Saturday, August 30, 2025

असफलता ही पाई हमने

 आगे बढ़कर गले लगाया


स्वार्थ पास हमारे आया, हमने तब-तब है ठुकराया।

असफलता ही पाई हमने, आगे बढ़कर गले लगाया।।

अपने आपको तुम पर थोपा।

नहीं सुना, कभी दिया न मौका।

नहीं कभी है किसी को समझा,

चाहा हर दम लगाए चैका।

तुम्हारे बचपन को रौंदा है, केवल अपना गाना गाया।

असफलता ही पाई हमने, आगे बढ़कर गले लगाया।।

बचना अब हमरी छाया से।

सुखी रहो अपनी काया से।

बुद्धिमान हो कर लो मन की,

मुक्त रहो मेरी माया से।

अकेले कोई जीवन होता? पाओ तुम, मैंने ना पाया।

असफलता ही पाई हमने, आगे बढ़कर गले लगाया।।

तुम्हारे ऊपर कोई कर्ज नहीं है।

सुनना तुम कोई अर्ज नहीं है।

मुक्त कर रहा खुद से तुमको,

हमारे लिए कोई फर्ज नहीं है।

चाह न समझी कभी तुम्हारी, नहीं किया जो तुमको भाया।

असफलता ही पाई हमने, आगे बढ़कर गले लगाया।।


Friday, August 29, 2025

समस्याएँ नहीं गिनो तुम,

 समाधान बन आगे आओ


कर्म से अपनी राह बनाकर जीवन अपना सुखी बनाओ।

समस्याएँ नहीं गिनो तुम, समाधान बन आगे आओ।।

कर्मशील को अवसर जग में।

कदम-कदम संसाधन मग में।

औरत की हथेली में बरकत,

वही पुरूष के होती पग में।

समय ही जीवन है प्यारे, जीवन आनंद से जीते जाओ।

समस्याएँ नहीं गिनो तुम, समाधान बन आगे आओ।।

समय नहीं है दुखी होने का।

समय नहीं है व्यर्थ सोने का।

काट बाद में तुम पाओगे,

समय अभी है फसल बोने का।

फल ही हैं फूलों की हसरत, फूल देखकर खुशी मनाओ।

समस्याएँ नहीं गिनो तुम, समाधान बन आगे आओ।।

चाहत किसी की पूरी न होती।

पाओगी वही, जो हो बोती।

लेन-देन से चलता है जग,

मुफ्तखोरी कभी सफल न होती।

कर्म करो अधिकार कमाओ, कदम-कदम बढ़ते तुम जाओ।

समस्याएँ नहीं गिनो तुम, समाधान बन आगे आओ।।


Wednesday, August 27, 2025

जन्म दिवस हो तुम्हें मुबारक

 अपने पुत्र के जन्म दिवस 8 अगस्त 2025  के लिए गुजरात यात्रा के दौरान रेलगाड़ी में 7 अगस्त 2025 को लिखी गयी कविता प्रस्तुत है

कर्म क्षेत्र में आगे आओ





सीख रहे हो जग से अब तक, वापस दो अब कुछ सिखलाओ।


जन्म दिवस हो तुम्हें मुबारक कर्म क्षेत्र में आगे आओ।।


पच्चीसवें वर्ष में प्रवेष कर रहे।


षिक्षालयों में अभी रह रहे।


षिक्षा है आजीवन चलनी,


समाज में कितना आगे बढ़ रहे?


देष से पाया, वापस करना, आनंद से आगे बढ़ते जाओ।


जन्म दिवस हो तुम्हें मुबारक कर्म क्षेत्र में आगे आओ।।


चाहत पर जिद, नहीं कभी की।


साथ की इच्छा, पूरी नहीं की।


कठोर तुम्हारे साथ रहा मैं,


पूरी चाहत, नहीं कभी की।


कोई इच्छा प्रकट न करते, कर्तव्य पथ पर बढ़ते जाओ।


जन्म दिवस हो तुम्हें मुबारक कर्म क्षेत्र में आगे आओ।।


 मुझसे नहीं मिला जो तुमको।


मिल जाए वह जग से तुमको।


काम में ही नहीं खो जाना प्रिय!


आनंद से जीना, है अब तुमको।


हर पल, हर पथ, साथ तुम्हारे, सीखो और सिखाते जाओ।


जन्म दिवस हो तुम्हें मुबारक कर्म क्षेत्र में आगे आओ।।


 

Sunday, August 17, 2025

जीवन साथी नहीं है कोई

 


कुछ खुद को कह रहे घराती, कुछ कहते हैं, बराती हैं।

जीवन साथी नहीं है कोई, सब कुछ पल के साथी हैं।।

मात-पिता संग बचपन जीया।

किषोरावस्था में, मन का कीया।

युवावस्था का, धोखा मधुर था,

गले लगा, जीवन रस पीया।

कुछ ही पल तक साथ चलें ये, बातें इनकी भरमाती हैं।

जीवन साथी नहीं है कोई, सब कुछ पल के साथी हैं।।

काया ही जीवन की साथी।

मच्छर हो या फिर हो हाथी।

देखभाल काया की कर लो,

यह ही आथी, जीवन-साथी।

काया बिना, आत्मा भी भूत है, दुनिया जिससे शरमाती है।

जीवन साथी नहीं है कोई, सब कुछ पल के साथी हैं।।

मात-पिता का साथ है सीमित।

पति-पत्नी संग, नहीं असीमित।

जीवन साथी नहीं मिलेगा,

साथ किसी का नहीं है बीमित।

काया जब तक, जीवन तब तक, शेष सभी वष भाथी हैं।

जीवन साथी नहीं है कोई, सब कुछ पल के साथी हैं।।


सहायताः- आथी-संपत्ति, भाथी-धौंकनी।


Friday, August 8, 2025

समाधान नहीं खोजा तुमने,

 समाधान नहीं तुम बन पाईं!


समस्याओं में अटका यह जग, शिकायत करते लोग-लुगाई।

समाधान नहीं खोजा तुमने, समाधान नहीं तुम बन पाईं!!

रिश्तों में टकराव है हर पल।

अपने पराये की है हल चल।

हमने तो निज उर है खोला,

अजस्र प्रेम, स्रोत की कल-कल।

लेने की बस चाह तुम्हारी, खुद को ही तुम समझ न पाईं।

समाधान नहीं खोजा तुमने, समाधान नहीं तुम बन पाईं!!

बिना किए अच्छा बनना है।

फूल नहीं, तुम्हें फल चुनना है।

लेन-देन से चलती दुनिया,

सुनाना है बस, नहीं सुनना है।

नफरत तुमने उर में पाली, अपनों को ना अपना पाईं।

समाधान नहीं खोजा तुमने, समाधान नहीं तुम बन पाईं!!

श्रवण कुमार कह मजाक उड़ाई।

कर्तव्य पथ तुम नहीं चल पाईं। 

लेन-देन से चलती दुनिया,

लेने की तुमने, राह है पाई।

प्रेम तो होता पवित्र समर्पण, समझाया तुम समझ न पाईं।

समाधान नहीं खोजा तुमने, समाधान नहीं तुम बन पाईं!!

अलग राह है तुमने चुन ली।

स्वार्थ की चूनर तुमने बुन ली।

अपना हित भी समझीं नहीं तुम,

नकल करी और किस्मत धुन ली।

जीवन अपना जीना हमको, सीधी राह पर चल नहीं पाईं।

समाधान नहीं खोजा तुमने, समाधान नहीं तुम बन पाईं!!


Thursday, June 12, 2025

होते नहीं, कभी पस्त हैं

चाह नहीं,

चाहत नहीं।


आह! नहीं,

आहत नहीं।


हाय और हैलो नहीं,

अपना कोई फैलो नहीं।


अपेक्षा नहीं,

उपेक्षा नहीं।


इच्छा नहीं,

परीक्षा नहीं।


वर नहीं,

वरीक्षा नहीं।


रुकते नहीं,

प्रतीक्षा नहीं।


हम अपने में मस्त हैं।

रहते हरदम व्यस्त हैं।

होते नहीं, कभी पस्त हैं।


Thursday, June 5, 2025

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे,

गमों को खुशी में बदल पीजिए


आपको खुशी मिले न मिले, सबको, अपने से खुशी दीजिए।

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे, गमों को खुशी में बदल पीजिए।।

चाह किसी की रहे न बाकी।

स्वयं ही बनना हमको पाकी।

आत्म प्रेम सबसे है निर्मल,

चाहत नहीं, मिले कोई साकी।

सबके अपने-अपने रस हैं, किसी के रस को, ना विरस कीजिए।

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे, गमों को खुशी में बदल पीजिए।।

परिवार किसी की है मजबूरी।

किसी की बनती इससे दूरी।

तितली फूलों पर मड़रा कर,

निज मन इच्छा करती पूरी।

लुटने का आनंद है भोगा, लुटेरों को, अब, बेनकाब कीजिए।

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे, गमों को खुशी में बदल पीजिए।।

नहीं खोज साथी की करनी।

नहीं किसी की आन है हरनी।

 सीधे हम, शौक न कोई,

शौकीनों की माँग न भरनी।

स्वत्व तुम्हारा, तुम्हें मुबारक, अपने स्वत्व का मजा लीजिए।

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे, गमों को खुशी में बदल पीजिए।।

खुशी जहाँ मिलें रमो वहाँ पर।

हम हैं पिछड़े, रहें कहाँ पर।

हम खुद को ही समझ न पाए,

तुम्हारा कर्ज है सारे जहाँ पर।

अपनत्व जो देते, वह हैं अपने, जीवन, साथ में जी लीजिए।

उर खुशियों का स्रोत है प्यारे, गमों को खुशी में बदल पीजिए।।


Tuesday, June 3, 2025

संघर्ष से अब थक गया हूँ

लगता है अब चुक गया हूँ।

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।

 

क्रोध अब आता नहीं है।

गान कोई भाता नहीं है।

प्रेम में गर्मी नहीं अब,

उपहार कोई लाता नहीं है।

सोचने अब लग गया हूँ। 

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।


नवीन पथ अब है न रुचता।

अपने लिए कोई न सजता।

कविता अब है नाराज लगती?

लेखनी को भी गद्य फबता।

मौन रहने लग गया हूँ।

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।


असहजता भी सहज है अब।

कृत्रिमता भी भाने लगी अब।

प्रेम की आशा न बाकी,

मजबूरी भी गाती लगे अब।

अकेला रहने लग गया हूँ।

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।


भीड़ में मैं चल न सकता।

अपनों से अब लड़ न सकता।

शांति का बन रहा पुजारी,

क्रांति मैं अब कर न सकता।

कपट से काटा गया हूँ।

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।


तुम हो अब भी उड़ती तितली।

आने लगीं हों भले ही मितली।

चंचलता को अब तो थामो,

चाउमीन तज खाओ इडली।

रिश्तों से लूटा गया हूँ।

संघर्ष से अब थक गया हूँ।।


Saturday, May 31, 2025

साथ में साथी चाहा अब तक

 खुद ही खुद के साथ रहेंगे


नहीं किसी से प्रेम चाहिए, खुद ही खुद से प्रेम करेंगे।

साथ में साथी चाहा अब तक, खुद ही खुद के साथ रहेंगे।।

जिसको चाहा, ठगा है उसने।

विश्वास किया, लूटा है उसने।

जिस-जिसको, है, गले लगाया,

अन्तर्मन बींधा, उस-उस ने।

नहीं किसी का हाथ चाहिए, खुद ही खुद का हाथ गहेंगे।

साथ में साथी चाहा अब तक, खुद ही खुद के साथ रहेंगे।।

कुछ लेने की चाह नहीं है।

लुटने की परवाह नहीं है।

झूठ, कपट षड्यंत्र हैं झेले,

मुस्कान बची, अब आह नहीं है।

हमको अपने पथ है चलना, सब अपने-अपने पाथ रहेंगे।

साथ में साथी चाहा अब तक, खुद ही खुद के साथ रहेंगे।।

जो नहीं अपना, नहीं चाहिए।

अधिकार जो झूठा, नहीं चाहिए।

यर्थाथ जीवन, जो है, जीना,

आडंबर कोई, नहीं चाहिए।

नहीं चाह है, ना चाहत है, नहीं किसी के, नाथ रहेंगे।

साथ में साथी चाहा अब तक, खुद ही खुद के साथ रहेंगे।।


Thursday, May 29, 2025

साथ भले ही नहीं रहो तुम

तुमसे हमारी यारी है



प्रेम नहीं केवल है तुमसे, छाया तुम्हारी प्यारी है।

साथ भले ही, नहीं रहो तुम, तुमसे हमारी यारी है।।

वाद-विवाद में नहीं है पड़ना।

राही हैं हम, नहीं है अड़ना।

तुम्हारी बात ही ऊपर मानी,

हमको नहीं है, ऊपर चढ़ना।

आकर्षित हम नहीं है केवल, तुम्हारी आन भी प्यारी है।

साथ भले ही, नहीं रहो तुम, तुमसे हमारी यारी है।।

आदत भले ही भिन्न-भिन्न हैं।

भले वियोग में आज खिन्न हैं।

जब भी तुम्हें जरूरत होगी,

नहीं दूर हैं, नहीं भिन्न हैं।

हमको कोई शौक नहीं है, तुम्हारी शान ही प्यारी है।

साथ भले ही, नहीं रहो तुम, तुमसे हमारी यारी है।।

प्रदर्शन की, तुम हो खिलाड़ी।

तुम्हारे आगे, हम हैं अनाड़ी।

नए-नए नित तुम्हारे शौक हैं,

हम हैं पुराने, चढ़ें न गाड़ी।

कर्म के पथिक, हम तो ठहरे, तुमरी राह ही न्यारी है।

साथ भले ही, नहीं रहो तुम, तुमसे हमारी यारी है।।


Monday, May 19, 2025

औरत?

 केवल


माँ ही नहीं,


कामिनी भी है औरत।


केवल बहिन और बेटी ही नहीं,


रागिनी भी है औरत।


केवल पत्नी ही नहीं,


कामाग्नि दग्ध प्रेमिका भी है औरत।


केवल गृहिणी ही नहीं,


स्वामिनी भी है औरत।


केवल समर्पित ही नहीं,


दहेज के झूठे आरोप लगा,


छेड़छाड़ और बलात्कार का बहाना बना,


कानूनों का दुरूपयोग कर,


लुटेरी, लोभी, लालची भी है औरत।


केवल देवी ही नहीं,


मौत बांटती,


टुकड़े-टुकड़े कर


नीले ड्रमों में भर सीमेण्ट से पैक करती


 राक्षसी भी है औरत।


औरत की व्याख्या संभव नहीं,


सभी गुणों, विशेषताओं का वर्णन करने में,


लेखनी है असमर्थ,


क्योंकि संपूर्ण सृष्टि को 


समाए हुए है औरत।


सृजन का कोई भी रूप,


औरत का एकपक्षीय चित्रण करता है,


संपूर्ण चित्रण संभव ही नहीं,


पुरूष के साथ अपने आपको खोती


पुरूष से हो दूर


खुद से ही दूर जा रही है औरत। 


Saturday, May 17, 2025

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या,

 

समाधान तुम खुद बन जाओ



मानवता जब भटक रही हो, आगे बढ़ कर पथ दिखलाओ।

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या, समाधान तुम खुद बन जाओ।।

शिकायत कब तक करते रहोगे?

समर्थ हो, फिर तुम क्यों सहोगे?

कर्म करो और आगे बढ़ो खुद,

दूजों से तुम कब तक कहोगे?

तथ्यों का विश्लेषण करके, योजना बना, चलकर दिखलाओ।

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या, समाधान तुम खुद बन जाओ।।

संसाधनों का प्रबंधन करके।

गतिविधियों का नियोजन करके।

संग-साथ में मिल काम करो,

पा लो लक्ष्य संतुलन करके।

संबन्ध सभी ही महत्वपूर्ण हैं, साथ सभी के तुम दिखलाओ।

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या, समाधान तुम खुद बन जाओ।।

शिकायत नहीं किसी से करनी।

जिसकी करनी, उसकी भरनी।

प्रेम नाम पर, लूट मची यहाँ,

राह चले, ना मिलतीं परनी।

विश्वासघात से बचकर प्यारे, विश्वासपात्र बनकर दिखलाओ।

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या, समाधान तुम खुद बन जाओ।।

शब्द, रूप, रस, गंध कामना।

कमनीय स्पर्श की करो न भावना।

कर्म के पथ पर खुद मिल जाते,

बधँना नहीं है, पाओ पावना।

कदम-कदम पर पथ हैं, पथिक हैं, अपने पथ पर चल दिखलाओ।

कदम-कदम हैं, बिछी समस्या, समाधान तुम खुद बन जाओ।।


Wednesday, May 14, 2025

समाधान

अनुत्तरित प्रश्न,

अनसुलझी समस्याएँ,

रिश्तों के रिसते घाव

जीने का बिखर गया चाब।


कदम-कदम बिछी बाधाएं,

शारीरिक-मानसिक व्याधाएँ,

विश्वास से निकलता घात

मिलने पर भी ना कोई बात।


सोशल मीडिया पर हजारों मित्र,

दिल में नहीं है कोई चित्र,

समाज को लगाई जिसने लात

लाइव आत्महत्या इसकी औकात।


शादी, बलात्कार, धर्म परिवर्तन,

सोशल मीडिया का कैसा नर्तन?

छिप जाता धर्म, छिप जाती जात

अन्तस भी घायल, घायल है गात।


समस्याएँ खुली हैं,

आंखें अश्रु धुली हैं,

मीडिया को हटा सीधे करें बात

समाधान निकलेगा, मिल खाओ भात।


Thursday, May 1, 2025

प्रेमी वह जो करता अर्पण

करते नहीं, प्रेम का दावा, प्रेम प्रदर्शन नहीं होता है।

प्रेमी वह जो करता अर्पण, प्रेम पात्र के हित जीता है।।

प्रेम नहीं है कोई सौदा।

प्रेम न चाहे कोई हौदा।

बदले की कोई चाह नहीं है,

हृदय गर्भ में उगता पौधा।

हानि-लाभ का गणित नहीं, नहीं रूलाता, खुद रोता है।

प्रेमी वह जो करता अर्पण, प्रेम पात्र के हित जीता है।।

अधिकारों की चाह नहीं है।

अपनी भी परवाह नहीं है।

तुमको खुशियाँ जहाँ हैं मिलती,

रोकेंगे हम राह नहीं है।

प्रेम नहीं प्रतिदान माँगता, बलिदानों को ही बोता है।

प्रेमी वह जो करता अर्पण, प्रेम पात्र के हित जीता है।।

चाहत नहीं थी, कुछ पाने की।

प्रतीक्षा नहीं की, तुमरे आने की।

हमसे दूर हैं तुम्हारी खुशियाँ,

वजह जहाँ हैं मुस्काने की।

जाओ, जहाँ तुम्हें खुशियाँ मिलतीं, आनंद सरोवर नित गोता है।

प्रेमी वह जो करता अर्पण, प्रेम पात्र के हित जीता है।।


Wednesday, April 16, 2025

प्रेम मिलन जब हो जाता है,

कोई हार, कोई जीत नहीं है


गले लगाकर, है ठुकराया, यह तो प्रेम की रीत नहीं है।

प्रेम मिलन जब हो जाता है, कोई हार, कोई जीत नहीं है।।

सबकी चाहत प्रेम है भाई।

लोग भले हों, भले लुगाई।

कोई बताओ प्रेम ये कैसा?

काट-पीट कर काया जलाई।

काम-वासना प्रेम नहीं है, हर कविता भी गीत नहीं है।

प्रेम मिलन जब हो जाता है, कोई हार, कोई जीत नहीं है।।

हमने प्रेम में देना सीखा।

प्रेम कभी ना होता फीका।

प्रेम मधुर है भाव सृष्टि का,

कानूनों से करो न तीखा।

प्रेम पात्र के हित में कर्म है, प्रेम मात्र प्रतीत नहीं है।

प्रेम मिलन जब हो जाता है, कोई हार, कोई जीत नहीं है।।

प्रेम नहीं काया का बिछोना।

जिस पर होता हो बस सोना।

प्रेम त्याग है, प्रेम ही तप है,

अजस्र सरोवर, नहीं खिलोना।

प्रेम में करता जो है सौदा, वह बन पाता मीत नहीं है।

प्रेम मिलन जब हो जाता है, कोई हार, कोई जीत नहीं है।।


Monday, April 14, 2025

नहीं, प्रेम तुम खोजो बाहर,

 खुद ही, खुद से प्रेम करो।


 खुद ही, खुद को समय निकालो, खुद ही खुद के कष्ट हरो।

नहीं, प्रेम तुम खोजो बाहर, खुद ही, खुद से प्रेम करो।।

सबके अपने-अपने स्वारथ।

कोई नहीं करता परमारथ।

जिनसे भी उम्मीद तू करता,

वह ही करते, जीवन गारत।

पल-पल को आनंद से जीओ, प्यारे! पल-पल नहीं मरो।

नहीं, प्रेम तुम खोजो बाहर, खुद ही, खुद से प्रेम करो।।

नहीं कोई अपना, नहीं पराया।

सबने अपना राग सुनाया।

विश्वास बिना जीवन नहीं प्यारे!

विश्वासघात ने जाल बिछाया।

आत्मविश्वास जगा राष्ट्रप्रेमी, खुद पर तुम विश्वास करो।

नहीं, प्रेम तुम खोजो बाहर, खुद ही, खुद से प्रेम करो।।

अन्तर्मन में प्रेम जगाओ।

चाह नहीं, बस प्रेम लुटाओ।

नहीं किसी से चाहत कोई,

नहीं पटो, और नहीं पटाओ।

प्रेम की भूख सभी को यहाँ पर, नहीं किसी का प्रेम हरो।

नहीं, प्रेम तुम खोजो बाहर, खुद ही, खुद से प्रेम करो।।


Saturday, April 12, 2025

नहीं किसी को कभी डराओ

 नहीं किसी से स्वयं डरो


नहीं किसी से  प्रेम की चाहत, नहीं किसी से प्रेम करो।

नहीं किसी को कभी डराओ, नहीं किसी से स्वयं डरो।।

निज स्वतंत्रता सबको प्यारी।

सीमित रखनी, सबसे यारी।

सबके अपने खेल निराले,

सबकी अपनी-अपनी पारी।

जीवन से खिलवाड़ करो ना, नहीं किसी से मेल करो।

नहीं किसी को कभी डराओ, नहीं किसी से स्वयं डरो।।

जीवन जीना है खुलकर के।

रोना भी है,यहाँ हँस करके।

जिस पर भी विश्वास करोगे,

चला जाएगा, वह ठग करके।

सामाजिक कर्तव्य निभाओ, नहीं किसी की जेल करो।

नहीं किसी को कभी डराओ, नहीं किसी से स्वयं डरो।।

प्रेम जाल में कभी न फसना।

नहीं पड़ेगा तुम्हें तरसना।

विश्वसनीय बन, विश्वास न करना,

विश्वासघात से भी है बचना।

नहीं किसी के खेल में फसना, नहीं किसी से खिलवाड़ करो।

नहीं किसी को कभी डराओ, नहीं किसी से स्वयं डरो।।


Thursday, April 10, 2025

महावीर जयंती पर विशेष

पाकर स्वयं पर विजय वर्धमान


सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान से, सम्यक चरित्र जो पाता है।

पाकर स्वयं पर विजय वर्धमान, महावीर बन जाता है।।

अनंत चतुष्ट्य का ज्ञान हो जिसको।

अनंत दर्शन और अनन्त शक्ति को।

अनंत वीर्य से, अनंत आनंदित,

अनंत लोक मिलता है ‘जिन’ को।

सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य जुड़ जाता है।

पाकर स्वयं पर विजय वर्धमान, महावीर बन जाता है।।

अनीश्वरवादी जैन धर्म है।

अनेकांत और स्याद मर्म है।

बद्ध जीव जब मुक्त है होता,

‘निग्रन्थ’ वह मुक्त कर्म है।

दिगंबर और श्वेतांबर मिल, जैन समुदाय कहलाता है।

पाकर स्वयं पर विजय वर्धमान, महावीर बन जाता है।।

अहिंसा धर्म का मूल मंत्र है।

सम्यक साधना मुक्ति यंत्र है।

बद्ध जीव की मुक्ति हेतु ही,

सम्यक चरित्र का जैन तंत्र है।

स्यादवाद सापेक्ष ज्ञान कह, सत् और असत् बतलाता है।

पाकर स्वयं पर विजय वर्धमान, महावीर बन जाता है।।


Sunday, April 6, 2025

तन-मन-धन सब मिलकर ही

प्रेम में नहीं भिन्न कुछ होता, एकाकार हो जाते हैं।
तन-मन-धन सब मिलकर ही, गीत मिलन के गाते हैं।।
तन का मिलन वासना प्यारी।
अलग-अलग रहती है  क्यारी।
तेरा-मेरा धन भिन्न जब तक,
मैं हूँ दूर और तुम हो न्यारी।
मन से मीत मिलन जब होता, एक-दूजे को भाते हैं।
तन-मन-धन सब मिलकर ही, गीत मिलन के गाते हैं।।
समझ रहा था, मैं अभिन्न हूँ।
तुमने बताया, मैं तो भिन्न हूँ।
तुमको चाह है धन की केवल,
जाना जब से, मन से खिन्न हूँ।
अर्ध-नारीश्वर शिव हो जाते, मन के मीत मिल जाते हैं।
तन-मन-धन सब मिलकर ही, गीत मिलन के गाते हैं।।
गलतफहमी में मैं था जीता।
तुमने लगाया उसको पलीता।
मजबूर नहीं हो, स्वयं कमातीं,
तुम संपूर्ण हो, मैं हूँ रीता।
मन का मिलन जब है होता, साथ में सोते-खाते हैं।
तन-मन-धन सब मिलकर ही, गीत मिलन के गाते हैं।।

Saturday, April 5, 2025

फसल और ही ले जाते हैं

पाता नहीं, जो उसको बोता


प्रेम नहीं सबको मिल पाता, सबके ही परिवार न होता।

फसल और ही ले जाते हैं, पाता नहीं, जो उसको बोता।। 

जन्म लिया है, जीना होगा।

संबन्धों में, विष, पीना होगा।

भले ही कोई घर नहीं प्यारे,

बजाना प्रेम से बीना होगा।

दिल खोलकार प्रेम लुटाना, भले ही मिले न प्रेम का सोता।

फसल और ही ले जाते हैं, पाता नहीं, जो उसको बोता।।

अपना नहीं है यहाँ पर कोई।

सबको चाहिए तेरी लोई।

जीवन का सब सार लुट गया,

बची पास है, केवल छोई।

जीवन पथ पर अकेला चलना, साथ न चलेगा सुत या पोता।

फसल और ही ले जाते हैं, पाता नहीं, जो उसको बोता।।

तूने सबको प्रेम लुटाया।

बाँट दिया सब, नहीं जुटाया।

उनके झूठ भी सच हैं प्यारे,

तेरे सच को भी झुठलाया।

नदी नहीं, है सागर गहरा, मौत का जोखिम लगा ले गोता।

फसल और ही ले जाते हैं, पाता नहीं, जो उसको बोता।।

जीवन से क्या पाया तूने?

खुद को ही है लुटाया तूने।

 जिस पर भी विश्वास किया,

विश्वासघात ही पाया तूने।

फसल की चाह त्याग दे प्यारे, सूख गया, जो तूने जोता।

फसल और ही ले जाते हैं, पाता नहीं, जो उसको बोता।।