों में क्या रखा है? इनसे अच्छे प्रवचन तो में दे सकती हूँ?' एक शिक्षिका महोदय अपने शिक्षिक साथी से सी.बी.एस.ई. के एक मूल्यांकन केन्द्र पर कार्य करते हुए कह रहीं थीं।
थोड़ी देर उपरांत वही शिक्षिका महोदया उनसे मुखातिब हुईं , 'सर! मैं अपने भाई के यहाँ ठहरी हूँ। किसी होटल वाले से होटल में ठहरने का बिल बनवा दीजिये न। सी.बी.एस.ई.से होटल में ठहरने का खर्चा तो लेना ही होगा न।' शिक्षक को उनका प्रवचन समझ में आ गया।

Sunday, March 2, 2008

क्या राम ? क्या रहीम? सभी एक हैं ।
जो करते हैं भले काम वही नेक हैं।

कविता

कविता कहाँ? अब खो गयी है।
बीज शांति के बो गयी है।
शांति मृत्यु की मानो छाया,
जीवन-विहीन ही चलती काया।
खोया प्रेम, ईर्ष्या नहीं है।
सपने मरे, दिखती न माया।
बेचैनी कहाँ? अब सो गयी है।
कविता कहाँ? अब खो गयी है।
जीने की अब, नहीं है इच्छा।
मृत्यु की भी, नहीं प्रतीक्षा।
चाहते है, संन्यासी जो,
झेल रहा हूँ , वह तितिक्षा ।

Friday, February 22, 2008

धार्मिक नहीं, आडम्बरी

हम बड़े गर्व के साथ कहते हैं। भारत एक आध्यात्मिक देश है। वर्तमान वातावरण कुछ एस प्रकार का बन रहा है, जैसे देश में धर्म की बाढ़ आ गयी हो। धार्मिक स्थलों पर बढ़ती भीड़, धार्मिक पत्र-पत्रिकाओं की बढ़ती संख्या व बढ़ता प्रसार, धार्मिक चेनलों की बाढ़ व बढ़ते दर्शक ही नहीं आज देश के अधिकांश समाचार पत्र साप्ताहिक विशेष आध्यात्मिक परिशिष्ट देने लगे है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे देश के अधिकांश स्त्री-पुरुष धर्मिक हो गए हों। ईश्वर मके लिए लोंगों के दिल मी श्रद्धा की अविरल धर बहाने लगी हो। योग-गुरुओं का प्रादुर्भाव भी तीव्र गति से हो रहा है, ऐसा लगता है जैसे ईश्वर को योग विद्या का प्रचार-प्रसार करने की सनक चढ़ी हो और अचानक योग-गुरुओं की बारिश कर दी हो। योग-गुरुओं ने योग का अंग्रेजीकरण करके नया नाम योगा कर दिया है। योग के नाम पर आसन-प्राणायाम को ही सिखाया जा रहा है। योग के आधार यम् और नियमों को तिलांजलि डे दी गयी है। कहने का आशय यह है कि भारतीय योगिक क्रियाओं में से एस स्वार्थी इंसान ने उन क्रियाओं को चुन लिया है जो उसके भोतिक शरीर को पुष्ट करके और अधिक भोग करने में सक्षम बनाती हैं।

Tuesday, February 12, 2008

जीवन का सत्य

जीवन मे सत्य और असत्य का निर्णय करना बहुत ही सीधा-सदा व सहज कार्य है। हर व्यक्ति जानता है, क्या सत्य है क्या असत्य? क्या न्याय है क्या अन्याय ? इसके लिए विद्वान होने की आवश्यकता नहीं है। विद्वान व समाज के कर्णधार सत्य को जटिल बनाकर असत्य के निकट ले जाते हैं ताकि वे भ्रम का सहारा लेकर अपने स्वार्थों की सिध्दि कर सके अपनी दुकानदारी चमका सकें। हम विद्वानों से दूर रहकर अपनी स्वार्थ बुध्दि को किनारे करके , परम्पराओं व सामाजिक मान्यताओं को नजर अंदाज करके अपनी आत्मा की बात सुने, आपकी आत्मा ही सत्य की सर्वश्रेष्ठ छवि सामने लाएगी.

Saturday, January 19, 2008

अपना पाला चुनें

जीवन एक खेल है , इसे किसी को सुधारने या समाज में परिवर्तन करने के अहम में कष्टकर न बनायें। सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय,पाप और पुण्य दोनो रहे हैं और दोनो रहेंगे। यह दुनिया विविधता पूर्ण है, और रहेगी। ईश्वर या प्रकृति या अन्य कोई शक्ति जिसे भी आप स्रजनाहर मानते हैं द्वारा रचित दुनिया को बदलने की अपेक्षा हम स्वयम अपना पाला निर्धारित कर लें की हम न्याय या अन्याय , सत्य या असत्य , धर्म या अधर्म,पाप या पुण्य किसके साथ जीवन रूपी खेल को खेलने के इच्छुक है। हमें किसी से भी अपेक्षाएं नहीं करनी हैं। अपने कर्तव्यों को पुरा करना है। फिर देखो जीवन रूपी खेल कितना आनंददायक हो जाएगा।