Friday, July 24, 2020

मुझे अच्छा नहीं लगता


 रूपाली टंडन जी की लिखी ये कविता मुझे बहुत पसंद आई इसीलिए आप 


सबसे शेयर कर रहा हूं।...



शादीशुदा महिलाओ को कुछ बाते अच्छी नहीं लगती,पर वे किसी से 


कहती नहीं उन्ही एहसासों को इकट्ठा करके एक कविता लिखी है.....



" _मुझे अच्छा नही लगता_ "



मैं रोज़ खाना पकाती हूँ, तुम्हे बहुत प्यार से खिलाती हूं,
पर तुम्हारे जूठे बर्तन उठाना
मुझे अच्छा नही लगता।
कई वर्षो से हम तुम साथ रहते है,
लाजिमी है कि कुछ मतभेद भी तो होंगे।।
पर तुम्हारा बच्चों के सामने चिल्लाना मुझे अच्छा नही लगता।
हम दोनों को ही जब किसी फंक्शन मे जाना हो,
तुम्हारा पहले कार मे बैठ कर यू हार्न बजाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
जब मै शाम को काम से थक कर घर वापिस आती हूँ,
तुम्हारा गीला तौलिया बिस्तर से उठाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
माना कि तुम्हारी महबूबा थी वह कई बरसों पहले,
पर अब उससे तुम्हारा घंटों बतियाना
मुझे अच्छा नही लगता।
माना कि अब बच्चे हमारे कहने में नहीं है,
पर उनके बिगड़ने का सारा इल्ज़ाम मुझ पर लगाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
अभी पिछले वर्ष ही तो गई थी,
यह कह कर तुम्हारा,
मेरी राखी डाक से भिजवाना
मुझे अच्छा नही लगता।
पूरा वर्ष तुम्हारे साथ ही तो रहती हूँ,
पर तुम्हारा यह कहना कि,
ज़रा मायके से जल्दी लौट आना
मुझे अच्छा नही लगता।।
तुम्हारी माँ के साथ तो
मैने इक उम्र गुजार दी,
मेरी माँ से दो बातें करते
तुम्हारा हिचकिचाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
यह घर तेरा भी है हमदम,
यह घर मेरा भी है हमदम,
पर घर के बाहर सिर्फ
तुम्हारा नाम लिखवाना
मुझे अच्छा नही लगता।
मै चुप हूँ कि मेरा मन उदास है,
पर मेरी खामोशी को तुम्हारा,
यू नज़र अंदाज कर जाना
मुझे अच्छा नही लगता।।
पूरा जीवन तो मैने ससुराल में गुज़ारी है,
फिर मायके से मेरा कफन मंगवाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।।
अब मै जोर से नही हंसती,
ज़रा सा मुस्कुराती हूँ,
पर ठहाके मार के हंसना
और खिलखिलाना
मुझे भी अच्छा नही लगता।।

Thursday, July 23, 2020

कोमलता के हाव-भाव तज

नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?


               डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



भौतिकता की भाग-दौड़ में, तुम, मशीन क्यों बनतीं नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना बन्दिनी नहीं हो नर की।
जीवन संगिनी तो हो नर की।
प्रतिस्पर्धी बन भटक रहीं क्यों?
कौन दिखाए? राह तुम्हें घर की।
घर जैसी! स्वर्गिक रचना को, खुद विनिष्ट क्यों करती नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, भटका, नर निज पथ से।
भटक गया नर, निज जीवन से।
तुम्हारी प्रेरणा, प्रेम, ममता बिन,
कौन लाएगा? पथ पर फिर से?
नैसर्गिक सुन्दरता तजकर, अशान्ति में क्यों? जलती नारी।
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, कामना, विवश कर रहीं।
इच्छाएँ तुम्हें, अधीर कर रहीं।
रोको, नर को अंधी दौड़ से,
तुम क्यों? उसका भाग बन रहीं।
तुम ही जीवन की सृष्टा हो, भटक, जीवन क्यों हरतीं नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?
माना, तुम ही शक्ति पुंज हो।
लेकिन तुम ही प्रेम कुंज हो।
नर को अपने पथ से हटाकर,
हो जाओगी, तुम भी, लुंज हो। 
संग-साथ संगीत है, सजता, नर को विलग क्यों करती नारी?
कोमलता के हाव-भाव तज, नैसर्गिक गुण, क्यों तजती नारी?

Wednesday, July 15, 2020

तेरे बिन, मैं रहा अधूरा

प्रेमी संग तू पूरी है

                             डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।
संग साथ की चाहत मेरी, तेरी चाहत दूरी है।
प्रेम का तूने, राग अलापा।
अकेलापन मुझको है व्यापा।
षडयंत्रों को पूरा करने,
कोर्ट में जाकर, किया स्यापा।
प्राणों पर आघात किया, फिर कहती मजबूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।।
झूठ और छल करके, रानी।
तूने याद दिला दी, नानी।
मैंने तो विश्वास किया था,
विश्वासघात का, पिलाया पानी।
विश्वास कभी, पा न सकेगी, भले कानूनी सूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।।
कहीं भी जाकर, अब तू लड़ ले।
किसी के ऊपर, जाकर चढ़ ले।
जीवन में ना, शांति मिलेगी,
कितनी भी, तू जिद पर अड़ ले।
तेरी चाहत पूरी हो बस, मेरी रही अधूरी है।
तेरे बिन, मैं रहा अधूरा, प्रेमी संग तू पूरी है।

Monday, July 13, 2020

पूरण करती, नर को नारी


               डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


सृष्टि की रचना, सबसे प्यारी।
सजती सृष्टि, जीवन क्यारी।
प्रेम डोर में, बाँधे नर को,
खुशियों की, वह है फुलवारी।

महानता की चाह न उसकी।
गहराई की थाह, न उसकी।
पिता, भाई, पति और पुत्र,
और कोई पहचान न उसकी।

घर में लाती है, खुशहाली।
माता, बहिन हो, पत्नी, साली।
गृह लक्ष्मी की बरकत से ही,
घर घर मनती है, दीवाली।

जन्मदात्री, नर की नारी।
पालन-पोषण, जाती बारी।
नर को समर्पित, अपना आपा,
प्रतियोगी नहीं, नर की, नारी।

नर की देखो, जान है नारी।
युगों-युगों से, शान है नारी।
सूपर्णखा, सीता या द्रोपदी,
नर जीवन की, आन है, नारी।

प्रकृति की श्रेष्ठ कृति, नर-नारी,
जिम्मेदारी है, उनकी सारी।
नारी को नर, पूरण करता,
पूरण करती, नर को नारी।

Sunday, July 12, 2020

साथ तेरा बस, मिल जाए तो




साथ तेरा बस, मिल जाए तो, और न कुछ हमें पाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
हमको धन की चाह नहीं है।
पद की भी कोई आह नहीं है।
तुझको कुछ पल, सुख दे पाऊँ,
दुनिया की, परवाह नहीं है।
भटकता फिरता, अनाड़ी था मैं, तुझसे मिल सब जाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
अलकों में उँगली दे खेलूँ।
पलकों में ले, सब कुछ झेलूँ।
समस्यायें कितनी भी आयें,
सबको ठेलूँ, सबको पेलूँ।
यादों में मैं, तड़प रहा हूँ, तुझको, क्यूँ कर आना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
प्रेम का जादू, तूने चलाया।
खुद आ बैठी, सबको भुलाया।
दिल के अन्दर किया कैद क्यूँ?
कभी हँसाया, कभी रुलाया।
पल-पल नई नवेली अब भी, मैंने ना पहचाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।
संग-साथ आ, गले लगा ले।
नयनों से आ, नयन मिला ले।
प्रेम पथिक हूँ, प्यासा युग का,
आ! अधरों से, सुधा पिला दे।
झूठ, कपट, छल नहीं सहूँगा, प्रेम में मरना ठाना है।
तू ही, दिल में बसती, प्यारी, तू ही प्रेम, तू गाना हैैै।।

Saturday, July 11, 2020

कानूनों में, प्रेम न पलता

नहीं कोई, गन्तव्य निर्धारित, पथिक हैं, पथ पर जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
जात-पाँत, कोई, भेद नहीं है।
धोखा खाया, हमें, खेद नहीं है।
पथ की धूल, कभी, गयी न लूटी,
प्रेम तुम्हारा, कभी, ध्येय नहीं है।
आघात किया, अब, साथी जाओ, घायल ही हमें जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
पथ है, पथिक, पाथेय नहीं है।
पथ में, पथिक, कुछ हेय नहीं है।
पथ में, साथी, मिलें, आकर्षण,
पथ के सिवा, कोई ध्येय नहीं है।
जीवन-नद, जल प्लावन झेले, जल को बहते जाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
नारी हो, पर, सदय नहीं हो।
बुद्धि हो, पर, हृदय नहीं हो।
कानूनों में, प्रेम न पलता,
भय देतीं, तुम, अभय नहीं हो।
नारीत्व बिन, नारी कैसी? नर को, जिसे फंसाना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।
हम पथिक, निज पथ है जाना।
सच है साथी, पथ, प्रेम है गाना।
धन-धान्य से, खुशी रहो तुम,
याद न करना, ना पछताना।
राह में राही, हमें जो मिलता, हमने, साथी माना है।
चंद कदम है, मिला साथ बस, साथी! साथ निभाना है।।

Friday, July 10, 2020

देवी! कहकर, ना तुम पूजो

मानवी ही स्वीकार करो




देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।
स्वाभाविक साथी है, नर की, इस सच को अंगीकार करो।
नर्क का द्वार, नारी को कहते।
अंधकार में,  वे,  नर रहते।
धर्म धुरी, धरणी, धात्री बिन,
अपूरणता का दंश हैं सहते।
धर्म के तत्व को, समझ न पाये, नारी पर अत्याचार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
धर्म के तत्व को, तुम पहचानो।
जीवन संगिनी की प्रकृति जानो।
आवश्यकतायें, आकाक्षायें, कुछ,
नारी की भी हैं, यह तुम मानो।
शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, इसे दो, पर्दा अस्वीकार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
बेटी-बेटे का भेद, ये कैसा?
बहिन को समझो, भाई जैसा।
ये घर तो, उसका अपना है,
ससुराल में भी, हाल हो ऐसा।
दान-दहेज का, पाप ये छोड़ो, स्वीकार अधिकार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।
पराये घर की वस्तु न बेटी।
बहिन नहीं,   भाई से हेटी।
जन्म लिया, यह घर अपना है,
ससुराल में भी, नहीं है  चेटी।
सुखी रहोगे, सुख देकर के, सब कुछ देकर, प्यार करो।
देवी! कहकर,  ना तुम पूजो,  मानवी ही स्वीकार करो।।

Thursday, July 9, 2020

सृष्टि का आधार प्रकृति है


नारी! प्रकृति का सार है



                                 डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।
बीज रूप है, पुरूष प्रकृति का, नारी! सृजन आधार है।।
काले-काले केश घटाएँ।
इंद्र धनुष सौन्दर्य छटाएँ।
भावों की लहरें, उर में ज्यों,
सागर की लहरें, लहराएँ।
पर्वत शिखरों को, मात जो देते, वक्ष स्थल के उभार हैं।
सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।।
सुरख लाल हैं, अधर तुम्हारे।
कपोल लालिमा, अलग पुकारे।
दीर्घ श्वांस संग, उरोज भी डोलें,
उर में हा! हा! कार मचा रे।
प्रेम लता, कलि, पुष्प बन खिलती, नर के गले का हार है।
सृष्टि का आधार प्रकृति है, नारी! प्रकृति का सार है।

Wednesday, July 8, 2020

किसी के लिए खास!

काश!
हम भी होते,
किसी के लिए खास!
कोई,
हमारे लिए भी,
करती अरदास।

कोई,
हमें भी,
करती पसंद,
डालती हमें भी,
प्रेम की गुलाबी घास।
मिलाती,
हमारे साथ छन्द,
नहीं रहने देती,
हमें स्वच्छन्द।

काश!
हमारा भी
करती कोई इंतजार
उमड़ता हमारे लिए भी,
थोड़ा सा प्यार,
बनती,
जीवन का आधार।

काश!
कोई,
हमें भी,
देर हो जाने पर,
करती बार-बार फोन।
और हम,
उसकी डाँट खाकर,
हो जाते मौन।
हमारे कार्य में,
व्यस्त होने के कारण,
फोन न उठा सकने पर
हो जाती नाराज।
और हमें,
उसे मनाने के लिए,
उठाने पड़ते,
उसके नाज।

काश!
हमारे भी,
ऐसा होता,
एक घर,
और एक घरवाली,
हमारा साथ पाने को,
वह रहती मतवाली
और हमें पिलाती,
प्रेम-सुधा की प्याली।
काश!

Thursday, July 2, 2020

धोखा खाकर, जश्न मनाओ

जीवन-पथ


जीवन पथ पर, पथिक है चलना।
राह में राही, सबसे है मिलना।
पथिक तो  आते, जाते रहते,
रूकना नहीं, है अविरल चलना।

आधा जीवन बीत रहा है।
नहीं, कभी संगीत रहा है।
हमने सब कुछ लुटा दिया,
फिर भी साथ न मीत रहा है।

साथ में जो भी, मीत ही समझो।
नहीं किसी से, कभी भी उलझो।
जीवन तो है, भूल-भुलैया,
सोचो, समझो और फिर सुलझो।

यहाँ, कोई तेरा मीत नहीं है।
हार-जीत, संगीत नहीं है।
पल-पल जी ले, तू मुस्काकर,
रोना यहाँ की, रीत नहीं है।

जीवन को क्यों काट रहे हो?
सुख को भी, दुख बाँट रहे हो।
दुख्खों के घेरे से निकलो,
व्यर्थ ही, खुद को डाँट रहे हो।

जीवन का आनन्द लुटाओ।
विध्वंसों में मौज मनाओ।
धोखा देना, फितरत उनकी,
धोखा खाकर, जश्न मनाओ।

Sunday, June 28, 2020

घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।

जग में सबको पाल रही है


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


घर से बाहर, निकली नारी, अर्थव्यवस्था सभाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
गृह प्रबंधन की कला है आती।
कुशल प्रबंधन, जहाँ भी जाती।
सेनाओं का नेतृत्व कर रही,
स्वयं जगी, जग को है, जगाती।
बेटी, बहिन, पत्नी, माता बन, नारी नर की ढाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
क्रोध में आकर, दण्ड भी देती।
सहलाकर, पीड़ा, हर लेती।
स्नेह, प्रेम, वात्सल्य लुटाती,
दिन में, रात में, सुख ये देती।
अन्तर्विरोध, घर-घर में होते, प्रेम से पिरोती माल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।
छल, कपट और झूठ भी बोले।
आँखों से ही सबको तोले।
घर, बाहर, तूफान हो कितना?
सब सभालती, हौले-हौले।
तृण-तृण से है नीड़ बनाती, सुख का बुनती जाल रही है।
घर के सदस्यों तक नहीं सीमित, जग में सबको पाल रही है।।


Saturday, June 27, 2020

एकान्त और अकेलापन

एक समय था,
जब मैं चाहता था,
एकान्त।

तब कुछ पढ़ने की,
कुछ बनने की,
किसी को पढ़ाकर,
कुछ बनाने की,
तीव्र इच्छा,
मुझे एकान्त के लिए,
मजबूर करती थी।

एक समय था,
जब साथी को चाह थी,
मेरे साथ की,
बेटे को चाह थी,
हर पल, हर क्षण,
हर दिन, हर राह,
मेरे साथ की,
मुझसे दुलार की।

और मैं,
उन्हें आगे बढ़ाने,
उन्हें कुछ सिखाने,
अपना करियर बनाने,
के चक्कर में,
अपने आपको भूल गया!
पता ही नहीं चला,
कब अपनी राह भूला,
और ठहर गया।

और आज
जब साथी साथ मिलने का,
इंतजार करते-करते,
प्रतीक्षा से थककर,
आगे बढ़ गया।
दूसरे शब्दों में कहूँ,
साथ अलग हो गया।

और आज
हर पल, हर क्षण
हर राह,
साथ चाहने वाला बेटा,
साथ रहना भूलकर,
एकान्त के पथ पर,
बढ़ गया।
एकान्तवासी बन गया।

और आज
मैं एकान्त से भी,
ठुकराया गया,
अकेला रह गया।
एकांत और अकेलेपन
का अंतर समझ आ गया।
अनुभव से
कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।

Tuesday, June 23, 2020

हर युग में, मैं छली गई हूँ

प्रेम से कहकर प्यारी हूँ

                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


काली, दुर्गा, सरस्वती नहीं हूँ, मैं साधारण सी नारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
जिम्मेदारी, मुझ पर डालीं।
काम सौंप दिया, कह घरवाली।
अधिकार सब, रखे पुरूष ने,
कर्तव्यों की, थमा दी, प्याली।
संस्कृति का भी भार बहुत है, थामो तुम, मैं हारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
पूजा मुझको, नहीं, चाहिए।
थोड़ा सा, सम्मान चाहिए।
मन की कहे, मन की सुने,
ऐसा पति का प्यार चाहिए।
संस्कार, नैतिकता, लज्जा, थामो तुम, मैं मारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।
परमेश्वर नहीं, पति चाहिए।
स्वर्ग नहीं, कुछ हँसी चाहिए।
निर्णयों में, भागीदारी दे,
नर की ऐसी, मति चाहिए।
प्रेम, विश्वास, सम्मान मिले बस, फिर देखो, मैं थारी हूँ।
हर युग में, मैं छली गई हूँ, प्रेम से कहकर प्यारी हूँ।।

Sunday, June 21, 2020

घरवाली

भोर ही नहीं, रजनी में भी


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


समय, काम की, सीमा न कोई, नहीं, वेतन की माँग उठी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
सबसे पहले, जग जाती है।
शुभ हो दिन, मंगल गाती है।
साथ-सफाई का चक्र है चलता,
बार-बार कह, नहलाती है।
गृहलक्ष्मी, सबको है देती, चाह न कुछ भी, स्वयं लुटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
समय की नहीं, कोई सीमा है।
घर ही तो, इसका बीमा है।
अन्दर बाहर काम कर रही,
कभी तेज, कभी धीमा है।
स्वयं भले ही नहीं पढ़ पाई, संतान की शिक्षा हेतु पिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।
संघर्षो में भी नहीं बुझी है।
सजती-संवरती, कितनी हंसी है?
काम काज सबके निपटाकर,
बिस्तर में भी, पति की खुशी है।
घर में ही नहीं, दफ्तर में भी, शालीनता कभी न मिटी है।
भोर ही नहीं, रजनी में भी, घर सभाल, घरवाली जुटी है।।

Thursday, June 4, 2020

संग साथ की, इच्छा थी, पर,

कोई भी साथ निभा न सकी


                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नहीं, चाह थी, रूप रंग की, मन की प्यास, बुझा न सकी।।
सीधे-सच्चे पथ पर चलना।
नहीं चाहिए, कोई छलना।
सब कह ले, सब कुछ सुन ले,
बाहों में उसके, चाहूँ मचलना।
प्रेम राह, मिल चलना चाहा, कोई भी, राह दिखा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।।
कामना रहित, प्रेम हो जिसका।
नहीं, किसी से, वैर हो उसका।
बुजुर्गो के प्रति, सेवा भाव हो,
हित जो चाहे, सदैव ही सबका।
अंग-अंग, सौन्दर्य भले ही, कर्मो से, मुझे लुभा न सकी।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।
नारीत्व दिखा, अन्दर ना पाया।
झूठे ही, प्रेम का, गाना गाया।
छलना, छल का भेद, खुला जब,
पता चला, बस था, भरमाया।
कमनीय कामिनी की, झूठी अदायें, पथ से मुझे डिगा न सकीं।
संग साथ की, इच्छा थी, पर, कोई भी साथ निभा न सकी।

Sunday, May 31, 2020

कदम-कदम, यह साथ है, चलती,

चिर संगिनी नारी है


                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



शक्ति की मूरत, भोली सी सूरत, विधि की रचना प्यारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
सौन्दर्य ही नहीं, शक्ति भी है।
कहती ही नहीं, करती भी है।
हर विपत्ति में, हाथ थामती,
डराती ही नहीं, डरती भी है।
नख से शिख, सौन्दर्य समाया, पीड़ा सहती, सारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
हँसने से, यह भी हँसती है।
नर को, कष्ट, यह भी रोती है।
कमजोर और अबला, मत कहना,
सब कुछ सहकर भी, जीती है।
नर ने, बहुत खेल है खेला, अब नारी की बारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।
संघर्ष नहीं, सहयोग चाहिए।
राष्ट्रप्रेमी को नहीं, जीत चाहिए।
सच को कह ले, सच को सुन ले,
ऐसा बस एक, मीत चाहिए।
विश्वास पुष्प, उर माँहि खिलेगा, तू सींच ले, सच की क्यारी है।
कदम-कदम, यह साथ है, चलती, चिर संगिनी नारी है।।

Friday, May 29, 2020

नारी ही, प्रेरणा, जन-जन की

नारी की प्रेरणा से


                  डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नर-नारी दोनों हैं व्यक्ति।
मिलते, बन जाते हैं, शक्ति।
अलग-अलग, अस्तित्व नहीं है,
इक-दूजे की, कर लो भक्ति।

अलग-अलग, दोनों पे विपत्ति।
मिल कर,  बनते हैं,  दंपत्ति।
ज्ञान, शक्ति का, सृजन हैं करते,
गृह लक्ष्मी,  सच्ची  संपत्ति।

मिल के काल से भी लड़ जाते।
ये कष्टों  में भी, मिल  हरषाते।
नारी की, प्रेरणा से, ये नर,
मूरख, कालिदास बन जाते।

समानता, संघर्ष का गाना।
शक्ति बिना, शिव किसने जाना।
विष्णु के, कम, भक्त मिलेंगे,
लक्ष्मी को, हर घर ने, माना।

सरस्वती ही हैं ज्ञान खजाना।
लक्ष्मी की, पूजा करे जमाना।
प्रिया प्रेरणा पर, तुलसी ने,
राम चरित का, लिखा फसाना।

नारी ही, प्रेरणा, जन-जन की।
नारी ही शक्ति, त्रि भुवन की।
नारी बिन, नर, सदैव अधूरा।
नारी ही, संगिनी, है, हर नर की।

Monday, May 25, 2020

अतीत की फांस


                               अर्चना पाठक, होसंगाबाद



अतीत की फांस,
चुभती अंतर्मन में,
एक बार नहीं,
बार-बार,
हर बार,
जब भी झांकती,
बीते समय में।

मन है भटकता,
अतीत में जब भी।
अतीत की चुभन,
गहराती है समय के साथ।
मैं करती प्रयत्न भुलाने के,
निकल आती है विस्मृति से,
अवचेतन मन से,
मेरे न चाहते हुए भी।
किसी के पास है?
कोई तरीका भुलाने का,
बता दो मुझे।

चाही थी सबकी भलाई,
की भी अपनी क्षमता भर,
किंतु लगता है अब,
अपनों का साथ,
देते देते,
भूली पुरानी राहें,
नई भी खोजी,
किंतु
अपनी राह न पाई।

किसे दोष दूं?
सबकी अपनी-अपनी राह।
केवल कहा वाह!
और चले गए।

अपने एकांकीपन के लिए,
किसे दोष दूं?
किसे ठहराऊं,
अपराधी?
जबकि दूसरों को,
संवारने की आपाधापी में,
खुद को ही भुला दिया था मैंने!
आज जीवन के इस मोड़ पर,
नितान्त एकाकी, 
कौन अपना और कौन पराया?
कितनों को दुलारा,
कितनों को ठुकराया?
जीवन रस!
किसका रहा जस का तस?
मन है सीजता,
प्यास अब भी विकल,
प्राण सरोवर सूखता।
प्यार की धरा,
सींचना चाहता है कोई,
मैं पीछे कदम हटाती,
चुपचाप।
अब प्यार में डूबने का,
साहस नहीं रहा।

Thursday, May 21, 2020

बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू,

शक्ति स्वरूपा नारी है


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।
कदम-कदम आईं कठिनाई, नहीं वक्त से हारी है।।
प्रेम में समर्पण कर सकती है।
अत्याचार से लड़ सकती है।
दुस्साहसए यदिए वह कर बैठे,
विध्वंस प्रलय सा, कर सकती है।
संघर्ष करने का जीवट है, पर अपनों से ही हारी है।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।
सृजन भाव से, घर है रचती।
स्वर्ग बने, जहाँ जाकर बसती।
प्रेमी हित, सब कुछ न्यौछावर,
षड्यंत्रों की, वह, देवी बनती।
आजीवन संघर्ष तपस्या, नहीं, किसी से हारी है।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।
नर सदैव, आराधन करता।
रूप, तुम्हारे पर, है मरता।
कठपुतली नर, तुम हो नचातीं,
संकेतों पर वह है चलता।
नर-नारी मिल, साथ चलें, पूरी हों इच्छा सारी हैं।
बुद्धिमयी, सौन्दर्यमयी तू, शक्ति स्वरूपा नारी है।।

Thursday, May 14, 2020

हम भूल नहीं सकते तुमको

नयनों में तुम बसी हुई हो


                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



हम भूल नहीं सकते तुमको, नयनों में तुम बसी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
तुम ही प्रेरणा जीने की हो।
तुम ही प्रेरणा गीतों की हो।
तुम से ही ये जीवन प्यारी,
तुम ही घड़कन सीने की हो।
सद्य स्नाता, बिखरे कुंतल, रावी तट पर खड़ी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
खिलखिलाहट, वह हँसी याद है।
बलखाती,  वह चाल, याद है।
बुलाया था, मुझे, बड़े प्रेम से,
नेह पगी, फरियाद, याद है।
भुला न सका, कोशिश करके, अंग-अंग, तुम ही रमी हुई हो।
भले ही कभी मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।
आने का तुमने, वायदा किया था।
दूर से, साथ के पल को, जिया था।
रूष्ट क्यों हों तुम? यह तो बताओ,
याद है, प्रेम का प्याला पिया था।
भले ही दूर हो, याद न करतीं, बाँहों में अब भी कसी हुई हो।
भले ही कभी, मिल नहीं पाओ, उर में तुम ही सजी हुई हो।।

Saturday, May 9, 2020

अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी,

नर हो या फिर नारी है

                                 डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नहीं, कोई भी, दोयम जग में, नहीं, कोई भी भारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
प्रकृति का सृजन, अजब निराला।
कोई  न  इसे,  झुठलाने वाला।
अनुपम है, हर  प्राणी,  जग में,
निकृष्ट नहीं, कोई गोरा-काला।
कोई समान प्रतिरूप नहीं यहाँ, पूरक हैं, सब, तैयारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
नारी बिन, अस्तित्व न, नर का।
नारी अकेली,  कारण डर का।
अकेले-अकेले, दोनों भटकें,
मिलने से, सृजन हो, घर का।
नारी खुद को, समर्पित करती, नर को नारी, प्यारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।
समानता, संघर्ष  व्यर्थ  है।
पूरकता ही, सही अर्थ है।
इक-दूजे बिन, दोंनो अधूरे,
मिलकर के वे, सृष्टि समर्थ हैं।
संघर्ष से विध्वंस करो ना, मिलकर सीचों क्यारी है।
अद्वितीय भूमिका, प्रकृति ने सौंपी, नर हो या फिर नारी है।।

Friday, May 8, 2020

क्या करती हो?

                             ठहरो नारी!

                                                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।
प्रेम, समर्पण, निष्ठा तज कर, ना, जग पर अत्याचार करो।।
स्नेह, दया, करूणा की मूरत।
भावों से, खिलती थी, सूरत।
निज अर्धांग की, प्रतियोगी बन,
सृष्टि को, करती, बदसूरत।
संबन्ध तो होते, दिल का समर्पण, ना, विश्वास का बंटाधार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।
झूठ, छल-कपट, षड्यन्त्र छोड़ो।
तुम सच्चाई से, नाता जोड़ो।
शिक्षा, सहयोग, समर्पण, निष्ठा,
स्वयं को गढ़ो, मरीचिका छोड़ो।
सच ही शक्ति, सच ही भक्ति, ना, धोखा दे, लाचार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।
संयम, धैर्य, मातृत्व की देवी।
क्यों? दुष्टा बन, प्राणों की लेवी।
शिक्षक, प्रेरक, नियंता नर की,
तुम तो थीं, सृष्टि की सेवी।
सृजन छोड़, विध्वंस के पथ पर, क्यों? ऐसा, दुराचार करो।
क्या करती हो? ठहरो नारी! कुछ पल, सोच-विचार करो।।

Thursday, May 7, 2020

सामाजिक दूरी पर रहकर

जीत का ध्वज फहराना है

                         डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नहीं, बाजार की चिंता है, अब, नहीं काम पर जाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
मानवता को बचायेंगे हम।
मानकों को अपनायेंगे हम।
नहीं थामेंगे, हाथ किसी का,
फिर भी साथ, निभायेंगे हम।
राशन भी, घर बैठे मिलेगा, मिल कर, पकाकर खाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
नहीं, क्रैच की, आज जरूरत।
बच्चों की दुनिया, खुबसूरत।
पति-पत्नी को, साथ मिल रहा,
इक-दूजे की, उन्हें जरूरत।
साथ रहेंगे,  नहीं मिलेंगे, कोरोना को मिटाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।
रोज काम पर, हम, जाते थे सब।
साथ में मिल, बैठे थे, कब-कब?
पत्नी भी तो, थी, नौकरी करती,
घरवाली है,  आज, बनी अब।
अवसर आज मिला है, फिर से, घरवाली को सजाना है।
सामाजिक दूरी पर रहकर, जीत का ध्वज फहराना है।।

Wednesday, May 6, 2020

दहेज के झूठे केस लगाकर

सच ही, सच की, नींव हिला दी

                                          डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


समय बदल गया, नारी बदली।
नहीं रही, अब रस की पुतली।
ऐसे-ऐसे कुकर्म कर रही,
घृणा को भी, आयें मितली।

प्रेम नाम ले, नित, नए, फँसाती।
सेक्स करो, खुद ही उकसाती।
धन लौलुपता, पूरी करने,
बलात्कार का केस चलाती।

शादी के नाम पर, जाल बिछाती।
झूठ बोल कर,  ब्याह रचाती।
पति कह, नर को, जी भर लूटे,
प्रेमी से मिल, उसे मरवाती।

कुकर्म घृणा के, करती ऐसे।
भाई-पिता भी, जीते कैसे?
सबको तनाव दे, मजे है करती,
रोज फँसा कर, जैसे-तैसे।

छल, धोखे से कर ली शादी।
खुद के मजे, पति की बरबादी।
दहेज के झूठे केस लगाकर,
सच ही, सच की, नींव हिला दी,

नर, नारी से डरता है अब।
बात राह में, करता है कब?
दुष्टा नारी, पीछा न छोड़े,
आत्म हत्या नर, करता है जब।


Tuesday, May 5, 2020

टेढ़़े-मेढ़े, अंधेरे पथ पर, सहजता से

साथ में मेरे आ जाओ

                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


टेढ़़े-मेढ़े, अंधेरे पथ पर, सहजता से,
चल सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
लोभ, लालच, ईष्र्या-द्वेष, सच्चे मन से,
तज सको, तो, साथ में, मेरे आ जाओ।
छल, कपट, षड्यंत्र, बदला, दुर्भावना से,
हट सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
असत्य, लालसा, लिप्सा, वासना से,
रूक सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
कथनी-करनी एक, बनावटीपन से मुक्त,
हो सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
आलस्य, निद्रा, तंद्रा तज, कर्म पथ पर,
बढ़ सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
धन, पद, यश, संबन्धों का मोह तज,
रह सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।
अहंकार, दुर्भावना, तज, सदभावना,
पा सको, तो, साथ में मेरे आ जाओ।

Sunday, May 3, 2020

अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति

नारी! अजब निराली हो


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।
आवाज से ही, आकर्षित करतीं,  नहीं,  सिर्फ  घरवाली हो।।
नाम नहीं कोई, न मुलाकात होगी।
आमने-सामने, कभी न बात होगीं।
अजीब सी आशा, जगाती हो क्यूँ?
देवी दर्शन, बड़ी सौगात होगी।
निराशा में भी, तुम, आश जगातीं, प्रेम से पूरित प्याली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
प्यार न मिला, कोई आश नहीं है।
खुश रहो, तुम सदा, अरदास यही है।
मिलने की अब, आश जगाओ ना,
समय हमारे पास, अब खास नहीं है।
नहीं, अबला हो, नहीं है, कोई सीमा, नहीं कभी, तुम खाली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
कर्तव्य पथ पर, खुद को लुटाया।
बेटी का भी, हर,  कर्तव्य निभाया।
खुद को मिटाकर, सबको संवारा,
अपना भाव, नहीं, किसी को बताया।
पास भले ना,  साथ हो रहती, नर बगिया की, तुम माली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।

Saturday, May 2, 2020

स्वाभाविक सहयोगी दोनों

 कोई न किसी पर भारी है

                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


प्रेम का भौतिक रूप प्रकृति है, नर की प्रकृति नारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
कोमल और कठोर न कोई।
प्रकृति सींचती, नर ने बोई।
सृष्टि का आधार हैं दोनों,
छोटा-बड़ा, यहाँ नहीं है कोई।
भावों का भण्डार है नारी, नर की तर्कशीलता प्यारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
प्रकृति-पुरुष संबंध निराला।
जन्म दिया है, उसने पाला।
लक्ष्य विहीन नर भटक रहा था,
पहना दी, उसने वरमाला।
असंतुष्ट वह,  रहा अपूरण,  पूरण करती नारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।
चट्टानों से वह टकराये।
सागर में भी राह बनाये।
सारी वेदना, पीड़ा भोगे,
बस एक बार नारी मुस्काये।
अलग-अलग असंतुष्ट अपूरण, मिल, पूरण इच्छा सारी है।
स्वाभाविक सहयोगी दोनों, कोई न किसी पर भारी है।।

Friday, May 1, 2020

कदम-कदम, मैं साथ चलूँगा, बस सीमाओं में उड़ना होगा

शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा


                             डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


कितनी भी आयें, कठिनाई, तुमको, आगे बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
जिस गंतव्य, तुम जाना चाहो।
जिस लक्ष्य को, पाना चाहो।
सक्षम हो तुम, कर सकती हो।
गाओ, जो तुम, गाना चाहो।
रूककर कुछ, विश्राम करो तुम, पथ पर फिर से, बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
अंधकार में, मत घबड़ाना।
प्रेम का छोटा, दीप जलाना।
अकेलापन जब, तुम्हें डराये,
दिल से तुम, आवाज लगाना।
कदम-कदम, मैं साथ चलूँगा, बस सीमाओं में उड़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।
संघर्ष नहीं, समन्वय करके।
एक-दूजे के पूरक बनके।
साथ रहे हैं, हम साथ रहेंगे,
पा लेंगे, सब साथ में चलके।
नर-नारी को साथ-साथ मिल, आनंद पथ पर बढ़ना होगा।
कोमल हो, पर दृढ़ भी तो हो, शिखरों पर, तुम्हें चढ़ना होगा।।

Thursday, April 30, 2020

प्रकृति का कण-कण है नारी


                       
प्रकृति का कण-कण है नारी।
सरस, सलिल, सरिता है नारी।
गगन में काली छायी घटायें,
मानो केश सुखाती नारी।

चहचहाहट, संगीत है नारी।
चिड़ियों के ये गीत है नारी।
पर्वतों पर छायी हरियाली,
वक्षस्थल पर केश ज्यों नारी।

प्राची लाल, शर्माती नारी।
खिलती कली, मुस्काती नारी।
सुन्दर नहीं, दाड़िम की लाली,
अधर हैं, ज्यों हँसती है नारी।

मंद सुगंधित, पवन है नारी।
ठण्ड में गरम, छुवन है नारी।
प्रेम राग में, झूम रही जो,
नर्तन कला, नर्तकी नारी।

क्रोध में काली, बनती नारी।
प्रेम में खुद को, लुटाती नारी।
जग की सारी पीड़ा सहती,
माता जब बनती है नारी।

खुद से खुद को छुपाती नारी।
मन्द-मन्द, मुस्काती नारी।
लोक लाज से डरती इतनी,
जीवन जेल बनाती नारी।

बेटी के रूप में, प्यारी नारी।
बहिन का प्यार है, राखी नारी।
माँ बन, जब वात्सल्य लुटाये,
खुद को भुलाती, रमणी नारी।

पल-पल समर्पित, तुझको नारी।
तुझे समर्पित जग ये नारी।
तुझ बिन कोई अस्तित्व न नर का,
सब कुछ सौंपा तुझको नारी।

Wednesday, April 29, 2020

धोखे की ठोकर, घायल आत्मा

नारी बिन नर!

                    डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नींद ही जाकर, कहीं सो गई है।
चिंता, दुख से,  बड़ी हो गई है।
तूने,  जब से,  दिया है धोखा,
कोमलता भी, कड़ी,  हो गई है।

नारी बिन, नर! जी नहीं सकता।
स्वयं, जहर, कभी, पी नहीं सकता।
छल, छद्म, षड्यन्त्र, मुकदमें,
अवसाद अमर, कभी मर नहीं सकता।

प्रेम की मूरत, अब कहाँ खो गई है?
मातृत्व की गरिमा, कहाँ सो गई है?
प्रेम, समर्पण, और सृजन की देवी,
नारी! ठगिनी, कैसे  हो गई है?

ठोकर की, अब, चिंता न मुझको।
मैंने, सब कुछ, सौंपा था तुझको।
लोभ-लालच की करके सवारी,
कमाया है जो, देगी वो किसको?

अपने पर,  विश्वास,  बड़ा था।
नारी हित, हो कर्म, अड़ा  था।
धोखे की ठोकर, घायल आत्मा,
अडिग हूँ, पथ पर, जहाँ खड़ा था।

नारी! ठगिनी, कह नहीं, सकता।
ठगा गया हूँ, ठग  नहीं सकता।
सुता, बहिन, माता भी नारी,
नारी बिन, नर रह नहीं सकता।




Thursday, April 23, 2020

झूठा सच!

जो धोखा दे, पत्नी कहते हैं


               

                                                    डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



झूठा सच! हम बोल रहे हैं।
बिना तराजू तोल रहे हैं।
नर-नारी के रिश्ते में अब,
कानून ही विष घोल रहे हैं।

गृह लक्ष्मी अब मेम हो गईं।
चलता फिरता जेम हो गई।
कैसा पति और कैसे बच्चे?
सोशल मीडिया, फेम हो गई।

घर अब आफिस जैसा चलता।
बच्चा भी अब क्रैच में पलता।
पति-पत्नी पद, हुए कानूनी,
विश्वास सूर्य, कपट से ढलता।

पति-पत्नी अब, चलते चालें।
एक-दूजे को, बनें न ढालें।
पति का बीमा, है करोड़ का,
पत्नी सोचे, राम उठा ले।

सुविधाओं को सुख कहते हैं।
रोते-हँसते, सुख सहते हैं।
शादी भी व्यवसाय बन गई,
जो धोखा दे, पत्नी कहते हैं।

प्रेम नाम, हैं  धंधे  होते।
शर्म, हया, अब रिश्ते खोते।
मिलने से, हो जाय, कोरोना,
मिलेगा वही, जो हम हैं बोते।