Sunday, May 3, 2020

अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति

नारी! अजब निराली हो


                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


अजीब सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।
आवाज से ही, आकर्षित करतीं,  नहीं,  सिर्फ  घरवाली हो।।
नाम नहीं कोई, न मुलाकात होगी।
आमने-सामने, कभी न बात होगीं।
अजीब सी आशा, जगाती हो क्यूँ?
देवी दर्शन, बड़ी सौगात होगी।
निराशा में भी, तुम, आश जगातीं, प्रेम से पूरित प्याली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
प्यार न मिला, कोई आश नहीं है।
खुश रहो, तुम सदा, अरदास यही है।
मिलने की अब, आश जगाओ ना,
समय हमारे पास, अब खास नहीं है।
नहीं, अबला हो, नहीं है, कोई सीमा, नहीं कभी, तुम खाली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।।
कर्तव्य पथ पर, खुद को लुटाया।
बेटी का भी, हर,  कर्तव्य निभाया।
खुद को मिटाकर, सबको संवारा,
अपना भाव, नहीं, किसी को बताया।
पास भले ना,  साथ हो रहती, नर बगिया की, तुम माली हो।
अजीव सी शक्ति, अजीब सी भक्ति, नारी! अजब निराली हो।

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