Thursday, April 30, 2020

प्रकृति का कण-कण है नारी


                       
प्रकृति का कण-कण है नारी।
सरस, सलिल, सरिता है नारी।
गगन में काली छायी घटायें,
मानो केश सुखाती नारी।

चहचहाहट, संगीत है नारी।
चिड़ियों के ये गीत है नारी।
पर्वतों पर छायी हरियाली,
वक्षस्थल पर केश ज्यों नारी।

प्राची लाल, शर्माती नारी।
खिलती कली, मुस्काती नारी।
सुन्दर नहीं, दाड़िम की लाली,
अधर हैं, ज्यों हँसती है नारी।

मंद सुगंधित, पवन है नारी।
ठण्ड में गरम, छुवन है नारी।
प्रेम राग में, झूम रही जो,
नर्तन कला, नर्तकी नारी।

क्रोध में काली, बनती नारी।
प्रेम में खुद को, लुटाती नारी।
जग की सारी पीड़ा सहती,
माता जब बनती है नारी।

खुद से खुद को छुपाती नारी।
मन्द-मन्द, मुस्काती नारी।
लोक लाज से डरती इतनी,
जीवन जेल बनाती नारी।

बेटी के रूप में, प्यारी नारी।
बहिन का प्यार है, राखी नारी।
माँ बन, जब वात्सल्य लुटाये,
खुद को भुलाती, रमणी नारी।

पल-पल समर्पित, तुझको नारी।
तुझे समर्पित जग ये नारी।
तुझ बिन कोई अस्तित्व न नर का,
सब कुछ सौंपा तुझको नारी।

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