Saturday, September 20, 2008

वैयक्तिक स्वतंत्रतावाद आतंकवाद से भी अधिक खतरनाक - परिवार बचाओ आन्दोलन की महती आवश्यकता

आधुनिकता और समानता तथा वैयक्तिक स्वतंत्रता की मांग व संघर्ष के कारण परिवार जैसी महत्वपूर्ण संस्था कमजोर होती जा रही है और परिवार के बिना, न नर सुखी रह सकता है और न नारी, इसी विषय पर जोधपुर से प्रकाशित विवेकानन्द केन्द्र की पत्रिका केन्द्र भारती के सितम्बर अंक में प्रकाशित संगीता सोमण का आलेख परिवार बचाओ साभार यहां दिया जा रहा है। संगीता जी का आलेख वर्तमान सन्दर्भ में ऐसी महिलाओं और पुरूषों के लिए मार्गदर्शक हो सकता है जो आधुनिकता के चक्कर में परिवार को ही तिलांजलि दे रहे हैं जो अविवाहित रहने को बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं। वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर परिवार संस्था को कमजोर कर रहे नर-नारी आतंकवादियों से भी अधिक हानि पहुचा रहे है ये देश की जड़ो को ही खोखला कर रहे है । देश को ये कितना नुकशान पहुँचा रहे है ये इनको स्वयं ही मालुम नही , ये इस खतरे से अनजान है इन्हे सही राह दिखाने की आवश्यकता है इसी का प्रयास लेखिका ने किया है :

परिवार


किशोरी,
परसों मनीषा अपने ढाई वर्षीय बेटे साकेत के साथ मिलने आई थी। साकेत बड़े आराम से बातें भी कर रहा था तथा साथ ही साथ नानी-नानी करके घर में घूम रहा था. उन दोनों का अस्तित्व ही बहुत सुख का अहसास दे रहा था। बातों-बातों में मैंने मनीषा को पूछा, तुम नौकरी पर जाती हो तो बच्चा किसके पास छोड़कर जाती हो? तो वह बोली, मैंने नौकरी छोड़ दी है। चालीस हजार मासिक कमाई करने वाली, सी.ए. जैसा कठिन अभ्यास क्रम पूरा करने वाली मनीषा का उत्तर सुनकर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ। वह आगे बोली, हम दोनों ही सुबह आठ बजे तक घर से निकल जाते थे तथा रात आठ बजे घर आते थे। ऐसे में साकेत को कौन पालता? सासू मां से अब ज्यादा कष्ट झेले नहीं जा सकते और नानी है ही नहीं। पालनाघर (creche) में बच्चे को छोड़ना नहीं चाहती थी। वैसे भी दादी-नानी सक्षम होती, तो भी अब उनकी उम्र बच्चों के पीछे दौड़ने की नहीं है। उनकी उपस्थिति ही हमारा सम्बल है। अत: मैंने और विवके जी ने बच्चे के जन्म से पहले ही नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया था। उपना बच्चा बड़ा होता हुआ देखना, उसके साथ खेलना, उसके बालहठ पूरे करना, उसका पहली बार करवट बदलना, बैठना, चलना, गिरना, इन सब सुखद क्षणों से मैं वंचित रहती। साथ ही साथ बच्चे का संवर्धन, संगोपन व संरक्षण का दायित्व हर मां का है। इसका पूरा अहसास था। साथ ही साथ बच्चा भी माँ के साथ रहकर सुरक्षा का अनुभव करता है और उसका तो वह हक भी है, तो मैं उसे उसके इस जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित क्यों करूं? यदि मैं नौकरी करती तो दिनभर हम दोनों तनाव में रहते। आज कम से कम विवेकजी निश्चिन्त होकर काम पर जाते हैं। उनके प्रमोशन्स और टूर्स निर्बाध चलते हैं, समय मिलते ही हमारे साथ रहते हैं। मेरे सामने छोटी से बड़ी हुई मनीषा इतना सोचती है यह देखकर बहुत अच्छा लगा। दोनों ही बधाई के पात्र हैं। क्योंकि चालीस हजार महीना रूपयों का लालच छोड़ना आसान बात नहीं है। विनीता के भी अभी बेटा हुआ है, वह भी सी.ए. है। उसने भी नौकरी छोड़ने का ऐलान कर दिया है। तुम्हारी दीदी, सुरभि `जी-निट´ का कोर्स किए हुए थी, उसको पैकेज भी अच्छा मिला था, परन्तु शादी के पश्चात उसने भी नौकरी छोड़ दी। मैथिली इंजीनियर है, वह भी घर पर ही रहती है, इन चारों के पति भी इस निर्णय में सहभागी थे। वास्तव में आज ऐसी मनीषा, विनीता, सुरभि, मैथिली आदि की समाज को महती आवश्यकता है।


महत्वाकांक्षी पतियों के तो क्या कहने! वैभव, जो अमेरिका से एम.बी.ए. करना चाहता है, उसने तो अपनी पत्नी को नौकरी करने को विवश ही कर दिया है। उसकी बेटी जन्म से ही बीमार है। साल भर तो वैभव की मां उनके साथ रही, परन्तु अब वैभव की पत्नी को अहसास हुआ कि मुझे नौकरी छोड़कर बिटिया की परवरिश करनी चाहिए। वैभव ने हां तो भर दी और दूसरे महीने अमेरिका में एम.बी.ए. करने की अपनी इच्छा जाहिर की। मध्यमवर्गीय परिवार में इतने पैसे कहा¡ से आयेंगे, अत: स्वाति नौकरी करने को विवश है।


बच्चा पैदा होने के बाद उसकी परवरिश अच्छी तरह से हानी ही चाहिए। परन्तु आज समाज में हम देख रहे हैं कि उच्च शिक्षित मा¡-बाप दोनों के अच्छा कमाने के बाबजूद भी उनकी पैसे की भूख कम नहीं हुई है या वे बहुत अधिक महत्वाकांक्षी हैं। अत: दादी, नानी या पालनाघर में बच्चे पल रहे हैं। मुझे कभी-कभी लगता है कि यह हम माताओं की तो कहीं गलती नहीं है, जिन्होंने अपनी कुंठित आकांक्षाओं को अपनी बच्चियों के गले में मढ़ दिया। उन्हें उच्च िशक्षा दिलाई। बेटे-बेटी में फरक नहीं किया। बेटियों की परवरिश बेटों जैसे ही की और यहीं हम मात खा गये। बेटियों को हमने स्त्रियोचित गुणों से अवगत नहीं कराया। यही कारण है कि आजकल लड़कियों की गृहकार्य में रूचि एकदम खत्म हो गई है। खाना बनाना, सिलाई-बुनाई करना या स्वयं के कपड़े धोना, यह सब पुरानी बातें हो गईं हैं। दूसरों के लिए कुछ करना, ससुराल में सभी रिश्तेदारों के साथ तालमेल बिठाना उन्हें आता ही नहीं है। यह सब करना उन्हें प्रतिष्ठा के विरूद्ध लगता है। उनके पा¡व जमीन से उखड़ गये हैं। उन्हें उड़ने के लिए आसमान तो दे दिया, परन्तु यह बताना भूल गये कि वापस अपने नीड़ में ही आना है। उच्च िशक्षा लेने के बाद पैसा कमाना ही हमारा ध्येय हो गया है। बढ़ती म¡हगाई में दोनों का कमाना आवश्यक है, यह मैं मानती हू¡, पर कहा¡ रुकना है यह भी तो समझ में आना आवश्यक है। मैं भी नोकरी करती थी किन्तु मैंने पदोन्नति नहीं ली क्योंकि उसके बाद मेरे जीवन में जो परिवर्तन आता, उससे मेरी पूरी गृहस्थी बिगड़ जाती। मेरी उम्र की बहुत सी महिलाओं ने ऐसा ही किया, उनकी प्राथमिकता अपनी गृहस्थी थी, न कि कैरियर। परन्तु हम लड़कों से कम नहीं हैं यह दिखाने के चक्कर में, हमने हमारे परिवार संस्था को ही दा¡व पर लगा दिया है। पूरे विश्व में भारत की परिवार-प्रथा को आदशZ के रूप में देखा जाता है, पर हम ही उसे आग लगाने पर उतारू हो गये हैं। हमने हमारे बेटों की परवरिश में भी कहीं गलती की, तभी तो उनको पैसे कमाने के चक्कर में अपने दायित्व को बोध नहीं रहा। पिछले दिनों में पूना गई थी, तब मौसी की दो बेटिया मिलीं। दोनों ही उच्च िशक्षित हैं परन्तु नौकरी नहीं करतीं, बताती थीं कि घर में सास-ससुर हैं। हमारे पति उनके इकलौते बेटे हैं, हम भी यदि नौकरी पर जायेंगे तो उनके साथ कौन रहेगा। बच्चों की देखभाल कौन करेगा? अत: एक ने घर में बुटीक खोल रखा है व दूसरी ने घर में हॉस्टल खोल रखा है। उनका काम अब बढ़ गया है, अत: मदद हेतु पास में रहने वाली जरूरतमन्द लड़कियों को अंशकालीन काम देती हैं। दोनों की ही समस्या का हल हो जाता है। वह बताती है कि यदि हम नौकरी करते तो शायद इससे थोड़ा ज्यादा पैसा मिलता? परन्तु आज अपना काम करने में जो आनन्द है वह कहा¡ से मिलता? हमारे पूर्वजों ने भी नौकरी को अधम ही बताया है, परन्तु नििश्चत आमदनी के कारण हम उसकी ओर आकर्षित होते हैं। आज लड़किया¡ पढ़ लिख रही हैं, परन्तु वे घर बैठे पैसा कमाये, इतना आत्मविश्वास हमने उनको नहीं दिया। आप उच्च िशक्षित लड़कियों के साथ-साथ, थोड़ी पढ़ी लिखीं लड़किया¡ भी गृह कार्य से जी चुराती हैं। घर के बाहर रहने में उनको अधिक आनन्द आता है। आवश्यकता हो तो पैसा कमाना कोई पाप नहीं है, परन्तु नौकरी और गृहस्थी का सामंजस्य बिठाना भी अनिवार्य है, अन्यथा हमारी परिवार संस्था टूट जायेगी और हम अपना अस्तित्व खो बैठेंगे। इसलिये समय रहते ही हमें इस बारे में कुछ ना कुछ करना होगा। नौकरी के घण्टों में कमी लानी होगी, अंशकालीन नौकरिया¡ उपलब्ध करानी होगीं। इस सबके लिए हम माताओं को ही मिलकर आवाज उठानी होगी, नहीं तो हमारी भावी पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा। शायद वे पैसा तो कमा लेंगे, परन्तु मनुष्य नहीं बनेंगे। उनको यदि मनुष्य बनाना है तो त्याग हम माताओं को ही करना होगा। घर-घर में आज यही चित्र दिख रहा है। हमारी बेटिया¡ और बहुए¡ अभी अपने पूरे यौवन काल में हैं, उन्हें आगे वाली अंधेरी गुफा का ध्यान नहीं है। आजकल सभी रिश्तों में कड़वाहट आ रही है। अभी तो जवान हैं, सब सहन करने की क्षमता प्रकृति ने उनको दी है, परन्तु आगे बुढ़ापे में क्या होगा? क्या वे वृद्धाश्रम में ही रहना पसन्द करेंगी? वहा¡ भी सामंजस्य बिठाना पड़ता है। कहा¡ जायेगी हमारी भावी पीढ़ी? सोच सोच कर मन उदास होता है। हमारी उस समस्या से हमें ही निजात पानी है। मुझे लगता है राजीवजी दीक्षित ने जैसे `आजादी बचाओ´ आन्दोलन शुरू किया है। उसी प्रकार हमें भी `परिवार बचाओ´ आन्दोलन शुरू करना पड़ेगा। स्वामीजी ने कहा था एक बार स्त्री िशक्षित हो जाये तो वह अपने आप अपनी समस्या का हल ढू¡ढ़ लेंगी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है -

`कीर्ति: श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा´

(अध्याय 10 “लोक 34)

`कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हू¡, इस सप्त गुणों से में स्त्रियों के हृदय में स्थित हू¡।´इसका प्रकटीकरण हमारी बेटियों में कराने का दायित्व हमारा ही है।

लेखिका : संगीता सोमण, 92, प्रेम नगर, खेमे का कु¡आ, पाल रोड, जोधपुर (राजस्थान)

Sunday, September 14, 2008

मानव के शव पर

मन्दिर का निर्माण
लालता प्रसाद गंगवार `प्रलयंकर´, बरेली

मानव ने पत्थर पूजे पर, मानव को कब पहचान सका।
यद्यपि इसकी ही छाया में, पा रंग रूप भगवान सका।।
मानव फुटपाथों पर सोते, भगवान भवन में झूले पर।
मानव सुत पत्तल चाट रहे, नैवेध वहा¡ थाली भर-भर।।
जा रही हजारों की लाशें, वेकफन यहा¡ शमशानों में।
श्रृंगार नहीं पूरा होता, उनका रेशम के थानों में।।
पत्थर नहलाये जाते हैं, दुर्भाग्य दूध, घी से जल से।
भूखी भिखमंगिन का बच्चा, दो बू¡द न पी पाया कल से।।
सोने-चा¡दी के ढेरों पर, जिसने भगवान बनाये हैं।
जिसने मानव चूस-चूस, कंकाल समान बनायें हैं।।
यदि यही धर्म के नेता हैं, धिक्कार रहा उनको यह स्वर।
यदि यही धर्म के हैं धुरीण, लानत है उन पर, है ठोकर।।
इन्सार उठो, फेंको पत्थर, मानव का जब पूजन होगा।
मानव के शव पर मन्दिर का, निर्माण-विधान नहीं होगा।।
सोन-चा¡दी के आभूषण, पत्थर के साज नहीं होंगे।
घंटों में शंख निनादों में, हम बे-आवाज नहीं होंगे।।
मेरी आवाज पुकारेगी, मानव-मानव के कानों में।
हम आग लगा देंगे बढ़कर, इन शोषण के भगवानों में।।
हम भू पर स्वर्ग उतारेंगे, अपने दो-चार इशारों में।
तुम देखो तो कितना बल है, इन क्रान्ति पूर्ण उद्गारों में।।







टालस्टाय की बाल लघु-कथा
आजादी की वापसी

एक मकान की उपरी मंजिल पर एक अमीर आदमी रहता था और नीचे की मंजिल पर एक गरीब दरजी । कपड़े सीते समय दरजी गाया करता था। उसके गाने से अमीर आदमी की नींद में बाधा पड़ती थी। वह उसका गाना रोकना चाहता था।
एक दिन उसने दरजी को रूपयों की एक थैली दी और कहा कि वह गाना बंद कर दे। दरजी मान गया और रूपये पाकर बहुत खुश हुआ। कुछ समय बीता लेकिन गाने के बिना दरजी का मननहीं लगता था। वह परेशान हो उठा। आखिर एक दिन वह रूपयों की थैली लेकर अमीर आदमी के पास गया और थैली उसको लौटाते हुए बोला, ``अपना धन वापस ले लीजिए और मेरा गाने का अधिकार मुझे वापस दीजिए। गाने के बिना मैं तंग आ गया हू¡।´´
अमीर आदमी उसे हैरानी से देखने लगा। दरजी चला गया फिर कुछ देर में उसने नीचे से दरजी के गाने की खुशी भरी आवाज सुनी।

Sunday, September 7, 2008

बड़ी-बड़ी डिग्री हैं मेरे पास!!

नहीं चाहिए मुझे ईमानदारी का तमगा

मैं कर सकता/सकती हूं कुछ भी,
आखिर !
बड़ी-बड़ी डिग्री हैं मेरे पास!!

मैं भारत का/की शिक्षित नर/नारी हूं¡
मैं हूं सशक्त, नहीं बिचारा/बिचारी हूं।
मैं जानता/जानती चैंटिंग और ब्लागिंग
मैं अंग्रेजी में धारा-प्रवाह,
लिख व बोल सकता/सकती हूं¡
मैं गालियां दे सकता/सकती हूं¡
भारतीय संस्कृति, विरासत और परंपराओं को,
मैं शादी, परिवार व समाज को,
गरिया सकता/सकती हूं¡
सब जायं¡ जहन्नुम में,
मैं सबको अपने ठेंगे पर रखता/रखती हूँ
अपनी वैयक्तिक स्वतंत्रता और स्वछंदता की खातिर,
मैं नारी को देखना चाहता/चाहती हूं
स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ही नहीं,
पूर्णत: स्वतंत्र और स्वछन्द भी,
शादी, परिवार व समाज की,
समस्त मर्यादाओं से मुक्त
आज के भारतीय नर और नारी शिक्षित हैं,
वे नहीं रह सकते बनकर एक-दूसरे के पूरक
औरत को मर्द की और मर्द को औरत की,
वश है जरूरत,
दोनों समान हैं,
दोनों के लिए खुला आसमान है,
समलैंगिक सम्बन्धों को भी सम्मान है
जरूरतें पूरी करना बड़ा आसान है,
हम अपनी जरूरतें! कर लें पूरी,
कैसे भी, कहीं से भी,
किसी के साथ रहकर या
किसी को साथ रखकर
या फिर चलते फिरते,
ऑफिस में काम करते।
क्या फर्क पड़ता है?
मैं कर सकता/सकती हू¡ कुछ भी,
आखिर !
बड़ी-बड़ी डिग्री हैं मेरे पास।

मैं झूठ बोलने में पारंगत,
भ्रष्टाचार में सिद्धहस्त,
मैं अपने में ही रहता/रहती मस्त,
सत्य का सूरज कर दूं अस्त,
ईमानदारी के हौसले पस्त।
कथनी से ही छा जाऊं जगत में
शराब पीकर, मांस खाकर,बन जाऊं भगत मैं।
मैं, जो बोलता/बोलती हूं,
जो करता/करती हूं,
दोनों में दूर-दूर तक,
खोज न पाये कोई रिश्ता,
भले ही आ जाये फरिश्ता।
मैं बोलकर और लिखकर ही सम्मान पाता/पाती हूं,
साथ में दौलत भी कमाता/कमाती हूं।
गधे को तो क्या?
दुश्मन को भी बाप बनाता/बनाती हूं,
किसमें है हिम्मत
जो मेरी करनी को देखे
आखिर प्राइवेसी भी कोई चीज होती है!
तुम्हे क्या वह किसके साथ सोता या सोती है?
अरे भाई!
निजत्व का सम्मान करो!!
जाओ! अपना काम करो।
तुम हो ही क्या चीज?
अपने आदर्शों के झोले को,
उठाये फिरते/फिरती हो!
केवल ठगे जाते/जाती हो!
किसी को नहीं ठगते/ठगती हो।
शादी करके एक पत्नी या पति के साथ
रहने वाले या रहने वाली,
दो जून की रोटी के लिए,
रात-दिन परिश्रम करने वाले या करने वाली
ईमानदारी और सत्य के व्यसनी मूर्खो की,
बात करने वाले या करनी वाली,
जाओ आगे बढ़ो!
यह दुनिया¡ तुम्हारी नहीं, मेरी है,
क्योंकि यह इक्कीसवीं सदी है,
मेरे पास सोने की ढेरी सजी है।
मैं खरीद सकता/सकती हूं कुछ भी,
सारी सुख-सुविधाए¡,
यहाँ तक कि बिस्तर के साथी,
नर-नारी को भी खरीदना संभव है,
आत्मा को जिन्दा रखकर,
आत्मनिर्भर बनना असंभव है।
मैं कर सकता/सकती हूं कुछ भी,
आखिर !
बड़ी-बड़ी डिग्री हैं मेरे पास।

मैं आजाद भारत का/की,
आजाद नागरिक हूं,
स्वतंत्रता दिवस पर झण्डा,
फहराऊंगा/ फहराऊंगी।
मिठाई बांटकर खुशियां,
मनाऊंगा/मनाऊंगी।
पीटकर ताली,
लोग,मिठाई खाने में हो जायेंगे मस्त,
मैं तो वश कमीशन खाऊंगा/खाऊंगी।
जरूरत पड़ी तो आतंकवादियों से भी हाथ,
मिलाऊंगा/ मिलाऊंगी!
आखिर वे भी हमारे वोटर हैं,
उनके लिए कानून सरल बनाऊंगा/बनाऊंगी।
बाजार तो भाई!आज युग की है जरूरत,
दोस्तो देखो बाजार है, कितना खुबसूरत,
जिसको आती है कला,
रुपया बनाने, छापने या लूटने की,
वही सबसे है भला,
खरीदना या बेचना नहीं है आसान,
बाजार में मच जाता है घमासान,
सांसदों, विधायकों या मन्त्रियों की बिक्री मैंने देखी है,
हम क्या कर सकते यह तो ईश्वर की लेखी है।
मैं भी अपनी सरकार बनाऊं!
बड़ा सा सरकारी पद पा जाऊं
स्वयं मलाई खाकर,
दूसरों को भी खिलाऊं!
नहीं चाहिए मुझे, ईमानदारी का तमगा,
चाहत है यही वश सफल कहाऊं!
हिन्दी का नाम जपकर,
अंग्रेजी का झण्डा लहराऊं!!

Tuesday, August 26, 2008

हँसी खुद ही रो रही है।

हँसी खुद ही रो रही है।

दु:ख में खुशी, हमें हो रही है।
हँसी खुद ही रो रही है।।
बुद्धि उर पर हुई हावी,
ख्याल उगते, नहीं पुलावी।
मकरन्द को, भंवरा नहीं,
योजना नहीं है, कोई भावी।
कली बसन्त को ढो रही है।
हँसी खुद ही रो रही है।।
प्रेम का व्यापार फलता,
स्वार्थ से संसार चलता।
टीवी पर मुस्कान बिकती,
किशोर का यौवन है ढलता।
बेचैनी ही अब सो रही है।
हँसी खुद ही रो रही है।।
फूल अब चुभने लगे हैं,
कांटे ही लगते भले हैं।
आलिंगनों से डर है लगता,
प्रेम में कटते गले हैं।
शान्ति आतंक बो रही है।
हँसी खुद ही रो रही है।।

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Sunday, August 17, 2008

क्या शादी अनावश्यक व कैरियर में बाधक है? क्या शादी की व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिए?

क्या शादी अनावश्यक व कैरियर में बाधक है? क्या शादी की व्यवस्था समाप्त हो जानी चाहिए?

मित्रो वर्तमान में शादी व पारिवारिक व्यवस्था कुछ कमजोर सी होती जा रही है, चिन्ता भी होती है कि शादी के प्रति बढ़ता अनाकषZण क्या पारिवारिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न नहीं कर देगा किन्तु कुछ उदाहरण ऐसे भी है कि उन्होंने स्वार्थवश केवल अपने लिए शादी से तोबा नहीं की है वरन उनका मकसद ही उन्हें शादी से दूर ले आया। समाज व परिवार के लिए अपने वैवाहिक जीवन को दाव पर लगाने वाले लोग उन लोगों से भिन्न हैं जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता या निजी स्वार्थ वश शादी के दायित्वों से भाग रहे हैं। इसी विषय को राजस्थान पत्रिका ने कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया है जिसे साभार प्रस्तुत कर रहा हू¡।

अजमेर से प्रकािशत राजस्थान पत्रिका दिनांक 11 अगस्त 2008 के प्रथम पृष्ठ से साभार

जिन्दगी कुछ यूं हुई बसर तनहा..........................................

एकाकियों की सूची में कई राजनेता, नौकरशाह, डॉक्टर और समाजसेवी

जयपुर, 10 अगस्त (का.सं.)
जिन्दगी बेमकसद नहीं कटती। लेकिन कभी-कभी मकसद की राह में सिर उठाकर ये भी देखने की फुर्सत नहीं मिलती कि कोई साथ रहा या नहीं। मंजिल का सफर बिना हमसफर ही कट जाता है और बचती है तो सिर्फ तनहाई। मकसद पूरा करने की सन्तुिष्ट तो मिलती है, जिन्दगी के कुछ मोड़ों पर अकेलेपन की टीस बाकी रह जाती है। `पत्रिका´ की यह पड़ताल उन लोगों के नाम है जिन्होंने अपने मकसद के लिए, चाहे वो कैरियर हो, समाजसेवा या राजनीति, अकेले रहना चुना और आज उन्हें अपने फैसले पर कोई मलाल भी नहीं। राष्ट्रीय स्तर पर तो पूर्व राष्ट्रपति एण्पीण्जेण् अब्दुल कलाम से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक कई बड़े नाम इसमें शामिल है। लेकिन राज्य की सूची में भी कम बड़े नाम नहीं हैं।

ये हैं बिन ब्याहे
राजनेता : भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सांसद कैलाश चन्द्र मेघववाल, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सोसद ओमप्रकाश माथुर, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डाण् गिरिजा व्यास, पूर्व केन्द्रीय मंत्री भुवनेश चतुर्वेदी।
आईएएस अधिकारी : परिवहन आयुक्त जगदीश कातिल, चिकित्सा िशक्षा सचिव डॉण् गोविन्द शर्मा, प्रमुख कला एवं संस्कृति सचिव एसण्अहमद, प्रमुख जनजाति क्षेत्रीय विकास सचिव गुरजोत कौर, सेेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य सचिव ए.के.आहूजा
आरएएस अधिकारी : रेखा गुप्ता, ऊषा शर्मा, लक्ष्मी बैरवा, शमीम अख्तर
सेवानिवृत्त आरपीएस : बादाम बैरवा
चिकित्सक : पैट्रीसिया वीकर्स, मालती गुप्ता ( एसएमएस से सेवानिवृत्त)
समाजसेवी : निखिल डे, कविता श्रीवास्तव
(राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक शादी नहीं करते, इस सूची में भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री प्रकाश चंद्र शामिल हैं।)

जिम्मेदारियों ने नहीं दिया मौका

कैरियर और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण मैंने ईमानदारी से शादी के लिए प्रयास नहीं किये। कैरियर के बाद छोटे भाई बहनों की शादी को प्राथमिकता देना जरूरी था। वैसे विवाह के मामले में कम से कम 50 प्रतिशत फैसला ईश्वर करता है। दिलचस्प यह है कि जब 35 वषZ का था, तब एक महिला ज्योतिषी ने मा¡ से कहा कि इसके हाथ में तो शादी की रेखा ही नहीं है। अविवाहित होने से विभागीय कायोZ के लिए मिल रहे समय का पूरा उपयोग कर रहा हू¡।
-जगदीश चन्द्र, परिवहन आयुक्त

वैवाहिक जीवन का विरोधी नहीं हू¡

``मैंने जीवन भर शादी नहीं करने का कोई प्रण नहीं लिया है और न ही वैवाहिक जीवन का विरोधी हू¡। विवाह एक पवित्र बंधन है, जिसका पूरा सम्मान करता हू¡। लेकिन मेरा समाज के प्रति एक बड़ा संकल्प है और उसको पूरा करने के लिए किसी दूसरे का जीवन प्रभावित नहीं करना चाहता।´´
-निखिल डे, सामजिक कार्यकर्ता

कोई बंधन नहीं चाहती
मैं किसी सामाजिक संस्था के बंधन में नहीं बंधना चाहती। समाज के प्रति अंतहीन संकल्प हैं। महिलाओं पर परिवार में ज्यादा बंदिशे होती है। मैंने परिवार के प्रति जिम्मेदारी को पूरा किया है, मा¡-बाप की सेवा की है। शादी करके ही कोई कर्तव्य पूरा होता है, ऐसा नहीं है। मुझे लगता है, मेरे पास दोनों सुख हैं और स्वतंत्र व्यक्ति भी हू¡। मेरा घर शॉर्ट स्टे होम की तरह है, कई लोगों के घर बसाये हैं। वैकल्पिक रिश्तों को ईमानदारी से निभाया है। कभी अकेलापन या फ्रस्टेशन महसूस नहीं किया।
- कविता श्रीवास्तव, पीयूसीएल पदाधिकारी

कोई टिप्पणी नहीं करू¡गा :
शादी करने या नहीं करने का सवाल बड़ा वैसा है, मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहू¡गा।
-सांसद कैलाश मेघववाल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भाजपा

ईश्वर को तुम खोज न पाये,ईश्वर तुमको खोज....

खोज

जाति वर्ण धर्म धन मद में,ना तुमको कुछ होश रहा है।

ईश्वर को तुम खोज न पाये,ईश्वर तुमको खोज रहा है।।

मन्दिर मस्जिद गिरिजाघर में नित आराधन करते हो।

कथा भागवत नाम कमाते लूट-लूट घर भरते हो।

नित के व्रत उपवास करो और माल चकाचक चरते हो।

असत्य भ्रष्टता इष्ट तुम्हारे गैरों का धन हरते हो।

ईश्वर को निज पक्ष में लाने ब्राºमण का हो भोज रहा है।

ईश्वर को तुम खोज न पाये,ईश्वर तुमको खोज रहा है।।


अरबों का करके घोटाला एक लाख मन्दिर में देते।

तुम्ही बता दो भाई मेरे ईश्वर भी क्या रिश्वत लेते ?

दानवीर फिर भी कहलाते कितने गले हैं तुमने रेते ?

भला न कुछ भी होने वाला दरिद्र नारायण नहीं हैं चेते।

भगवा वस्त्र हैं तूने पहने फिर भी देख उरोज रहा है।

ईश्वर को तुम खोज न पाये,ईश्वर तुमको खोज रहा है।।


सर्वोच्च अदालत ईश्वर की है जहा¡ न कोई रिश्वत चलती ।

सत्य अहिंसा सदाचार की ,मानव धर्म की बेल है पलती।

दूध का दूध पानी का पानी नहीं वका लत यहा¡ है फलती।

सच्चा न्याय सभी को मिलता नहीं कभी भी होती गलती।

कर्म का फल निश्चय ही मिलता भले ही मिन्दर धोक रहा है।

ईश्वर को तुम खोज न पाये,ईश्वर तुमको खोज रहा है।।

Thursday, August 14, 2008

स्वतन्त्रता दिवस

नमस्कार मित्रों सभी को स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनायें!

आशा है हम सभी इस स्वतन्त्रता दिवस की आन की रक्षा के लिये अपने पूर्वजों के प्राणों द्वारा सृजित देश की स्वतन्त्रता के लिये जीना सीखेगे, याद रखें देश के लिये मरने से अधिक कठिन हे देश के लिये जीना।
स्वतंत्रता


स्व-तंत्रता दिवस मनाते हैं पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।
स्व-तंत्र को तो ध्वस्त करें नित, गायें स्वतंत्रता का गाना।।
स्वतंत्र हुए स्वच्छन्द नहीं, सबको पड़ेगा समझाना।
तोड-फोड़ कर आग लगाते,लक्ष्य विकास का यू¡ पाना?
सार्वजनिक सम्पत्ति अपनी, समझ के घर ही ले जाना।
अधिकारॊं को झगड़ रहे नित, कर्तव्यो को ठुकराना॥
कैसे होगा विकास साथियो? मार्ग तुम्हीं को दिखलाना।
दिवस मनाते हैं, पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।
कैसा तंत्र कैसी व्यवस्था?हमको हड़ताल पर है जाना!
हमारी सरकार, हमारी निगमें,बिना टिकिट हमको जाना॥
देश के, स्वतंत्र नागरिक, बिना किये सब कुछ पाना।
विद्यालयों में विलास करेंगे,नकल से पास ही हो जाना॥
दाम के बिन काम करें नहीं, भले ही हो चारा खाना।
दिवस मनाते हैं,पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।
आज स्वतंत्रता दिवस साथियो, संकल्प एक करना
तन्त्र दुरूस्त करने की खातिर, जागरूक रहना होगा।
भ्रष्टाचार करने वालों को, आखिर सबक सिखाना होगा॥
हाथी के पाव¡ में सबका पा¡व, सबको ही समझाना
सार्वजनिक हित में निजी स्वार्थ तज, गायें स्वतंत्रता का गाना।
स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।

Thursday, August 7, 2008

नर-नारी समानता - एक आकर्षक झूंठ! समझे और सुधारें

नर-नारी समानता - एक आकर्षक झूंठ! समझे और सुधारें

समानता- एक आकर्षक झूंठ

संविधान ने हमें समानता का मौलिक अधिकार दिया है। समानता की मांग प्रत्येक क्षेत्र व प्रत्येक स्तर पर की जाती है। समानता का नारा सर्वाधिक प्रचलित, आकर्षक व लोकप्रिय जुमला बन चुका है। प्रत्येक क्षेत्र में समानता की मांग व समानता की वकालत हमें चारों और देखने को मिलती है। समानता का अधिकार देने पर हम गर्व की अनुभूति भी करते हैं। हमारा नेतृत्व समानता को भारतीय संविधान की विशिष्ट उपलब्धि भी बताता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने से उच्च स्तर के व्यक्ति के साथ समानता चाहता है किन्तु अपने से निम्न स्तर के व्यक्ति के साथ समानता शायद ही व्यवहार में कोई चाहता हो। प्रत्येक व्यक्ति अपने से उच्च वर्ण में सिम्मलित होना चाहता है, किन्तु व्यवहार में क्या निम्न समझे जाने वाले वर्ण भी आपस में समानता का व्यवहार करते हैं? या उच्चता का अहम् पाले सवर्ण वर्ग एक ही जाति के अन्दर भेदभाव नहीं करता? यहां व्यवहार में शब्द इसलिए प्रयुक्त किया गया है कि सिद्धान्तत: समानता की डींगे हांकना सरल कार्य है किन्तु व्यवहार में लागू करना जटिल ही नहीं असम्भव है। समानता निरपेक्ष रूप में स्थापित नहीं की जा सकती। समानता का अर्थ ही बड़ा जटिल है। संविधान की व्याख्या करते समय समानता का आशय `समान वर्ग के लिए समान अवसर´ से लिया जाता है। कहने का आशय यह है कि वर्गों में विभाजन तो अनिवार्य ही है। भले ही हम किसी भी नाम से संबोधित करें। वर्ग न कहकर श्रेणी कह लें, जाति कह लें, पद कह लें, समाज में कोई न कोई वर्गीकरण की प्रणाली तो रहेगी ही। समानता के जुमले को नर-नारी समानता के सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रयुक्त किया जाता है। समानता के नाम पर नर और नारी जो प्राकृतिक रूप से ही एक-दूसरे के पूरक, प्राकृतिक मित्र व अन्योन्याश्रित रूप से एक-दूसरे पर आश्रित व एक दूसरे की जरूरत हैं। प्राचीन काल में इसीलिए नर-नारी को मिलाकर ही एक इकाई माना गया है। दोनों ही एक -दूसरे के बिना अधूरे हैं। इस समानता के बखेड़ें के कारण ही आज एक-दूसरे के आमने सामने, एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी व एक-दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। वस्तुत: समानता एक आकर्षक व बहुत बड़ा झूंठ है।
यथार्थ यह है कि नर-नारी की तो बात ही क्या है? दो नर या दो नारी भी आपस में समान नहीं होते। समानता के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए दो शब्दों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा- स्थानापन्न व पूरक। स्थानापन्न उस व्यक्ति या वस्तु को कहा जा सकता है, जो किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु के स्थान पर पूर्ण कुशलता के साथ प्रयुक्त हो सके, जबकि पूरक का आशय उन वस्तु या व्यक्तियों से है जो एक-साथ मिलकर ही उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कोई भी व्यक्ति या वस्तु किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु का पूर्ण स्थानापन्न नहीं हो सकता। यह ठीक है कि साइकिल की जगह स्कूटर का प्रयोग करके यात्रा सम्पन्न की जा सकती है। अत: इन्हें एक दूसरे का स्थानापन्न कहा जा सकता है किन्तु ये पूर्ण स्थानापन्न नहीं हैं, दोनों की विशेषताएं भिन्न-भिन्न हैं प्रयोग करते समय ही मालुम पडे़गा कि ऐसी भी परिस्थिति आयेंगी, जब स्कूटर के स्थान पर साइकिल या साइकिल के स्थान पर स्कूटर काम नहीं करेगा। दूसरी और पूरक वस्तुओं पर विचार करें तो पता चलता है कि स्कूटर बिना पेट्रोल के व्यर्थ है तो पेट्रोल बिना स्कूटर के यात्रा पूरी नहीं कर सकता। इन तथ्यों पर विचार करके कोई भी विचारवान व्यक्ति समझ सकता है कि नर-नारी दोनों एक-दूसरे के सादृश्यमूलक व्यक्तित्व प्रतीत होते हैं। कुछ कामों को एक-दूसरे के स्थान पर पूर्ण भी कर सकते हैं किन्तु एक-दूसरे के पूर्ण स्थानापन्न नहीं हैं, ये दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं जो एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। पूर्णता के लिए एक-दूसरे का साथ अनिवार्य है। दोनों में रचनात्मक, स्वाभाविक व मौलिक भिन्नताएं हैं। अत: इन्हें बराबरी की लड़ाई में सम्मिलित करके एक-दूसरे का दुश्मन बनाना व्यक्ति व समाज दोनों का अहित करना है। नर-नारी दोनों समान नहीं है यह कहने का आशय यह नहीं कि नारी कमजोर है या वह पुरूष की दासी है। प्रकृति प्रदत्त विशेष गुणों के कारण दोनों की भिन्न-भिन्न विशेषताएं हैं, भिन्न-भिन्न रूचियां हैं, भिन्न-भिन्न शक्तियां हैं भिन्न-भिन्न शारीरिक, मानसिक व संवेगात्मक आवश्यकताएं हैं। कुछ क्षेत्रों में नारी अग्रणी स्थान रखती है तो कुछ क्षेत्रों में नर इक्कीस ठहरता है। नैसर्गिक क्षमताओं को उनकी रूचियों के अनुसार विकसित करके तथा दोनों एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए एक सफल व्यक्तित्व बनते हैं। दोनों में समानता है तो एक ही है कि दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता है।
वर्तमान समय विशेषज्ञता का युग है। विशेषज्ञता का आशय है किसी अनुकूल परिस्थितियों वाले रूचिकर क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना और उसे अपना कार्य क्षेत्र बनाना जिससे उस क्षेत्र में अधिकतम कुशलता के साथ कार्य करके अधिकतम् सन्तुष्टि प्राप्त की जा सके तथा परिवार व समाज के लिए अधिकतम सुखदायक परिणाम प्राप्त किए जा सकें। जिस प्रकार चार भाइयों में प्रत्येक की रूचि भिन्न-भिन्न होती हैं और वे भिन्न-भिन्न कार्य करते हैं जिनमें उनकी रूचि व कुशलता होती है। किन्हीं दो व्यक्तियों में पूर्ण समानता नहीं होती। नर और नारी जीव-वैज्ञानिक दृष्टि से भी भिन्न-भिन्न शारीरिक क्षमताएं लिए हुए होते हैं। नर की अपेक्षा नारी का शरीर कम शक्तिशाली, कम ऊंचाई तथा लघु व कोमल आकार का होता है। शरीर के अनुसार ही उसकी पौषण आवश्यकताएं भी नर से भिन्न ही होती हैं। नर जहां भावुकता के क्षेत्र में नारी से पिछड़ जाता है, वहीं घुमक्कड़ी में नारी को पीछे छोड़ देता है। यह सभी भिन्नताएं प्रकृति प्रदत्त है किसी के द्वारा थोपी नहीं गई हैं। नारी संरचना में उसे मातृत्व से विभूषित करके प्रकृति ने सृजन की क्षमता प्रदान कर उसे बीज का संवर्द्धन कर नवीन रचना का जन्मदाता व पोषक बनाया है। यह एक आधारभूत देन है जो नारी को पुरूष से श्रेष्ठ बनाती है और पुरूष नारी का सहायक मात्र हो जाता है। नारी नवीन रचना को जन्म ही नहीं देती, उसे दुग्ध पान कराकर जन्म के बाद भी पोषण देती है। इसी विशेषता के कारण परिवार के पालन-पोषण का दायित्व भी नारी ही निभाती है। नारी पालक है, नर तो केवल सहायक मात्र है। यह मातृत्व ही नारी की घुमक्कड़ी पर प्रतिबन्ध लगाता है। नारी की घुमक्कड़ी पर लगाए गए प्रतिबन्ध के कारण ही परिवार का सृजन होता है, घर बनता है। इसीलिए नारी को गृहिणी नाम से संबोधित किया है। नारी को दोयम दर्जे का दर्जा उसको देवी बनाने वालों व उसकी सती व देवी कहलवाने की लालसा ने दिया है। वास्तव में हमें कुछ भी बनने के प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। हम जो भी हैं अपनी अन्तनिर्हित शक्तियों का विकास कर नर या नारी की पूर्णता को प्राप्त करें। हमें मुखोटे लगाना ही सबसे अधिक त्रस्त करता है। हमें देव या देवी बनने की आवश्यकता नहीं है। हम मानव हैं और सच्चे अर्थों में मानव बनने के प्रयत्न करें।
वास्तव में नारी ही नर की अर्द्धांगिनी नहीं नर भी नारी का अरद्धांग है। दोनों का ही एक-दूसरे के बिना न तो जन्म संभव है और न ही जीवन। दोनों एक-दूसरे की अनिवार्य आवश्यकताएं हैं। जो स्वतन्त्रतावादी महिलाएं किसी एक पुरूष के बंधन में बंधकर नहीं रहना चाहतीं, वे भी बिना पुरूष के तो नहीं रहतीं। हां, यह हो सकता है कि वे निपट स्वार्थी बनकर पुरूष का अपनी इच्छानुसार उपभोग कर किनारे हो जाती हों, जिस प्रकार पुरूष अपने अहम में नारी का उपभोग करता आया है। किन्तु दोनों ही परिस्थितियों में वास्तविक शान्ति किसी को नहीं मिलेगी, न स्त्री को और न ही पुरूष को। प्राचीन काल से ही जो पुरुष नारी को त्याज्य मानकर घर छोड़कर कंदराओं की ओर गए, वे भी किसी मेनका या उर्वशी के चंगुल में फंसे या स्वर्ग में अप्सराओं के सानिध्य की कामना करते रहे। स्त्री व पुरूष दोनों को ही प्रकृति ने भिन्न-भिन्न बनाया है, न केवल शारीरिक रूप से वरन मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक व भौतिक रूप से भी। नारी के लिए सबसे नुकसान देह सिद्ध हुआ, नारी पर मातृत्व थोपा जा सकता है, जबकि पुरूष पर पितृत्व थोपा नहीं जा सकता। नारी न चाहते हुए भी मां बन सकती है, पुरूष न चाहते हुए पिता नहीं बन सकता। कहने का आशय यह है कि पुरूष स्त्री की इच्छा के बिना भी उसे मां बना सकता है, जबकि स्त्री चाहकर भी पुरूष को उसकी इच्छा के बिना पिता नहीं बना सकती। प्रकृति ने इसी की क्षतिपूर्ति के लिए नारी को ऐसे आकर्षक व सहज गुणों से विभूषित किया है कि वह पुरूष को आकर्षित कर सके क्योंकि वह अपनी कामनाओं की पूर्ति पुरूष को तैयार करके ही कर सकती है। इसी लिए वह रिझाती है और पुरूष को अपना बन्दी बना लेती है। इसी लिए रामधारी सिंह दिनकर ने उर्वशी में लिखा है-
इन्द्र का आयुध
पुरूष जो झेल सकता
सिंह से बांहे मिलाकर
खेल सकता
फूल के आगे वही असहाय हो जाता
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता
बिद्ध हो जाता
सहज बंकिम नयन के वाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से।
समय-समय पर नारी ने अपनी शक्तियों का प्रयोग भी किया है और बड़े से बड़े वीर पुरूषों को, बड़े-बड़े संन्यासियों को अपनी इस शक्ति से पराजित किया है। कहा यहां तक जाता है कि देव-दानवों के मध्य अमृत बटवारे के समय भी नारी ने ही असुरों को परास्त किया। स्त्री के यह आकर्षक व नैसर्गिक गुण उसके लिए बहुत बड़े वरदान हैं, इन्हें कोसना नहीं चाहिए। प्रसिद्ध समाजशास्त्री बायरन के विचार में प्रेम पुरूष के जीवन का एक हिस्सा होता है और नारी के लिए सम्पूर्ण अस्तित्व। यह प्रेम मातृत्व ने ही बख्शा है। नारी के लिए मातृत्व जंजीर नहीं बनना चाहिए। उसके विकास के अवसरों को इस जंजीर में बांधकर अवरूद्ध नहीं करना चाहिए क्योंकि नारी के विकास के अवसरों को रूद्ध होने का आशय पुरूष के विकास के अवसरों का अवरूद्ध होना भी है, परिवार व समाज के विकास का अवरूद्ध होना भी है।
स्त्रीमुक्तिवादी व्यक्तियों द्वारा आलोचना की जाती है कि पुरूष स्त्री को केवल देह मानकर भोग करता आया है। मेरे विचार में स्त्री हो या पुरूष दोनों का ही अस्तित्व देह पर ही निर्भर है। इस शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा न स्त्री है और न ही पुरूष। हां, यह बात निश्चित रूप से आलोच्य है कि पुरूष कई बार अपने अह्म में स्त्री की इच्छा को नजरअन्दाज कर उसके शरीर को भोगता है। निश्चित रूप से स्त्री और पुरूष को एक-दूसरे की इच्छाओं, कामनाओं, आवश्यकताओं का पूरा ख्याल रखना ही चाहिए अन्यथा उसकी स्वयं की इच्छायें, कामनाएं या आवश्यकताएं भी अतृप्त रह जायेंगी। जहां तक देह की बात है। आत्मा अदृश्य है, पहली ही दृष्टि में हमें शरीर ही नजर आता है। शरीर मूल है, यह आत्मा को संसार में आने का आधार प्रदान करता है। आत्मा के अस्तित्व पर विभिन्न मत हो सकते हैं किन्तु शरीर पर नहीं इसकी भी अपनी नैसर्गिक आवश्यकताएं हैं जिनकी पूर्ति पर ही इसका अस्तित्व और विकास निर्भर है। शिक्षा के बिना जीवन रह सकता है किन्तु भोजन व जल के बिना शरीर के अस्तित्व पर ही संकट आ जायेगा। शरीर शरीर है वह चाहे स्त्री का हो या पुरूष का। पुरूष को स्त्री के शरीर के साथ की आकांक्षा होती है तो क्या स्त्री यह कह सकती है कि उसे पुरूष के शरीर की आवश्यकता नहीं? शारीरिक भूख को सिद्धान्तों व तर्कों के मायाजाल में उलझाकर शान्त नहीं किया जा सकता। हां, यह संभव है कि कुछ स्त्री या पुरूष मन पर नियन्त्रण स्थापित करके अपनी इच्छाओं, कामनाओं या आकांक्षाओं का शमन कर लें किन्तु इसका यह अर्थ नही कि स्त्री के लिए पुरूष देह का या पुरूष के लिए स्त्री देह का कोई महत्व नहीं। आत्मा का विकास भी शरीर के द्वारा ही संभव है। अपवाद सिद्धान्त नहीं बन सकते। स्त्री व पुरूष का अलगाव या वैराग्य धर्म नहीं है क्योंकि धर्म वही है जो प्राकृतिक है, धर्म वही है जिससे संसार सामान्य गति से गतिमान रह सके। यदि स्त्री और पुरूष अलग-अलग रहने की स्थिति में पहुंच जायं (वैसे ऐसा कभी संभव नहीं है) तो संसार ही नष्ट हो जायेगा। अत: यह आलोचना व्यर्थ है कि पुरूष के लिए स्त्री केवल शरीर मात्र है। कितनी स्त्रियां यह कह सकती हैं कि पुरूष उनके लिए शरीर मात्र नहीं रह जाता? यदि शरीर का महत्व नहीं होगा तो क्यों कोई स्त्री दुबले-पतले व नि:शक्त व्यक्ति के साथ प्रसन्नता का अनुभव नहीं करती, जबकि उसके पास पर्याप्त विकसित मस्तिष्क व जीवनयापन के साधन होते हैं। क्या ऐसे पुरूष का साथ छोड़कर स्त्रियां चली नहीं जातीं? क्या अत्यन्त सुन्दर पागल स्त्री के साथ कोई भी पुरूष रहना पसन्द करेगा? सभी मानसिक, संवेदनात्मक, भावनात्मक व बौद्धिक गुणों का महत्व पुरूष के लिए भी है और नारी के लिए भी , इसके बाबजूद शरीर के महत्व को भी नगण्य नहीं समझना चाहिए। हमें इस यथार्थ को नहीं झुंठलाना चाहिए कि जिस प्रकार पुरूष के लिए स्त्री की सुन्दरता का महत्व है, उसी प्रकार स्त्री के लिए भी पुरूष के व्यक्तित्व का महत्व है। दोनों ही शरीर है और एक-दूसरे के लिए हैं। आत्मा अदृश्य है और शरीर के माध्यम से ही कार्य करती है। अत: शरीर ही योग्यता का भी साधन बनता है और प्रेम व सृजन का भी। कोई भी पुरूष स्त्री को केवल शरीर के लिए नहीं चाहता, उसके गुणों व क्षमताओं का न केवल वह सम्मान करता है वरन एक गुणवान, विदुषी व बुद्धिमती महिला को पाकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करता है।
स्त्री और पुरूष के अपनी-अपनी रूचियां हैं, अपने-अपने नैसर्गिक गुण हैं। नैसर्गिक रूचियों के अनुरूप नैसर्गिक गुणों का विकास करके ही आगे से आगे बढ़ा जा सकता है। स्त्री कितने भी प्रयास कर ले कि वह पुरूषोचित गुणों का विकास करेगी, वह पुरूष नहीं बन सकती और न ही उसे पुरूष बनने के प्रयत्न करने चाहिए। पुरूष कितने भी प्रयास कर ले कि वह स्त्रियोंचित गुणों को ग्रहण कर ले किन्तु वह कभी सफल नहीं हो सकता। यहां पर मुंशी प्रेमचन्द द्वारा उनके प्रसिद्ध उपन्यास गोदान में व्यक्त विचार महत्वपूर्ण हैं, `यदि पुरूष स्त्रियों के गुणों को ग्रहण करले तो वह देवता बन जायेगा, जबकि यदि स्त्री पुरूष के गुणों को ग्रहण कर ले तो वह कुलटा हो जायेगी।´ वास्तविक स्थिति यह है कि स्त्री जिन गुणों से परिपूर्ण है वे संसार के लिए अनिवार्य आवश्यकता हैं। संसार का अस्तित्व उनके ऊपर ही निर्भर है। पुरूष भले ही शारीरिक शक्ति में स्त्रियों से कुछ इक्कीस ठहरता हो, इसी आधार पर वह स्त्रियों से श्रेष्ठ होने का दावा नहीं कर सकता और न ही उसे ऐसा करना चाहिए। शारीरिक शक्ति में तो पशु अधिक ताकतवर होता है तो क्या पशु को मानव से श्रेष्ठ मान लिया जायेगा? नारी को प्रकृति ने मातृत्व का एक ऐसा वरदान व दायित्व दिया है कि पुरूष कितने भी प्रयास करके उसकी बराबरी नहीं कर सकता। इसी वरदान या दायित्व को नारी की कमजोरी नहीं माना जाना चाहिए। नारी का यह मातृत्व ही उसे ममत्व देता है जो पुरूष को बांधकर रखने में समर्थ होता है। अन्यथा पुरूष पशुओं के समान घूमता ही नजर आता। यही ममत्व परिवार व समाज की धुरी है। परिवार व समाज की नियंता स्त्री ही है और उसी के हाथ में इनका नियन्त्रण देकर अस्तित्व व विकास सुरक्षित रखा जा सकता है। नारी को भी सरलता व विनम्रता के साथ-साथ दृढ़ता को भी आत्मसात करना होगा। इस सन्दर्भ में श्री हरिवंशराय बच्चन की `आत्मकथा क्या भूलं क्या याद करूं´ में उनकी पत्नी श्यामा का कथन, `मुझे जहर लाकर दे देना, पर दान के धन से मेरा इलाज न कराना´ प्रत्येक नारी के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। नारी को किसी की ओर निहारना नहीं चाहिए। उसके पास इतना कुछ है कि वह सम्पूर्ण सृष्टि के लिए दाता है। उसे कमजोरी का प्रदर्शन कर नारी होने के नाते मांगें नहीं रखनी चाहिए।
पुरूष भले ही शारीरिक शक्ति का प्रयोग करके या बाहर जाकर सम्पत्ति का अर्जन करे, उस पर उसका स्वामित्व नहीं हो सकता। उसका प्रबन्ध जितनी कुशलता से स्त्री कर सकती है, पुरूष नहीं। अत: संसाधनों पर केवल पुरूष का आधिपत्य स्वीकार नहीं किया जा सकता। शिक्षा व विकास के अवसरों की समानता की मांग करना गलत नहीं कहा जा सकता। प्रकृति ने भले ही नर-नारी में भिन्नताओं का सृजन किया हो किन्तु नारी को विकास के अवसरों से वंचित करने का अधिकार किसी को नहीं है न पुरूष को और न ही नारी को। प्रकृति ने नर व नारी को एक दूसरे के लिए पैदा किया है, अपने-अपने लिए नहीं इसी कारण नर की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं व अभिलाषाओं की पूर्ति की क्षमताएं नारी को बख्शी हैं तो नारी की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं व अभिलाषाओं की पूर्ति की क्षमताएं पुरूष को दी हैं। पुरूष नारी के लिए है व नारी पुरूष के लिए। नारी ने अपने कर्तव्य का पालन भली प्रकार से किया है, पुरूष घर से बाहर निकलकर शक्ति के मद में अपने कर्तव्य से समय-समय पर च्युत होता रहा है और यही समस्या की जड़ है। नारी ने भी उसके अह्म को बढ़ाने में योग ही दिया है। समस्या का समाधान नारी का भी कर्तव्य से च्युत हो जाना नहीं है बल्कि पुरूष को नारी के लिए जीना सीखना होगा यह सीख भी नारी ही दे सकती है। पुरूष नारी की प्रेरणा से ही आगे बढ़ता है। इसीलिए तो कहा जाता है कि प्रत्येक सफल पुरूष के पीछे किसी न किसी नारी का हाथ होता है। यह तभी संभव है जब दोनों के मिलन के समय शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक परीक्षणों के द्वारा एक-दूसरे के अनुरूप व्यक्तित्वों का चयन किया जायेगा। एक अशिक्षित नारी विद्वान नर के साथ या एक विदुषी नारी मूर्ख नर के साथ या एक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति नारी कुरूप नर के साथ या एक कुरूप नारी सुन्दर नर के साथ उचित जोड़ा नहीं बना पायेगी और समस्याओं में वृद्धि होने की संभावना हो सकती है। हां शरीर पर नियंत्रण मस्तिष्क व हृदय का होता है, अत: शारीरिक सौन्दर्य की अपेक्षा भावनात्मक व बौद्धिक विकास व समन्वय दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए अधिक आवश्यक है। जब तक समन्वय व सांमजस्यपूर्ण रूख रखते हुए एक-दूसरे के पूरक बनकर साथ-साथ जीने के लिए तैयार नहीं होगें। वे एक-दूसरे के व्यक्तित्व के विकास में या परिवार व समाज के विकास में पूर्ण योग नहीं दे सकते।
हमारी गलत अवधारणाओं, कालान्तर में पनपी गलत परंपराओं तथा नारी के द्वारा नर के प्रति पूर्ण समर्पण, तथा नर द्वारा नारी के प्रति अपने कर्तव्य से च्युत होने के कारण ही नारी को जन्म के अधिकार से ही वंचित किया जा रहा है। उसे गर्भ में ही समाप्त कर दिया जाता है। इस अन्याय को करने में केवल पुरूष ही नहीं महिला भी पीछे नहीं हैं। नारी पुरूष के लिए है तो पुरूष को नारी के लिए होना पड़ेगा और नारी नर सन्तान पर अधिक ध्यान देती है तो नर को नारी सन्तान को पूर्ण संरक्षण देना चाहिए। यह विपरीत लिंगी आकर्षण के कारण होता है। किन्तु नारी को भी समझना चाहिए कि उसे नर सन्तान कितनी भी अच्छी लगती हो, नारी सन्तान की भी उसे किसी भी स्थिति में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। नारी को दहेज की आवश्यकता नहीं, किन्तु पिता की सम्पत्ति में उसके अधिकार से उसे वंचित करने का किसी को भी अधिकार नहीं होना चाहिए। नारी को भी अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए अपने रौद्र रूप को धारण करने में नहीं हिचकना चाहिए। नारी को भी अपने विकास को सुनिश्चित करने वाले अधिकारों की प्राप्ति के लिए आगे आना होगा। सामान्यत: माताएं कन्याओं की अपेक्षा बालकों को अधिक समय तक दुग्ध पान कराती हैं उसके बाद भी उनकी सेहत का ही अधिक ध्यान रखती हैं, इस प्रवृत्ति को बदलना होगा। घर पर नियंत्रण गृहिणी का ही होता है अत: अपने प्रति भी उसे सकारात्मक सोचना होगा। आज नारी पर ही दायित्व है कि यदि पुरूष उसकी ओर ध्यान नहीं दे रहा है, अपने कर्तव्यों की पूर्ति नहीं कर रहा है तो उसे इसके लिए मजबूर करे। उसे ध्यान रखना चाहिए, अधिकार मांगने से नहीं मिलते उन्हें शक्ति से लेना पड़ता है। पुरूष निश्चित रूप से उसका प्राकृतिक मित्र है किन्तु यदि वही उसके व्यक्तित्व का क्षरण करे तो उसे उसकी रक्षा के लिए खड़ा होना ही पड़ेगा यही उसके हित में है तो यही पुरूष के हित में भी, क्योंकि नारी का कमजोर होना स्वयं पुरूष का कमजोर होना भी है। नारी को समानता के आकर्षक झूंठ में न फंसकर अपना व अपने प्राकृतिक घटक पुरूष का नैसर्गिक विकास सुनि्श्चित करना चाहिए और यही काम पुरूष को भी सुनिश्चित करना चाहिए। न तो पुरूष को स्त्री बनने की आवश्यकता है और न ही स्त्री को पुरूष। स्त्री, स्त्री रहे और पुरूष, पुरूष। यही दोनों के आनन्द का आधार है। दोनों एक-दूसरे के प्रतिस्पर्द्धी बनने के प्रयत्न न करके एक-दूसरे के पूरक बनकर जीवन को आनन्दपूर्ण व संसार को स्वर्गिक आभा से परिपूर्ण बना सकते हैं और उन्हें ऐसा करना चाहिए।

Friday, August 1, 2008

जब तक चाहेगी थामना, किसी का हाथ

बन जा तू जबाब


जब तकचाहेगी

थामना किसी का हाथ


लगाई जाती रहेंगी नुमाइशें ।


जब तक नही देगी

पलटकर जबाब

लेते रहेंगे लोग

तेरा इम्तहान।


निश्चय ही

तू एक अच्छी इन्सान है

तेरी निराली शान है

तोड़ दे बनावटी आन है

दुनिया करेगी तेरा मान है।


जब तक

तू खुद ही नहीं रखेगी

अपनी पसन्द का ख्याल

लोग कैसे पूछेंगे?

तुझसे तेरी पसन्द

व्यवस्थाए कैसे हो पायेंगी?

चाक-चौबन्द।


जब तक

जीयेगी

किस्मत के भरोसे

कैसे मिल पायेंगे अधिकार?

अधिकार जताने नहीं

कर्तव्यों के साथ प्राप्त करने हैं।


जब हो जायेगी तू

कर्म पथ पर अडिग

कर नहीं सकता पुरूष

तेरी बराबरी।

किसमें हिम्मत?

लगाये तेरा मोल

खड़ी हो जमीन पर

अपने को तोल!


कब तक?

बनेगी बाजारों की शान!

दहेज लोभियों कोमार दे ठोकर

किस्मत पर नहीं

कर्म पर भरोसा कर

खुद के ही नहीं

पराये दैन्य भी हर।


कब तक?

पूछती रहेगी सवाल?

बन जा तू जबाब

इकट्ठी कर क्षमताए¡

मिटा दे विषमताए¡

जुटा शक्ति, शिक्षा और सामर्थ्य

हे नारी!

तू ही दे सकती

नर जीवन को अर्थ।

Tuesday, July 29, 2008

समानता का नारा,लगता बड़ा प्यारा

आओ सभी नर और नारी

समानता का नारा,

लगता बहुत प्यारा,

उठते जो प्रश्न,

करते सभी किनारा।

समानता : एक कृत्रिम शब्द,यथार्थ में,

दिखती नहीं समानता

किसी भी पदार्थ में।

यहां तक कि एक ही व्यक्ति के,

दो अंगों में भी नहीं होती समानता,

हर स्थान पर है असमानता,

यह असमानता जरूरी है,

क्योंकि यही करती सृष्टि को पूरी है।

सभी एक-दूसरे के बिन अधूरे हैं।

आपस में मिलकर ही होते सब पूरे हैं।

विभिन्न असमानतायें मिलकर ही,

पूर्णता की ओर ले जाती हैं।

समानता एक यक्ष प्रश्न?

जिसका उत्तर,

कब खोज पाया युधिष्ठर?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओ सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पडें प्रश्नों पर भारी।
क्या दो नर, या दो नारी,

आपस में समान होते हैं?

क्या दो जुड़वा भी,

एक जैसे महान होते हैं ?

क्षमता, दक्षता या निष्ठा में,

अन्य किसी भी विशेषता में।

क्या नहीं समेटे होते?

कोई न कोई असमानता?

प्रश्न है फिर हम क्यों?

आग और पानी पर समानता थोप रहे हैं।

चांद और सूरज को एक ही,

तराजू में तोल रहे हैं।

समानता के नाम पर,

प्रकृति के सृजन में,

क्यों छुरा भोंक रहे हैं?

एक-दूसरे के पूरक,

प्राकृतिक मित्र नर-नारी में,

समानता के नाम पर,

जगाकर प्रतिस्पर्धा,

क्यों बना इनको जौंक रहे हैं?

क्यों नर को लगने लगी नारी- एक वैश्या?

क्यों नारी को लगने लगा नर- जंगली और भेिड़या?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों नारी भ्रूण को,

कोख में ही नष्ट किया जा रहा है?

क्यों मानवता को मिटाया जा रहा है?

क्यों लक्ष्मी को ही किया जा रहा है?

पैतृक सम्पत्ति से वंचित!

वंचित करके दी जाती रही हैं :

जो छोटी-छोटी भेंटें।

दहेज के नाम पर गरियाकर,

उनसे भी वंचित किये जाने का,

रचा जा रहा है 'षड्यंत्र?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों देखते हैं सदैव,

पुरुष ही हो बड़ा,शिक्षा, शक्ति,

सामर्थ्य ही नहीं,उम्र में भी।

क्यों शिक्षा से वंचित,

किया जाता रहा है- सरस्वती को ही,

क्यों शक्ति से वंचित किया जाता रहा है:

साक्षात शक्ति रूपा नारी को ही।

क्यों धन, शिक्षा,स्वास्थ्य, शक्ति से वंचित करके?

पिता कर देता है दान :

एक वस्तु की तरह!

या फिर बेच देता है :

दामाद रूपी ग्राहक को!

और कल्पना करता है कि,

उसकी दान की हुई

या बेची हुई पुत्री,

पूजी जायेगी दूसरे घर में?

विवाद की स्थिति में,

हो जायेगी निर्वाह-व्यय की हकदार?

क्यों ? क्या है इसके पीछे तर्क?

पति रूपी नर के लिए?

क्या शादी करना है अपराध?

जो एक पुरूष,केवल एक परंपरा के निर्वाह मात्र से,

कुछ पल/दिन/माह/वर्ष के साथ से,

ही पा जाता है पति का तमगा

और विवाद की स्थिति में,

मजबूर किया जाता है-

जीवन भर निर्वाह भत्ता देने को।

दोनों हों शिक्षित,

दोनों हों समर्थ,

दोनों का अधिकार,

अपनी-अपनी पैतृक व

अपनी कमाई गयी, सम्पत्ति में।

दोनों हों समान तो क्यों कोई,

किसी पर निर्वाह व्यय के लिए,

क्यो बने भार!क्या है इसका आधार ?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर,

आओ सभी नर और नारी,

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों चरित्र की परिभाषा,

सीमित है शारीरिक सम्बन्धों तक,

क्यों झूठ, कपट, छल, धूर्तता,रिश्वतखोरी,

देशद्रोह, लाटरी, जुआऔर मदिरापान,

चरित्र का निर्धारण करते समय,

विचारणीय नहीं होते,

क्या पति-पत्नी द्वारा,

एक-दूसरे पर बलात्कार नहीं होते?

क्यों `वैश्या´ शब्द प्रयुक्त होता है -

केवल स्त्री के लिए,

जबकि पुरुष के बिना ,स्त्री

कुछ कर ही नहीं सकती,

प्राकृतिक व्यवस्था है,

स्त्री शारीरिक सम्बन्धों में,

एक सहयोगी होती है, प्रेरक होती है,

किन्तु निष्क्रिय पार्टनर मानी जाती है,

वह नहीं कर सकती, पुरुष के साथ,

भौतिक रूप से बलात्कार,

फिर भी वही क्यों दोषी है,

वही क्यों `वैश्या´ है?

उसके पास जाने वाले,

उसको वहां तक पहुंचाने वाले,

वैश्या की श्रेणी में क्यों नहीं आते?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओ सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।
क्यों नारी को ही सहारे की,

मानी जाती है जरूरत,

जबकि पुरुष है हर पल :

नारी पर आश्रित,

नहीं आ सकता,

जमीन पर नारी के बिना,

नहीं जी सकता,

नारी-दुग्ध के बिना,

चाहिए नारी का स्नेह, दुलार,

प्रेम,मार्गदर्शन व प्रेरणा कदम-कदम पर

नहीं चल सकता,

नारी के बिना,

एक कदम भी,

नहीं सो सकता मां की लौरी,

पत्नी की हमसौरी के बिना,

एक क्षण को भी,

मां के अभाव में धाय,

पत्नी के अभाव में या फिर वियोग में प्रेमिका,

वह भले ही बाजारू हो या वास्तविक,

नारी ही साथी बनती है।

फिर नर-नारी में समानता की,

प्रतिस्पर्धा क्यों चलती है?

केवल है प्रश्न, नही है उत्तर

आओं सभी नर और नारी

मिलकर ही शायद,

पड़े प्रश्नों पर भारी।

Monday, July 28, 2008

प्रेम क्या है?क्षणिक व्यापार,मौज-मस्ती मनाने का?

करोगे काम?


प्रेम क्या है?

एक पथ,

ईश्वर तक पहुचंने का?


प्रेम क्या है?

एक सच,

जीवन जीने का?


प्रेम क्या है?

एक नाटक,

दूसरों को फुसलाने का?


प्रेम क्या है?

एक तरकीब,

छिपे राज उगलवाने का?


प्रेम क्या है?

क्षणिक व्यापार,

मौज-मस्ती मनाने का?


प्रेम क्या है?

एक मजबूर सम्बन्ध

साथ-साथ रहने का?


प्रेम क्या है?

करोगे काम?

राष्ट्रप्रेमी को समझाने का?

Sunday, July 27, 2008

हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।

मुस्कान लुटाएं
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
अपरिचित दोंनो परिचित हो गये
रंगरीले ख्वावों में खो गये
बिताने को मिलकर के ,
प्रेम भरे गाने कुछ गायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
हम राही से एक हो गये
दिल दोंनो मिल सुखी हो गये
अगले चौराहे से ही तो
अलग-अलग रस्ते हो जायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।
पथ बदले और पथिक भी बदले,
दुनियां के सब प्राणी बदले
अपनी-अपनी राहों पर
सबको मुस्कान लुटायें।
हम राह के पक्षी है,जाने किधर को उड़ जायें।
हमसे दिल न लगाना तुम दिल के टुकड़े हो जायें।

Wednesday, July 23, 2008

महिला सशक्तिकरण की पोल खोलता पायल का यह खत

महिला सशक्तिकरण की पोल खोलता पायल का यह खत
अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त जोधपुर निवासी 26 वर्षीय पायल के खत से आपको समाज की असली तस्वीर दिखाई देगी, जिसे दैनिक भास्कर ने बुधवार, 25 जुलाई 2008 को मधुरिमा परिशिष्ट में आवरण कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। मैं दैनिक भास्कर का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए, हूबहू, इसे साभार इंटरनेट पर प्रस्तुत कर रहा हूं।
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं है बल्कि सत्य से लबरेज एक मर्मस्पर्शी कथा है। ये दास्तां है हमारे देश की हर लड़की की, जो शादी योग्य हो चली है। पायल की कहानी केवल उसकी कहानी नहीं है बल्कि देश की लड़कियों की कहानी भी है।
मैं अपनी बात कहना शुरू करती हूं, जब मैं कालेज में थी, तब हमारी अपनी जिन्दगी होती थी। मैं, मेरे दोस्त और बहुत सारी मस्ती............ कोई जिम्मेदारी नहीं, कोई फिक्र नहीं। बस दिन भर मौज-मस्ती करना और अपने सपनों के बारे में बात करना ........... उस वक्त हर बात को लेकर बहुत उत्सुकता होती थी। हर नई चीज हम सीखना चाहते थे। उन दिनों सबके अपने-अपने सपने थे। सबसे हसीन सपना था शादी का सपना........सबके अलग-अलग सपने, ज्यादा कुछ मालुम नहीं था, बस अपनी बड़ी दीदियों को देखते थे। जब उनकी शादी होती थी तो उन्हें मिलने वाले नए कपड़े, गहने ये अट्रेक्ट करते थे। वे जब ससुराल से आतीं थीं, तो उनका जो स्वागत होता था, वो सब बहुत अच्छा लगता था। हमस ब यही सोचते थे कि जब हमारी शादी होगी, तो हमें भी इसी तरह से इन सबका प्यार मिलेगा यानि कुल मिलाकर सपनों की दुनियां सब कुछ ऐसे ही चल रहा था, जब तक कि हम लोगों का पोस्टग्रेजुएशन नहीं हो हुआ। फिर धीरे-धीरे हम लोगों का सच्चाई से सामना हुआ। आहिस्ता-आहिस्ता शादी को लेकर देखे गए, हमारे सपने एक कड़वी सच्चाई में तब्दील हो गए। पढ़ाई पूरी होने के बाद जब मैं घर में रहने लगी, तो शुरू-शुरू में तो सबकुछ ठीक रहा, फिर जब रिश्ते आने लगे तो कुछ परिवर्तन सा महसूस किया। पता चला कि शादी के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है `आपका रंग´। लड़की का गौरा होना उसके सारे दोषों को छुपा देता है और रंग सांवला हो या काला तो कोई भी गुण मायने नहीं रखता। एक परिचिता ने मेरे लिए कहा था, `मैं सेकंड क्लास में भी सेकंड ग्रेड की लड़की हूं´ ये वाक्य पहला था, जिसने मुझे बुरी तरह से हिलाकर रख दिया था। इसलिए तो इसे कभी मैं भूल नहीं पाती पर यह तो सिर्फ शुरूआत थी। उसके बाद रिश्ते आने का सिलसिला जारी रहा तो आज लगता था कि शादी मेरी है, जिंदगी मेरी है, तो मेरी सोच मेरी पसंद-नापसंद ही सब कुछ होगी।



ऐसा एक बार हुआ भी था। बैंगलोर का रिश्ता था, अच्छी जानी-मानी फैमिली थी, लड़के ने एम.बी.ए. किया हुआ था। वे लोग मेरी फोटो मा¡ग रहे थे। जब हमने लड़के की फोटो मा¡गी, तो लड़के का जबाब देखिए, ``मैं कोई लड़की हू¡ क्या, जो अपनी फोटो दू¡? मेरी फोटो से क्या फर्क पड़ता है?´ मैंने कह दिया कि जिस लड़के की सोच ऐसी है, उसने एमण्बीण्एण् किया हो मैं मान ही नहीं सकती।
फिर समय गुजरने लगा और मेरी उम्र बढ़ने लगी। ये सारी बातें मेरे अन्दर चिड़चिड़ाहट भरने लगीं। पहली बार बात देखने दिखाने पर पहु¡ची। परिवार बहुत अच्छा था, लड़का दिखने में एवरेज था। उसके भी कई रिश्ते सिर्फ उसके लुक्स की वजह से नहीं हुए थे। कहने का अर्थ यह है कि वह भुगत-भोगी था। वो लोग जब मुझे देखने आये, सब बढ़िया था। जिन चाची ने रिश्ता बताया था, उन्होंने उनको हा¡ में जबाब दे दिया था, पर हमें कोई उत्तर नहीं दिया। फिर थोड़े दिन बाद पता चला कि उन्होंने रिश्ता जयपुर में तय कर दिया है। कारण था- जब वे लोग देखने आने वाले थे, तब मैंने सिर्फ ये कहा था, `मैं लड़के से एक बार मिलना चाहती हू¡, ऐसा न हो कि आप लोग बिना मुझे दिखाये हा¡ कह दें।´ मेरे पापा भी यही चाहते थे पर इस बात ने इतना बड़ा रूप ले लिया। घर में सब लोगों ने पापा को इतनी भली-बुरी सुनाई, `क्या हम पर विश्वास नहीं है? क्या जो तुम करोगे वो ठीक होगा..............? पायल में इतनी अक्ल है क्या? वो क्या देखेगी´ और न जाने कितनी ही बातें कहीं। मुझे नहीं मालुम था कि मुझे इतना भी हक नहीं कि मैं लड़के को देख सकू¡। जब उन लोगों ने ही मना कर दिया तो सारी बात खत्म हो गई। अब समाज के लोगों ने मुझे ताने मारने शुरू कर दिये। कई लोगों के तो घर पर फोन आए, `बधाई हो लड़की की सगाई कर दी और हमें बताया भी नहीं।´ मुझ से कहा गया `उन लोगों ने मना कर दिया और तेरे चेहरे पर कोई फर्क ही नहीं दिख रहा? यानि ि कवे मुझसे कहना चाह रहे थे कि मुझे रोना चाहिए क्योंकि मेरा रिश्ता नहीं हुआ।
अब बताती हू¡ जब कोई देखने आता है, तो क्या होता है- हम लड़की वाले हैं, तो सारे इन्तजाम परफैक्ट होने ही चाहिए। इसके अलावा सबकी सलाह यह पहनना, ऐसे बैठना, ऐसे बात करना, ज्यादा मत बोलना वगैरह। मतलब गलती को कोई गुंजाइश नहीं, उस वक्त हम एक कठपुतली होते है ............... । कहना होगा कि हमसे तो निचले तबके की लड़किया¡ अच्छी, जिन्हें न तो पढ़ाया जाता है, न उनमें सोचने समझने की शक्ति होती है। कम से कम उन्हें इन सब बातों का कोई असर नहीं होता। यहा¡ तो खुद की सोच रहते हुए भी ऐसे ही रहना पड़ता है जैसे हमारा कोई अस्तित्व ही न हो। हमारी कोई पहचान ही नहीं है। हमारा कोई वजूद ही नहीं है। भले ही हमारे देख में महिला सशक्तिकरण का नगाड़ा पीटा जाता है पर सच्चे मायने में स्त्री को वो दर्जा हासिल है, जो उसे मिलना चाहिए?
अभी मेरे साथ एक वाकया हुआ था। लड़के के पापा ने पूछा शादी के बाद जॉब करना चाहोगी? मैंने कहा, `हा¡, यदि मौका मिला तो।´ इस पर लड़के की मा¡ ने कहा जरूरी है क्या जॉब करना? मैंने कहा, `नहीं´। फिर दुबारा लड़के के पिता ने पूछा फ्यूचन प्लानिंग कया है? क्या सोचा है आगे?´ आपको नहीं लगता यहा¡ पर यह सवाल बेमानी था। अब बताइए मैं क्या जबाब देती? उन लोगों के जाने के बाद मेरे ताऊजी ने कहा, `तुमने उत्तर क्यों नहीं दिया?´ क्या जबाब देती क्या वाकई एक लड़की की एक सोच होती है? अपना कोई फ्यूचर होता है? शादी से पहले सब बातें पापा, भाई या मा¡ तय करते हैं, हमें निर्णय लेने की भी इजाजत नहीं होती। हम तो सिर्फ वहा¡ फैसला लेते हैं जहा¡ ये तय करना होता है कि आज क्या पहनना है? कौन से रंग का नेल पेंट लगाना है, हेयर कट कौन सा होगा, बस। बाकी सारे बड़े निर्णय बड़ ही लेते हैं और शादी के बाद पति ................ फ़िर बाद में बच्चे।
हमें तो प्यार करने की भी इजाजत नहीं होती। क्यों हमेशा परिवार की इज्जत का बोझ लड़की के सिर पर ही होता है? यदि वह अपना मनपसन्द जीवन साथी चुन ले, तो खानदान की इज्जत पर दाग लग जाता है। जब लड़का अपने माता-पिता को घर से निकालकर बाहर खड़ा कर दे, तब परिवार की इज्जत नहीं जाती?
और मिठाई कब खिला रही हो? ............... ये वाक्य जब भी घर से बाहर निकलो, 4-5 बार सुनाई देना तो मामूली बात है, ये लोगों के ताने देने का तरीका है। अब तो इतनी ज्यादा आदत हो गई है ये सुनने की कि कभी-कभी तो मै जबाब दे देती हू¡, `हमारे हाथ में नहीं मिठाई खिलाना, नहीं तो कब के खिला चुके होते ..... ?
ऐसा हर लड़की के साथ होता है- मेरी कई सहेलिया¡ हैं, उनसे जब भी बात होती है, कहती हैं, `अब तो जल्दी से जो किस्मत का फैसला है, जो जाए।´ लड़कियों को फिब्तया¡ कसने या शोषण का िशकार होने से नहीं बक्शा जाता, लेकिन बात जीवन साथी की आए, तो तमाम मापदण्ड सामने रख दिए जाते हैं। सच तो यह है कि स्त्रिया¡ महज देह हैं, जिनका हर पल, हर मोड़ पर शोषण किया जाता है। हमको तो घरवालों के शोषण का भी िशकार होना पड़ता है- लड़कियों की भेड़-बकरियों की तरह नुमाइश लगाकर।

Sunday, July 20, 2008

जो जातिवाद की नफरत की आग में देश को में झोंकते

प्रस्तुत है डाक्टर एस के मित्तल द्वारा प्रेषित रचना समय की पुकार
समय की पुकार


समय की पुकार आज की दरकार
जाग दोस्त सुन भारत माता की पुकार


जो दंगा करते हैं
जो नर संहार करते है
जो जातिवाद की नफरत की आग में देश को में झोंकते
राम- रहीम -इसा - गुरु -गाँधी -बाबा की बात करते है

इन आस्तीन के सांपो से
सावधान ख़बरदार होशियार
मेरे देश वासिओं कसलो कमर,
होजाओ त्यार

इन पापिओं को सबक सिखाना होगा
हर हथियार काम में ला इन्हें उडाना होगा


देर बहुत हो जायेगी
मानवता कराहयेगी
जब देश ही ना रहा
तो नींद कहाँ से आएगी
आज की ताजा ख़बर ...............
कश्मीर जल रहा है
काबूल आतंकियों से थर्रा रहा है

गुलाम इस्तीफ़ा दे दिल्ली चल रहा है
मनमोहन टोकियो में बुश से चोंचे लड़ा रहा है
वाम हका बका मुलायम अवसर ताक रहा है
महंगाई का नाग डस रहा किसान जहर खा रहा है
भारतमाँ का मुकट खतरे में है केन्द्र थर्रा रहा है

समय की पुकारआज की दरकार
जाग दोस्त सुन भारत माता की पुकार

Monday, July 14, 2008

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है

जो भी तुमको प्यारा है


तुमने तन ही दिया भले हो, हमने मन भी बारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

नहीं किसी से ईर्ष्या हमको

नहीं बाधंना चाहें तुमको।

हमें भले ही ना मिल पाया,

जीवन-रस मिल जाये तुमको।

हिमगिरि तब था भाया हमको, अब सागर का किनारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

नेत्रों से जल, कभी न निकसे

ह्रदय-कुमुद रहे हरदम विकसे।

अधरों पर मुस्कान रहे नित,

आप नहीं, अब हम ही सिसके।

स्वार्थों की मारी मति ने ही तो, प्रेम से छीना सहारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

मृग-मरीचिका है अब अपनी,

मरूथल में है माला जपनी।

अपनी जान जहां में खोई,

नहीं किसी की जान हड़पनी।

विस्तृत जग आमिन्त्रत करता, याद तुम्हारी कारा है।

हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।

क्षिति जल पावक गगन समीरा

तुम बिन कैसे भये अधीरा ?

अवशोषण नासूर बना अब,

कौन लगाये इसको चीरा?

धरा ही नहीं, आसमान भी, देखो हमने फाड़ा है।

जिसने सबको हरा दिया है, वह खुद से ही हारा है।।

जल भी, हमने नहीं बख्शा,

वायु भी फ़ैलाये गमछा।

पावक को भी बांधा नर ने,

कब तक इसका चलेगा चमचा।

प्रकृति के आड़ोलन ने ही, भय का झण्डा गाड़ा है।

जिसने सबको हरा दिया है, वह खुद से ही हारा है।।

Thursday, July 10, 2008

धर्म के नाम पर, कब तक?

कब तक?



धर्म के नाम पर,

कब तक?

सती होंगी ललनाए¡

जीवन-भर

त्रासदी सहेंगीबाल-विधवाए¡।


धर्म के नाम पर,

कब तक?

संलेखना/संथारा के द्वारा

आत्महत्याए¡

होती रहेंगी।

पढ़ने की उम्र में,

अबोध बालक/बालिकाए¡,

दीक्षा लेकर,

साधु और साध्वी बनती रहेंगी।



यश-अपयश,

लोक-परलोक के नाम पर

कब तक?

गृहस्थ जीवन को

हीन बताया जाता रहेगा।


धर्म के नाम पर,

कब तक?

शाहबानो, गुडिया ,

इमराना, लतीफ़ुन्निसा,

तलाशती रहेंगी अपना वजूद।



बाल-दीक्षित समताओं को,

शादी रचाने के लिए

कब तक?

करने होंगे

चमत्कारों के दिखावे।


धर्म में हो आस्था,

स्वेच्छया हो उसका पालन,

स्वेच्छा से बनें साधु और संन्यासी,

समाज के हित में।

न हो कोई मजबूरी,

न हो कोई दबाब,

जब चाहे,

कर सकें वापसी,

गृहस्थ जीवन में।


कब तक?

मिल पायेगी

स्वतन्त्रता

पूजा की

आराधना की!

आस्था की!

और सबसे आगे बढकर,

जीवन जीने की!

Sunday, July 6, 2008

माँ

अबला-सबला,
हँसना-रोना,
सोना-जागना,
उसको होता हर्ष,
सन्तान का उत्कर्ष।

सरल,विनीत और विनम्र,
सन्तान का सब कुछ क्षम्य,
हृदय है अगम्य,
हो जाये भ्रष्ट,
सन्तान हो ना नष्ट।

व्यष्टि-समष्टि,
सारी ये सृष्टि,
भले ही जायें,
सिद्धियां अष्ट,
सन्तान न पाये कष्ट.

Saturday, June 28, 2008

तुम नहीं हो हमारी अमानत, स्वीकार है हमें,

मुक्तक

खड़े हैं कब से चौराहे पर, नजारा ही बदल गया।
करते-करते इन्तजार, जमाना ही बदल गया।
परीक्षा लोगी कब तक? हमारे इस जीवट की,
आ जाओ एक बार, तुम्हारा हुलिया ही बदल गया।


न देखा तुमने मुड़ के, हम दीदार न कर सके।
चाहा था हमने तुमको, तुम इन्कार न कर सके।
तुम नहीं हो हमारी अमानत, स्वीकार है हमें,
नादान हैं तुम्हें छोड़कर, प्यार ना कर सके।


हमारे दिल में है क्या हम इजहार ना कर सके।
तुम बैठे हमारे सामने, हम दीदार ना कर सके।
ठोकरें ही थीं पथ में, हम थे उसी गम में,
चाहकर भी हम तुमसे, इकरार ना कर सके।

बीत गये वे दिन रावी का बह गया वह पानी।
गुलिश्ता उजड़ गया, छाई है यहा¡ वीरानी।
क्या करेगी आकर ? हे तितली! सभंल जा,
नहीं है यहा¡ राजा, न बन सकेगी तू रानी।


दर पर खड़े तुम्हारे हम घण्टी ना बजायेंगे।
तुमको खुश करने को, ना अपने को सजायेंगे।
इकरार और इंकार सब छोड़ते हैं तुम पर,
तुम्हारे गम में डूबे, नहीं अपने को बचायेंगे।


चाहा था तुमको हमने , करते रहे तुम्हें प्यार।
बीती हैं वर्षों देखो, नहीं कर सके हम दीदार।
कहा था तुमने ही, पत्थर भी हैं दुआ देते,
राष्ट्रप्रेमी बना पत्थर? आ के कर जाओ इजहार।


नहीं थी आरजू फिर भी, तुम्हें दिल में बसाया।
दिल में हमारे बैठकर, हमें ही सताया।
तुम्हारी मुस्कराहट पर जीवन है निछावर,
का¡टो में फूल खिले, जब भी तुमने मुस्काया।

Friday, June 27, 2008

जब तक चाहो तुम,साथ चलते जाना।

आगे बढ़ते जाना
जब तक चाहो तुम,साथ चलते जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

पथ के पथिक हैं, पाथेय तुम ले लो।
नदी है, नौका है, साथ मिल इसे खे लो।
कश्ती हुई पुरानी, भंवर इससे टकरायें,
धैर्य और साहस से ,तूफानों को मिल झेलो।
पथिक हैं जितने भी साथ लेके जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

समय नहीं है अब, आगे हमको बढ़ना होगा।
कष्ट आयें कितने भी सबको ही सहना होगा।
भटके हुओं की खातिर, यदि कुछ कर पायें,
राह पर लाना है तो ,पास उनके जाना होगा।
हमने तो तुमको, बस अपना साथी माना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

हवा में उड़ने की, तमन्ना नहीं रही मेरी।
मधु रस पीने की, तमन्ना नहीं रही मेरी।
श्रम और कौशल से काँटों में भी फूल खिलें,
खिलाकर, पुष्प,चढ़ाने की,तमन्ना रही है मेरी।
बगिया लगाकर के, आगे बढ़ते जाना।
तुम पर नहीं है मुझको, अधिकार पाना।।

Thursday, June 26, 2008

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।जीवन भर का प्यार चाहिए।।

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए

दहेज एक विलक्षण शब्द है। इसके उन्मूलन के लिए विभिन्न कार्यक्रम व आन्दोलन संस्थाओं द्वारा चलाये जाते हैं तो सरकारों द्वारा विभिन्न कानून बनाये जाते हैं। संस्थाओं व सरकारों द्वारा औपचारिक रूप से किए गए समस्त प्रयासों के विपरीत व्यक्तियों द्वारा अधिकतम दहेज प्राप्त करने या देने पर ही जोर दिया जाता है। यद्यपि कुछ अपवाद भी मिल सकते हैं तथापि दहेज का विरोध करना एक फैशन है और अधिकतम् दहेज प्राप्त करना या देना खान्दान की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। दहेज देते समय हम दहेज मा¡गने वालों को गरिया भी सकते हैं, किन्तु दहेज प्राप्त करना हमारे लिए किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं होता। दहेज एक ऐसी परंपरा है जिसका जितना ज्याादा विरोध किया जाता है, यह उतना ही अधिक प्रसार पाती है। वास्तव में दहेज एक शब्द नहीं शब्द-युग्म है, `दान-दहेज´। दान-दहेज इस बात को इंगित करता है कि पिता के द्वारा बेटी को दान के रूप में दहेज दिया जाता है। मूल रूप से विवाह को कन्यादान कहा जाता रहा है। दान के साथ दक्षिणा के रूप में पिता श्रद्धानुसार धन दिया जाता है। इस प्रकार दान-दहेज की अवधारणा पूर्ण होती है। दान-दहेज की अवधारणा के मूल में है बेटी को पिता द्वारा अपने घर का सदस्य न मानना, उसे पराया धन कहना। कन्या दान इसी बात को इंगित करता है कि बेटी वस्तु है और उसे दान करके पिता पुण्य का अधिकारी है। यह अवधारणा नारी को व्यक्ति के रूप में स्वीकार ही नहीं करती। बेटी को भाइयों के समकक्ष परिवार का सदस्य संपत्ति में उत्तराधिकारी ही नहीं मानती। दहेज को समाप्त करने की बात पर जितना जोर दिया जाता है, उतना संपत्ति में अधिकार देने की बात पर नहीं। दान-दहेज की आड़ में अभी तक नारी को उसके संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जाता रहा है, दहेज को संपत्ति का अधिकार दिए बिना समाप्त करना, उसके साथ घोर अन्याय करना है। नारी को संपत्ति में अधिकार देने के बाद कुछ शतािब्दयों में दहेज स्वयं ही समाप्त हो जायेगा।

प्राचीन काल से ही धर्म की आड़ लेकर नारियों को छला जाता रहा है और उसी का एक रूप है दान-दहेज। अब हम समझने लगे हैं कि बेटी भी बेटे की तरह पिता की ही नहीं, संयुक्त परिवार की संपत्ति में भी बराबर की अधिकारी हैं, इसलिए दान-दहेज की अवधारणा ही समाप्त हो जाती है। लेकिन अभी तक सरकारों ने कानून बनाए हैं, उन्हें व्यक्तियों ने अंगीकार नहीं किया है। दहेज को गालिया¡ तो देते हैं, किन्तु दहेज बंद करके पिता की संपित्त में बेटी के अधिकार को मान्यता नहीं दे रहे। कानून भले ही बन गया हो किन्तु कितने लोग बेटी को उसका हिस्सा देने को तैयार हैं? कितनी बेटिया¡ इसकी हिम्मत जुटा पा रहीं हैं कि वे भाई से अपने अधिकार की मा¡ग कर सकें? कितने भाई बहन को उसका हिस्सा देकर उसके साथ प्रेम और सौहार्द्र से जीवन भर व्यवहार करने को तैयार हैं? कोई बहन बिना कानूनी कार्यवाही के पिता की संपत्ति में हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकती और कानूनी कार्यवाही के बाद भाई कह देते हैं कि अब उससे हमारा कोई रिश्ता नहीं। ऐसा ब¡टवारे के बाद भाइयों में तो नहीं होता कि आपस में उनका कोई रिश्ता ही न रहे फिर बहन के साथ सामान्य ब¡टवारा क्यों नहीं स्वीकार किया जा सकता? बेटी का पिता की संपत्ति में अधिकार देने से दान-दहेज स्वयं ही समाप्त हो जायेगा। किसी कानूनी, संस्थागत या जनान्दोलन की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

जब बेटी पिता की संपत्ति में अपना अधिकार प्राप्त करके विवाह करे तो पति के साथ उसकी संपत्ति में बराबर की अधिकारी भी होगी। वर्तमान स्थिति में उसे निर्वाह व्यय के लिए भी पापड़ बेलने पड़ते हैं, जबकि निर्वाह व्यय देने की बात ही कहा¡ आती है? वह अपने पति के साथ समस्त संपत्ति में परिवार के एक सदस्य के रूप् में अधिकारी होनी चाहिए। बेटे-बेटियों को मा¡-बाप द्वारा भेदभाव रहित प्यार-दुलार मिले, उनका पालन-पोषण भेदभाव रहित वातावरण में हो, िशक्षा के अवसर देकर दोनों को ही विकास के अवसर मिलें और समय आने पर दोनों को ही पारिवारिक सदस्य होने के नाते पारिवारिक सम्पत्ति में भाग मिले। शादी के बाद परिस्थितियों को देखकर पति-पत्नी निर्धारित करें कि स्थाई रूप से उन्हें पत्नी या पति के पैतृक स्थान किस स्थान पर रहना है। नर-नारी की प्राकृतिक भिन्नताओं के बाबजूद अपनी-अपनी प्रकृति, आवश्यकताओं व क्षमताओं के अनुरूप उन्हें अपने-अपने कौशल के विकास के अवसर मिलें ताकि वे समाज के लिए अच्छे से अच्छा कर पायें। समान क्षमताओं व अधिकारों से सम्पन्न स्त्री-पुरूष पति-पत्नी के रूप में मिलेंगे तो उनमें अधिक सामंजस्य व प्रेम होगा और हम एक आदर्श समाज की और बढ़ सकेंगे। सभी के लिए अवसर मिलने पर समानता के संघर्ष से भी बचा जा सकेगा, जो किसी भी दृिष्ट से समाज के लिए उपयोगी नहीं है। समान अवसरों की अवको व्यवहार में लागू कर देने से दहेज अपने आप समाप्त हो जायेगा। दहेज और संपत्ति का ब¡टवारा दोनों को साथ-साथ लेकर चलना होगा। संपत्ति में अधिकार के साथ-साथ मायके व ससुराल दोनों ही स्थानों पर परिवार के सदस्य के रूप में मान्यता देनी होगी। आज की नारी की यही मा¡ग है:-

दहेज नहीं, अधिकार चाहिए।

जीवन भर का प्यार चाहिए।।

Tuesday, June 24, 2008

अविश्वास भरा विश्वास, सन्देह भरा समर्पण,

आपका हंसता हुआ वो चेहरा याद आता है,

होठों का मुस्काता गुलाब, अब भी याद आता है।


मधुरता लिए हुए वो गुस्सा था कितना मनोहर,

नयनों में बसा वो प्रेम, अब भी याद आता है।


मुस्कराने की वो अदा, वो ढलती हुई जवानी,

इंकार में छिपा आमंत्रण, अब भी याद आता है।


कुछ भी करने की चाहत, वो संदेहों के घेरे,

साथ निभाने का वायदा, अब भी याद आता है।


अविश्वास भरा विश्वास, सन्देह भरा समर्पण,

लोक-भय भरा आलिंगन, अब भी याद आता है।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

प्रेम नहीं कर पाओगी

वणिक बुद्धि हावी है तुम पर, दिल की नहीं सुन पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

पढ़ने-लिखने भर से कोई,श्रेष्ठ नहीं बन जाता है।

आत्मसात कर करे आचरण,वो ही कुछ कर पाता है।

हमने सब कुछ कह डाला है, तुम भी क्या कुछ कह पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

तुम्हे पाने की चाह नहीं थी, स्वार्थ भरी यह राह नहीं थी।

तुम्हारी खुशियों की खातिर ही, हमने तुम्हारी बा¡ह गही थी।

जाते हुए यह दुख है , केवल तन्हा कैसे रह पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

काश तुम्हें खुशियां दे पाते, प्रेम तुम्हारे से मिलवाते।

तुमको जीवन रस मिल जाता,शायद हम भी खुश रह पाते।

सोचा था तुम बनोगी साथी, लेकिन तुम ना बन पाओगी।

चाहे जितना पढ़-लिख लो, प्रेम नहीं कर पाओगी।।

Monday, June 23, 2008

विचार करें और बतायें

महाराष्ट्र से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका लोक-यग्य के अप्रैल-जून २००८ के अंक के सम्पादकीय में सुप्रसिद्ध कहानीकार अमरकान्तजी की दयनीय स्थिति को उजागर किया गया है कि वे आजकल अपने गांव में दाने-दाने को तरस रहै है. इसी प्रकार का एक समाचार २००६ में बिहार के बढईया के कवि श्री कान्त प्रसाद सिंह का भी मिला था. इस प्रकार के उदाहरण साहित्य-जगत में भरे पढे हैं. भावनात्मक रूप से यह विषय साहित्यकार की सहायता की मांग करता है किन्तु यह प्रश्न भी उठ्ता है कि सन्सार को सीख देने वाला एक बुध्दिजीवी इतना असहाय क्यों हो जाता है कि उसे रोटी के लिये हाथ फ़ैलाना पडे? मेरा विचार है साहित्य जीविकोपर्जन का साधन नहीं है, यह केवल एक शौक, एक जज्बा है समाजसेवा जैसा. इसको समाज सेवा की तरह ही लेना चाहिये, इससे जो आजीविका कमाना चाहेगा, उसका ऐसा ही हश्र होगा. यद्यपि कुछ लोगों ने साहित्य से मलाई भी उडाई है किन्तु वे अपवाद हैं और साहित्य की राजनीति करने वाले रहै हैं. सामान्य सहित्यकार के लिये यह संभव नहीं है. वर्तमान समय मैं हिन्दी के कवियों से तो छापने के भी रुपये मांगे जा रहै हैं, पुरस्कार बेचे जा रहै हैं, ऐसी स्थिति में विचारणीय है कि अलग आजीविका का साधन रखकर ही इस मार्ग पर बढा जाय ताकि हमको रोटी के लिये दान या भीख के लिये हाथ न फ़ैलाना पढे.

Sunday, June 22, 2008

मेरी चाहत का जनाजा

मुक्तक
मेरी चाहत का जनाजा

मेरी चाहत का क्या जनाजा निकाला है तुमने,
मेरी गलतियों का अहसास कराया है तुमने,
मैंने तुम्हें अपना मानने का भ्रम पाला था जो,
गलत था, खुबसूरती से आभास कराया है तुमने ।


तुम्हारे सोने,जागने,बतियाने का साक्षी होता था मैं,
तुम्हारे पढ़ने,पढ़ाने, हरषाने का चिन्तन करता था मैं,
न समझा, न जाना, न पहचाना,इसमें मेरा क्या दोष?
तेरे हित में प्रबंधन हर-पल किया करता था मैं।



मैं आया था सीख देने,सीख लेकर जा रहा हूँ ,
निज नियम,सिद्धांत,कार्यविधि गलत पा रहा हूँ,
तुम्हारी दृष्टि में, निर्दयी था,छुटकारा तुमको देकर,
पथ में विछी हों कलियां, दुआएं देता जा रहा हूँ।


तुमको छोटा,ना समझ,नादान समझ बैठा था मैं,
न थी इच्छा-शक्ति, सामर्थ्य,विवेक,जो मान बैठा था मैं,
चाहा था स्वच्छन्दता से जीना,बाधक बन बैठा था मैं,
हो सके तो माफ करना,गलतियां जो कर बैठा था मैं।


अनिश्चित, दुर्गम, नीरस यात्रा, दुआएं, देता जा रहा हूँ मैं।
अविरल,अनविरत,निर्भय बढ़ो,कामना करता जा रहा हूँ मैं।
अबाधित,अकण्टक,अभयता,असीमितता हो, विकास पथ पर,
चिर प्राप्त्याशा,फलागम हो तुझे,तू रह सुखी, जा रहा हूँ मैं।


चहुँ ओर सुख की छाया, सरस हो तुम्हारा जीवन,
कुसुम पूरित हो पथ,पल-पल पाओ पराग संजीवन।
कण्टक,कष्ट,कठिनाई,मिल जायं मुझे,तुम्हें बहारें,
जन्नत और स्वर्ग मिलें,इस भू पर ही तुम्हें आजीवन।

Wednesday, June 18, 2008

लालच का फल

मुकुंदपुर एक छोटा सा गांव था। गांव में ठाकुर रहते थे। अत: मुकुन्दपुर ´´ठाकुरों का नगला इस नाम से भी जाना जाता था। गांव के सभी लोग खेती का काम करते थे। गांव के किसानों की स्थिति सम्पन्न नहीं तो अच्छी थी यह तो कही ही सकते है। इसी गांव के पुरोहित पण्डित जी बगल के गांव में रहते थे। मुकुन्दरपुर में एक छोटा सा परिवार था जिसमें केवल दो सदस्य थे। स्वयं ठाकुर रामसिंह एवं उनकी नई नवेली पत्नी रामदेई। घर के सभी काम काज को निपटाकर वह दरवाजे पर आ बैठी थी। बेचारी करती भी क्या ? ठाकुर रामकिसं भोर पांच बजे ही खेत पर निकल जाता था। ठकुराइन को दोपहर बारह बजे खाना खेत पर पहुंचाना होता। सुबह का कलेवा पहुंचाने के लिए ठाकुर मना ही कर गया थ। ठाकुर ठकुराइन को बहुत स्नेह करते थे। खेत दूर था। अत: उसे बार-बार परेशान करना उचित न था।सुबह सुबह पण्डित जी घोड़ी पर सवार गांव में आ गये, जरूर अगले गांव में जा रहे होगें। पण्डित जी को प्रणाम कर घोड़ी से उतर कर विराजने का आग्रह किया। पण्डित जी रस पानी पीकर ही आगे बढ़ो, पण्डित ने ठकुराइन के स्नेह अभरे आग्रह को ठुकराना उचित न समझा। पण्डित जी ने घोड़ी दरवाजे पर बांधी तब तक ठकुराइन पण्डित जी के लिए आंगन में चारपाई डालकर घोड़ी के आगे घास डल चुकी थी। गांव के सीधे-सादे लोग पण्डित जी के साथ-साथ पण्डित जी की घोड़ी को भी पूज्य समझते थे। पानी-वानी पिलाय के व कुशल-क्षेम पूछने के बाद ठकुराइन बोली महाराज, ``आप तो भूत, भविष्य, वर्तमान सब जानते हो, सो कृपा करिके हमारे दिन देख कर यह बताओें कि हमारे उनके और मेरे दिन कैसे चल रहे है। पण्डित जी ने पहले तो थोड़ी सी ना नूकर करी। लेकिन जब ठकुराइन ने पण्डित जी के चरणों में सवा पांच रूप्ये रख दिये तो पंचाग निकाल कर दिन बताने लगें।पण्डित जी बोले, ´´ठकुराइन और तो सब ठीक है, किन्तु आज को दिन तेरे लिये ठीक नहीं। शनि और राहू को योग है पिटाई होइवे की सम्भावना अधिक है। बेचारी ठकुराइन घबड़ा गई। वह आज तक ठाकुर के यहां बडे़ ही प्रेम पूर्वक रह रही थी। वह घबड़ा कर पण्डित जी के चरण पकड़कर बोली।´´महाराज जब आपने इतनी कृपा करी कि हमारे घर पर पधारे और दिन बतायें। आप तो बहुत ही विद्वान है। याको कोई न कोई उपाय भी अवष्य होइगो। कृपा करिके उपाय बताओं। पण्डित जी महाराज पहले तो कुछ चिन्तित हुए किन्तु अचानक उनकी आंखों मे चमक आ गई। आज के दिन के लिए किसी ने पण्डित को निमन्त्रण भी नहीं दिया था। अत: उन्होंने सोेचा आज का निमन्त्रण पक्का कर लिया जाय।पण्डित जी गम्भीर होते हये बोले, ``ठकुराइन शनि को प्रकोप कठिन है इस से बचने को उपाय तो है। लेकिन तू कर नहीं पायेगी।ठकुराइन कुछ आष्वस्त होकर बोली `` महाराज बताओं तो सही ऐसो कौन सौ उपाय है, जाय मैं करि नाय सकूं।``पण्डित जी बोले ठकुराइन `` आज की तिथि में अगर काऊ विद्वान ब्राह्मणको भोजन करा दे तो तेरे ऊपर से शनि को प्रकोप टल सके। अब मैनें तौकू उपाय बताय दियो, अब मैं चलू हु¡।ठकुराइन ने तुरन्त पण्डित जी के पैर पकड़ लिये `` महाराज ये कोई कठिन काम नाय¡, हमा तुम्हारे जिजमान है। यह तो आप जानो कि हम आपके सिवा और काहू कूं नाय बुलावें। यह तो आप देख ही रहे हो कि घर से ठाकुर साहब है नाय। आपको बुलाइवे कौन जावेगा। कृपा करिके दस मिनट ठहरो। दूध गर्म हो रहयो है वामे चावल डाल के खीर बनाऊ¡। कढ़ाई में घी देकर पूड़ी निकालू¡।पहले तो पण्डित जी राजी न हुए किन्तु जब ठकुराइन ने अधिक आग्रह कि तो उसकी मजबूरी को समझकर बोले, अच्छा मैं यहा¡ बैठो हु¡, तू जल्दी कर सब्जी बनाइयो मत, नहीं तो देर लगेगी। खीर में चीनी अधिक डाल दियो। मैं वाई ते पूड़ी खइ लुंगो। पण्डित जी को चारपाई पर बिठाकर पण्डित जी के लिए ठकुराइन रसोई बनाने लगी। दूध गर्म था चावल डाल दिये, खीर बनने में कोई देर नहीं लगी। आटा भी बना हुआ था तुरन्त पूड़ी भी बनाली। थाली लगाते समय चीनी डालने में ठकुराइन ने कंजूसी की, व पण्डित जी को भोजन कराने बिठा कर पड़ोस से सब्जी लेने चली गई।पण्डित जी को कम मीठी खीर अच्छी न लगी। वह ठकुराइन को मन ही मन गाली देने लगे। फिर यह सोचकर ठकुराइन नेजिस बर्तन में से चीनी डाली थी वह रसोई में ही रखा है। उसमें से उठकर चीनी डालने में कोई हानि नहीं पंडित जी अपने स्थान से खड़े होकर रसोई में गये। रसोई में एक जैसे दो बर्तन थे एक में तो चीनी थी एक में नमक, पण्डित जी ने नमक को ही चीन समझा और मन भरक चीनी डाली।पण्डित जी ने जब पुन: आकर भोजन प्रारम्भ किया तो खीर मु¡ह में भी रखी जाये। पण्डित जी चक्कर में पड़ गये। आधी छोड़ एक कू धायें, दोनौ में एक भी ना पाये। अब क्या किया जाय ? यह खीर नहीं खाई जा रही है। अत: पण्डित जी ने खी को फेंकने का निर्णय लिया। फेंकने की भी समस्या पण्डित जी खीर फेंकने का स्थान देखने लगे। ठाकुर के आंगन में एक कुआ था। पण्डित जी ने तुरन्त सोचा क्यों न यह खीर कूए में डाल दी जाय। पण्डित जी ने खड़े होकर कूएं में खीर डालने का काम किया कि खीरके साथ पण्डित जी के हाथ से थाली भी छूटकर कूंए में जा गिरी।क्या किया जाय ? ठकुराइन आ गई तो चक्कर पड़ जोगा यह सोचकर पण्डित जी ने थाली निकालने के लिए कूए में उतरने की योजना बनाई। पण्डित जी ने रस्सी कूए के पास बांधी व उसे पकड़ कर कूए में उतरने लगे। रस्सी काफी पुरानी थी पण्डित जी का दुभाZग्य पण्डित जी के नीचे पहूंचने से पहले ही रस्सी टूट गयी खैर भगवान का शुक्र था पण्डित जी को कोई चोट नहीं आयी।ठकुराइन को पड़ोस से सब्जी लाने में देर हो गई, जब ठकुराइन सब्जी लेकर वापिस आई तो वहां पण्डित जी को न देख सन्न रह गयी। ठकुराइन पण्डित जी को इधर-उधर देखने लगी। घोड़ी अभी तक दरवाजे पर खड़ी घास खा रही थी अत: पण्डित जी के जाने का तो सवाल ही नहीं था, वह बैचेनी से इधर-उधर देखने लगी ठकुराइन की नजर अचानक कूऐ की तरफ गई तो पण्डित जी के जूते एवं बंधी हुई रस्सी दिखाई दी। पण्डित जी को कूऐ में आवाज लगाई तो पण्डित जी बोले, `` ठकुराइन कोई रस्सी लेके पहले मोकू निकाल लें, बाद में बात बताऊ¡गो।ठकुराइन ने घर में से नई रस्सी निकाली व रस्सी पकड़ कर कूएं की मेढ़ पर खड़ी को गई। पण्डित जी को कूएं से निकलने की जल्दी थी उन्होंने यह ध्यान नहीं दिया कि ठकुराइन ने रस्सी बांधी है या नहीं। पण्डित ने जैसे ही रस्सी पकड़ी ठकुराइन झुक कर तो खड़ी ही थी झटके के साथ कूएं में जा गिरी। किन्तु इतनी भगवान की कृपा थी कि अब भी ठकुराइन या पण्डित जी के कहीं चोट नहीं आयी थी।ठकुराइन व पण्डित जी दोनों को कूए में काफी समय हो गया दोपहर का एक बज चुका था। खेत पर ठाकुर रामसिंह ठकुराइन का इन्तजार करते-करते परेशान हो गया तो अपने बैलों को पेड़ से बांध पैना (बैलों को छांकने वाला) लेकर अपने घर आया। दोपहर का समय था। ठाकुर का मुंह गुस्से से लाल हो रहा था। किन्तु दरवाजे पर पण्डित जी की घोड़ी को देखकर कुछ आश्वस्त हुआ। कोई बात नहीं पण्डित जी आ गये है। इसी कारण से से ठकुराइन खेत पर न आ सकी। ठाकुर पण्डित जी का बहुत आदर करता था रामसिंह घर में घुसा तो दखा दरवाजा खुला पड़ा है किन्तु ठकुराइन व पण्डित जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे। वह रसोई में गया तो खीर पूड़ी बनीं रखी है। ठाकुर रामसिंह अब झल्लाता हुआ ठकुराइन को खोजने लगा।क्ाफी देर बात रामसिंह की नजर कूएं पर गई। उसने रस्सी लटी देखकर आश्चर्य से कूएं में देखा। ठकुराइन व पण्डित जी को कूएं में देखकर ठाकुर के गुस्से का ठिकाना न रहा। पूरा घर छोड़कर इनहें रंग-रेलिया¡मनाने के लिये कुआ मिला। पण्डित जी इतने नीच होगें आज से पहले उसने कभी सोचा भी न था। वह गुस्से में हाथ में पैना लेकर ही कूएं में कूद पड़ा। ठाकुरो का गुस्सा तो प्रसिद्ध होता है। उसने गुस्से में पण्डित ही व ठकुराइन को लहूलुहान कर दिया। इसके पश्चात ठाकुर ने जैसे तैसे उन दोंनो को कूए से बाहर निकाला।बहर निकालने के पश्चात बोला, ´´पंण्डित जी महाराज अब बताओ का बात भई हती।``पण्डित जी ने कहा, ´´ भइया ठकुराइन को पिटवे को योग हो। मैंने लालच किया बाकी सजा मिली, लेकिन अब बात कू मत पूछौ।ठाकुर रामसिंह बोला, ´´ पण्डित जी महाराज बात तो बतानी ही पड़ेगी। बिना बात बतायें जाने नाय दु¡गो। पण्डित जी ने सारा किस्सा सुनाया और बोले ठाकुर अगर ठकुराइन ने खीर में चीनी डालवे में लालच नाय¡ किया होतो या मैंने लालच न कियो हा तो काउकी पिटाई नाये होती। लालच का फल बुरा होता है।

Tuesday, June 17, 2008

सरकारी कर्मचारी

सरकारी कर्मचारी

रिश्वत लेते कर्मचारी को,

अधिकारी ने पकडा

पहले तो जा जकड़ा,

फिर चिल्लाकर कहा

बेईमान रिश्वत लेता है,

हमको कुछ नहीं देता है,

कार्ड लिया झटक

लिखने लगे रपट

पहले नाम और पता लिखाया

तारीख तीस थी तीस हजार पकडाया

अधिकारी थोडा सकुचाया,

थोड़ा मुस्काया बोला,

पहले क्यों नहीं बताया?

बेकार में इतना सताया

राष्ट्रप्रेमी राष्ट्रकार्य करो,

हिचकिचाना नहीं,

सरकारी आदमी होकर,

सरकार से सकुचाना नहीं।

Sunday, June 15, 2008

अपराधियों का निर्माण अपराधियों का निर्माण

अपराधियों का निर्माण

आज जग्गू धीरे-2 सीधा चला जा रहा था, वह गा¡व छोड़कर कल भागा था। कल से लगातार चलते-चलते थक गया है। गर्मियों के दिन हैं, नंगे पैर हैं पानी के कहीं दशZन नहीं है आ¡खों में निद्रा है या बेहोशी पता नहीं। कुल मिलाकर जग्गू को आज सान्त्वना है वह जानता है कि वह आज जिस रास्ते पर जा रहा है। उसके माध्यम से वह अपनी बहन के हत्यारों से एक न एक दिन बदला अवश्य ले लेगा।उसे इन्तजार है उस दिन का जब चम्बल की घाटी में नये डाकू जग्गू का नाम गू¡जेगा। जब जग्गू चार वषZ का था तो उसके माता पिता उसे एक शरीफ, सज्जन एवं प्रतििष्ठत (जिसकी समाज में इज्जत हो) आदमी बनाना चाहते थे। मा¡ बाप के आशीZवाद एवं अपने परिश्रम से जग्गू शहर का माना हुआ डाक्टर बन गया। आज उसके पास बड़ी दूर-2 से मरीज आया करते थे। मा¡ बाप के सामने ही जग्गू ने घर की स्थिति सभा¡ल ली थी। जग्गू के माता पिता एवं स्वयं जग्गू भी प्रसन्न था। जिस दिन जग्गू के माता पिता का स्वर्गवास हुआ था जग्गू फूट-फूटकर रो पड़ा था। माता-पिता द्वारा दिये गये प्यार को जग्गू कैसे भुला सकता था। जग्गू के एक छोटी सी बहन थी। जग्गू उसे बहुत प्यार करता था, वह उसकी प्रत्येक इच्छा की पूर्ति करने को तत्पर रहता था। जग्गू प्यार में अपनी बहन को पिंकी कहकर पुकारा करता था। वैसे उसकी पूरा नाम प्रेमलता था। जग्गू ने पिंकी को कालेज में दाखिल कर दिया था। वह प्रतिदिन सुबह साढ़े नौ बजे पिंकी को कालेज छोड़ने एवं साढ़े तीन बजे वापस लेने उसके पश्चात ही वह क्लीनिक पर पहु¡चता। वह पिंकी को किसी भी प्रकार कष्ट नहीं होने देता। पिंकी अपने भाई को भाई ही नहीं पिता के समान मानती थी। वह उसका अत्यन्त आदर करती थी। उसे अपनी बहन से ही प्यार नहीं था उससे भी अधिक अपने कर्तव्य से प्यार था। वह एक अच्छे व समाज सेवी डॉक्टर के कर्तव्यों को भली प्रकार जानता व पालन करता था। वह प्रत्येक मरीज की देखभाल इतनी तन्मयता के साथ करता कि उस समय वह अपने को भी भूल जाता। वह जानता था कि डॉक्टर का कर्तव्य होता है मरीज की जी जान से सेवा करें भले ही मरीज उसका दुश्मन ही क्यों न हो। इसी कर्तव्यनिष्ठा के कारण जग्गू आज सम्पूर्ण शहर में मशहूर था। एक प्रतििष्ठत डॉक्टर होने के नाते जग्गू का सम्र्पक अक्सर बड़े-2 अधिकारियों से होता रहता था। जग्गू अपने कर्तव्य पालन में व्यस्त रहता उसे अधिकारियों से कोई लगाव नहीं था। वह स्वयं कर्तव्य पालन करता था उसी प्रकार चाहता था कि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य का पालन करे। इस वषZ जग्गू के यहा¡ नये जिलाधिकारी ट्रान्सफर होकर आये। जहा¡ तक अनुभव था पुराने जिलाधिकारी के समय जिला प्रशासन व्यवस्थित रूप से चलता था। नये जिलाधिकारी के आते ही प्रशासन का स्तर गिरने लगा था। जग्गू को सुनने को मिलता कि फल¡ा स्थान पर ``निर्दोष राहगीर को पुलिस ने पीटा।´´ या फला¡ स्थान पर कुछ लोगों ने अबोध बालिका के साथ बलात्कार किया-----फला¡ स्थान पर-----। जग्गू ऐसे समाचार सुनकर या पढ़कर दु:खी होता लेकिन वह क्या कर सकता था। पुलिस ने प्रत्येक दुकानदार से मासिक चौथ वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। कोई दुकानदार पुलिस द्वारा वसूली का विरोध करता तो पुलिस उसे थाने पकड़कर ले जाती और झूठे मुकदमे मड़ देती। बेचारे निर्दोष नागरिकों की परेशानिया¡ बढ़ती जा रहीं थी। एक दिन जग्गू अपने चिकित्सालय से पिंकी को लेने कालेज जा रहा था कि रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी और वह पिंकी को लेने देर से पह¡चा । वह कालेज के गेट पर पहु¡चा ही था कि उसने पिंकी की चिल्लाने की आवाज सुनी वह चौंका उसने सामने ही एक युवक, पिंकी को जबरन अपनी गाड़ी में बिठाने का प्रयास कर रहा था उसके साथ चार गुण्डे और थे। जग्गू का चेहरा क्रोध से लाल पड़ गया वह अपनी गाड़ी खड़ी करके उस युवक के पास पहु¡चा ही था कि युवक के साथियों ने जग्गू को पकड़ लिया और धक्का मारकर एक तरफ गिरा दिया। वह बदमाश जग्गू की बहन को आ¡खों के सामने ही उठाकर ले गये जग्गू रोक न सका। जग्गू पागल सा हो गया वह क्या करे समझ में नहीं आ रहा था। उसे उठने सोचने व निर्णय पर पह¡चने में लगभग आधा घण्टा लगा, वह गाड़ी स्टार्ट कर के थाने की ओर चल दिया। थाना कालेज से एक किलोमीटर दूर था कि उसे गड्ढे में अस्त व्यस्त कपड़ों में पिंकी दिखायी पड़ी वह मानो पागल हो गया था गाड़ी रोककर उसे देखता ही रहा तब तक पिंकी आकर उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। उन पा¡च गुण्डों ने पिंकी के साथ बलात्कार किया था। वह चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थी भैया अब तुम कुछ नहीं कर सकते थाने न जाओ वह एक बड़े पुलिस अधिकारी का पुत्र है। किन्तु जग्गू कानून को इतना गिरा हुआ न समझता था वह पिंकी को साथ लेकर थाने पहु¡चा। उसने लाख मिन्नत की थानेदार की किन्तु थालेदार ने रिपोर्ट न लिखी। उसे थाने से धमकाकर भगा दिया। जग्गू समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। एक ऐसा भाई जिसकी बहन के साथ बलात्कार हुआ हो आखिर चुप कैसे बैठ सकता था। जग्गू को उच्चाधिकारियों से कुछ आशा थी इसलिये जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक के पास िशकायत भेजी किन्तु वहा¡ से भी एण् डीण् के सिवा कुछ प्राप्त नहीं हुआ। जब जग्गू को िशकायत भेजे महीने बीत गये तो उसनेे वकील के माध्यम से मुकदमा चलाने का विचार किया व एक अच्छे वकील को फीस देकर नोटिस दिया। नोटिस पर आखिर कोई न कोई प्रतिक्रिया होनी ही थी। प्रतिक्रिया स्वरूप एक दिन जग्गू के घर पर चार सिपाही आ धमके दरवाजे पर डण्डे पीटे। जग्गू बाहर निकला तो बोले,``चल तुझे सीण् आईण् साहब ने बुलाया हे और प्रकार हो गया जग्गू के साथ मारपीट व धमकी देने का सिलसिला। अब तो जग्गू थाने पर बुलाया जाता मार-पीट कर धमकाया जाता व समझाया जाता कि वह मुकदमा वापस ले ले। मुकदमा वापस ले ले वरना हम तुझे दस्यु विरोधी अधिनियम में जेल भेज देगेंं। तेरा घर चौपट हो जायेगा किन्तु मुकदमा वापस लेने को राजी नहीं हुआ। उसे न्याय मिलने की आशा जो थी। जब जग्गू ने मुकदमा वापस लिया तो एक दिन थानेदार साहब आये और जग्गू को थाने में ले जाकर हवालात में बन्द कर दिया और सलाखों पर डन्डा मारकर विजय पूूर्ण कुटिल मुस्कान में बोले,``हमने बड़े-2 बदमाश ठीक किये हैं।´´ जग्गू किन्तु ``लातों के देव बातों से नहीं मानते।´´ रात्रि को थाने में जग्गू की खूब पिटायी की गयी और सुबह 6 बजे उसे छोड़ दिया। सुबह जग्गू घर पहु¡चा। दरवाजा अन्दर से बन्द था जग्गू ने कई आवाज लगाई व दरवाजे को पीटा किन्तु जब अन्दर से कोई प्रतिक्रिया न हुई तो अनापेक्षित आश¡का से जग्गू के चेहरे पर हवाइया¡ उड़ने लगी। पड़ोसियों की सहायता से दरवाजा तोड़ा गया। दरवाजा टूटने पर जब जग्गू बेड रूम में पहु¡चा तो वहा¡ का दृश्य देखा तो जग्गू के काटो तो खून नहीं पिकीं अस्त व्यस्त हालत में पड़ी थी उसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी पास में पिकीं के हाथ का लिखा हुआ पत्र पड़ा था जिसमें लिखा था-प्रिय भैया , अब में इस संसार से परेशान हो चुकी हू¡। एक ऐसी दुनिया में जा रही हू¡ जहा¡ स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु नहीं समझा जाता। तुम्हारे जाने के बाद वही लड़का आया था जिसने पूर्व में मेरी इज्जत लूटी थी। आज भी मेरे साथ मु¡ह काला किया और यह कहकर चला गया कि कह देना अपने भैया से लड़े मुकदमा और लड़े। भैया कानून अन्धा है तुम अब मेरी मृत्यु का समाचार भी पुलिस को न देना। तुम्हारी अभागिन पिकीं जग्गू ने पत्र पढ़ा। पत्र पढ़ते-2 उसका चेहरा कठोर हो चुका था। इस कानून से विश्वास उठ चुका था। जग्गू पिकीं की लाश को उसी हालत में छोड़कर भागा जा रहा था। भागा जा रहा था और उसके पैर चम्बल की खािड़योंं की तरफ बढ़ रहे थे।

Friday, June 13, 2008

समानता का नारा- वास्तविक समस्या?

वास्तविक समस्या ?

वर्तमान समय में नारी समस्या ,नारी सशक्तीकरण,नारी कल्याण, नारी अत्याचार, नारी मुक्ति आदि विषय किसी भी मीडिया संगठन के लिये आकषZक, मनोहारी, आदशZवादी ,सहज उपलब्ध ,सर्वस्वीकृत व अपने आप को आधुनिक प्रगतिशील सिद्ध करने में सहायक विषय हैं। इन विषयों पर प्रकािशत आलेखों, विभिन्न चर्चाओं व प्रसारित कार्यक्रमों से ऐसा आभास होता है कि भारत में अचाानक नारी पर अत्याचार बढ़ गये हैं। यदि कहीं ऐसा है भी तो उसके लिए केवल पुरूष को उत्तरदायी ठहराना उसके साथ अन्याय करना है। आधुनिक स्वच्छन्दता ही इसके लिए उत्तरदायी है। जन्म से लेकर शादी तक बेटी को दुलार से पालने वाला, बेटी की सुरक्षा व संरक्षा में अपनी जान की बाजी लगाने वाला, बेटी की िशक्षा व शादी के लिए कोल्हू के बैल की तरह काम करके व पेट काटकर धन इकट्ठा करने वाला, जीवन-पर्यन्त बेटी की इच्छा व परंपरा के अनुरूप विभिन्न उपहार पहु¡चाने वाला पिता भी एक पुरूष ही है। जबकि जन्म से पूर्व बेटा की कामना करने वाली,गर्भस्थ भ्रूण की जा¡च व नष्ट करवाने को मजबूर करने वाली या स्वीकार करने वाली ,पालन-पोषण के समय बेटा-बेटी में भेद करने वाली , शादी के बाद बहू को ताने देने वाली भी एक महिला ही होती है क्योंकि कोई भी परिवार हो घर पर नियंत्रण स्त्री का ही होता है। इसीलिए तो वह गृहिणी कहलाती है। पुरूष बेटी को दुलारता है, बहन की राखी के लिए सब कुछ न्यौछावर करता है ,पत्नी की सलाह के अनुसार चलता है तथा माता की आज्ञा का पालन करना अपना धर्म समझता है। अपवादों को छोड़ दें तो पुरूष स्त्री पर अत्याचार कर ही नहीं सकता क्योंकि वह नारी के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। वह जो भी करता है किसी स्त्री की सलाह, पे्ररणा, आज्ञा या जिद पर ही करता है। वह तो एक कठपुतली की तरह नारी के इशारों पर ना¡चता है। युगो-युगों से यही होता आया है और यही होता रहेगा। नारी के नयनों के एक संकेत पर अपनी जान की बाजी लगाने वाला पुरुष किस प्रकार नारी पर अत्याचार कर सकता है ? विशेष कर भारत के सन्दर्भ में, जहा¡ स्त्री के बारे में कहा जाता रहा है कि जहा¡ नारी की पूजा होती है वहा¡ देवता वास करते हैं। यही कारण है कि विदेशी नारियां भी भारतीय पुरूष से शादी करने की अभिलाषा रखतीं हैं। हो सकता है कि इस उक्ति का आज के सन्दर्भ में विशेष महत्व न हो किन्तु नारी के बिना नर का एक कदम भी चलना संभव नहीं। हो सकता है कुछ परिवारों में नारी को तात्कालिक रूप से निर्णयों में भागीदारी नहीं मिलती हो किन्तु अपवादों की कमी नहीं होती। यदि अपवादों को ही देखा जाय तो ऐसे पुरूष भी मिल जायेंगे जिनकी जिन्दगी को नारी ने तबाह कर दिया है और उसे चैन से जीने नहीं देतीं। कहने का आशय यह नहीं है कि नारी पर किसी भी प्रकार के अत्याचार नहीं हो रहे, वास्तविकता यह है कि अत्याचार तो हर जगह हर क्षण देखने को मिल जायेंगे। किन्तु अत्याचारों के लिए हमारे यहा¡ की व्यवस्था व युगों-युगों से स्थापित अंधविश्वास, कुछ गलत धारणाए¡ व कुप्रथाए¡ हैं। अगर कहीं महिला पर अत्याचार भी होता है तो महिला की सहायता करने आने वाला भी पुरूष ही होता है। मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि नारी पर किसी भी प्रकार का अत्याचार या अन्याय नहीं हो रहा है या सुधार की आवश्यकता नहीं है। सुधार की आवश्यकता तो सदैव रहती ही है।अत्याचार एवं अन्याय से केवल नारी ही पीिड़त नहीं बल्कि पुरूष भी अत्याचार झेलते हैं।किसी भी समस्या पर विचार करते समय हमें पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होना चाहिए।नर या नारी दोनों में से किसी के प्रति पक्षपात न रखते हुए ,स्वतंत्र व खुले दिमाग से विचार करके ही हम किसी उचित निष्कषZ पर पहु¡च सकते हैं।अपनी परंपराओं को गलत सिद्ध करके ही हम अपने को सुधारक सिद्ध करना चाहें तो यह भी उचित नहीं। हमें किसी भी परंपरा,अवधारणा,मान्यता व स्थापित मानदण्डो का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं करना चाहिए। परंपराओं व संस्कृति की श्रेष्ठता व उदात्ता से किसी समाज के चरित्र का विकास व उसके नागरिकों के जीवन का निर्माण होता है। अत: हमें विचार करना चाहिए कि समाज में विभिन्न प्रकार की नयी-नयी समस्याओं के उदय का कारण हमारे द्वारा संस्कृति का विकृत किया जाना तो नहीं है। हमें विचार करना चाहिए कि समाज केिन्द्रत विचारधारा स्वार्थकेिन्द्रत क्यों होती जा रही है ? बढ़ते हुए बलात्कारों ,अपहरणों ,दहेज हत्याओं व भ्रूण हत्याओं का कारण सांस्कृतिक पतन,मानसिक विकृति व हमारी संकीर्णता तो नहीं है? नर या नारी किसी एक को इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर हम केवल बौिद्धक विलासिता की पूर्ति ही कर रहे होते हैं। हमारी कथनी व करनी में कितनी समानता है स्वयं अपने अन्दर झा¡ककर देखने की आवश्यकता है। वास्तविक समस्या का समाधान अवधारणाओं, मान्यताओं व वास्तविकता को समझे बिना संभव नहीं है। वर्तमान समय में हमने ऐसा वातावरण बना दिया है जैसे कि नर-नारी एक दूसरे के दुश्मन हों। नर-नारी को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है। प्राकृतिक रूप से ही एक-दूसरे के पूरक, प्राकृतिक मित्र व प्राकृतिक सहचर होने के बाबजूद यह धारणा बना लेना कि पुरूष महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है या महिलाओं पर अत्याचार करता है, किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। आज नारी पुरूष समानता की बात करके, नारी अधिकारों की बात करके नर और नारी को एक दूसरे का प्रतियोगी बना दिया है। परिवार, समाज व राष्ट्र समानता के लिए तराजू रखकर बैठने से नहीं चलते। सभी की मूलभूत आवश्यकताएं पूर्ण हों,सभी को िशक्षा मिलें,सभी को विकास के अवसर मिलें तथा सभी को गौरव पूर्ण मानव जीवन मिले, प्रयास इसके लिए किये जाने की आवश्यकता है। कभी भी किसी को एक दूसरे के समान नहीं बनाया जा सकता। प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति का अपना महत्व होता है। किसी को किसी के स्थान पर प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। नर और नारी की समानता की तो बात ही दूर की बात है दो नारिया¡ भी समान नहीं होतीं। प्रकृति से ही प्रत्येक वस्तु,पदार्थ व प्राणी की भूमिका निर्धारित हैं। उनकी भूमिकाओं में किसी भी प्रकार का परिवर्तन व छेड़छाड़ विनाश को आमिन्त्रत करना है। हम प्रकृति से छेड़छाड़ करके ही पर्यावरण को इतना प्रदूषित करते जा रहे हैं कि एक दिन जिन्दा रहना ही समस्या बन जाने वाला है। यदि हम इसी प्रकार चलते रहे तो पृथ्वी से जीवन समाप्त हो जायेगा। इसी प्रकार नर और नारी की भी भूमिकाए¡ प्रकृति ने निर्धारित कर दी हैं। हम उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं कर सकते और करेंगे तो उसके कुपरिणाम भी भोगने पड़ेंगे। समस्या प्रकृति प्रदत्त भूमिकाओं में परिवर्तन करके और बढ़ाई जा रही है। आज स्थिति यह है कि युगों-युगों से नारी जिस मातृत्व के कारण अपने आप को गौरवािन्वत महसूस करती रही है। वात्सल्य की जो नदी उसके उर के सागर में बहती है, आज उसी को गाली दी जा रही है। वात्सल्य,ममता व प्रेम लुटाने में कितने आनन्द की अनुभूति होती है इसे एक नारी ही बता सकती है। आज कहा जा रहा है कि नारी बच्चे पैदा करने वाली मशीन नहीं है। ये किसने कहा कि नारी मशीन है। एक जीता-जागता व्यक्तित्व एक मशीन कैसे हो सकता है। मशीन बनाने के प्रयत्न तो आज हो रहे हैं। आज नारी को ही नहीं पुरूष को भी एक मशीन बनाया जा रहा है। जिस समानता की बात की जा रही है वह समानता मशीन व उपकरणों में ही खोजी जा सकती है और आज मानव को संवेदनहीन प्राणी ही बना दिया है। केवल स्त्री को ही नहीं पुरूष को भी एक मशीन बना दिया गया है। इस समानता के नारे ने ही आज परिवार जैसी आधारभूत संस्था पर ही संकट खड़ा कर दिया है। स्त्री के रूप में परिवार का जो आधारभूत स्तम्भ था केवल वही नहीं पुरूष भी भौतिकता को अधिक महत्व दिये जाने के कारण धन कमाने की मशीन ही बन गया है। पति-पत्नी,माता-पिता,बाप-बेटा,भाई-बहन,बाप-बेटी तक के रिश्तों में कुछ नहीं रह गया है। इसके लिए हमारी गलत धारणाए¡,भौतिकता की अंधी दौड़,प्रकृति के विरूद्ध समानता का नारा जिम्मेदार है। जब परिवार का आधारभूत स्तम्भ नारी भी धन कमाने की मशीन बन गई तो परिवार का अस्तित्व कहा¡ रहेगा इसका तात्कालिक परिणाम तो यही आ रहा है कि हमारे बुजुगोZं के लिए ओल्डएज होम बनाने पड़ रहे हैं। यदि बहुत शीघ्र ही हमने इन गलत अवघारणाओं, मान्यताओं, कुप्रथाओं, भौतिकता की अंधी दौड़ तथा प्रकृति विरूद्ध समानता के राग से मुक्त नहीं हुए तो क्या होगा? कल्पना करना कितना कठिन है? कहा नहीं जा सकता।

Monday, June 9, 2008

माया-मुलायम के भक्त

भक्त बन जाइये

उपदेश नीति और धर्म अगर चाहो,
विदुर रचित नीति शास्त्र म¡गवाइये,
जोश रोष वीरता की आश लेके प्यारे,
वीर शिवाजी की जीवनी पढ़ जाइये।

देखना संयोग और वियोग तो,
प्रेमी को प्रेमिका से पत्र लिखवाइये,
प्रेम की पीर को बिना भोगे जानो तुम,
घनानन्द काव्यरस डुबकी लगाइये।

यूपी की राजनीति समझना यदि चाहो,
माया-मुलायम के भक्त बन जाइये,
आरक्षण राजनीति समझने हेतु यारो,
राजस्थान में आज-कल भ्रमण कर जाइये।

Wednesday, June 4, 2008

अभागी देवी

अभागी देवी
आज जगदेव पूरी तरह निराश हो गया था। उसने मुकदमों के सारे कागजातों को फाड़कर हीटर पर डाल दिया। उसके धैर्य का बांध टूट चुका था। उसकी पत्नी रमा अन्दर बैठी रो रही थी। अभी मुश्किल से पांच वर्ष ही तो हुए होंगे शशी की शादी को। शशी रमा के एकमात्र पुत्री थी। उसके एक भाई था दिलीप, वह शशी से छोटा था। शशी को अपने माता एवं पिता का अपार प्यार मिला था। शशी के पिता ने शशी की शशी की शादी पर क्या नहीं दिया था ? शशी की शादी में अपना सारा धन खर्च कर दिया था। अपनी पुत्री की खुशी के लिये। वे यह नहीं जानते थे कि दहेज दहेज की भूख कभी शान्त नहीं होती। शशी जब पहली बार ससुराल से आयी तभी उसे कोई प्रसन्न नहीं देख पाया इसका एकमात्र कारण था शशी की उपेक्षा। ससुराल से दस हजार रूपये की मांग की गयी थी। जगदेव ने शशी की खुशी का ख्याल रखकर कर्ज लेकर ससुराल की मांग पूरी की तथा उसे ससुराल विदा किया। किन्तु ससुराल में उसे फिर भी प्यार नहीं मिला । छह महीने बाद शशी के हाथ द्वारा लिखा पत्र आया कि यहाँ पर मुझे बहुत परेशान किया जा रहा है। मुझ से यह पत्र जबरदस्ती लिखवाया जा रहा है कि मै मोटर साइकिल की मांग करूँ । इसके बाद पांच पत्र और आये तरह-तरह की धमकियां भरे। और छठंवा पत्र आया था शशी के पति द्वारा लिखित जिसमें शशी की मौत की सूचना दी थी। सूचना शशी की लाश जलाने के बाद दी गयी थी। बताया गया था कि उसने फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली। जगदेव ने वहाँ जाकर सारा वाकया जानना चाहा तो पड़ोसियों ने बताया कि शशी ने बहुत शोर मचाया था किन्तु उन्हें उसके पास तक शशी के ससुर ने नहीं जाने दिया था। मामला स्पष्ट आत्महत्या का न होकर हत्या का था। किन्तु कोई गवाह तैयार नहीं था। जगदेव ने पूरे चार साल तक मुकदमा लड़ा किन्तु न्याय नहीं मिला। आज उसका धैर्य टूट चुका था। उसके हृदय से एक ही बात निकल रही थी कि क्यों ? जन्म लेती है भारत में अभागी देवी ! क्यों यहाँ के देवताओं में समझ नहीं आता? देवियों के बिना इनका अस्तित्व संभव ही नहीं है। क्यों देवियों को उनकी पैतृक सम्पत्ति में अधिकार नही दिया जाता ताकि उनको किसी दान-दहेज की आवश्यकता ही न रहे और उन्हें किसी को दान में दिये जाने वाली वस्तु न बनना पड़े।

Sunday, June 1, 2008

मन्दिर वहीं बनायेगी

मन्दिर

चुनाव का समय,

निकट आया

परिषद को राम नाम भाया

कुछ भी हो

वह राम नाम जाप करायेगी

वोट बैंक बढ़ायेगी

राष्ट्र रहे न रहे

मन्दिर वहीं बनायेगी।