Saturday, January 28, 2012

ईश्वर से बड़े पंच



ईश्वर से बड़े पंच
         

कैलाश पर्वत के पवित्र सुरम्य व मनमोहक वातावरण में वसंत ऋतु के आगमन ने चार चांद लगा दिए। देवाधिदेव महादेव समाधि में विराजमान थे। पार्वती अकेले बैठे-बैठे बोर हो रहीं थीं। वे बार-बार विचार करतीं, ऐसे मनोरम वातावरण में भी महादेव को क्या सूझी कि समाधि में बैठ गए। उसी समय `नारायण, नारायण´ की ध्वनि सुनाई दी। भ्रमण करते हुए त्रिलोकी पत्रकार नारद आ पहुंचे। नारद तो ठहरे पत्रकार उन्हें तो सभी लोकों की ख़बरें चाहिए ताकि सभी को सूचना देकर मीडिया की ताकत से रूबरू कराते रहें। पार्वतीजी ने उनसे कुशल समाचार पूछे देवलोक, ब्रह्म लोक व विष्णु लोक के समाचार जानकर अपनी प्रिय सहेली लक्ष्मी व सरस्वती के हाल-चाल सुने। 
        नारदजी इस दौरान पार्वतीजी द्वारा परोसे गए नाश्ते के बाद लस्सी पी कर निवृत्त हो चुके थे। नाश्ते पर हाथ साफ़कर जब वे सीधे होकर बैठे तो पार्वती जी ने नारदजी से प्रश्न किया नारदजी आपने शादी-विवाह तो किया नहीं, आपका समय कैसे कटता होगा? मैं तो महादेवजी के समाधि पर बैठने वाले दिनों में ही इतनी बोर हो जाती हूं कि यहां से कहीं घूमने जाने को मन करता है ( किंतु महादेवजी को समाधि में छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। एक तो उनकी देखभाल करना आवश्यक है, दूसरे गुस्सैल बहुत हैं पता नहीं, मैं कहीं चली जाऊं और वे नाराज हो जायं। एक बार पहले गलती कर चुकी हूं, दोबारा नहीं कर सकती। एक बार की गलती के कारण तो मुझे जलते हुए हवन कुंड में कूदकर दूसरा जन्म लेना पड़ा और घोर तपस्या करके महादेव को दोबारा पाया है। अब मैं कोई गलती नहीं करना चाहती। वास्तविक बात यह भी है कि महादेव से अलग रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। अत: यहीं बैठे-बैठे बोर होती रहती हूं।  
         नारदजी बोले, ``आप सही कहती हैं। देवलोक में विष्णु-लोक हो या ब्रह्म लोक, अमरावती हो या यमपुरी या देवाधिदेव शिवजी का कैलाश सभी स्थानों पर महिलाएं बंधन महसूस करती हैं। हां, पृथ्वी-लोक की महिलाएं स्वतंत्रता की ओर बढ़ रही हैं। कुछ आधुनिकाएं तो स्वच्छंदता की हद तक स्वतंत्रता का उपभोग कर रही हैं, किंतु देवलोक की देवियां अपने पति प्रेम के कारण घूमने फिरने भी नहीं जा सकती। यह तो मानना पड़ेगा कि देवलोक में यह बंधन देवियों ने स्वयं स्वीकार किया है, मृत्यु लोक की तरह देवताओं ने परंपराओं के बंधन बनाकर उन्हें नहीं जकड़ा है। हां, महिलाओं को जो स्वतंत्रता असुर लोक में प्राप्त है, वह देव लोक में तो संभव नहीं है; हो सकता है पृथ्वी लोक पर विलासी प्रवृत्ति के पुरूषों व व्यावसायिकता के कारण वहां की महिलाओं को प्राप्त हो जाय किंतु उसमें भी उनकी सुरक्षा को लेकर मैं संदेह में रहता हूं।´´
         नारदजी के लंबे चौड़े वक्तव्य को सुनकर पार्वतीजी बोली, ``नारदजी आप की प्रवृत्ति कभी नहीं बदलेगी। आपतो मुझे मेरे प्राणप्रिय महादेव के खिलाफ भड़काने का प्रयत्न कर रहे हो। मुझे ऐसी किसी स्वतंत्रता की आकांक्षा नहीं है। मैं अपने प्रियतम के प्रेम के बंधन में बंधकर ही आनंद पाती हूं। आप तो इतना बताइए, महादेव के समाधि पर होते हुए मेरे पास जो खाली समय होता है; उसमें क्या किया जाय?´´
         नारदजी दो मिनट मौन रहकर विचार करने लगे। अचानक उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव उभरे मानो उन्हें पार्वती की समस्या का समाधान मिल गया हो। मुस्कराते हुए अपनी झोली में हाथ डाला और एक किताब निकाल कर पार्वतीजी की और बढ़ाते हुए बोले, ``महादेवी! क्षमा चाहता हूं। देवाधिदेव के विरूद्ध आपको भड़काने का दुस्साहस मुझमें कैसे हो सकता है? मेरे लिए तो आप और महादेव दोनों ही पूज्य है। मैं तो केवल पृथ्वी लोक और असुर लोक के वातावरण की तुलना करके आपको बता रहा था। रही आपके अकेलेपन के समय को काटने की बात, आपके चरणारविंदों में यह पुस्तक समर्पित है। अभी-अभी मैं पृथ्वी लोक की यात्रा करके आ रहा हूं। वहां एक कहानीकार था, जिसे लोग उपन्यास सम्राट भी कहते हैं। मुझे भी उसके उपन्यासों के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तो एक बुक-स्टॉल पर गया। बुक-स्टॉल पर उपन्यास देखकर तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई इतना बड़ा उपन्यास तो बेकार आदमी ही पढ़ सकता है, मेरे पास इतना समय कहां? जो उस उपन्यास को पढ़ पाता। मुझे परेशान देखकर बुक-विक्रेता ने यह किताब मुझे दी और कहा, ``सरजी आप उपन्यास तो पढ़ नहीं पाएंगे, आप यह किताब ले जाइए जब भी समय मिले एक कहानी पढ़ लो इस प्रकार आपकी राह भी कट जाएगी और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी से परिचय भी हो जाएगा।´´
            मैं उसे धन्यवाद देकर जैसे ही चलने लगा, उसने मेरी झोली पकड़ ली और बोला, ``किताब क्या फोकट में मिलती है? इसकी क़ीमत चुकाओ तब किताब लेकर जाओ।´´ 
             मेरे पास भारतीय मुद्रा तो थी नहीं, देवलोक की मुद्रा को उसने नकली बताकर लेने से इन्कार कर दिया। मजबूरन मुझे उसे अपना परिचय देने को मजबूर होना पड़ा। मेरे परिचय देने के बाद वह अट्टहास करके हंसने लगा और बोला, `` ओ बाबा! मैं तेरी इन चिकनी-चुपड़ी बनावटी बातों को नहीं मानता किंतु यह किताब काफी दिनों से पड़ी है, आजकल हिंदी की बुक्स का कोई क्रेज भी नहीं रहा। अत: यह बुक मैं तुम्हें दया करके दे देता हूं।´´
        पार्वतीजी बोली, `किंतु नारद! तुम किसी से कोई वस्तु मुफ्त में स्वाकार नहीं करते। यहां तक कि आवभगत में नाश्ता-पानी के एवज में भी समाचार सुनाकर हिसाब चुकता कर देते हो, फिर आपने उससे यह किताब या बुक, जो भी हो स्वीकार कैसे की?´
       ``महादेवी के वचन शत-प्रतिशत सत्य हैं। मैं उसे किताब वापस करने का वचन देकर किताब लाया हूं। अत: पढ़ने के बाद महादेवी किताब वापस कर देंगी और मैं मृत्यु लोक की अपनी अगली विजिट में यह किताब उस किताब वाले को धन्यवाद सहित वापस कर आऊंगा। महादेवी अब मुझे प्रस्थान करने की आज्ञा प्रदान करें। महादेव के समाधि से उठने पर पुन: आऊंगा।´´ यह कहते हुए नारदजी उठकर खड़े हो गए। पार्वतीजी ने किताब उपलब्ध करवाने के लिए धन्यवाद करते हुए दरवाजे तक साथ जाकर नारदजी को विदा किया।
       नारद को विदा कर पार्वतीजी पुन: महादेव के पास आईं। उनके आसन की साफ़-सफाई की और पुन: अपने आसन पर बैठकर किताब का अवलोकन करने लगीं। अनुक्रमणिका में कहानियों के शी्र्षक देख रहीं थी कि उनकी नज़र `पंच परमेश्वर´ पर टिक गई उन्हें आश्चर्य हुआ कि महादेव का नाम इस किताब में कैसे आ गया। उन्हें परमेश्वर से पहले `पंच´ शब्द भी अजीब लग रहा था। खैर हो सकता है कि कहानीकार महादेव का भक्त हो और पंच-परमेश्वर कहानी के माध्यम से उन्होंने परमेश्वर श्री महादेव की महिमा का बखान किया हो। कुछ आश्वस्त होते हुए उन्होंने सर्वप्रथम उस कहानी को पढ़ना प्रारंभ किया। पार्वतीजी ने पूरी कहानी को पढ़ डाला। कहानी उत्सुकता के साथ पढ़ी वह काफी रोचक भी लगी किंतु कहानी में महादेव का नाम न पाकर वे बैचेन हो उठीं। उन्हें कहानीकार प्रेमचंद पर क्रोध आने लगा। वे विचार करने लगीं, मृत्युलोक के सामान्य आदमी के लिए परमेश्वर शब्द का इस्तेमाल करके उसने परमेश्वर का अपमान किया है, क्योंकि ब्रह्मांड में परमेश्वर तो केवल देवाधिदेव महादेव ही हैं। मृत्युलोक के एक सामान्य से कहानीकार की इतनी जुर्रत कि वह परमेश्वर शब्द का प्रयोग सामान्य मानवों के लिए करे। इसे दंडित करना ही होगा। पार्वतीजी विचारमग्न होते हुए आक्रोशित हो रहीं थी कि तभी उन्होंने अपने नेत्रों को बंद पाया और महादेव के स्पर्श को महसूस किया।
          पार्वतीजी ने सामान्य होने का प्रयत्न करते हुए कहा, `स्वामी समाधि से उठ गए मेरे अहोभाग्य! मैं तो आपकी सेवा करने के लिए तरस गई थी। आप बैठिए मैं आपके लिए जलपान की व्यवस्था करती हूं।´ महादेव ने पार्वती को प्रेम से पकड़कर अपनी गोद में बिठा लिया, `पार्वतीजी जलपान की ऐसी क्या जल्दी है? अभी तो हम आपके पास बैठकर आपके स्नेह का पान करना चाहते हैं। समाधि के समय आप ने समय कैसे व्यतीत किया? आपके समाचार जानना चाहते हैं।´ महादेव के प्रेम भरे वचनों से अभिभूत पार्वतीजी ने लजाकर अपना चेहरा महादेव के वक्ष में छुपा लिया। महादेव ने प्रेमपूर्वक अपना हाथ महादेवी के केशों पर फिराते हुए कहा, `क्या बात है आज महादेवी वैचारिक रूप से आक्रोशित लग रही हैं?´ 
          पार्वतीजी ने कहा, `कुछ विशेष बात नहीं है, आप कई दिनों बाद समाधि से उठे हैं आइए पहले आपको स्नान करातीं हूं, तदोपरांत जलपान के बाद वार्ता उचित रहेगी।´
         `नहीं, जब तक आपके विचारों में  आक्रोश होगा; आप स्नान कराकर हमें शीतलता प्रदान कैसे करेंगी? विचारों में शान्ति  व मृदुता के स्थान पर आक्रोश होने पर जलपान स्वास्थ्यकर कैसे होगा? अत: उचित यही है कि महादेवी उद्विग्नता के कारण को बताएं और शांति की अनुभूति करें। चिंतन व अभिव्यक्ति वैचारिक उद्विग्नता व आक्रोश का शमन करने के आधारभूत उपकरण हैं।´ महादेव ने पार्वती से स्नेहपूर्वक आग्रह किया।
        `स्वामी तो अंतर्यामी हैं फिर भी मेरे मुंह से ही क्यों कहलवाते हैं? इसका राज आज समझ आया। स्वामी मुझे वैचारिक रूप से शांति व प्रसन्नता प्रदान करने के लिए ही मेरे मुंह से सब कुछ सुनते हैं।´ `यह तो एक पहलू है पार्वती! इसका दूसरा पहलू यह है प्रिये! आपकी वाणी को सुनकर हमें असीम आनंदानुभूति होती है। अत: आप तो अपनी मधुर वाणी से अपने आक्रोश का कारण बताकर श्रवणामृत का पान कराएं।´ महादेव ने मुस्कराहट के साथ पार्वती से प्रेमपूर्वक आग्रह किया।
        पार्वती ने नारद के आने व उनसे किताब प्राप्त कर मुंशी प्रेमचंद की कहानी `पंच-परमेश्वर´ पढ़ने का उल्लेख करते हुए कहा,`स्वामी! मृत्युलोक का एक मामूली कहानीकार मामूली इंसानों की तुलना परमेश्वर से कैसे कर सकता है? अवश्य ही वह दंड का भागी है। मैं आपका अपमान किसी भी क़ीमत पर सहन नहीं कर सकती। आपकी अनुमति से मैं उसे दंडित करना चाहती हूं। यही मेरी उद्विग्नता का कारण है।´
        शांत देवी शांत! न तो कहानीकार मामूली आदमी होता है और न ही पंच-परमेश्वर शीर्षक देकर कहीं भी हमारा निरादर होता है। इसके विपरीत इससे तो हमारा मान बढ़ता ही है। नि:संदेह न्याय प्रदान करना हमारे वरदान प्रदान करने के कृत्य से भी महान कृत्य है। देव और देवियां, ऋषि और मुनि वरदान या श्राप दे सकते हैं किंतु न्याय प्रदान करना मानव समुदाय में पंच का ही कृत्य है। न्याय संसार में किसी भी पदार्थ से अधिक महत्वपूर्ण हैं। न्याय प्रदान कर पंचायतें निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। हां, कुछ व्यक्ति पंचायत के नाम पर झूठी प्रतिष्ठा को ओढ़कर एक-दूसरे के प्रेम में बंधे युवक-युवतियों को मौत के फरमान देकर जघन्य पाप करते हैं तथा इसे मृत्युलोक में `ऑनर किलिंग´ का नाम दिया जा रहा है.  हां, इस प्रकार के जघन्य पाप करने वाले व्यक्ति मानव के रूप में राक्षसों से भी निकृष्ट कोटि के हैं। इस प्रकार के जघन्य कृत्य के समर्थन में आने वाली पंचायतें व जन-समुदाय भी माफी के लायक नहीं है। यह सब होते हुए भी न्याय प्रदान करने वाले पंचों का महत्व कम नहीं हो जाता। न्याय प्रदान करने वाला इंसान हमसे भी बढ़ा है। उसे `परमेश्वर´ नाम देकर कहानीकार ने हमारा सम्मान ही बढ़ाया है। अत: देवी उद्विग्नता का त्याग करें और मृत्यु-लोक के भ्रमण के दौरान स्वयं न्यायिक प्रक्रिया को देखकर आश्वस्त हो लें।
        मृत्यु-लोक के नियमित भ्रमण के दौरान शिव और पार्वती समस्त जीवों के सुख-दुखों का अवलोकन करते हुए चले जा रहे थे। इसी दौरान पार्वती को स्मरण हो आया और वे बोलीं, `स्वामी! आपने एक बार मेरे द्वारा `पंच-परमेश्वर´ शब्द पर आपत्ति करने पर मृत्यु-लोक की पंचायतों की प्रशंसा करते हुए मुझे पंचायतों की न्याय प्रणाली का अवलोकन कराने का वायदा किया था। कृपया अब मुझे पंचायतों के द्वारा न्याय प्रदान करने की शक्ति का अवलोकन कराएं।´ 
        `देवी ने सही फरमाया। निश्चित रूप से आपको पंचायत की न्यायिक प्रणाली का अवलोकन कराना चाहता हूं किंतु सामने के जिस गांव की ओर आप संकेत कर रही हैं, इस गांव के लोग, पंच और पंचायत न्याय प्रदान करने में सक्षम नहीं रह गये हैं। `आनर किलिंग´ के नाम पर यहां निर्दोष युवक-युवतियों की हत्या की जाती है। यहां के लोगों का जमीर भी इतना मर चुका है कि वे इस प्रकार के जघन्य कृत्य के विरोध में खड़े नहीं होते। अत: इस प्रकार के कुकृत्य करने वाले गांव में हमारा प्रवेश किसी भी प्रकार से उचित नहीं। कोई भी देव इस गांव में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं आएगा। इस प्रदेश की सीमा की समाप्ति पर अगली ग्राम पंचायत की सीमा में आपको न्याययिक प्रक्रिया देखने का अवसर प्राप्त हो सकता है।´ महादेव ने पार्वती जी को जबाब दिया।
       पार्वती और शंकर भ्रमण करते-करते काफी आगे निकल चुके थे। पार्वतीजी ने फिर याद दिलाया,`स्वामी! मुझे पंचायत की कार्य प्रणाली दिखाकर पंच के बारे में मेरी जिज्ञासा को शांत करने की कृपा करें।´ महादेव ने कुछ क्षणों तक विचार किया और बोले, `देवी! इस समय पंचायत के सामने कोई विवाद ही नहीं है तो हम आपको पंचायती न्याय प्रणाली का अवलोकन कैसे कराएं? इसके लिए तो हमें तब तक यहीं ठहरना पड़ेगा, जब तक पंचायत के समक्ष न्याय-निर्णय के लिए कोई विवाद नहीं आ जाता। हम यहां लंबे समय तक कैसे रूक सकते हैं? अत: इस कार्य को अगले भ्रमण के लिए स्थगित करके हमारा कैलाश लौटना ही उचित होगा।´
       पार्वतीजी निराश होते हुए बोलीं, `स्वामी इस प्रकार तो मैं कभी भी पंचों की कार्य प्रणाली का अवलोकन नहीं कर पाऊंगी। इसके लिए हम अपनी माया से विवाद पैदाकर पंचों के सामने प्रस्तुत करें तो उनकी न्याय प्रणाली का अवलोकन कर सकेंगे। आपसे मेरी प्रार्थना है कि मेरी जिज्ञासा का शमन अवश्य करें।´ `यह तो पंचायत की परीक्षा लेना हो जाएगा, जो मुझे उचित नहीं लगता। देवी पुन: विचार कर लें पंचों की न्याय शक्ति पर संदेह कर उनकी परीक्षा लेना अनुचित है। देवी ने इसी प्रकार का संदेह श्री राम के ईश्वरत्व को लेकर किया था और परीक्षा ली थी तो काफी लंबे समय तक हम दोनों को अलग-अलग रहना पड़ा था। अत: इस विचार का त्याग करना ही उचित जान पड़ता है।´ महादेव ने मत प्रकट किया।
       पार्वती ने आग्रहपूर्वक प्रार्थना की, `नि:संदेह! मुझसे उस समय भूल हुई थी और उस भूल के लिए मैं दंड भी भोग चुकी हूं। अब मैं किसी प्रकार की गलती नहीं करूंगी। स्वामी जिस प्रकार चाहेंगे, उसी प्रकार विवाद का सृजन करें किंतु स्वामी मुझे पंचों की महानता के दर्शन अवश्य कराएं। मैं पंचों की न्यायिक शक्ति पर संदेह नहीं कर रही, मैं तो उसका अवलोकन कर अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहती हूं।´ `ठीक है! किंतु ध्यान रखें पंचों की न्यायिक प्रक्रिया में हम अपनी मायावी या देवी शक्ति का प्रयोग करके किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यह बात आप याद रखें।´ महादेव ने निर्देश दिया।
      जैसी स्वामी की आज्ञा, `मैं कुछ नहीं करूंगी, केवल अवलोकन करूंगी। आप जैसा चाहें वैसा विवाद बनाकर प्रस्तुत करें।´ लोगों की नज़रों से बचने के लिए पार्वती ने भिखारिन का रूप बनाया और वहीं आस-पास विचरने लगी।
      मध्याह्न का समय था। एक किसान काम की थकान उतारने के लिए एक पेड़ के नीचे लेटा हुआ था। महादेव उसी किसान का रूप बनाकर ठीक उसी प्रकार उसकी बगल में लेट गए। कुछ समय बाद ही किसान की पत्नी भोजन लेकर वहां पहुंच गई और दूर से ही बोली, `अजी! उठ जाओ और हाथ-मुहं धुलकर रोटी खालो।´ किसान पत्नी की आवाज सुनकर आंखे मिचमिचाता हुआ जगा तो साथ ही उसका हमशक्ल दूसरा किसान भी ठीक उसी प्रकार उठा। किसान व किसान की पत्नी दोनों ही आश्चर्य में पड़ गए। किसान की पत्नी निर्धारित नहीं कर पा रही थी कि दोनों में कौन सा उसका पति है? इधर दोनों किसान आपस में झगड़ने लगे और एक-दूसरे पर बहरूपिया होने का आरोप लगाने लगे। दोनों एक ही महिला पर अपनी पत्नी होने का दावा कर रहे थे। आस-पास के खेतों से और किसान भी आ गए। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है? सभी ने मिलकर कहा, `चलो पंचायत में मामला रख़ते हैं, अब तो पंच ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि वास्तविक किसान कौन है और यह स्त्री किसकी पत्नी है?´
       दोनों किसानों को पंचायत घर ले जाया गया। पंचायत घर में पंचायत का आयोजन हुआ। पंचों को भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय? दोनों में कोई समानता नहीं वरन् दोनों एक ही थे। खैर पंचों को कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही था। अत: उन्होंने पंचायत घर के अंदर जाकर आपस में विचार-विमर्श किया। बाहर आकर पुन: जब वे अपने-अपने आसनों पर बैठे तो सभी उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे। 
       एक पंच ने खड़े होकर कहा, `हम सभी ने मिलकर यह तय किया है कि वास्तविक किसान कौन है? इसका निर्धारण करने के लिए हम दोनों को कुछ काम देंगे और जो उन सभी कामों को पहले पूर्ण कर लेगा, यह स्त्री उसी की पत्नी होगी।´ सर्वप्रथम दोनों में अंतर करने के लिए एक को सरसों व दूसरे को गेंदा के फूलों की माला पहनाई गई। पंच ने पुन: जनता को संबोधित करते हुए कहा, `स्त्री के लिए वस्त्र और आभूषण विशेष प्रिय होते हैं। इस स्त्री के पास न तो ढंग के वस्त्र हैं और न ही आभूषण। अत: दोनों किसानों को निर्देशित किया जाता है कि अपनी पत्नी के लिए सुंदर वस्त्र व आभूषणों की व्यवस्था करें।´ बेचारा गरीब किसान कहां से अच्छे वस्त्र और आभूषणों की व्यवस्था करता? अत: सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान निराश होकर वहीं जमीन को कुरेदने लगा, जबकि गेंदा के फूलों की माला पहने हुए किसान तुरंत गया और पांच मिनट बाद ही सुंदर-सुंदर वस्त्र और आभूषण ले आया। वस्त्रों और आभूषणों को देखकर न केवल वह महिला वरन् सभी भौचक्के रह गए। पंचों के चेहरों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। वे पहली बार दोनों में कोई अंतर देख रहे थे।
         दूसरे पंच ने खड़े होकर कहा, `किसान का मूल आधार बैल होते हैं, यह किसान इतना लापरवाह रहा है कि इसने अपने बच्चों के लिए एक गाय और अपने खेतों के लिए बैलों की भी व्यवस्था नहीं की। अत: अब इसे चाहिए कि आज पड़ोस की हाट में जाकर बैलों की जोड़ी व एक गाय लेकर आए ताकि इसकी स्त्री प्रसन्न रह सके।´ दोनों किसान गए, गेंदा के फूलों की माला पहने हुए किसान दस मिनट बाद ही बैलों की सुंदर जौड़ी व एक सुंदर गाय के साथ पंचों के सम्मुख प्रस्तुत हुआ। सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान अपना चेहरा लटकाए वापस आ गया। उसके पास बैल व गाय ख़रीदने को धन ही नहीं था और किसी ने उसकी सहायता भी नहीं की।
         भिखारिन बनी पार्वती दूर से ही तमाशा देख रहीं थीं। अब तीसरे पंच ने खड़े होकर कहा, `बड़ा जटिल मामला है, न्याय करने की एवज में पंचायत के लिए किसान को पंचायत के लिए भी कुछ काम करने होंगे; तभी उसकी पत्नी उसे दी जाएगी।´ दोनों किसानों ने एक साथ कहा, `पंचायत के लिए काम करके हमें प्रसन्नता होगी। हमें बताया जाय क्या काम करना है?´ यद्यपि दोनों किसानों ने यह वाक्य बोला था किंतु सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान की आवाज निराशा के कारण कमजोर थी। 
         सरपंच ने दोनों किसानों को आश्वस्त किया, `वे घबड़ाएं नहीं, यह स्त्री उसी के साथ भेजी जाएगी जो उसका वास्तविक पति होगा। यह एक न्यायिक प्रक्रिया है। अत: किसी भी प्रकार का निषकर्ष निकाल कर निराश न हों। हां, न्यायिक प्रक्रिया में दोनों को भाग लेना होगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि यह महिला वास्तव में किसकी पत्नी है?´ सरपंच ने तीसरे पंच को अपनी बात कहने का संकेत किया।
       दोनों किसानों की ओर मुखातिब होकर तीसरे पंच ने कहा, `तीसरी परीक्षा यह है कि ग्राम पंचायत की 30 एकड़ जमीन अनुपजाऊ और बंजर पड़ी है अब देखना यह है कि दोनों किसानों में से कौन सा किसान उसे उपजाऊ और हरी-भरी बना देता है?´ सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान एक बार फिर निराश होकर जमीन पर बैठ गया, जबकि दूसरा किसान तुरंत उस भूमि पर गया और कुछ समय बाद आकर पंचों से बोला, `जमीन उपजाऊ और हरी-भरी बन चुकी है पंच निरीक्षण कर सकते हैं।´
       अब चौथे पंच की बारी थी,`चौथा पंच खड़ा हुआ और बोला,`गांव में स्कूल भवन नहीं है, मास्टरजी बच्चों को पेड़ के नीचे पढ़ाते हैं। अत: पंचायत इन दोनों किसानों को निर्देश देती है कि वे एक-एक करके स्कूल भवन का निर्माण करें, हम देखेंगे कौन सुंदर व मज़बूत भवन का निर्माण करता है?´ गेंदा के फूलों की माला की फिर विजय हुई उस किसान ने शीघ्र ही पंचो को एक सुंदर, मज़बूत व सुविधाजनक स्कूल भवन ही नहीं उसके साथ मास्टर्जी के आवास की भी व्यवस्था की थी। सभी पंच प्रसन्न हो गए।
       अब सरपंचजी की बारी थी। सरपंचजी ने सरसों के फूलों की माला पहने किसान की और इंगित करते हुए कहा,`तुम कुम्हार के पास जाकर एक हांडी व उसे ढकने का ढक्कन लेकर आओ।´ उस किसान को पहली बार लगा कि यह कार्य उसकी क्षमता के अनुसार है और कुछ ही देर में वह हांडी लेकर उपस्थिति हो गया। इसके बाद वह हांडी दूसरे किसान को दी कि तुम इसमें छोटे-छोटे 99 छेद कर दो। वह किसान तो सब कुछ कर सकता था। वह पंचायत भवन के पीछे गया और उसमें बड़े सुंदर व सुडोल छेद करके ले आया। सरपंच ने पुन: एक पहले किसान को भेजकर गांव के तालाब से चिकनी मिट्टी मंगाई। हांडी पर उसका ढक्कन सही प्रकार से रखकर चिकनी मिट्टी से उसके मुंह को भली प्रकार बंद कर दिया गया।
       अब सरपंच ने दोनों के हाथ में गंगाजल देकर शपथ दिलाई, `वे किसी भी प्रकार इस हांडी को फोड़ेगे नहीं, कोई चालाकी नहीं करेंगे।´ जब वे दोनों शपथ ले चुके, सरपंचजी ने उस हांडी के एक छेद से प्रवेश कर दूसरे से निकलकर आने का निर्देश दिया। सरसों के फूलों की माला पहने किसान ने निराशा से जमीन पकड़ ली जबकि दूसरे किसान ने सूक्षम रूप बनाकर हांडी में प्रवेश किया। सरपंचजी ने उस छेद को चिकनी मिट्टी से बंद कर दिया और दूसरे छेद से निकलकर आने को कहा। बाहर आने के बाद दूसरे छेद को भी बंद कर दिया गया। पुन: तीसरे छेद से प्रवेश करने को कहा गया और उसे बंद कर दिया गया। यह प्रक्रिया जारी रही और हांडी के 98 छेद बंद हो चुके थे। किसान को पुनः उसके अन्दर प्रवेश करने के लिये कहा गया; जैसे ही गैंदा के फूलों की माला पहने किसान ने 99 वें छेदमें प्रवेश किया उस छेद को भी बंद कर दिया गया। अब बाहर एक ही किसान रह गया। सरपंचजी ने निर्णय सुनाया, `यही वास्तविक किसान है, यह स्त्री इसी की पत्नी है। यह स्त्री इन वस्त्रों व आभूषणों को लेकर गाय और बैलों की जोड़ी के साथ अपने पति को लेकर अपने घर जा सकती है।´
       वह स्त्री बोली, `पंचों की जय हो, पंचों की कृपा से मेरा पति मुझे मिल गया किंतु ये वस्त्राभूषण, गाय और बैल मेरे नहीं हैं तथा अत्यंत आवश्यक होते हुए भी हम दोनों इन्हें स्वीकार नहीं कर सकते। हम दोनों परिश्रम पूर्वक दो रोटी खाने में विश्वास करते हैं। हम गरीब सही किंतु मुफ्त में कुछ पाना नहीं चाहते। अत: यह सभी सामिग्री हमारी तरफ से पंचायत ग्रहण करे।´
       सरपंचजी ने कहा, `ठीक है। जैसी तुम्हारी इच्छा। फावड़ा लाकर एक गढ्ढा खोदकर उसमें यह हांडी दबा दी जाय।´ 
     भिखारिन बनी पार्वतीजी घटनाक्रम को देखकर आश्चर्यचकित रह गई और तुरंत पंचायत के समक्ष हाथ जोड़कर उपस्थित हुई और पंचों से निवेदन किया, `नि:संदेह आपने सही न्याय किया है। पंच परमेश्वर होते हैं किंतु इस हांडी में मेरे पतिदेव बंद हैं। कृपया, उन्हें छोड़कर मुझ पर अनुग्रह करें।´ अब सभी का ध्यान उस भिखारिन की और हो गया। सरपंचजी ने कहा, `हम समझ रहे हैं, आप लोग साधारण व्यक्ति नहीं हैं। आपको अपने पति को मुक्त करवाना है तो अपना वास्तविक परिचय दीजिए और हमारे सामने अपना वास्तविक रूप प्रकट कीजिए।´ 
       अब पार्वतीजी के सामने कोई चारा नहीं था। उन्होंने न केवल अपना परिचय दिया वरन् वास्तविक रूप में आकर सभी को दर्शन भी दिए। सभी पंचों व ग्रामीणों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तुरंत हांडी का ढक्कन हटा कर महादेव को निकाला गया। सभी ने शकंर-पार्वती के युगल रूप के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ किया।     


Saturday, November 19, 2011

दिल में बसाया कीजिए

गुरु हमारे युग निर्माता
                      कवि- नसीब सिंह, कक्षा-१२ विग्यान वर्ग
                      जवाहर नवोदय विद्यालय,
                      खुंगा-कोठी, जींद(हरियाणा)
गुरु हमारे युग निर्माता, सच के  ग्याता.
दिल से कभी ना इनका आदर  घटाया कीजिए.


मात-पिता से भी है ऊंचा दर्जा इनका,
भूल से भी न इनका दिल दुखाया कीजिए.


पल-पल कदम-कदम पर जो बने तुम्हारा सहारा,
उनके उपकारों को कभी ना भुलाया कीजिए.


नही है कोई भी उत्तम-स्थल गुरु चरणों से,
हरदम अपना मस्तक चरणों में झुकाया कीजिए.


हैं उन्हें उम्मीदें, तुमसे भी कहीं ज्यादा,
मेहनत कर उन सपनों को, कुछ तो सवांरा कीजिए.


गुरु-शिष्य रिश्ता होता है पवित्र और कोमल,
इस प्यारे रिश्ते को ना, ठेस पहुंचाया कीजिए.


गर ठेस पहुंचे तुम्हारे कारण उन्हें जरा भी,
कोशिश कर, ऐसी गलती ना दुबारा कीजिए.


दिन-रात जो लगे रहते हैं राष्ट्र-सेवा में,
उनकी भी सेवा बारे, कुछ तो विचारा कीजिए.


छोटी सी जिन्दगी में मोके ना मिलेंगे बार-बार,
हो सके तो इनका कुछ आशीर्वाद कमाया कीजिए.


जिन्होंने अमृत-वचनों से, हमेसा तुम्हें सिखाया,
’नसीब’ ऐसी हस्तियों को, दिल में बसाया कीजिए.

Monday, November 14, 2011

कविता कहां? अब खो गई है।


कविता कहां? अब खो गई है।
                                     
कविता कहां? अब खो गई है।
बीज  शांति  के, बो गई है॥
               शांति  मृत्यु की, मानो छाया,
               जीवन-विहीन ही, चलती काया।
               खोया  प्रेम, ईर्ष्या   नहीं  है,
               सपने मरे, दिख़ती न माया।
बेचैनी कहां? क्यों सो गई है?
कविता कहां? अब खो गई है॥
               जीने की, अब नहीं है इच्छा,
               मौत की भी, नहीं  प्रतीक्षा ।
               चाहते हैं,  संयमी   जो,
               गले पड़ी आ, वह तितीक्षा।
नि:स्पंद बुद्धि भी रो गई है।
कविता कहां? अब खो गई है॥

टीचर
           
शिक्षक को दो ही मिलें, मजदूर को सात हज़ार,
टीचर नहीं फटीचर कहो ,टीचर बैठे बार
टीचर बैठे बार लक्षमी जी जाम पिलातीं
सरस्वती खड़ी हताश, बेचारी दुत्कारीं जातीं।


अधिकारी?
                 
अधिकारी ही है भ्रष्ट जहां, लघुकारी न जाने क्या होगा?
मर्यादा विहीन हो राम यदि , मुरारी न जाने क्या होगा?
नेता ही हों कामिनी दास , अन्जाम न जाने क्या होगा?
रक्षक ही बन बैठे भक्षक, परिणाम न जाने क्या होगा?

Friday, October 21, 2011

प्रेम के रंग से जीवन रंग कर, जीवन को रंगीला कर दो

सभी पाठकों, विचारकों व साहित्यकारों को
 दीप-मालिका की हार्दिक शुभकामनाएं
आशा है हम केवल अपने ही घर नहीं
वरन सभी के घर एक छोटा-सा दीप 
जलवाने का प्रयास करेंगे
तथा सभी योग्य बच्चों को
 विद्या का दीप प्रदान करने में सक्षम हो सकेंगे
 ताकि सभी को प्रकाश मिल सके.


जीवन को ज्योतिर्मय कर दो
                         
ज्योति आकर के जीवन में, जीवन को ज्योतिर्मय कर दो।
प्रेम के रंग से जीवन रंग कर, जीवन को रंगीला कर दो॥
आ जाओ हम सब मिलकर,
खुशियों के दीप जलाएंगे।
उर में अपने तुम्हें बिठाकर,
महफिल को महकाएंगे।

अंतर-घट अब रीत रहा है, तुम आकर आपूरित कर दो।
ज्योति आकर के जीवन में, जीवन को ज्योतिर्मय कर दो॥
सब मिलकर हैं नीड़ बनाते,
हम उपवन एक लगाएंगे।
तुम खुशियों के दीप जलाना,
हम रंगों से तुम्हें सजाएंगे।

बिखर रहे हैं भाव हमारे, तुम आकर गरिमामय कर दो।
ज्योति आकर के जीवन में, जीवन को ज्योतिर्मय कर दो॥
आतंक मिटा खेलें हम होली,
सद्भावना के दीप जलाएं।
प्रेम का घी, नेह की बाती,
आओ हम मिल दीप जलाएं।

जन-पूजा के थाल सजे हैं, चटख रंग आकर तुम भर दो।
ज्योति आकर के जीवन में, जीवन को ज्योतिर्मय कर दो॥

Tuesday, October 4, 2011

साहस शौर्य पराक्रम से, आतंक-मुक्त हम विश्व बनाएं


विजयादशमी पर्व मनाएं

साहस, शौर्य, पराक्रम से, आतंक-मुक्त हम विश्व बनाएं।
भ्रष्ट  तंत्र पर विजयी होकर, विजयादशमी पर्व मनाएं॥
                फूंक रहे हम केवल पुतला
                   जन-जन में रावण बैठा है।
                    अपहरण, हत्या, बलात्कार में,
                          पहचानों   राक्षस  बैठा है।
अंतर्मन की ज्योति जलाकर, नारी का सम्मान बढ़ाएं।
भ्रष्ट  तंत्र पर विजयी होकर, विजयादशमी पर्व मनाएं॥
                    शिक्षा में भी घपला  होता
                     मजबूरी में बचपन  खोता।
                           छात्र ही मानव-बम बन जाते,
                                  गुरू द्वारा देह शोषण होता।
भौतिक नहीं, आध्यात्म जगाकर, शिक्षकों का मान बढ़ाएं।
भ्रष्ट  तंत्र पर विजयी होकर, विजयादशमी पर्व मनाएं॥
                   कितने रावण? नहीं है गिनती
                       राष्ट्रप्रेमी   करता  है विनती।
                          लोकतंत्र में तंत्र हुआ  हावी,
                            सरकार नहीं चीत्कार है सुनती।
देश के हित में जीना सीखें, विश्व गुरू फिर से बन जाएं।
भ्रष्ट  तंत्र पर विजयी होकर, विजयादशमी पर्व मनाएं॥

Monday, October 3, 2011


जन-जन जीवन ज्योति जले

दीप-उत्सव  का दीप जले।
जन-जन जीवन ज्योति जले॥


आतंक पर सद्भावना विजयी
दुष्कृत्यों पर सुकृत्य हों जयी
पुतले और पटाखे छोड़
डाले हम परंपरा नयी
भ्रष्टाचार पर घात चले।
जन-जन जीवन ज्योति जले॥


अंतर्मन रसधार बहे
वाणी से भी प्यार बहे
व्यक्ति और परिवार तुष्ट हो
विश्व में शांति बयार बहे
संबंधों की बर्फ गले
जन-जन जीवन ज्योति जले॥


ज्योति आए, तम मिटे
ज्योति से, अंतर-तम मिटे
प्रेम ज्योति, उर घट भरे
जन-मन से जब अहम मिटे
जन-जन का जब श्रम फले
जन-जन जीवन ज्योति जले॥

Monday, September 5, 2011

गर होय जबरदस्ती कह दइयों बीबी भी ना चहिए


टी.वी. बनाम बीबी


गए थे लेने बीबी,साथ में मिल गई टीवी,
साथ में मिल गई टीवी,मनें बहुतेरी कीनी।


जबाब सास जी ने दीनों,छोरी कूं जरूरी टीवी,
मनें जब ना चल पायी,बीबी पीछे टीवी आगे आई।


सांच सब मानों भाई,टीवी और बीबी दोंनो,        
रविवार क्या पूरे सप्ताह,महाभारत कीनौ।


दोंनों करें लड़ाई तबीयत मेरी घबड़ानी,
मेरो सूखो कण्ठ बीबी ना देवे पानी।


कहै राष्ट्रप्रेमी समझाय,टीवी मत लइयो भइए
गर होय जबरदस्ती कह दइयों बीबी भी ना चहिए।

कौन कहेगा ये मानवता है?


मानवता


एक मानव 
गंदे और बदबूरार वस्त्रों में
अपनी अभागी रेंखाओं के हाथ पसारे
देख रहा कुदरत के नजारे                    
सूटेड-बूटेड मानव की ओर निहारे             
मानव ही मानव को दुत्कारे
पशुओं को दुलारे-पुचकारे
मानव को पग-पग फ़टकारे
स्वार्थी हो गया है प्यार
केवल पैसे वाले के पास है
केवल पैसे वाला पाता है
मानव समाज के इस क्रूर सत्य पर
हंसता हुआ आगे बढ़ जाता है
राष्ट्रप्रेमी पूछे यारों,
कौन कहेगा ये मानवता है?

Sunday, August 14, 2011

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें

स्व- तन्त्र का अर्थ समझ कर, 
अपना तन्त्र हम विकसित कर लें,
अन्ना जी का हाथ थाम कर, 
जन-लोकपाल हम निर्मित कर लें,
राजनैतिक आजाद भले ही, 
स्व-तन्त्र अभी भी नहीं हो पाये,
भ्रष्टाचार है दानव समझो, 
कानून बनाकर अब बस में कर लें.

आजादी की दूसरी लड़ाई, 
शुरू कर रहे अन्ना जी
स्वतंत्रता नहीं भेंट में मिलती, 
यही बताते अन्नाजी
स्वतंत्रता कमजोर पड़ रही, 
भ्रष्टाचारी हावी है,
स्वतंत्रता की रक्षा के हित, 
हम भी साथ है अन्नाजी.


Saturday, August 13, 2011

रक्षाबन्धन की शुभकामनाएं

बांधे हम रक्षा का बन्धन
भ्रष्टाचार से ना हो क्रन्दन
अन्नाजी को मिले सफ़लता
जनता के माथे पर चन्दन.

Tuesday, July 5, 2011

स्वतन्त्रता दिवस

 स्वतन्त्र का अर्थ


                                 
स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।
स्व-तंत्र को तो ध्वस्त करें नित, गाएं स्वतंत्रता का गाना।।


स्वतंत्र हुए स्वच्छंद नही, सबको पड़ेगा समझाना।
तोड़-फोड़ कर आग लगाते, लक्ष्य विकास का यूं पाना??
सार्वजनिक संपत्ति अपनी, समझ के घर ही ले जाना।
अधिकारों को झगड़ रहे नित, कर्तव्यो को ठुकराना।
कैसे होगा विकास साथियो! मार्ग तुम्हीं को दिखलाना।
स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।


कैसा तंत्र कैसी व्यवस्था? हमको हड़ताल पर है जाना!
हमारी सरकार, हमारी निगमें,बिना टिकिट हमको जाना।
स्वतंत्र देश के, स्वतंत्र नागरिक, बिना किए सब कुछ पाना।
विद्यालयों में विलास करेंगे,नकल से पास ही हो जाना।
कमीशन के बिन काम करें नहीं, भले ही हो चारा खाना।
स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं,पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।


आज स्वतंत्रता दिवस साथियो, संकल्प एक करना होगा।
तंत्र दुरूस्त करने की खातिर, जागरूक रहना होगा। 
भ्रष्टाचार करने वालों को, आखिर सबक सिखाना होगा  ।
हाथी के पावं में सबका पांव, सबको ही समझाना होगा।
सार्वजनिक हित में निजी स्वार्थ तज, गाएं स्वतंत्रता का गाना।
स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, पर स्वतंत्र का अर्थ नहीं जाना।।

Saturday, May 21, 2011

स्वागत तेरा मौन !!!


स्वागत!
                 

स्वागत ! स्वागत ! स्वागत !
जो  भी  है यहां   आगत।
जीवन की    तू     सौत,
स्वागत     तेरा     मौत। 
बचपन से है हमें सिखाया,
दरवाजे पर जो भी आया
उसको हमने गले लगाया
तुझसे  डरता     कौन!
      स्वागत  तेरा मौन!
जीवन हमने बहुत जिया है,
सुधा मान के गरल पिया है।
जिस-जिस को हमने अपनाया,
नहीं किसी ने सुक्ख दिया है।
तू है दुल्हन तुझे सजा लूं,
अपने हिय में तुझे बिठा लूं।
मन अपना संगीत बजा लूं,
दूल्हा मुझसे अच्छा  कौन!
      स्वागत तेरा मौन!!
कुदरत से जो तन था पाया,
नहीं उसे वैसा रख   पाया।
नादानीं जो मैने  की थीं,
अंग-अंग है उसने  खाया।
पहन के आ दुल्हन का जोड़ा,
मैं  हूं दूल्हा चिता है  घोड़ा।
चलता हूं   अब थोड़ा-थोड़ा,
बने     बराती      कौन ?
      स्वागत तेरा मौन !!!


Thursday, May 19, 2011

सदैव वादी कहलायेगा


वादी 


हावी है हैवानियत
निरर्थक शब्द हैं लेखनी पर
पुत्र पिता को ताड़ना देता
विधर्मी धर्म की आड़ लेता
राष्ट्रभक्त राष्ट्रद्रोहियों से मात खा रहे हैं
बेटे ही मां का सिन्दूर चुरा रहे हैं
विचारों पर छाया है वाद                        
जातिवाद,सम्प्रदायवाद,
गान्धीवाद,आतंकवाद और
राष्ट्रवाद
सबको ही मानने वाले हैं वादी 
तन पर धारे हैं सुन्दर खादी 
राम के प्रति श्रद्धा नहीं किसी में
किन्तु फिर भी बेबसी में
मन्दिर बनाने,
न बनाने को चिन्तित हैं
इन्हीं से तो हम सब सिंचित हैं
यदि छोड़ दें हम वाद
कैसे बनेंगे वादी
पहन न पायें खादी
हो जायेगी हमारी बरबादी
राष्ट्रप्रेमी ठोकर न खायेगा
सदैव वादी कहलायेगा।
                                       

Saturday, May 7, 2011

अभी युद्ध विराम है केवल, समझो जीवन जीत नहीं है

हम परदेशी मीत नहीं हैं









हम परदेशी मीत नहीं हैं,
यह कविता है, गीत नहीं है ।


अभी युद्ध विराम है केवल,
समझो जीवन जीत नहीं है।।


संघर्ष सदैव ही करते आये,


तदनुकूल ही फल भी पाये।


हम सदैव ही चलते आये,


समझ यही तू मनु के जाये।


जीवन में सुन करूण पुकारें,
समझ इन्हें संगीत नहीं है।


अभी युद्ध विराम है केवल,
समझो जीवन जीत नहीं है।।


बचपन से हम कहीं न ठहरें,


लगा लिये लोगों ने पहरे।


चलना अपना काम रहा है,


पथ में आये गढ्ढे गहरे।


सबको ही सम्मान दिया है,
लेकिन करते प्रीत नहीं है।


अभी युद्ध विराम है केवल,
समझो जीवन जीत नहीं है।।


साथ हमारे तुम चल पाओ,


विपित्तयों में ना घबराओ।


साथ हमारे चल सकते हो,


कदम न पीछे जरा हटाओ।


संघर्ष किया है हमने अब तक,
पालन करते रीत नहीं है।


अभी युद्ध विराम है केवल,
समझो जीवन जीत नहीं है।।

नाना हो या नानी सबने पानी की माया जानी


पानी की माया
          

नाना हो या नानी सबने, 
पानी की माया जानी।
सबको भोजन देता पानी,
अफसर हो या बुढ़िया,रानी।
मिठाई न बने बिना पानी के,
घास उगे न बिना पानी के।
सबको पानी देता जीवन,
इसीलिए तो करते सेवन।।
एक लक्ष्य बतलाता पानी,
परमार्थ सिखलाता पानी।
कहे राष्ट्रप्रेमी कविराय, 
सबको भोजन देता पानी।
नाना हो या नानी सबने, 
पानी की माया जानी।।

Wednesday, April 13, 2011

फूल उठे फिर से फुलवारी

फूल उठे फिर से फुलवारी
                
बीत गई यह वर्ष हमारी,
नये संवत की करें तैयारी।
फूल उठे फिर से फुलवारी,
भरीं हों जिसमे खुशियां सारी।

नया संवत जब भी है आता,
खुशियां यह घर-घर में लाता।
सबके ही मन को यह भाता,
विक्रमादित्य की याद दिलाता।

गये वर्ष को देके विदाई,
गत संवत से होती जुदाई।
नव संवत पर बनें मिठाई,
हर बच्चे-बच्चे ने खाई।

नव-संवत है नया प्रभात,
फूल रहे सबके हैं गात।
नये संवत के नये उत्पात,
कौन किसे दे देगा मात।

शुभ हो सबको ही यह वर्ष,
चंहु ओर छाया है हर्ष।
बच्चों के मन में उत्कर्ष,
शुभ हो भारत को नव-वर्ष।

नव-संवत पर नयी उमंग,
छायी हैं सबके ही अंग।
सबके मन में उठी तंरग,
नव-संवत लाता है रंग।

नव संवत क्या नहीं है लाता,
कैसा है यह सबको भाता।
पिन्टू है कैसा इठलाता,
नये वर्ष  के गीत है गाता।

नया संवत है कैसा आया,
राष्ट्र हमारा है मुस्काया।
ऐसा है विश्वास दिलाया,
राष्ट्रप्रेमी मन में हर्षाया।

Sunday, March 20, 2011

परम-गुरू अध्यापक हो गये, नकल कराई होली में।


सबका चेहरा काला होग्या

सबका चेहरा काला होग्या
अबकी बार तो होली में,
भ्रष्टाचार के रंग है भाई
यहां जन-जन की झोली में।


भ्रष्टाचार की कैसी ललक है
जन-जन को इस होली में
किसानों के भी कर्ज माफ
हो जायं चुनाव की होली में।


राजाजी भी खूब ही खेले
कलमाड़ी भी होली में
हसन अली भी रंग में रंग गये
बचे न थामस होली में।


ब्यूरोक्रेट पर रंग चढ़ गया
भ्रष्टाचार का होली में
मजदूरों की पौ बारह हैं
मनरेगा की होली में।


सांसदों की भी निधि बढ़ गई
अबकी बार फिर होली में
भ्रष्टाचार का रंग है गहरा
सरकारी इस झोली में।


छात्रों पर भी रंग चढ़ गया
नकल की पावन होली में
परम-गुरू अध्यापक हो गये
नकल कराई होली में।

Saturday, March 19, 2011

जीवन के रंग- होली के संग

होली की शुभकामनाएं

समस्त मित्रो को होली की हार्दिक शुभकामनाएं.
होली के रंग- बिखेरे आपके जीवन में उमंग.
डा.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
९९९६३८८१६९
होली- संबन्धो का प्रबन्धन
आओ कहानी पढ़ें

Wednesday, March 16, 2011

काम की तरंग अंग-अंग में समाई ऐ


     होरी कौए हुरदंग फरकत अंग-अंग



होरी कौए हुरदंग फरकत अंग-अंग,
होरी की उमंग अंग-अंग में समाई ऐ।
रंगन कौए घोर  नृत्य करत चहुं ओर,
नांचत हैं गोप एक गोपिका नचाई ऐ।
झूमि रहे अंग-अंग नचत हैं सिगु संग,
काम की तरंग अंग-अंग में समाई ऐ।
धाम,वाम और बाग  साथ-साथ मटकत,
होरी की हुरंग मोहि बरसाने लाई ऐ।।

चंहु ओर ऐ बसन्त रंगन कौ नाएं अन्तु
लाल, हरौ, बैंगनी, गुलाबी मन भायौ ऐ।
लायो इतनो सौ रंग जिहु सिगु डारि दियौ,
लला तू दिखाय हमें औरू कहा लायौ ऐ।
हमने तौ होरी कहि गारी सिगु गाइ दईं,
तू तौ बतराइ लला, तैंनै कहा गायो  ऐ।
नांचु नेकु देखि लऊं,नांचि लला ठाड़ो हे कैं,
तू तौ खूब नाचत हो, काहे शरमायो  ऐ।।

चोप करि केसर लगायो याने अंगन पै,
हेरि लायो ग्वाल-बाल,हुरियारो आयो ऐ।
हरौ,लाल,गुलाबी,अरूण,आसमानी रंगु,
लाल पोल लाल रंगु लाल ने लगायो ऐ।
होरी आइवे ते हिय नेह रस रंगि गयौ,
ग्वाल सिगु हरे रंगे रंगी ब्रज नारी ऐं।
राष्ट्रप्रेमी हियरा सरूप रस रंगि दयौ,
रंगि रहीं गैल-गैल,गैल रंगि डारी ऐं।।

होरी हंसावत होरी खिलावत,
होरी ही जरावत मानस कौ तम।
होरी भुलावत,गुन सिखलावत,
होरी मिलावत प्रेमिन को सम।
होरी ऐ नगर में,होरी ऐ मन में,
होरी से कांपत पापिन कौ मन।
होरी मारत, होरी बचावत,
नरसिंह नंचावत,नांचत हैं हम।।

होली के बहाने गुरूजी की तोड़ दी खाट


होली
                                        

                                       होली,
                                       परम्परा को मारे गोली,
                                       खूब करो हुल्लड़,
                                       गुरू के सिर पर,
                                       फोड़ दो कुल्लड़।


                                       गरिमा,
                                       गुरू-भक्ति,
                                       दहन कर दो होरी में
                                       अच्छा मौका है,
                                       आज,
                                       गुरूजी को,
                                       डाल दो मोरी में।


                                       कक्षा में पिलाते थे डॉट
                                       आधुनिक शिष्य,
                                       होली का बहाना,
                                       आज,
                                       गुरूजी की तोड़ दी खाट।

छात्राओं के साथ, कमर लचकाई


                 होली है भाई
                         

                              मास्टर जी ने,
                              होली 
                              कुछ इस तरह मनाई,
                              छात्रों को बुला,
                              स्नेह प्रदर्शन कर,
                              अश्लील गाने गाकर,
                              छात्राओं के साथ,
                              कमर लचकाई
                                      होली है भाई। 

होली में हुल्लड़ करो, हल्ला करो हजूर


गौपिन नै घेरि लिये हैं


होली में हुल्लड़ करो, हल्ला करो हजूर।
होली खेलन के लिए,भए आज मजबूर।।
भए आज मजबूर, गोपिन ने घेर लिए हैं।     
घेर-घेर कर आज तो रंगरेज बनाय दिए हैं।।
हर हालत में हरदेवी कूं आज हरी करि डारौ।
लाल रंग है लालवती को,लाल रंग है जापे डारौ।।
हरे रंग कौ हरण करि हरे रंग सूं रंगौ दुपट्टा।
राष्ट्रप्रेमी अब सम्भलि,गुलाबी गुलाबो पै मारै झपट्टा।।

होली की पावन वेला में, मित्रो तुम्हें मुबारक होली


होली कैसे मनावेंगे?

होली की पावन वेला में,
                 मित्रो तुम्हें मुबारक होली।
मिठाई गुलाल पास नहीं,
                 मित्रों मंहगी हो गई रोली।।
महंगी हो गई रोली ,                         
                 अब होली कैसे मनावेंगे।
घरवाली की सूची लेकर ,                      
                 बाजार कैसे जावेंगे।।
बाजार कैसे जावेंगे ,
            चालीस रूपये मांगे रिक्शे वाला।
पिछली बार की होली को तो,
                 ले गया था बच्चों को साला।।
ले गया था बच्चों को साला,
                 अब तो रोना आता है।
राष्ट्रप्रेमी अब तो रंग भी,
                 पचास रुपये तोला आता है।।

भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में


भारत देश है आज जल रहा 
              
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में,
अर्थी चली असंख्यों बाला, बैठ न पाईं डोली में।
लाखों ने अपनी कन्या की ,मांग सिन्दूर से भरने को,
दी जीवनाहुति असंख्यों अपनी शरम की बोली में।


जाके पैर न फटी बिबाई, वो क्या जाने पीर पराई,
जिन पर बीती वही जानते,मकान बेच कर करी सगाई।
गहने अपना जिस्म रख दिया,सिर्फ मांग की बोली में,
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


फिर भी रूकी न अर्थी देखो,मानवता की भाषा में,
लड़के वाले दहेज मांगते और धनी की आशा में।
लड़कों की बिक्री होती है,बाजारों की बोली में,         
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


कन्या नहीं दान की वस्तु, सम्पत्ति में पूरा हक है,
पैतृक सम्पत्ति की वारिस, शिक्षा पर पूरा हक है।
मालिक वह खुद ही होगी, दहेज न होगा रोली में 
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


केवल विरोध से दहेज न मिटता, कुछ और हमें करना होगा,
शिक्षा और अधिकार जुटाकर, नारी को खुद बढ़ना होगा।
आर्थिक शक्ति पाये जब वह, कोई न डाले झोली में ।
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


बेटी पाये विकास के अवसर,खुद ही आगे बढ़ लेगी,
पुरूष बने नहीं भाग्य विधाता, अपना पथ खुद गढ़ लेगी।
भ्रूण हत्या कर मिटाओ न उसको, वश लालच की खोली में
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


अब तो समझो लड़के वालो,कन्याओं की शादी में,
नहीं बटाओ हाथ इस तरह, तुम ऐसी बबार्बादी में।
आग लगे,ऐसे दहेज को हैवानों की टोली में,
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।


तुमको भी दुख होगा, जब क्षण विपरीत का आयेगा,
या यह बेबश का पैसा, तुम्हें नरक ले जायेगा।
कटु सत्य है,बुरा न मानो,राष्ट्रप्रेमी की बोली में,
भारत देश है आज जल रहा,इस दहेज की होली में।

सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।


सब कहते हैं होली-होली
        

सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।
जब तक हैं हिरण्यकश्यपु जीते,तब तक तो होली बाकी है।
जिसको मां का ध्यान नहीं, पुकार न सुनता जनता की।
जनता करूण क्रन्दन करती, आह निकलती जनता की।
भारत मां डायन कहने वालों की, संग है जब तक टोली।
सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।


कुर्सी की खतिर तो यहां नित हो ती खातिरदारी है।
प्रधानमन्त्री पद पर करते, सब अपनी दावेदारी है।
क्या हुआ जनता ने, सत्ता दल का कर दीना निपटारा।
जो लोग सत्ता में आये, उनका भी है वही पिटारा।
नहीं गारण्टी अब न मिलेगी जनता को खूनी रोली।
सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।


जब न रहेगा कोई ईसाई,नहीं रहेगा मुस्लिम भाई।
हम सबकी राष्ट्रीयता ही, अब  एक हमारी माई।     
पड़ने न देंगे फूट आपस में , बढ़ने न देंगे खाई।     
बहुसंख्यक,अल्पसंख्यक ना कोई,सब हिन्दुस्तानी भाई।
राष्ट्रीय स्वाभिमान पर मिल मनायें सब होली।
सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।


जनता जग रही है भारत की अब प्रहलाद बन जायेगी।
अब राक्षसी चाल एक भी ,नहीं काम कर पायेगी।
राष्ट्र और संस्कृति विरोधी मिट्टी में मिल जायेंगे।
होगा अम्बर अरूण लाल ,तब देव भी होली गायेंगे।
रामराज्य की आवश्यकता,जनता की निकली टोली।
सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।


भारत मां के सपूत जगेंगे,सच्ची मानवता लायेंगे।
झूंठी शान और शोकत को ,भारत से दूर भगायेंगे।
उपलब्ध साधन और श्रम से ही भारत को चमकायेंगे।
राणा,शिवा आदर्श हमारे,राष्ट्र की खातिर मिट जायेंगे।
राष्ट्रप्रेमी लक्ष्य प्राप्ति हित, लगायें भू-रज रोली।
सब कहते हैं होली-होली,किन्तु अभी होली झांकी है।

Tuesday, March 15, 2011

नारी का कविता ब्लॉग: सोच रहा हैं अरुणा शानबाग का बिस्तर

नारी का कविता ब्लॉग: सोच रहा हैं अरुणा शानबाग का बिस्तर

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वाइफ नहीं, धर्मपत्नी खोजता हूं।


खोज

भवन तो बहुत हैं , गृह खोजता हूं। 
सितारे  बहुत हैं, चांद खोजता हूं।
नर नारी हैं, इंसान खोजता हूं।
कहने को तो सब अपने है,
परचित जहां  में, अपनत्व खोजता हूं।
राम का मुखोटा लगाये, घूम रहे है रावण,
सीता के हरण के बाद भी, 
मुखोटा हटाने को आये , जटायू खोजता हूं।
राम आयें न आयें, विभीषण खोजता हूं।
शासक बहुत हैं, सेवक खोजता हूं।
जंगलों में मंगल की बात है पुरानी,
नगरों में मंगल, मैं खोजता हूं।
अरण्यों में शान्ति तो मिटती जा रही,
वातानुकूलित कक्षों में , शान्ति खोजता हूं।
प्रतिभा,चतुरता व कुशलता सभी,
हैं कायरता द्वारा रक्षित ,
मिले कहीं निडरता,उसे खोजता हूं।
मम्मी मिलीं हैं , मैया खोजता हूं।
वाइफ नहीं, धर्मपत्नी खोजता हूं।
              प्रेमिका नहीं गृहलक्ष्मी खोजता हूं। 
वोटों की खातिर नेता, आते रहते हैं अक्सर,
मैं तो आज फिर से, बापू को खोजता हूं।
मेरी खोज में, सहायक हो ऐसा,
            अपने लिए, एक साथी खोजता हूं। 

जब भी तू आयेगी, स्वागत करुंगा मैं


चाहत
           

जानता हूं मैं, चाहत नहीं हूं तेरी।
कह नहीं सकता,चाहत है तू मेरी।।


चाहत तो चक्कर है,समझ कौन इसको पाया?
जिसने भी, जिसको चाहा,उसने उसको ठुकराया।
ठोंकरें भी लेकिन,सुनो, बुरी नहीं मानी गईं,
जितना जो ठुकराया, उतना ज्ञान उसने पाया।


तू भी मुझको ठुकराले,बुरा नहीं मानूंगा।
प्यार मिले तुझको , मैं रार नहीं ठानूंगा।
चाहत  हो तेरी  जहां, जहां तू खुश रहे,
मैं तो तेरी खुशियों में, अपनी खुशी पा लूंगा।


तेरी चाहत तुझे मिले, दुआ यही करुंगा मैं।
पुष्प मिलें, तुझको, कांटों पै चलूंगा  मैं।
चाहत नहीं है मेरी, इसके सिवा और कुछ,
जब भी तू आयेगी, स्वागत करुंगा मैं।


Monday, March 14, 2011

सरस्वती का चीर-हरण कर, मन्दिर उसका बनवाते हो.


षड्यन्त्रो   के  घेरे   में  घिर

षड्यन्त्रो   के  घेरे   में  घिर,  कैसे, मौन रहा जा सकता ?
संघर्ष किया है हमने हर पल,कैसे आज सहा जा सकता?
खुश हो लो तुम यही समझकर, अभिव्यक्ति को दबा चुके हो.
शालीनता के आवरणों से, सत्य को नहीं ढका जा सकता ?


लोकतन्त्र के गाने गाकर लोकतन्त्र को दफनाते हो.
बातें तो सुन्दर करते हो, जातिवाद को पनपाते हो.
कहते कुछ और करते कुछ हो, सबको ही है मूरख समझा,
जन को इधर-उधर उलझाकर, भ्रष्टाचार को अपनाते हो.




अभिव्यक्ति को दबा के प्यारे, कैसे चैन से रह पाओगे?
निजी स्वार्थ हित भ्रष्ट हुए, फिर कैसे जन को अपनाओगे?
भ्रष्टाचार को गले लगाकर, संस्था का हित किसने साधा?
चापलूसों के घेरे में घिर, क्या सुधार तुम कर पाओगे ?

परीक्षाओं में नकल कराकर, परिणाम दिखाकर इठलाते हो.
सरस्वती का चीर-हरण कर, मन्दिर उसका बनवाते हो.
शत-प्रतिशत हो रजेल्ट भले ही, देश को क्या तुम दे पाओगे?
छात्रों को जब समझ आयेगी, उनसे बस गाली पाओगे.

Sunday, March 13, 2011

नव वसन्त तब ही महकेगा.

नव वसन्त
                            

बच्चे हैं  भारत  का गौरव
कितना भरा है इनमें शौरभ
मन्द-मन्द ये करते कलरव
कल को  बन जायेंगे पौरव.


ये हैं भारत भाग्य विधाता
भेदभाव इनको ना आता
इतने बच्चे एक अहाता
एक गान हर बच्चा गाता.


पढ़े  न कोई  भारत दर्शन
बच्चों के ही कर ले दर्शन
इनमें छुपे सुभाष और वर्मन
इनमें  ही  हैं गान्धी सरवन.


जहां-जहां है इनका पहरा
स्नेह मिलेगा वहीं पै गहरा
चांद भी देखन को है ठहरा
चरण-स्पर्श को सागर लहरा.


 कैसे  हम  नव-वसन्त मनाएं
जब बच्चे भूखे सो जाएं
कागज  बीने रोटी खाएं
फुटपाथों पर रात बिताएं.


आओ इनको गले लगाकर 
इनके कष्टों को अपनाकर
सबको ही शिक्षा दिलवाकर
इन्हें बनायें हम रत्नाकर.


घर-घर स्वत: रंग बिखरेगा
भारत  सोता हुआ जगेगा
अन्धकार  भी दूर  भगेगा
नव वसन्त तब ही महकेगा.

राष्ट्रप्रेमी हस्ती भी तेरी नहीं


समर्पण
              
यह तन न था तेरा कभी
यह मन न था तेरा कभी
नहीं यह पन्थ भी तेरा नहीं
कर दें समर्पण राष्ट्र को।
    न  यह  मेरा  प्राण  है
     इसका न मुझको त्राण है
      नहीं यह बुद्धि भी तेरी नहीं
     कर दे समर्पण  राष्ट्र को।
जो कुछ मिले जो कुछ फले          
जो भेंट में तुझको मिले             
नहीं यह वेश भी तेरा नहीं
कर दे समर्पण राष्ट्र को।
                 न  यह  तेरा  है  परिवार
                      न यह बंगला न यह कार
                  नहीं यह बहार भी तेरी नहीं
                कर  दे समर्पण राष्ट्र को।
जितना भी है वैभव तेरा 
बना ले कितने तम्बू डेरा
राष्ट्रप्रेमी हस्ती भी तेरी नहीं
कर दे समर्पण राष्ट्र को।

Friday, March 11, 2011

वह दीप जलता हृदय किसका ?


वह दीप
              
वह दीप
 जलता हृदय
 किसका ?
              विरह विदग्ध
              नायिका का
              या मारा गया
             जिसका पति है
           आतंकवादियों द्वारा।
  
  वह दीप         
          प्रसन्नता या क्षोभ
    किसका ?
           विलासी आत्मा का
              या पेट के लिए जूझती
            रात को भी अविरल
           काम करती परम आत्मा का।


  वह दीप
    किसका ?
          बच्चे के जन्म पर
          मनाई जाने वाली
     दीवाली का
                   या आतंकवादियों के शिकार 
            बच्चे के मातम का।

Thursday, March 10, 2011

बचपन का कवि ----------दो-पद


            चौरी संग बरजोरी


जमुना कैसे जाऊं री।
कुञ्ज गली या वृन्दावन की राह कैसे मैं पाऊं री।
श्री दामा और मनसुख, मेरी हंसी उड़ावें री।
झट से झटके मोरी बैंया तनिक दया नहीं लावें री।
कंकड़ मारें फट जाय चोली मोरी एक न माने री।
चौरी संग बरजोरी, श्याम बिन पल भी चैन न पाऊं री।        
राष्ट्रप्रेमी दरशन की तड़पन, कैसे तुझको समझाऊं री।।

मैं तो करूं वृन्दावन वास।
वृन्दा सखी को धाम करे सबकी ही पूरी आस।
रमण बिहारी रमण करत हैं और करत हैं रास।
यमुना तेरे चीर हरण पर मेरो बने निवास।
वृन्दावन की मधुर कल्पना,राधा के दरसन की आस।
राष्ट्रप्रेमी  दरसन कौ भूखौ,यमुना जल से बुझेगी प्यास।।
                       

Sunday, March 6, 2011

नकल के गुर सिखलाओ


मैरिट
         डॉ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

प्रधानाध्यापक ने ,
अध्यापक को बुलाया
फरमाया,
हमारा विद्यालय,
लाखों में एक है,
नगर की जनता की,
यही एक टेक है।
इस बार,
प्रान्त में,
कीर्ति ध्वजा फहरानी है,
सबसे अधिक मैरिटें लानी हैं।

बच्चों को सातवीं में,
आठवीं का,
नवीं में दसवीं का,
पाठयक्रम पढ़ाओ,
नकल के गुर सिखलाओ,
तभी वेतन-वृद्धि पाओ,
अन्यथा
गेट से बाहर हो जाओ।

Saturday, March 5, 2011

भावनाएं प्रज्वलित कर चन्दा उगाहना


धर्म
        

मन्दिर,
मस्जिद व चर्च का
नाम लेकर,
भावनाएं प्रज्वलित कर
चन्दा उगाहना 
ए.सी. लगवाना
कंचन व कामिनी के साथ
भगवा हो जाना
दंगे कराना
वोटों का व्यापार कर
मन्त्री बन जाना।

Friday, March 4, 2011

राहत के नाम पर कमीशन खाया है


ठूंठ
                                           
सूखे के बाद
आई बरसात
जन-मन-गण के खिले गात
सूखे विटपों पर
आए हरे पात
तू बता
क्यूं अब तक ठूंठ?
बोलना मत झूंठ
मौन!
 अच्छा, समझा,                                 
तू है,आदमजात
बहुत कुछ छुपाया है,
राहत के नाम पर कमीशन खाया है
किन्तु, बन्धु
अब तो, समय चुनाव का आया है।