अबला-सबला,
हँसना-रोना,
सोना-जागना,
उसको होता हर्ष,
सन्तान का उत्कर्ष।
सरल,विनीत और विनम्र,
सन्तान का सब कुछ क्षम्य,
हृदय है अगम्य,
हो जाये भ्रष्ट,
सन्तान हो ना नष्ट।
व्यष्टि-समष्टि,
सारी ये सृष्टि,
भले ही जायें,
सिद्धियां अष्ट,
सन्तान न पाये कष्ट.
स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण
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*श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विशेष*
*स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से श्री कृष्ण*
*©** डा संतोष गौड़ राष...
2 weeks ago

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