Sunday, September 14, 2008

मानव के शव पर

मन्दिर का निर्माण
लालता प्रसाद गंगवार `प्रलयंकर´, बरेली

मानव ने पत्थर पूजे पर, मानव को कब पहचान सका।
यद्यपि इसकी ही छाया में, पा रंग रूप भगवान सका।।
मानव फुटपाथों पर सोते, भगवान भवन में झूले पर।
मानव सुत पत्तल चाट रहे, नैवेध वहा¡ थाली भर-भर।।
जा रही हजारों की लाशें, वेकफन यहा¡ शमशानों में।
श्रृंगार नहीं पूरा होता, उनका रेशम के थानों में।।
पत्थर नहलाये जाते हैं, दुर्भाग्य दूध, घी से जल से।
भूखी भिखमंगिन का बच्चा, दो बू¡द न पी पाया कल से।।
सोने-चा¡दी के ढेरों पर, जिसने भगवान बनाये हैं।
जिसने मानव चूस-चूस, कंकाल समान बनायें हैं।।
यदि यही धर्म के नेता हैं, धिक्कार रहा उनको यह स्वर।
यदि यही धर्म के हैं धुरीण, लानत है उन पर, है ठोकर।।
इन्सार उठो, फेंको पत्थर, मानव का जब पूजन होगा।
मानव के शव पर मन्दिर का, निर्माण-विधान नहीं होगा।।
सोन-चा¡दी के आभूषण, पत्थर के साज नहीं होंगे।
घंटों में शंख निनादों में, हम बे-आवाज नहीं होंगे।।
मेरी आवाज पुकारेगी, मानव-मानव के कानों में।
हम आग लगा देंगे बढ़कर, इन शोषण के भगवानों में।।
हम भू पर स्वर्ग उतारेंगे, अपने दो-चार इशारों में।
तुम देखो तो कितना बल है, इन क्रान्ति पूर्ण उद्गारों में।।







टालस्टाय की बाल लघु-कथा
आजादी की वापसी

एक मकान की उपरी मंजिल पर एक अमीर आदमी रहता था और नीचे की मंजिल पर एक गरीब दरजी । कपड़े सीते समय दरजी गाया करता था। उसके गाने से अमीर आदमी की नींद में बाधा पड़ती थी। वह उसका गाना रोकना चाहता था।
एक दिन उसने दरजी को रूपयों की एक थैली दी और कहा कि वह गाना बंद कर दे। दरजी मान गया और रूपये पाकर बहुत खुश हुआ। कुछ समय बीता लेकिन गाने के बिना दरजी का मननहीं लगता था। वह परेशान हो उठा। आखिर एक दिन वह रूपयों की थैली लेकर अमीर आदमी के पास गया और थैली उसको लौटाते हुए बोला, ``अपना धन वापस ले लीजिए और मेरा गाने का अधिकार मुझे वापस दीजिए। गाने के बिना मैं तंग आ गया हू¡।´´
अमीर आदमी उसे हैरानी से देखने लगा। दरजी चला गया फिर कुछ देर में उसने नीचे से दरजी के गाने की खुशी भरी आवाज सुनी।

2 comments:

  1. मेरी आवाज पुकारेगी, मानव-मानव के कानों में।
    हम आग लगा देंगे बढ़कर, इन शोषण के भगवानों में।।
    हम भू पर स्वर्ग उतारेंगे, अपने दो-चार इशारों में।
    तुम देखो तो कितना बल है, इन क्रान्ति पूर्ण उद्गारों में।।

    isme koi shak nahi aapne kadwa sach kaha hai

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  2. this poem is not mine. this poem is written by lalaita ji bareli.

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