Wednesday, April 22, 2020

नारी ही, जननी है, नर की

नारी प्राणाधार है



नारी शक्ति, नारी भक्ति, नारी पालनहार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
जन्मदात्री है, नर की, नारी।
प्राकृतिक सखी, सहचरी, नारी।
नारी बिन, नर, नहीं चल सकता,
उँगली पकड़, चलाती नारी।
नारी ही, सृष्टि का मूल है, नारी ही, से घर-द्वार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
नारी ही है, घर को बनाती।
नारी ही है, घर की बाती।
नारी दुर्गा, नारी काली,
प्रेम से, नर को, है नहलाती।
नारी ही की, प्रेरणा पर नर, मर-मिटने को तैयार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।
नारी ही सृजन है करती।
प्रेमी के लिए, रति ये बनती।
ज्ञान की देवी, नारी सरस्वती,
गृहलक्ष्मी भी, नारी बनती।
नर को, प्राणों से सहलाकर, नर को देती धार है।
नारी ही, जननी है, नर की, नारी प्राणाधार है।।

Monday, April 20, 2020

हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना

तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे

                   

हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।
जब तक, तुम नहीं चाहोगी, हम राहों में नहीं आयेंगे।।
नयनों में ही, नहीं बसी हो।
दिल के अंदर, तुम्ही सजी हो।
तुम्हारे बिना, ये जीवन कैसा?
प्रेम से प्यारी, मेरी सखी हो।
तुम्हारे सपनों की खातिर, हम, जीवन भर सो जायेंगे।
हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।
पीछा तुम्हारा, कभी न करेंगे।
तुम्हें देखकर, नहीं, आह भरेंगे।
तुमको खुशियाँ, मिलती रहें बस,
जीवन पथ पर, अकेले चलेंगे।
तुम्हारे पथ पर, पुष्प सजायें, प्रेमी को, गले लगायेंगे।
हम तुम्हें प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।
तुम्हें न कभी, मजबूरी हो।
सुविधा मिलें, जो, जरूरी हो।
पथ में, न आये, कोई बाधा,
इच्छा हमारी, यह, पूरी हो।
रहो कहीं भी, आनंद से चहको, हम तुम्हें देख मुस्कायेंगे।
हम तुम्हें, प्यार करते हैं, इतना, तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।।

Sunday, April 19, 2020

हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना?

ये अहसास दिला न सके


                                                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।
साथ तुम्हारा, पल पल चाहा, हम, तड़पे कितना? बता न सके।
समय न माँ का, मिला बचपन में।
किताबों में खोये, थे जिदपन में।
युवावस्था, सारी, संघर्ष में बीती,
आज भी, अकेले, हम पचपन में।
नारी हित में, जीये थे पल-पल, साथ कभी भी पा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।
प्रेम छिपा, हम रहे घूमते।
साहस नहीं था, तुम्हें चूमते।
हम तो, दिल की, नहीं कह पाये,
मिली न कोई, जो दिल की पूछते।
कदम-कदम पर, मिलीं कई थीं, दिल की बात, बता न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास, दिला न सके।।
सच्चाई की, चाह थी हमको।
छिपाव कपट बर्दाश्त न हमको।
सब कुछ कह ले, सब कुछ सुन ले,
साथी कोई भी, मिली न हमको।
कदम-कदम पर प्यार लुटाया, विश्वास किसी का पा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।
कभी किसी से, कुछ नहीं चाहा।
सच बोले बस, वह भी न पाया।
मैंने सब कुछ, सौंप दिया था,
सब कुछ छिपाकर, क्यों भरमाया?
प्यार के नाम क्यों, मिलते धोखे? हम, अपने को समझा न सके।
हम करते थे, प्यार तुम्हें कितना? ये अहसास दिला न सके।।

Thursday, April 16, 2020

नारी नहीं है नर पर भारी

ईश्वर की वह रचना प्यारी



                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नारी नहीं है नर पर भारी।
ईश्वर की वह रचना प्यारी।
कुछ इच्छाएँ, उसकी भी हैं,
सजाती हमारी जीवन क्यारी।

पूजा नहीं बस प्रेम चाहिए।
थोड़ा सा सम्मान चाहिए।
जन्म लेने दो, जीने दो,
उड़ने को आसमान चाहिए।

संपत्ति की, नहीं है इच्छा।
दे लेंगी हम, कठिन परीक्षा।
सोना चाँदी, नहीं चाहिए,
स्कूल भेजो, दे दो शिक्षा।

शिक्षा अनुरूप, काम चाहिए।
खुली हवा में श्वांस चाहिए।
सुरक्षित बाहर घूम सकें हम,
सुरक्षित  वातावरण  चाहिए।

पराये घर की कहा न जाए।
अधिकारों को लड़ा न जाए।
मायके की ना भेंट चाहिए, 
दान करो हमें, सहा न जाए।

आँसू अब तक बहुत बहाये।
महिला हैं, अबला कहलाये।
अपना भाग्य, खुद ही लिखेंगी,
देवी कह, अब तक,  बहलाये।

घृणा नहीं, हम, प्रेम हैं करतीं।
मुस्कानों  से  पीड़ा  हरतीं।
कदम-कदम  बाधाएँ  आएँ,
मौत से भी हम नहीं हैं डरतीं।

आरक्षण,  हमें  नहीं चाहिए।
दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।
यह घर भी अपना कहलाए,
उस घर का भी प्यार चाहिए।

राष्ट्रप्रेमी बस मान चाहिए।
जीने के अरमान चाहिए।
सब कुछ अर्पण कर दूँगी मैं,
दया नहीं, स्वाभिमान चाहिए।

पिता से थोड़ा दुलार चाहिए।
भाई से, बहन का, प्यार चाहिए।
सब कुछ देकर, थोड़ी आशा,
सखा! सदैव, बस साथ चाहिए।

तन मन धन सब अर्पण है।
मेरा  उर, तेरा  दर्पण है।
नर-नारी हम पूरक दोनों,
कर दूं, सब तुझको अर्पण है।

साथ में मिलकर, हम होते पूरे।
अलग-अलग, दोनों ही अधूरे।
अपना अपना, आपा मिटा कर,
जग के सपने, हम कर दें पूरे।

Tuesday, April 14, 2020

प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है

प्रेम की देवी

                                    

प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करूणा की तू खान है।
बेटी, बहिन, पत्नी, माता बन, जग का रखती ध्यान है।।
कार्य क्षेत्र की, नहीं कोई सीमा।
आश्वासन  ही, है  बस  बीमा।
अंदर बाहर, काम ये करतीं,
कल्पना, करीना या हो हसीना।
अदम्य जिजीविषा है अन्तर में, मानिनी मन की मान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।
बचपन  से है,  मुझे दुलारा।
गुस्से में भी,  दिया  सहारा।
दौड़ी-दौड़ी,  आई  माता,
पीड़ा में, जब भी मैंने पुकारा।
पति, पुत्र, पिता, भाई हित, खुद को करे कुर्बान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।
समान नहीं, तू अति विशिष्ट है।
सब कुछ तुझमें, अन्तर्विष्ट है।
सीमाएं जब, नर है लांघता,
काली बनकर, करे शिष्ट है।
तन-मन-धन सब करूँ समर्पित, करूँ समर्पित ज्ञान है।
प्रेम की देवी, ममता की मूरत, करुणा की तू खान है।।

Monday, April 13, 2020

प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू

तू ही रस की खान है


                                     


प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।
तू ही प्रेम की सीमा मेरी, मेरे उर की जान है।।
केशोें की ये, काली घटायें।
नयन कालिमा, कुटिल फिजायें।
कपोल लालिमा, सौन्दर्य बिखेरे,
उर पर ताले, मदमस्त कुचायें।
सरस रसीली, चितवन, चित को, चित्रित करती मान है।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।।
नासिका मानो, शुक है विराजा।
अधरों की सुरखी, उसका खाजा।
चाल अदा, आमंत्रित करती,
इंतजार है, पिया  आजा।
नयन नजर है, मिलन प्रतीक्षा, कपोल लालिमा आन है।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।
बलखाती कटि, चलती है जब।
सभाल ले आंचल, कलि बिखरे कब?
चाहत चाहूँ, रहे चहकती,
तू ही प्यार है, तू ही है रब।
जीवन का आधार प्रेम है, मैं गाऊँ प्रेम के गान हैं।
प्रेममयी सौन्दर्यमयी तू, तू ही रस की खान है।

Sunday, April 12, 2020

सृष्टि का आधार तुम्हीं हो

नर की संगिनी आली हो

                                     

नारी नहीं, नई नवेली, रचना अजब निराली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
मधुर आवाज में, नर विंध जाता।
मुस्कान पर, मर मिट जाता।
अधरों के रसपान को ये नर,
ब्रह्माण्ड में, सबसे भिड़ जाता।
नर का आकर्षण, पाकर के, तुम होती मतवाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
अंग-अंग सौन्दर्य समाया।
कातिल कैसा? हुस्न ये पाया।
छाती की, गोलाइयों ने ही,
नर को तेरा गुलाम बनाया।
कैसे प्रेमी बच पायेगा? मारक गालों की लाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
कमर कटीली, चाल मदमाती।
नर हो जाता, मदमस्त हाथी।
मर्यादा कोई, ठहर न पाये,
जब तुम, उसको पास बुलातीं।
जान हथेली पर रखकर के, करता वह  रखवाली हो।
सृष्टि का आधार तुम्हीं हो, नर की संगिनी आली हो।।
 

Friday, April 10, 2020

भावों की सरिता है उर में,

भावों की सरिता है उर में

                                         डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।
आश्चर्य, घृणा, जुगुप्सा और भय, किंतु प्रेम सबसे हटकर है।
क्षणिक भाव हैं, आते-जाते।
हँसते हैं कभी, कभी रुलाते।
क्रोध में जाग्रत विवेक न रहता,
प्रेम गान जड़ चेतन गाते।
निर्वेद, हास और उत्साह से, प्रेम का मुकाबला डटकर है।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।
शोक, वात्सल्य और रति में।
जीवन की इस मंथर गति में।
प्रेम की माया, अजब निराली,
पत्नी अनुरक्त प्रेम से पति में।
प्रेम से सारे झगड़े मिटते, प्रेम से मिलते जब हँसकर हैं।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।
प्रेम समाया अंग-अंग में।
जरूरी नहीं, चले संग-संग में।
सबसे प्रेम, हम पथिक प्रेम के,
नहीं किसी के रंगे रंग में।
मानते है हम नियम कायदे, किंतु प्रेम सबसे चढ़कर है।
भावों की सरिता है उर में, किंतु प्रेम सबसे बढ़कर है।।


Thursday, April 9, 2020

रेगिस्तान में उड़ता रेत नर, नारी ज्यों फुलवारी है

नारी के बिन नर है अपूरण


                                       डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।
उड़ता हुआ बीज ज्यौं है नर, पौषण देती क्यारी है।
सुंदर और सरस है रमणी।
गोरी हो या  काली चमड़ी।
कठिन समय की खातिर देखो,
संचित करती है वह दमड़ी।
कोमल है वह शक्ति पुंज है, विधि की रचना न्यारी है।
 नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।
नारी बिन, नहीं है जीवन।
नर को देती नित संजीवन।
सरस स्पर्श और दिव्य दृष्टि से,
पोषण करती, देती जीवन।
माता, भगिनि, पत्नी प्रयसी, पुत्री भी जान से प्यारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।
नर नारी का विरोध नहीं है।
सरस प्रेम है, किरोध नहीं है।
तर्क-वितर्क और नोंकझोंक है,
आत्म मिलन में निरोध नहीं है।
रेगिस्तान में उड़ता रेत, नर, नारी ज्यों फुलवारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।
राष्ट्रप्रेमी को प्रेम मिला है।
प्रणय काल में पुष्प खिला है।
झूठ कपट की मूरत बनकर,
नारी ने ही दिया सिला है।
विध्वंस में भी प्रेम का कलरव, सृष्टि की किलकारी है।
नारी के बिन नर है अपूरण, पूरण करती नारी है।।

Wednesday, April 8, 2020

तुमने जिसको प्यार कहा है, वह तो सरासर धोखा है

प्यार तो माँगे प्रेम समर्पण

                                      डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

तुमने जिसको प्यार कहा है, वह तो सरासर धोखा है।
प्यार तो माँगे, प्रेम समर्पण, सच्चाई, निष्ठा भरोसा है।।
झूठ बोलकर शादी करना।
प्रेमी संग मिल, हत्या करना।
शिकारी का ही काम ये केवल,
फंदे, फंसा  वार  फिर करना।
मर जायेंगे, मिट जायेंगे, अब नहीं देंगे, मौका है।
प्यार तो माँगे, प्रेम समर्पण, सच्चाई, निष्ठा भरोसा है।।
झूठे वायदे, झूठे इरादे।
षडयंत्र से हमें गिरा दे।
शक्ति नहीं किसी में इतनी,
सच्चाई से हमें फिरा दे।
सब कुछ जानकर, चुनने के, अधिकार से तुमने रोका है।
प्यार तो माँगे, प्रेम समर्पण, सच्चाई, निष्ठा भरोसा है।।
पीड़ा दे ले, सह लेंगे हम।
सजा मिलेगी, भोगेंगे हम।
चाहे जितने, केस करो तुम,
मौत से भी, भिड़ जायेंगे हम।
धोखेबाज तुम, कुशल खिलाड़ी, झूठ का मारा चौका है।
प्यार तो माँगे, प्रेम समर्पण, सच्चाई, निष्ठा भरोसा है।।

Tuesday, April 7, 2020

हम जीत इस पर पायेंगे‌

जीत

                                                           डॉ सरला सिंह स्निग्धा
                                                                                           दिल्ली
हम जीत इस पर पायेंगे‌।
हम हार नहीं मानेंगे,------।

हारना सीखा न हमने,
दानव बड़े टकराये हमसे।
मानव हैं हम, श्रेष्ठतम हैं,
जीवों में उत्तम हैं सभी हम।
हारे नहीं युग में किसी भी,
वायरस ये चीज क्या है?
काल से भी नहीं  हारेंगे।
हम जीत इस पर पायेंगे‌,
हम हार नहीं मानेंगे,----।

जैसा हो अपना कर्मपथ,
कंटकों से  परिपूर्ण हो।
चलकर सहज भाव से ,
करके निज कर्त्तव्य हम।
अपने अपने कर्म करके,
जीतपथ हासिल करेंगे।
हम जीत इस पर पायेंगे,
हम हार नहीं मानेंगे,----।

कठिन पर अप्राप्य नहीं,
जीत हासिल हमें होगी।
वायरस कोरोना नष्ट करें,
हम सबने यही ठानी है।
मानव ही कुछ राक्षस बने,
उनका ही यह कुटिलता।
हम जीत इस पर पायेंगे‌,
हम हार नहीं मानेंगे,----।



वनिता, बन्नो का पर्याय राग

पत्नी बन, सजाती जग की क्यारी है

                       
महिला, वामांगिनी, वनिता, रमणी, कांता, शक्ति, सुंदरी, जन्मदात्री नारी है।
सजनी, सहचरी, वल्लभा, वामा, पत्नी बन, सजाती जग की क्यारी है।।
औरत, स्त्री, सबला है तू, तू ही पत्नी दारा है।
सहधर्मिणी, घरनी, भामिनी, चढ़े न तेरा पारा है।
गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी, गृृृहिणी, शक्ति स्वरूपा दुर्गा तू,
जहाँ भी जाती, घर है बनाती, भले ही वहाँ पर कारा है।
श्रीमती, बेगम, अर्धांगिनी, धर्मपत्नी, संगिनी, घरवाली की लीला न्यारी है।
सहगामिनी, प्राणेश्वरी, प्रियतमा, माता बन, सजाती जग की क्यारी है।।
बीबी और लुगाई भी है, कलत्र,जनानी, जाया है।
अबला, जोरू, परिणीता, बन तूने नर भरमाया है।
भार्या, बहू, वधू, वामांगना, अंकशायिनी, माया तू,
राष्ट्रप्रेमी ने वनिता, बन्नो का पर्याय राग ही गाया है।
जीवनसंगिनी, गेहिनी, प्रिया, हृदयेश्वरी, बन्नी, साजन को सजनीे प्यारी है।
प्राणप्रिया, तिय, तिरिया, दुलहन, प्राणवल्लभा बन, सजाती जग की क्यारी है।।
दयिरा, दुलहिन, शक्ति की देवी, काली ने नाच नचाया है।
शैलपुत्री, पार्वती, सती, प्रेयसी बन, प्यार का पेच फंसाया है।
महिलाओं की, महानता के, महान गान, कौन यहाँ गा पाये?
सृष्टि के सृजन की देवी, रति ने, रोते नर को हँसाया है।
आया है सृजन का पल, सृजन की देवी रमा की, अब घर सजाने की तैयारी है।
सुता, बहिन, पृथ्वी, माता, सृजनहार, जननी बन, सजाती जग की क्यारी है।।



Monday, April 6, 2020

मुझको तो आकर्षित करतीं

उसकी आँखों की प्याली है

                                     
भले ही काली- काली है, लेकिन मेरी घरवाली है।
मुझको तो आकर्षित करतीं, उसकी आँखों की प्याली है।।
बात-बात पर झूठ बोलती।
नहीं, कभी भी, राज खोलती।
प्रेमी के संग उड़ जाने को,
अपने पर है, रोज तौलती।
इच्छा तेरी पूरी हों सब, बने प्रेमी की डाली है।
मुझको तो आकर्षित करतीं, उसकी आँखों की प्याली है।।
धोखे से था ब्याह रचाया।
पल-पल मुझको था भरमाया।
धन की खातिर बनकर ठगिनी,
झूठा मुकदमा दर्ज कराया।
प्रेम के नाम ठगती है सबको, लेकिन प्रेम से खाली है।
मुझको तो आकर्षित करतीं, उसकी आँखों की प्याली है।।
कानून जाल में मुझे फंसाकर।
जेल का मुझको डर दिखलाकर।
शिकार करने को आतुर शिकारी,
पत्नी नहीं, शिकारी शातिर।
मैं तो खुशियाँ चाहूँ उसकी, वो मेरी मौत की जाली है।
मुझको तो आकर्षित करतीं, उसकी आँखों की प्याली है।।
नहीं चाहता तेरा बुरा हो।
स्वर कभी तेरा बेसुरा हो।
तुझको तेरी खुशियाँ मुबारक,
राष्ट्रप्रेमी आजाद खरा हो।
पढ़ी-लिखी आधुनिक विषकन्या, तेरी शान निराली है।
मुझको तो आकर्षित करतीं, उसकी आँखों की प्याली है।।

Sunday, April 5, 2020

साथ भले ही ना मिल पाया

हम तो साथ निभायेंगे

                                     

साथ भले ही ना मिल पाया, हम तो साथ निभायेंगे।
अपने पथ पर आगे बढ़ो तुम, पलकों से उसे सजायेंगे।।
तुमने साथ भले ही छोड़ा।
हमने कभी भी मुख ना मोड़ा।
अब भी आश न छोड़ी हमने,
चलते हैं हम थोड़ा-थोड़ा।
नहीं भी मिलने आओगे, हम स्वप्न में गले लगायेंगे।
अपने पथ पर आगे बढ़ो तुम, पलकों से उसे सजायेंगे।।
यही चाह  है, केवल हमको।
सारी खुशियाँ मिल जायँ तुमको।
तुम अपनी चाहत के संग जीओ,
तन्हाई  ही  भाई  हमको।
तुम्हें तुम्हारी खुशियाँ मिलें बस, हम खुद को ही ठुकरायेंगे।
अपने पथ पर आगे बढ़ो तुम, पलकों से उसे सजायेंगे।।
प्रेम तुम्हारा, तुम्हें मिल जाये।
तुमसे मिले, वह भी हरषाये।
तुम्हारी खुशियों की अनुभूति,
हमको भी खुशियाँ दे जाये।
हम तो  तुम्हारे  प्रेमी के भी, पथ  में  पुष्प  विछायेंगे।
अपने पथ पर आगे बढ़ो तुम, पलकों से उसे सजायेंगे।।

Saturday, April 4, 2020

सब कहते काली काली है

समझो मेरी घरवाली है

                                       
सब कहते काली काली है, समझो मेरी घरवाली है।
अधरों से गाली रस टपके, लगे जहर की प्याली है।।
नारी  है,  पूजा  करनी  है।
जीना है, माँग भी भरनी है।
खप्पर वाली देवी है वह,
नहीं किसी से डरनी है।
धोखा दे, प्यार वो पाने चली, कानून हाथ, मति खाली है।
अधरों से गाली रस टपके, लगे जहर की प्याली है।।
षडयंत्र, प्रपंच की है देवी।
पत्नी बन प्राणों की लेवी।
प्यार के नाम है, केस करे,
अद्भुत देवी, बनी फरेबी।
यारों की सखी, समर्पित है, वह कालदेव की साली है।
अधरों से गाली रस टपके, लगे जहर की प्याली है।।
अंग-अंग झूठ समाया है।
नारी नहीं, वह माया है।
राष्ट्रप्रेमी भी राष्ट्र को भूला,
जब से उसने, फंसाया है।
समझे खुद को सौंदर्य की देवी, कामदेव की आली है।
अधरों से गाली रस टपके, लगे जहर की प्याली है।।

Friday, April 3, 2020

सभी प्रेम की बातें करते

दिल में नफरत लिए घूमते

                                      
सभी प्रेम की बातें करते, दिल में नफरत लिए घूमते।
गला काटने की तैयारी, फिर भी देखो हाथ चूमते।।
आई लव यू ब्राण्ड बन गया।
मरघट भी बाजार बन गया।
धोखे से दुल्हन बन करके,
झूठा दहेज का केस लग गया।
पति-पत्नी अब पद ही होते, एक-दूसरे को रोज मूढ़ते।
सभी प्रेम की बातें करते, दिल में नफरत लिए घूमते।।
पैसे से हों, रिश्ते-नाते।
प्रेम नाम केवल भरमाते।
हाईटेक हैं आज के प्रेमी,
एसिड अटैक से होती घातें।
जेल भेजते, मर्डर करते, ज्यों कढ़ाई में चने भूनते।
सभी प्रेम की बातें करते, दिल में नफरत लिए घूमते।
ग्लेमर के जादू की खूबी।
धन की खातिर प्रेम में डूबी।
प्रेम जाल में धनिक फंसाकर,
करती मस्ती, बनती मूवी।
रिश्ते हैं बाजार में बिकते, प्रशिक्षित दुल्हन शिकार ढूढ़ते।
सभी प्रेम की बातें करते, दिल में नफरत लिए घूमते।
राष्ट्रप्रेमी पग पग पर धोखे।
सत्य राह चल, देख न मौके।
भले ही कोई तुझको लूटे,
रूकना नहीं किसी के रोके।
सावधान हो! आगे बढ़ना, अपने बनकर लोग मूढ़ते।
सभी प्रेम की बातें करते, दिल में नफरत लिए घूमते।

Thursday, April 2, 2020

मनमौजी हम, डरें न मृत्यु से

जीवन, जग ही, संकट में  अब

                         


विकट परिस्थिति, भय है छाया, सरकार ने आपात लगाया है।
मनमौजी हम,  डरें न मृत्यु से,  लापरवाही को अपनाया है।।
चीन, अमेरिका, इटली भी फेल।
फिर भी, भारतीयों में, रेलम-पेल।
सिखाने का, जिन पर ठेका है, वह भी,
जीवन  को,  समझें हैं,  खेल।
कहीं भी घूमें, कफ्र्यू न माने, पुलिस को भी इन्होंने छकाया है।
विकट परिस्थिति, भय है छाया, सरकार ने आपात लगाया है।।
काम करो घर से, नया है फण्डा।
ना निकल, घर से, पड़ेगा डण्डा।
जीवन, जग ही, संकट में  अब,
बचाव, धैर्य, और मन रख ठण्डा।
छोटे से,  वायरस ने,  आकर,  मानव घमण्ड,  मिटाया है।
विकट परिस्थिति, भय है छाया, सरकार ने आपात लगाया है।।
खाने के,  पड़  रहे हैं लाले।
शैतान चलते, फिर भी चालें।
एक-एक सप्ताह, पैदल चलकर,
मिला न कुछ भी, जो ये खालें।
साथ-साथ मिल, आओ लड़े, दूर-दूर रह, मुद्दा, अब गरमाया है।
विकट परिस्थिति, भय है छाया, सरकार ने आपात लगाया है।।
महामारी से आओ लड़े हम।
जीवन बचायें, न महान बने हम।
राष्ट्रप्रेमी भी है, आज रो पड़ा,
करते भी ना, आज, लाज हम।
मौत में भी, कालाबाजारी, करने वालों से, शरम को भी शरमाया है।
विकट परिस्थिति, भय है छाया, सरकार ने आपात लगाया है।।

Sunday, March 29, 2020

दिल से दिल जब मिले हुए हैं, गले मिलाकर क्या करना?

कोरोना से क्या डरना?

                                        डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


दिल से दिल जब मिले हुए हैं, गले मिलाकर क्या करना?
सामाजिक दूरी पर रहते हम, फिर कोरोना से क्या डरना?
हाथ जोड़कर नमस्ते करना।
स्वच्छता संग, योग है करना।
हम घर के अंदर रहें सुरक्षित,
जीतेंगे हम, नहीं है डरना।
घर बैठे हम कार कर रहे, कार्यालय जाकर क्या करना?
सामाजिक दूरी पर रहते हम, फिर कोरोना से क्या डरना?
हाथ मिलाना छोड़ो भाई।
दिल से दिल को जोड़ो भाई।
परिवार के साथ में वक्त बिता,
सुखी रहो सब लोग-लुगाई।
परिवार जनों को समय आज दो, बाहर जाकर क्या करना?
सामाजिक दूरी पर रहते हम, फिर कोरोना से क्या डरना?
कोरोना ने कहर है ढाया।
इटली और ईरान हिलाया।
धैर्य और संयम आज फिर,
मोदी जी ने याद दिलाया।
भारत भू है तपोभूमि, फिर एकान्तवास से क्या डरना?
सामाजिक दूरी पर रहते हम, फिर कोरोना से क्या डरना?

Saturday, March 28, 2020

होठों पर मुस्कान मधुमई

प्रेम लुटाता हूँ

                                   
नहीं कामना, कामिनी कोई, मैं तो प्रेम लुटाता हूँ।
होठों पर मुस्कान मधुमई, जिसे देख मुस्काता हूँ।
सुंदरता की मूरत हो तुम।
भोलेपन की सूरत हो तुम।
वाकपटु, व्यवहार कुशल हो,
सादगी भरी, खुबसूरत हो तुम।
तुमसे सीखा प्रेम समपर्ण, मैं गीत तुम्हारे गाता हूँ।
नहीं कामना, कामिनी कोई, मैं तो प्रेम लुटाता हूँ।।
जहाँ रहो, स्वतंत्र रहो तुम।
स्वस्थ रहो,  प्रसन्न रहो तुम।
खुशियाँ तुम्हें मिलें जीवन में,
हमें कभी ना याद करो तुम।
प्रकृति के कण-कण में पल पल, देख तुम्हें मैं पाता हूँ।
नहीं कामना, कामिनी कोई, मैं तो प्रेम लुटाता हूँ।।
तुम्हारे पथ का पथिक नहीं हूँ।
रमणी, साथी  सही नहीं हूँ।
भटकन ही अपना पथ प्यारी,
बसने में, मैं कहीं नहीं हूँ।
तुम अपनी चाहत को पाओ, दुआ यही, मैं दे जाता हूँ।
नहीं कामना, कामिनी कोई, मैं तो प्रेम लुटाता हूँ।।

Friday, March 27, 2020

सुता, भगिनि, पत्नी माता बन, नर की प्राणाधार हो

                               


सुता, भगिनि, पत्नी माता बन, नर की प्राणाधार हो।
नारी बिन अस्तित्व न नर का, तुम ही जग की सार हो।
विद्या की देवी हो तुम ही।
शिव की शक्ति भी हो तुम ही।
जिसके पीछे जग बौराया,
धन की लक्ष्मी भी हो तुम ही।
मुस्कान पर नर मिट जाता तुम से कारोबार हो।
सुता, भगिनि, पत्नी माता बन, नर की प्राणाधार हो।।
तुम से नर संपूरण होता।
तुम बिन खाये भंवरों में गोता।
तुम जब नर से मिल जाती हो,
तभी पुष्प सृष्टि का खिलता।
तुम हो कामना, तुम हो भावना, भक्ति तारणहार हो।
सुता, भगिनि, पत्नी, माता बन, नर की प्राणाधार हो।।
तुमरे बिन जग धर्म न होता।
तुम ही जग में, अर्थ की स्रोता।
तुम ही कामना, काम की हो रति,
तुम से ही नर मोक्ष है पाता।
राष्ट्रप्रेमी कृतज्ञ तुम्हारा, माँ! तुम ही पालनहार हो।
सुता, भगिनि, पत्नी, माता बन, नर की प्राणाधार हो।।

Thursday, March 26, 2020

अभूतपूर्व परिस्थिति भाई, हम सरकार के साथ हैं

कोरोना से मत  घबड़ाओ।

                 
अभूतपूर्व परिस्थिति भाई, हम सरकार के साथ हैं।
नहीं थामने हाथ किसी के, नहीं मिलाने गात हैं।।
मानव जाति की शामत आई।
कोरोना  ने  जगह   बनाई।
मरना नहीं है, मिटना नहीं है,
अलग-अलग रह  जीना भाई।
घर से बाहर नहीं निकलना, मोदी जी की बात हैं।
नहीं थामने हाथ किसी के, नहीं मिलाने गात हैं।।
रखो सफाई, दूरी बनाओ।
बातें करो, पर पास न आओ।
जिजीविषा जिंदा है जब तक,
कोरोना से मत  घबड़ाओ।
घर में रह लो घर वाली संग, बच्चों संग सौगात है।
नहीं थामने हाथ किसी के, नहीं मिलाने गात हैं।।
दिल से दिल की बातें कर लें।
समय मिला परिवार की सुन लें।
अपने हाथ से खाना खिलाकर,
पत्नी के दिल की, धुन कुछ सुन लें।
कोरोना ने दिया है अवसर, खुद ही खुद के साथ हैं।
नहीं थामने हाथ किसी के, नहीं मिलाने गात हैं।।

Thursday, March 19, 2020

नारी है जग जननी जग में

यदि अंतर में प्रेम बसा हो।


नारी है जग जननी जग में, यदि अंतर में प्रेम बसा हो।
मन-मंदिर में मोह की मूरत, मानिनी में अरमान सजा हो।।
प्रेम में वह बहती नदियाँ हैं।
इंतजार में, बहती सदियाँ हैं।
लक्ष्य हेतु कुछ भी कर जाती,
कामना की खिलतीं कलियाँ हैं।
मुस्कान पर जग दीवाना, क्रोध में काल का वाद्य बजा हो।
नारी है जग जननी जग में, यदि अंतर में प्रेम बसा हो।।
पल पल करतीं, सब कुछ अर्पण।
स्पष्टवादिनी,   बनती   दर्पण।
प्रेम में हैं, सर्वस्व  लुटातीं,
असंतुष्ट हो,  करती  तर्पण।
शक्ति पुंज, सृजन की देवी, सब कुछ देती यदि रजा हो।
नारी है जग जननी जग में, यदि अंतर में प्रेम बसा हो।।
अज्ञानी, जो पिछड़ी  कहते।
गृहिणी के बिन, घर ना रहते।
सुता, बहिन, पत्नी माता बिन,
उच्च भवन को घर ना कहते।
नर-नारी मिल साथ चलें जब, पथ, पाथेय गंतव्य सजा हो।
नारी है जग जननी जग में, यदि अंतर में प्रेम बसा हो।।

Sunday, March 15, 2020

प्रेम लुटाने की फितरत है, लेने का कोई ख्वाब नहीं है

प्रेम कोई व्यापार नहीं है


प्रेम पुजारी हूँ, मैं केवल, और कोई भी भाव नहीं है।
प्रेम के बदले, प्रेम मैं माँगू, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।।
प्रेम नहीं है गुलाम किसी का।
समर्पण करे, है प्रेम उसी का।
प्रेम नाम षड्यंत्र ये कैसे?
प्रेम पवित्र है, भाव सभी का।
प्रेम लुटाने की फितरत है, लेने का कोई ख्वाब नहीं है।
प्रेम के बदले, प्रेम मैं माँगू, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।।
प्रेम मधुरता समस्त सृष्टि  की।
प्रेम अश्रु है, प्रयल वृष्टि की।
जड़-चेतन सब, प्रेम तत्व हैं,
प्रेम तरणि हैं, भाव समष्टि की।
प्रेम में नहीं आकलन होता, गणित का कोई हिसाब नहीं है।
प्रेम के बदले, प्रेम मैं माँगू, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।।
प्रेम में तुम खुबसूरत  होतीं।
तुमसे ही है, प्रेम की ज्योति।
झूठ प्रेम की कैंची जब में,
प्रेम बिना सब कुछ हो खोती।
प्रेम बिना, इस जग में मुझको, जीने का कोई चाब नहीं है।
प्रेम के बदले, प्रेम मैं माँगू, प्रेम कोई व्यापार नहीं है।।

तुम्हें प्रेम हम करते कितना

कण-कण में बस तुम दिखती हो

तुम्हें प्रेम हम करते कितना? इसका कोई माप नहीं है।
कण-कण में बस तुम दिखती हो, नाम का केवल जाप नहीं है।।
चाह नहीं है, हम तुम्हें पाएं।
हम तो गीत तुम्हारे गाएं।
हम तो तुम्हारे हर प्रेमी को,
अपना समझें गले लगाएं।
प्रेम वियोग है, जीवन पीड़ा, तुम हो पश्चाताप नहीं है।
कण-कण में बस तुम दिखती हो, नाम का केवल जाप नहीं है।।
नयन भले ही देख न पाएं।
अनुभूति से हम हरषाएं।
बाग-बाग हम हो जाते हैं,
समाचार तुम्हारे, हम सुन पाएं।
पीड़ा कितनी भी मिल जाए, हमको कोई ताप नहीं है।
कण-कण में बस तुम दिखती हो, नाम का केवल जाप नहीं है।।
स्वर सुनने को कान ये तरसे।
नयनों से भी अश्रु  बरसे।
जहाँ हो तुम, आनंदित हो बस,
यही जानकर हियरा  हरषे।
यादों के सहारे हम जी लेंगे, भले ही तुम्हारा साथ नहीं है।
कण-कण में बस तुम दिखती हो, नाम का केवल जाप नहीं है।।

Tuesday, March 10, 2020

हमने तुमरे हर प्रेमी को, अपना समझा गले लगाया।

जीते जी

                        संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


गुस्सा करते हो क्यों हम पर हम इसे झेल नहीं पायेंगे।
पल भर को तुम दूर हुए, हम जीते जी मर जायेंगे।।
            तुमने ही जीना सिखलाया,
            तुमने हमको पथ दिखलाया।
            निराशाओं में भटक रहे थे,
            तुमने आकर धैर्य बँधाया ।
दुनियां से हम अलग रहे पर तुम्हें छोड़ नहीं पायेंगे।
पल भर को तुम दूर हुए, हम जीते जी मर जायेंगे।।
            तुम ही केवल आश हमारी,
            तुम ही हो अरदास हमारी।
            तुम्हारी खातिर ही ता हम,
            दर-दर के हैं बने भिखारी।
साथ तुम्हारा यदि मिल जाये,हम भूखे सो जायेंगे।
पल भर को तुम दूर हुए, हम जीते जी मर जायेंगे।।
             तुमने जितना हमें भुलाया,
             उतना ही हमने अपनाया।
             हमने तुमरे हर प्रेमी को,
             अपना समझा गले लगाया।
तुमने हमको ना अपनाया, यादों में खो जायेंगे।
पल भर को तुम दूर हुए, हम जीते जी मर जायेंगे।। 

                     फिर भी आई, देखो, होली!

                                                     डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

वासंती के बजे तराने।
बातेें करते, सभी सुहाने।
प्रदूषण चहुँ ओर बढ़ रहा,
कैमीकल रंगते  मनमाने।
हिंसा की चलती है गोली।
फिर भी आई, देखो, होली!

चहुँ ओर है, भागम-भाग।
गोली चलतीं, लगती आग।
ऐसिड फेंके, पत्थर मारे,
पुलिस के साथ भी ऐसा फाग।
सीएए पर इनकी, कड़वी होती बोली।
फिर भी आई, देखो, होली!

होली रख कर, आग लगाते।
मन का मैल मिटा ना पाते।
काम न कर, व्यर्थ आलोचन,
स्वार्थ की खातिर हैं भरमाते।
फैशन नाम, केवल है चोली।
फिर भी आई, देखो, होली!

प्रदूषण तुम नहीं बढ़ाओ।
मन का सारा मैल मिटाओ।
परंपराओं में सुधार करो अब,
जीवन पर्यावरण  बचाओ।
आज की राधा, नहीं है भोली।
फिर भी आई, देखो, होली!

प्रेम के रंग में सबको रंग दें।
सद वृत्तियाँ, दिलों में भर दें।
लोक कल्याण का भाव जगाकर,
सबके दिल आनंदित कर दें।
सबके गालों पर हो, सच्चाई की रोली।
फिर भी आई, देखो, होली!
ई-मेलः santoshgaurrashtrapremi@gmail.com, चलवार्ता 09996388169/8787826168
                        visit us: rashtrapremi.com,www.rashtrapremi.in              
जवाहर नवोदय विद्यालय, महेंद्रगंज, दक्षिण पश्चिम गारो पहाड़ियाँ, मेघालय-794106 

Sunday, March 8, 2020

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष


सृष्टि का आधार हो

                                                   डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी


नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।
शक्ति रूपिणी, माँ दुर्गा हो, प्रेम की पारावार हो।
शहनशक्ति की सीमा हो तुम।
परिवार  हित,  बीमा  हो तुम।
तुम ही प्रेयसी, भगिनी, माता,
सहधर्मिणी,  वामा हो तुम।।
गृहलक्ष्मी तुम, धन की देवी, ज्ञान को देती धार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।
तुम हो अल्पना, तुम हो कल्पना।
तुम्हीं दिखातीं, नर  को सपना।
सर्वस्व ही, न्यौछावर करतीं,
जिसे मानती हो वश अपना।
शिव की शक्ति, भक्त की भक्ति, त्रिगुणों की तुम सार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।
राष्ट्रप्रेमी  की  यही कामना।
सीमित रहे ना, कोई भावना।
उन्नति के नित शिखर चढ़ो तुम,
नहीं चाहता, तुम्हें  थामना।
जहाँ पर जातीं, स्वर्ग बनातीं, भले ही कारागार हो।
नारी! नहीं केवल श्रद्धा हो, सृष्टि का आधार हो।।

Tuesday, March 3, 2020

अध्यापन- समाज सेवा के रूप में

      नौकर नहीं, अध्यापक बनें

                            डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

                     
कैरियर(जीवन-वृत्ति विकास) किसी भी व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। जीवन-वृत्ति का चयन उसकी जीवन यात्रा में महत्वपर्ण दिशादर्शन का कार्य करता है। युवाओं के चहेते संन्यासी स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को कैरियर दिवस के रूप में मनाने की बात भी की जाती है, इससे यह ही स्पष्ट होता है कि युवाओं के लिए कैरियर का चयन व उसमें सफलता की बुलन्दियों को छूना, ना केवल वैयक्तिक विकास के लिए आवश्यक है वरन् पारिवारिक, राष्ट्रीय व सामाजिक सन्दर्भो में भी महत्वपूर्ण होता है।
कैरियर अंग्रेजी का शब्द है। इसके उच्चारण को लेकर भी मतभेद हैं। कुछ लोग इसका उच्चारण करियर करके करते हैं तो कुछ कैरियर; मुझे तो कैरियर कहना ही अच्छा लगता है। अतः मैं इसी शब्द का प्रयोग करता हूँ।
पारंपरिक समाज में कैरियर के सीमित विकल्प ही उपलब्ध होते थे। वर्तमान समय में औद्योगिक विकास के साथ सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के युग में नित नवीन क्षेत्रों का विकास हुआ है किंतु पारंपरिक जीवन-वृत्ति का महत्व किसी भी प्रकार से कम नहीं हुआ है।
पारंपरिक कैरियर के विभिन्न क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण व सम्मानजनक कार्य अध्यापन रहा है। अध्यापक को गुरू का सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया था-
गुरू-गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पायँ।
बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय।।
शिक्षण पेशे की आवश्यकता उस समय भी थी और आज भी है। ज्ञान के विकास के साथ-साथ इसकी आवश्यकता बढ़ी ही है। जनसंख्या वृद्धि व शिक्षा के सार्वभौमिक उद्देश्य के साथ-साथ शिक्षकों की आवश्यकता निःसन्देह बढ़ी है। हाँ! अध्यापन पेशे के नए-नए रूप भी सामने आये हैं। अध्यापन एक नौकरी मात्र नहीं है। यह समाज सेवा है। अध्यापक को युग-निर्माता कहा गया है। 
अध्यापक है, युग निर्माता।
छात्र राष्ट्र के भाग्य विधाता।।
जब व्यक्ति अध्यापन पेशे को मात्र नौकरी के रूप में लेता है, तब वह अध्यापक के सम्मान को ठेस पहुँचा रहा होता है। नौकर को अध्यापक के पद पर नियुक्ति पा लेने से अध्यापक का सम्मान नहीं मिल जायेगा। अध्यापक के नौकर बन जाने के कारण ही जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है। जीवन मूल्यों के क्षरण के कारण अध्यापक के मान-सम्मान में कमी आई है या यूँ भी कहा जा सकता है कि अध्यापक के मान-सम्मान में कमी होने के कारण ही जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है और समाज नैतिक मानदण्डों की पुनस्र्थापना के प्रयत्न कर रहा है।
संख्याबल के आधुनिक युग में कई बार गुणवत्ता पिछड़ती हुई दिखाई देती है। यही स्थिति अध्यापन पेशे के संदर्भ में भी कही जा सकती है। अच्छे, समर्पित व निष्ठावान अध्यापकों का अभाव ही दिखाई देता है। नौकरी के लिए बेरोजगारों की कितनी भी लंबी लाइनें हों किंतु अध्यापकों की कमी निरंतर बनी हुई है। 
अध्यापन पेशे के प्रति आकर्षण भले ही कम दिखाई देता हो, बहुत बड़ी संख्या में युवक-युवतियाँ अध्यापन पेशे को अपना रहे हैं। हाँ! दिल से अध्यापक बनने की इच्छा कम ही लोगों में दिखाई देती है। अधिकांश अध्यापक मजबूरी में कोई इच्छित नौकरी न मिलने के कारण अध्यापन का काम करने लगते हैं। वास्तव में वे टीचर नहीं, वाई-चांस टीचर होते हैं और वे न तो स्वयं अपने साथ न्याय कर पाते हैं और न ही अध्यापन पेशे के साथ। 
अच्छे अध्यापक के रूप में विकसित होने के लिए निष्ठा व समर्पण अनिवार्य तत्व हैं। ग्रेच्युटी के एक मुकदमे की सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने शिक्षकों की ग्रेच्युटी की माँग को ठुकराते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट रूप  लिखा था कि अध्यापक नौकर नहीं समाज सेवक है। 
        वास्तविकता यही है कि अध्यापक समाज सेवक के रूप में ही सम्मान पाता रहा है। समाज सेवक के रूप में समर्पित होने के कारण ही अध्यापक को गुरू के रूप में सम्मान मिलता रहा है। इसी सेवा के कारण ही उसे ईश्वर से भी अधिक माना जाता रहा है। किन्तु यदि हम अध्यापन को एक नौकरी के रूप में लेते हैं तो उस सम्मान के हकदार नहीं रह जाते। नौकर कभी सम्मान का पात्र नहीं हो सकता। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने आप को अध्यापक से नौकर की श्रेणी में न जाने दें। इसके लिए आवश्यक है कि हम अध्यापक पेशे के महत्व और इससे जुड़े कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझें। 
           हमें समझना होगा कि अध्यापक को युग-निर्माता क्यों कहा जाता है? हम अध्यापक की नौकरी मात्र करके युगनिर्माता नहीं हो सकते। युग के निर्माण के लिए अपने आप को दीपक की भाँति जलाकर विद्यार्थियों में ज्योति का संचार करना होगा। विद्यार्थियों को केवल नौकरी-पेशे के लिए तैयार करने से बाज आना होगा और उन्हें जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करने के प्रयास करने होंगे।

Friday, June 7, 2019

अच्छा स्वास्थ्य

अच्छे स्वाथ्य के आधार- भोजन, व्यायाम और नींद



अच्छे स्वास्थ्य की परिभाषा भी प्रत्येक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न होती है। पहलवान और अध्यापक के लिये अच्छे स्वास्थ्य के लिये अपने-अपने मानदण्ड अलग-अलग होते हैं। उसी प्रकार अच्छे स्वास्थ्य को बानायें रखने के लिये भी अलग-अलग सुझाव दिये जाते हैं। 
             अच्छी नींद अच्छे स्वास्थ्य के लिये निःसन्देह आवश्यक है किन्तु यदि कोई व्यक्ति दस घण्टे सोता है तो उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता। सोने में अधिक समय बर्बाद करने का आशय अपने कार्यशील जीवन को कम करके अपनी जीवन अवधि को कम करना है। यदि किसी व्यक्ति की शरीर की नींद की आवश्यकता ४ घंटे में पूरी हो जाती है तो उसे अधिक सोकर समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं बनता। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी के बारे में माना जाता है कि वे केवल ४ घण्टे ही सोते हैं। उनके काम करने के तरीकों और गति से यह स्पष्ट है कि उनके लिये इतनी नींद पर्याप्त है। सामान्यतः स्वस्थ व्यक्ति के लिये ४ से ६ घण्टे की नींद पर्याप्त होती है। यदि किसी को नींद नहीं आती या अधिक नींद आती है, दोनों ही अच्छे स्वास्थ्य के लक्षण नहीं हैं।
              नींद ही नहीं भोजन भी स्वास्थ्य के लिये अनिवार्य आवश्यकता है। भोजन की आवश्यकता व्यक्ति के शरीर और उसके काम के आधार पर भिन्न होती है। समय पर भोजन करना व आवश्यकतानुसार भोजन करना अच्छे स्वस्थ्य के लिये आवश्यक है। भूख न लगना या अधिक भूख लगना भी अच्छे स्वास्थ्य के लक्षणों में नहीं आता। अतः सन्तुलित आहार ही अच्छे स्वास्थ्य की निशानी भी है और आवश्यकता भी।
              व्यायाम या EXERCISE प्रत्येक प्राणी के लिये आवश्यक है। इस बात पर सामान्यतः सर्व स्वीकृति हो जाती है, किन्तु व्यायाम की मात्रा और आवश्यकता भी वैयक्तिक भिन्नता के आधार पर भिन्न-भिन्न होती है। लोगों के तर्क भी भिन्न-भिन्न होते हैं। इस सन्दर्भ में मैं अपने बेटे दिवाकर गौड़ के तर्क का उल्लेख करना चाहता हूं, उससे जब भी अधिक पौष्टिक खाने और व्यायाम करने के लिये कहा जाता है, उसका तर्क होता है "पहले अधिक खाकर अधिक कैलोरी शरीर में ले जाओ और फ़िर कैलोरी बर्न करने के लिये पसीना बहाओ, का क्या मतलब है? केवल उतना ही खाओ, जितने की शरीर को आवश्यकता है, फ़िर आपको कैलोरी बर्न करने के लिये व्यायाम की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।" मैं आज तक उसके तर्क से सहमत नहीं हो पाया हूं किन्तु उसका तर्क विचारणीय अवश्य लगता है।
             अच्छे स्वास्थ्य के लिये केवल भोजन, व्यायाम और नींद के पर विचार करना ही पर्याप्त नहीं है, किन्तु ये पहलू स्वस्थ्य रहने के लिये अत्यन्त आवश्यक है और अच्छे स्वास्थ्य की निशानी भी हैं। अतः अन्य पहलुओं पर सावधान रहते हुये इन पहलुओं पर व्यक्ति को पर्याप्त ध्यान देना चाहिये।