Tuesday, May 28, 2019

एक समीक्षा

जनता से प्रश्न पूछते आलेख- आखिर क्यों? कब तक?

                                                                              डाॅ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

‘‘श्रमिक संगठनों की भूमिका संदेहास्पद हो जाने के कारण आज यहां हजारों घर के चूल्हे ठण्डे होते जा रहे हैं। जनोपयोगी संसाधन दिन पर दिन महंगे होते जा रहे हैं, हमारी संसद मौन है। आने वाले समय में बेकारी, बेरोजगारी बढ़ने के लक्षण साफ-साफ दिख रहे हैं, फिर भी हम सभी मौन हैं, आखिर क्यों? कब तक?’’ संदर्भित पंक्तियाँ कवि, लेखक, पत्रकार, जुझारू कर्मयोगी व बहुमुखी प्रतिभा के धनी डाॅ. भरत मिश्र प्राची के निबंध संग्रह ‘सत्ता संघर्ष’ के निबंध- ‘विपक्ष की भूमिका नगण्य होती जा रही है’ के अंतिम अनुच्छेद की हैं। उक्त पंक्तियाँ ही व्यवस्था के प्रति डाॅ. प्राची जी के असंतोष को मुखर करने के लिए काफी हैं। श्री प्राची जी को लगता है कि संसद मौन है। निःसन्देह प्राची जी की पीड़ा प्रासंगिक है। संसद में सासंदों को जिस काम के लिए चुनकर भेजा जाता है, वह काम तो होता ही नहीं है। संसद में शोर-शराबा होता है, आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, गाली-गलोज भी होती हैं, कभी-कभी मारपीट की नौबत भी आ जाती है; किंतु जनता के मुद्दों पर, संसद में आये प्रस्तावों पर कोई सार्थक बहस नहीं होती। अधिकांश कानून व प्रस्ताव समय की कमी के कारण बिना बहस के ही पारित हो जाते हैं। हम सभी मौन हैं। हमारे सभी के अपने-अपने स्वार्थ हैं, हमारे सभी के अपने-अपने भय हैं। अतः हम भी सब कुछ देखकर भी नजरअंदाज करते हैं या हम हताश हो गए हैं कि हमारे कुछ बोलने या न बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। श्री प्राचीजी का प्रश्न आखिर कब तक? का उत्तर शायद जनता देने लगी है। लोकसभा के चुनावों में भी पंचायत चुनावों की तरह बंपर मतदान इस बात का प्रतीक है कि जनता अपने तरीके से बोल रही है। उच्च न्यायालयों में जन हित से जुड़ी याचिकाओं की संख्या भी इस प्रश्न का उत्तर दे रही है, आखिर कब तक? हम चुप रहेंगे। बहुत हो चुका।
       30 अप्रेल 2019 को विद्यालय के ग्रीष्मकालीन अवकाश प्रारंभ होने वाले थे। मेरे विद्यालय का पुस्तकालय भी बंद होने वाला था। प्रतिवर्ष की तरह ग्रीष्मकाल के दो माह में अध्ययन के लिए कुछ पुस्तकें निकालकर रखने के उद्देश्य से पुस्तकालय में पुस्तक चयन कर रहा था। इसी क्रम में डाॅ. प्राची जी की पुस्तक ‘सत्ता-संघर्ष पर नजर पड़ी। प्राची जी के नाम के आकर्षण से ही तुरंत पुस्तक उठा ली। डाॅ प्राची जी से उनकी पत्रिका कंचनलता के माध्यम से, मेरा परिचय मेरे विद्यार्थी जीवन, जब मैंने लेखन का प्रारंभ ही किया था से है। डाॅ. प्राची जी को अपना मित्र तो नहीं कह सकता, क्योंकि वे मुझसे काफी बड़े हैं। मैंने उनसे समय-समय पर मार्गदर्शन प्राप्त किया है। अतः उन्हें में अपने मार्गदर्शक ही कह सकता हूँ। मैं प्रत्यक्ष रूप से आज तक उनसे नहीं मिला, किंतु लेखन के माध्यम से काफी लंबे समय से जानता हूँ। पुस्तक ‘सत्ता-संघर्ष’ से उन्हें और भी अधिक जानने का मौका मिला। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मेरा विचार बन रहा था कि प्राची जी कांग्रेसी हैं किंतु पुस्तक के अंतिम निबंध ‘प्रजातंत्र में राजतंत्र की उभरती छाया’ तक स्पष्ट हो गया कि सच्चा लेखक व पत्रकार किसी राजनैतिक विचारधारा का गुलाम नहीं होता। डाॅ. प्राची जी कैसे हो सकते हैं, ‘नेहरूवादी संस्कृति से गांधीवादी संस्कृति के पैमाने में सिमटे परिवारवाद की कांग्रेसी लहर तो बिहार में लालू-राबड़ी के बीच चल रही सरकार के बीच जनता दल की पतवार, हरियाणा में देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चैटाला सरकार के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता चोटाला परिवार, चैधरी चरण सिंह के बाद सत्ता की गेंद सम्भाले अजीतसिंह जैसे आज देश के अनेक नाम हैं, जहाँ परिवारवाद तेजी से फल-फूल रहा है’ परिवार वाद पर चोट करते समय डाॅ. प्राची की कलम ने किसी के प्रति कोई नरमी नहीं बरती।
      ‘सत्ता-संघर्ष’ नाम से भले ही यह प्रकट होता हो कि पुस्तक में सत्ता के लिए किये जाने वाले षड्यंत्रों को उजागर किया गया होगा किंतु पुस्तक वास्तव में एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें विभिन्न रंगों के फूलों को सजाया गया है। लेखक के पारंपरिक विचार प्रवाह को भी गिनती में लें, तो पुस्तक में कुल 41 आलेख हैं। नाम के अनुरूप अधिकांश आलेख राजनीति अर्थात सत्ता के इर्द-गिर्द विषयों पर ही लिखे गए हैं। इसके बावजूद ‘शिक्षा, शिक्षक एवं शिक्षार्थी में बढ़ती दूरी’, ‘शिक्षा आपके द्वारा फिर भी अंधकार’ जैसे आलेखों को सम्मिलित कर विविधता भी प्रस्तुत की है। वास्तविकता तो यही है कि डाॅ. प्राची सभी आलेखों में ही हमें एक शिक्षक के रूप में शिक्षा देते, प्रेरणा देते, प्रश्न पूछते और मार्गदर्शन देते नजर आते हैं।
             पुस्तक सत्ता-संघर्ष केवल सत्ता तक ही सीमित नहीं है। इसमें देश की समस्याओं को बखूबी उकेरा गया  है। यही नहीं आर्थिक उदारवाद, बाजारवाद, विनिवेशन, निजीकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हुए जनता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर लेखक की पीड़ा लगभग प्रत्येक निबंध में महसूस की जा सकती है। लेखक उदारीकरण के कारण घरेलू उद्योगों को होने वाले नुकसान को लेकर ही नहीं, श्रमिकों को लेकर भी चिंतित हैं। लेखक ने युद्ध की विभीषिका पर भी अपने विचार व्यक्त किए है। लेखक के अनुसार युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आतंकवाद के कारणों का पता लगाकर उनके निराकरण से ही आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है। डाॅ. प्राची जी की पुस्तक सत्ता-संघर्ष के साथ-साथ सत्ता के लिए संघर्षरत पाटियों को मार्गदर्शन भी प्रदान करती है। उनके विचार में भाजपा और कांग्रेस में कोई मूलभूत अंतर नहीं है।
       सत्ता-संघर्ष में इतने विषय समाहित हैं कि उन सबकी गणना करवाना भी इस संक्षिप्त समीक्षा में संभव नहीं है। कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय, सराहनीय व अनुकरणीय है। सामान्यतः आलेख पाठकों को बांध सकने में सफल नहीं हो पाते किंतु लेखक ने छोटे-छोटे आलेख प्रस्तुत कर पाठक को बोर होने से बचा लिया है। कविता की अपेक्षा गद्य में पाठकों को बांधे रखना मुश्किल काम होता है। लेखक के पास किंतु और परंतु भी नहीं होते कि उसे तुकबंदी या लय मिलाने के लिए ऐसा करना पड़ा या छंद की मात्रा पूरी करने के लिए शब्द के साथ खेलना पड़ा। भारतीय मनीषी आचार्य वामन का मत है, ‘गद्यं कवीनां निकषं वदंति।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, गद्य कवियों या लेखको की कसौटी है तो निबंध गद्य की भी कसौटी है। मेरे विचार में डाॅ. प्राची जी के निबंध इस कसौटी पर एकदम सही उतरते हैं।

जवाहर नवोदय विद्यालय, महेंद्रगंज, दक्षिण पश्चिम गारो पहाड़ियाँ, मेघालय-794106

Monday, May 20, 2019

गर्व करने की बात

  मुंह छिपाने की नौबत क्यों?

                                   
सर्व प्रथम में अपनी फेवरेट लेखिका श्रीमती मृदुला सिन्हा से माफी मांगता हूँ कि मैंने उनके लिखे हुए विषय पर लिखने का दुस्साहस किया। महिला लेखिकाओं में अमृता प्रीतम के बाद मृदुला सिन्हा मेरी चहेती(फेवरेट) लेखिका हैं। इन दोनों का लिखा हुआ, जहाँ भी मिल जाता है। पढ़ने के लोभ को नियंत्रित नहीं कर पाता या यूँ कहूँ कि नियंत्रित करना ही नहीं चाहता। अमृता प्रीतम के लेखन में कहीं भी झूठ या छिपाव नहीं है। उन्होंने जो लिखा है, वह जिया है। लिखना और, और करना और, वाला दोगलापन उनमें नहीं है। वे केवल आदर्श की बात नहीं करतीं, व्यवहार में जो है, सो है। यथार्थ लिखती रही हैं। दूसरी ओर मृदुला सिंहा पारिवारिक चिंतन पर बहुत अच्छा लिखती हैं। इनके लेखन का कायल में इनकी एक ही पंक्ति से हो गया था, जब राजस्थान पत्रिका में कभी पढ़ा था, ‘परिवार समानता के लिए फीता लेकर माप-तौल करने से नहीं चलते।’ यथार्थ यही है। परिवार और समाज कानूनों से नहीं चलते परिवार और समाज का आधार तो भावनात्मक संबंध होते हैं कानून नहीं।
इन दिनों मृदुला जी की पुस्तक, ‘मात्र देह नहीं हैं औरत’ पढ़ रहा हूँ। यद्यपि उनका लिखा हुआ एक-एक शब्द परिवार और समाज के लिए ही नहीं व्यक्ति के लिए भी उपयोगी है। तथापि पुस्तक में से जो भी मुझे अंदर तक प्रभावित करता है, उसे दूसरों के साथ बांटने का प्रयास करता हूँ। आखिर मृदुला जी जिस संस्कृति को विकसित होते देखना चाहती हैं, वह मिल जुलकर रहना ही तो सिखाती है। अतः जो अच्छा लगता है, उसे अपने ब्लाॅग पर भी प्रस्तुत कर देता हूँ। किंतु इस आलेख का आधार वे पंक्तियाँ बनीं, जो मुझे अच्छी नहीं लगीं। जी हाँ! पहली बार है, जो मुझे श्रीमती मृदुला सिंहा का लिखा हुआ कुछ पसंद नहीं आया। उसको भी अपनों के साथ बांटना चाह रहा हूँ।
मृदुला जी की उक्त पुस्तक के आलेख, ‘ मुंह छुपाने की नोबत क्यों?’ की पंक्तियाँ, ‘‘‘ सही माने में ये लड़कियां तो हमारे समाज पर कलंक हैं। तालाब के स्वच्छ जल में विचरण करती असंख्य बड़ी-छोटी मछलियों के बीच चंद सड़ी मछलियां हैं। सुगधिंत पके आमों की टोकरियों में एक सड़ा आम है। लाखों युवतियों द्वारा जीवन जगत में किए जा रहे जीवन जगत में किए जा रहे निरंतर संघर्ष पर धब्बा हैं।’’ मेरे विचार में सही नहीं है। हालांकि इतनी बड़ी लेखिका के लेखन पर प्रश्न चिह्न लगाने की मेरी औकात नहीं है किंतु किसी भी विषय पर अपने विचार प्रकट करने का प्रयास तो कर ही सकता हूँ। इसका बुरा शायद वे भी नहीं मानेंगी। कोई भी व्यक्ति कभी भी कलंक नहीं हो सकता। व्यक्ति कोई गलती कर सकता है। व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कृत्य परिवार और/या समाज के मानकों के हिसाब से अनुचित हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह व्यक्ति समाज के लिए कलंक हो गया। व्यक्ति जीवन में लगातार कर्म करता ही रहता है। उनमें से कुछ कर्म समाज के लिए अच्छे होते हैं और समाज उन पर गर्व करता है। व्यक्ति को पुरस्कृत करता है। कुछ कर्म समाज के मानकों के हिसाब से अनुचित हो सकते हैं। इसके लिए परिवार और समाज में निंदा या प्रताड़ना ही नहीं कभी-कभी तो सजा की भी व्यवस्था होती है। किंतु ये प्रशंसा या निंदा कर्मों की होती है। व्यक्ति को कभी भी कलंक जैसे शब्द से नहीं नवाजा जाना चाहिए। हमें स्मरण रखना होगा कि कभी-कभी गलती से हमारे पैर कीचड़ में पड़ जाते हैं, तो हम अपने पैरों को नहीं काट फेंकते। हम साफ पानी से कीचड़ को साफ करते हैं और फिर आगे की ओर चल पड़ते हैं।
मृदुला जी ने उक्त आलेख ‘मुह छुपाने की नोबत क्यों?’लड़कियों के देह व्यापार में या सेक्स संबंधों में फंसने को लेकर लिखा है। संदर्भित पंक्तियाँ भी देह व्यापार में धकेली हुई या जा रहीं या शौकीन लड़कियों के लिए प्रयोग की हैं। यहाँ पर स्मरण रखना होगा कि कोई भी व्यापार केवल विक्रेता से नहीं चलता। विक्रेता को ग्राहकों की भी आवश्यकता पड़ती है। यदि ये लड़कियाँ देह व्यापार में फंस गई हैं और मुंह दिखाने के काबिल नहीं हैं तो उनके ग्राहकों को भी इसी श्रेणी में आना चाहिए। वैसे इतिहास में कोई भी काल ऐसा नहीं मिलेगा, जब देह व्यापार की उपस्थिति न मिलती हो। यह एक अनिवार्य बुराई है। चंद रूपयों या उपहारों के लालच में सामान्य घरों में भी इस प्रकार के संबंध बनाने की बातें सुनी जाती रहती हैं। इस प्रकार की घटनाओं को पूर्णतः रोका जाना संभव ही नहीं है। संक्षिप्त रूप से विचार करें तो बहुत कम महिलाएं होंगी जो स्वच्छा से इस पेशे में उतरती होंगी। कुछ को जबरदस्ती इस पेशे में धकेल दिया जाता है। 
समाज व सरकार को यह भी विचार करना चाहिए कि जिस बुराई को समाप्त नहीं किया जा सकता। उसको नियंत्रित करने के लिए क्यों न उसका नियमितीकरण कर दिया जाय? क्यों न कानून बनाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाय? क्यों न इस कार्य को भी एक पेशा घोषित कर दिया जाय? इस संबन्ध में मेरा कोई निश्चित स्थिर मत नहीं है किंतु जिसको आदि काल से ही रोका जाना संभव नहीं हुआ है। वह अब कैसे होगा? हमारी स्वर्ग की कल्पना में भी अप्सराओं का अस्तित्व है तो जन्नत की कल्पना भी हूरों से ही प्रारंभ होती है। अब तो वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर कोई भी बालिग स्त्री पुरूष किसी के साथ भी रह सकता है। लिव इन रिलेशनशिप को भी लगभग कानूनी रूप से स्वीकार कर लिया गया है। वैयक्तिक स्वतंत्रता के नाम पर सभी प्रकार की छूटें दी जा रही हैं। ऐसी स्थिति में कानूनन इस प्रकार के कृत्यों को रोका जाना संभव नहीं है। अच्छा यही होगा कि इस प्रकार के पेशे में लगे महिला पुरूषों को कानूनी संरक्षण प्रदान करते हुए उन्हें स्वास्थ्य संबंधी न्यूनतम सुविधाएं सुनिश्चित की जायं। वे भी अपनी हीन भावना से निकल कर एक सम्मानित जीवन की अनुभूति कर सकें।
              वर्तमान समय में देखने में आ रहा है कि केवल रेड लाइट ऐरिया में ही यह कार्य नहीं हो रहा। हमारे-आपके आसपास भी इस प्रकार के लोग हैं जो इन कार्यो में लिप्त पाये जाते हैं। वर्तमान समय में वैश्या शब्द का स्थान काॅलगर्ल लेने लगी हैं। इनमें से कुछ तो मजबूरी में इस काम में प्रवेश करती हैं। समाचारों के अनुसार कुछ को ब्लेकमेल करके उनके ही बाॅयफ्रेण्ड इस दलदल में धकेल देते हैं। इसका मूल कारण चकाचैंध और ग्लेमर की जिंदगी की ओर आकर्षण भी है। वर्तमान में नयी पीढ़ी रातोंरात धनी हो जाना चाहती है। एक गरीब परिवार के लड़के-लड़कियों को स्मार्टफोन क्यों चाहिए? मेरी समझ में नहीं आता। टी.वी., लेपटाॅप ओर स्मार्टफोन परिवार व समाज को कमजोर कर रहे हैं। लालच, आकर्षण और गरीब व मध्यम वर्ग में बढ़ती विलासिता की प्रवृत्ति लड़कियों को इस जाल में आसानी से फंसा देती है। इंटरनेट पर पढ़े गये एक समाचार के अनुसार एक व्यक्ति अपने मनोंरंजन के लिए बाजार से अपने फोन में कुछ पोर्न फिल्में डलवाकर लाया था। जब उसने घर में आकर देखा तो एक फिल्म में तो उसकी अपनी पत्नी ही थी। ऐसी घटनाओं के लिए भी हमें तैयार रहना होगा।
मृदुला जी के अनुसार, ‘‘दरअसल, मां-बाप बच्चियों और समाज पर दोषारोपण करके अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। अपनी बेटियों को संस्कारित करना, उन्हें अंगुली पकड़कर सही राह पर चलाना अभिभावक का दायित्व है। इतनी-भर स्वतंत्रता उन्हें जरूर मिलनी चाहिए कि वे अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लें। परंतु उन निर्णयों में मां-बाप और शिक्षक की सहायक या परामर्शदाता की भूमिका रहनी ही चाहिए।’’ निश्चित रूप से लड़के या लड़कियाँ बुरी संगत या बुरी आदतों में फंस रहे हैं तो उसके लिए परिवार भी नहीं परिवार ही जिम्मेदार है। आज लोगों के पास अपने बच्चों के लिए समय नहीं है। लोग टीवी, कम्प्यूटर, लेपटाॅप और स्मार्ट फोन पर इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उनके बच्चे जब उनसे बात करना चाहते हैं, तब वे अपने बच्चों को समय ही नहीं देते। बच्चे भी फिर अपना समय अलग गतिविधियों में लगाने लगते हैं तो हमारे पास पछताने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता। अतः हमें भटकी हुई लड़कियों या लड़कों के लिए कंलक शब्द न प्रयोग करके इस प्रकार की व्यवस्था पर विचार करना होगा कि वे अपनी भटकन से बाहर निकल कर पुनः सामान्य राह पर आ सकें। उन्हें कलंकित कह कर तो हम उन्हें आत्महत्या या विद्रोह की ओर धकेल रहे होते हैं। हमें उनमें आत्मविश्वास और साहस जगाने की आवश्यकता है कि वे न केवल उस दलदल से बाहर निकल सकें वरन् यह स्वीकार भी कर सकें कि हम इसमें फंस गर्यी थीं या फंस गये थे किंतु अपने प्रयासों के बल पर हम उससे बाहर आने में सफल रहे और हमें अपने आप पर गर्व है कि हम अपने प्रयासों में सफल रहे। अपनी गलतियों को स्वीकार करके उनसे बाहर निकलना बहुत बड़े साहस का काम है और यह शर्म की नहीं गर्व करने की बात होनी चाहिए। तभी सुधार प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी।
हमें सेक्स अपराधों से पीड़ित व्यक्तियों को कलंक कहने की प्रवृत्ति से बचना होगा। इसी प्रवृत्ति के कारण पीड़िताएं आत्कहत्या कर लेती हैं। हमें व्यक्ति, परिवार और समाज की सोच को बदलना होगा। हमें समझना होगा कि पीड़िता या पीड़ित कलंक नही है। दोषी तो अपराधी है, पीड़ित को कलंक नहीं कहा जाना चाहिए। लड़कियां इस दलदल में फंस भी गई हैं, तो भी वे दोषी नहीं हैं, व्यवस्था  ही दोषी है, परिवार और समाज दोषी है। यदि कोई बलात्कार से पीड़ित या इस धंधे में धकेल दी गई युवती आत्महत्या करती है तो उसका दोष हम सभी पर है, जो इस प्रकार का वातावरण बना दिया है कि वे अपने आपको कलंक समझने लगती हैं। इस व्यवस्था मंे सुधार की आवश्यकता है। जिन्होनंे गलती की है या जो फंस गये हैं और उससे बाहर निकलना चाहते हैं तो ऐसा वातावरण बनना चाहिए कि गलती को सुधार लेना गर्व करने वाली बात है। मुंह छुपाने वाली बात नहीं।                
                    
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Sunday, May 19, 2019

स्वतंत्रता

‘‘ दरअसल, मां-बाप बच्चियों और समाज पर दोषारोपण करके अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते। अपनी बेटियों को संस्कारित करना, उन्हें अंगुली पकड़कर सही राह पर चलाना अभिभावक का दायित्व है। इतनी-भर स्वतंत्रता उन्हें जरूर मिलनी चाहिए कि वे अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लें। परंतु उन निर्णयों में मां-बाप और शिक्षक की सहायक या परामर्शदाता की भूमिका रहनी ही चाहिए।’’
‘‘ सही माने में ये लड़कियां तो हमारे समाज पर कलंक हैं। तालाब के स्वच्छ जल में विचरण करती असंख्य बड़ी-छोटी मछलियों के बीच चंद सड़ी मछलियां हैं। सुगधिंत पके आमों की टोकरियों में एक सड़ा आम है। लाखों युवतियों द्वारा जीवन जगत में किए जा रहे जीवन जगत में किए जा रहे निरंतर संघर्ष पर धब्बा हैं।’’
                                              मृदुला सिन्हा के         निबंध मुंह छुपाने की नोबत क्यों? से

Thursday, May 16, 2019

एक फजूल दौड़

 विरोधाभासों की जिंदगी





स्त्री को पूजनीया मानने वाले समाज ने स्त्री के लिए बहुत सारी विसंगतियां खड़ी कर रखी हैं। विरोधाभासों की जिंदगी जी रहे हैं हम। एक ओर स्त्री पूजनीया है, तो दूसरी ओर सबसे अधिक अत्याचार और उत्पीड़न की भागीदार! मनो उसे देवी बनाना है या दासी, हमने इसका निर्णय ही नहीं किया है या सदियों से पुरुष की दासता भुगतती नारी स्वयं अपनी पहचान नहीं कर पा रही है। जो अपनी शक्ति पहचानती है, वह सारे बंधन तोड़कर पुरुष से आगे निकलने की होड़ में एक फजूल दौड़ में उलझ गयी हैं। इस दौड़ में उन्होंने अपने शरीर और मन के तकाजे और माँगों को भी ताक पर रख दिया है। इस दौड़ में उन्हें न माँ बनने की सुध है, न बच्चो की देखभाल से प्राप्त आनंद की सुध। उनका बस चले तो बराबरी की दौड़ में वे पुरुष को ही माँ बनने के लिए बाध्य करें। ऐसा करते हुए इन्हें यह स्मरण नहीं कि प्रकृति प्रदत्त यही एक विशेष गुण है, जो उसे पुरुष से विशेष बनाता है। मातृत्व उसे आनंद भी देता है और सीधे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के साथ खड़ी कर देता है।
                                                                 मातृत्व का अधिकार- मृदुला सिन्हा से साभार

Wednesday, May 15, 2019

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-४१

परिवार और रिश्तेदारों द्वारा दिये गये धन की सूची


नाम                                         वजन                             अनुमानित कीमत

दो सोने के सैट                        6 तोला                              1,68000/-रूपये
आठ सोने की चूड़ी                  4 तोला                               1,12000/-रूपये
दो अँगूठी सोने की                  2 तोला                                 56000/-रूपये
दो सोने की चैन                      2 तोला                                56000/-रूपये
दो जोड़ी चाँदी की पायल        200 ग्राम                             10000/-रूपये
कपड़े, साड़ी सूट आदि                                                     1,00000/-रूपये

उक्त काल्पनिक वस्तुओं के अतिरिक्त न्यायालय से अन्य अनेक दावे भी किये गये थे।

5. उपार्जनों से हानि की बाबत दावा की गयी रकम                             4,00000/- रूपये
6. चिकित्सकीय खर्चो की वावत एकमुश्त राशि                                 3,00000/-रूपये
7. आवेदिका के नियंत्रण में से हटायी गयी सम्पत्ति के नाश
, नुकसान एवं हटाये जाने के कारण हुई हानि के वावत                            60000/-रूपये
8. शारीरिक व मानसिक उपहति हेतु प्रतिपूर्ति की रकम
जिसके निशान शरीर पर होने का दावा भी किया गया था                          8,00000/-रूपये
9. गृहस्थी के खर्चा भरण-पोषण कपड़ा आदि हेतु प्रति माह                   60000/-रूपये मासिक
10. मुकदमें की पैरवी एवं वकील अधिवक्ता हेतु 
रकम प्रतिमाह की दर से                                                                         20000/-रूपये मासिक
11. इसके अतिरिक्त मानसिक, भावनात्मक, मानसिक, भावनात्मक
व सामाजिक संताप और कष्ट की क्षतिपूर्ति हेतु एकमुश्त                          5,00000/-रूपये 

मनोज कोर्ट में दायर याचिका की प्रति को बार-बार पढ़कर यही आश्चर्य करता कि लोगों का लालच कितना बड़ा हो सकता है। मनोज के साथ इस प्रकार का झूठा मुकदमा हाने से पूर्व वह विश्वास नहीं कर पाता था कि ऐसे दो व्यक्ति जिन्होंने एक साथ जीने मरने की कसम खायी हो। एक साथ नहीं भी रह पाये तो एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमे बाजी और मरने मारने को उतारू कैसे हो सकते है? खैर जो हुआ, अच्छा हुआ। जो हो रहा है, वह भी अच्छा ही हो रहा है। जो होगा वह भी अच्छा ही होगा के सूत्र पर विश्वास करने वाला मनोज। अपने खिलाफ कोर्ट में दायर याचिका की प्रति को बार-बार पढ़कर आश्चर्य करता कि कोई औरत इस प्रकार बेसिर-पैर की बातें लिखकर झूठे आरोप लगाकर एक व्यक्ति पर मुकदमा दायर करती है और उस पर भी उसका कहना यह कि वह उसका पति है और उसके साथ रहना चाहती है। कानून के विद्यार्थी के रूप में मनोज ने वे सभी धाराएँ पढ़ रखी थीं, जिनका प्रयोग उसके खिलाॅफ किया गया था। विद्यार्थी के रूप में कानून की सभी धाराएँ उसको महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने के लिए बनाई हुई प्रतीत होती थीं किंतु वास्तविकता तो इसके विपरीत ही थी। अपने प्रेमी को धोखा देकर, कपटपूर्वक शादी रचाकर कुछ मिनटों के नाटक में ही किसी अच्छे-खासे कमाने वाले व्यक्ति को पति के रूप में अपना पालतू गुलाम बनाने का सुन्दर प्रयास किया गया था। केवल उस शातिर औरत ने ही षडयंत्र नहीं रचा था, इस कार्य में उसके भाई का भी पूरा सहयोग था। शातिर दिमाग वाली महिलाएँ किस प्रकार कानून का दुरूपयोग करके अपनी कमाई का रास्ता निकाल सकती हैं? मनोज को इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा था।
  

Monday, May 13, 2019

पुस्तक समीक्षा


 जनता से प्रश्न पूछते आलेख-

                                             आखिर क्यों? कब तक?


                                    
‘‘श्रमिक संगठनों की भूमिका संदेहास्पद हो जाने के कारण आज यहां हजारों घर के चूल्हे ठण्डे होते जा रहे हैं। जनोपयोगी संसाधन दिन पर दिन महंगे होते जा रहे हैं, हमारी संसद मौन है। आने वाले समय में बेकारी, बेरोजगारी बढ़ने के लक्षण साफ-साफ दिख रहे हैं, फिर भी हम सभी मौन हैं, आखिर क्यों? कब तक?’’ संदर्भित पंक्तियाँ कवि, लेखक, पत्रकार, जुझारू कर्मयोगी व बहुमुखी प्रतिभा के धनी डाॅ. भरत मिश्र प्राची के निबंध संग्रह ‘सत्ता संघर्ष’ के निबंध- ‘विपक्ष की भूमिका नगण्य होती जा रही है’ के अंतिम अनुच्छेद की हैं। उक्त पंक्तियाँ ही व्यवस्था के प्रति डाॅ. प्राची जी के असंतोष को मुखर करने के लिए काफी हैं। श्री प्राची जी को लगता है कि संसद मौन है। निःसन्देह प्राची जी की पीड़ा प्रासंगिक है। संसद में सासंदों को जिस काम के लिए चुनकर भेजा जाता है, वह काम तो होता ही नहीं है। संसद में शोर-शराबा होता है, आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, गाली-गलोज भी होती हैं, कभी-कभी मारपीट की नौबत भी आ जाती है; किंतु जनता के मुद्दों पर, संसद में आये प्रस्तावों पर कोई सार्थक बहस नहीं होती। अधिकांश कानून व प्रस्ताव समय की कमी के कारण बिना बहस के ही पारित हो जाते हैं। हम सभी मौन हैं। हमारे सभी के अपने-अपने स्वार्थ हैं, हमारे सभी के अपने-अपने भय हैं। अतः हम भी सब कुछ देखकर भी नजरअंदाज करते हैं या हम हताश हो गए हैं कि हमारे कुछ बोलने या न बोलने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला। श्री प्राचीजी का प्रश्न आखिर कब तक? का उत्तर शायद जनता देने लगी है। लोकसभा के चुनावों में भी पंचायत चुनावों की तरह बंपर मतदान इस बात का प्रतीक है कि जनता अपने तरीके से बोल रही है। उच्च न्यायालयों में जन हित से जुड़ी याचिकाओं की संख्या भी इस प्रश्न का उत्तर दे रही है, आखिर कब तक? हम चुप रहेंगे। बहुत हो चुका।
      30 अप्रेल 2019 को विद्यालय के ग्रीष्मकालीन अवकाश प्रारंभ होने वाले थे। मेरे विद्यालय का पुस्तकालय भी बंद होने वाला था। प्रतिवर्ष की तरह ग्रीष्मकाल के दो माह में अध्ययन के लिए कुछ पुस्तकें निकालकर रखने के उद्देश्य से पुस्तकालय में पुस्तक चयन कर रहा था। इसी क्रम में डाॅ. प्राची जी की पुस्तक ‘सत्ता-संघर्ष पर नजर पड़ी। प्राची जी के नाम के आकर्षण से ही तुरंत पुस्तक उठा ली। डाॅ प्राची जी से उनकी पत्रिका कंचनलता के माध्यम से, मेरा परिचय मेरे विद्यार्थी जीवन, जब मैंने लेखन का प्रारंभ ही किया था से है। डाॅ. प्राची जी को अपना मित्र तो नहीं कह सकता, क्योंकि वे मुझसे काफी बड़े हैं। मैंने उनसे समय-समय पर मार्गदर्शन प्राप्त किया है। अतः उन्हें में अपने मार्गदर्शक ही कह सकता हूँ। मैं प्रत्यक्ष रूप से आज तक उनसे नहीं मिला, किंतु लेखन के माध्यम से काफी लंबे समय से जानता हूँ। पुस्तक ‘सत्ता-संघर्ष’ से उन्हें और भी अधिक जानने का मौका मिला। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मेरा विचार बन रहा था कि प्राची जी कांग्रेसी हैं किंतु पुस्तक के अंतिम निबंध ‘प्रजातंत्र में राजतंत्र की उभरती छाया’ तक स्पष्ट हो गया कि सच्चा लेखक व पत्रकार किसी राजनैतिक विचारधारा का गुलाम नहीं होता। डाॅ. प्राची जी कैसे हो सकते हैं, ‘नेहरूवादी संस्कृति से गांधीवादी संस्कृति के पैमाने में सिमटे परिवारवाद की कांग्रेसी लहर तो बिहार में लालू-राबड़ी के बीच चल रही सरकार के बीच जनता दल की पतवार, हरियाणा में देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चैटाला सरकार के इर्द-गिर्द चक्कर लगाता चोटाला परिवार, चैधरी चरण सिंह के बाद सत्ता की गेंद सम्भाले अजीतसिंह जैसे आज देश के अनेक नाम हैं, जहाँ परिवारवाद तेजी से फल-फूल रहा है’ परिवार वाद पर चोट करते समय डाॅ. प्राची की कलम ने किसी के प्रति कोई नरमी नहीं बरती।
                ‘सत्ता-संघर्ष’ नाम से भले ही यह प्रकट होता हो कि पुस्तक में सत्ता के लिए किये जाने वाले षड्यंत्रों को उजागर किया गया होगा किंतु पुस्तक वास्तव में एक ऐसा गुलदस्ता है, जिसमें विभिन्न रंगों के फूलों को सजाया गया है। लेखक के पारंपरिक विचार प्रवाह को भी गिनती में लें, तो पुस्तक में कुल 41 आलेख हैं। नाम के अनुरूप अधिकांश आलेख राजनीति अर्थात सत्ता के इर्द-गिर्द विषयों पर ही लिखे गए हैं। इसके बावजूद ‘शिक्षा, शिक्षक एवं शिक्षार्थी में बढ़ती दूरी’, ‘शिक्षा आपके द्वारा फिर भी अंधकार’ जैसे आलेखों को सम्मिलित कर विविधता भी प्रस्तुत की है। वास्तविकता तो यही है कि डाॅ. प्राची सभी आलेखों में ही हमें एक शिक्षक के रूप में शिक्षा देते, प्रेरणा देते, प्रश्न पूछते और मार्गदर्शन देते नजर आते हैं।

                  पुस्तक सत्ता-संघर्ष केवल सत्ता तक ही सीमित नहीं है। इसमें देश की समस्याओं को बखूबी उकेरा गया  है। यही नहीं आर्थिक उदारवाद, बाजारवाद, विनिवेशन, निजीकरण जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हुए जनता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर लेखक की पीड़ा लगभग प्रत्येक निबंध में महसूस की जा सकती है। लेखक उदारीकरण के कारण घरेलू उद्योगों को होने वाले नुकसान को लेकर ही नहीं, श्रमिकों को लेकर भी चिंतित हैं। लेखक ने युद्ध की विभीषिका पर भी अपने विचार व्यक्त किए है। लेखक के अनुसार युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आतंकवाद के कारणों का पता लगाकर उनके निराकरण से ही आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है। डाॅ. प्राची जी की पुस्तक सत्ता-संघर्ष के साथ-साथ सत्ता के लिए संघर्षरत पाटियों को मार्गदर्शन भी प्रदान करती है। उनके विचार में भाजपा और कांग्रेस में कोई मूलभूत अंतर नहीं है।
      सत्ता-संघर्ष में इतने विषय समाहित हैं कि उन सबकी गणना करवाना भी इस संक्षिप्त समीक्षा में संभव नहीं है। कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय, सराहनीय व अनुकरणीय है। सामान्यतः आलेख पाठकों को बांध सकने में सफल नहीं हो पाते किंतु लेखक ने छोटे-छोटे आलेख प्रस्तुत कर पाठक को बोर होने से बचा लिया है। कविता की अपेक्षा गद्य में पाठकों को बांधे रखना मुश्किल काम होता है। लेखक के पास किंतु और परंतु भी नहीं होते कि उसे तुकबंदी या लय मिलाने के लिए ऐसा करना पड़ा या छंद की मात्रा पूरी करने के लिए शब्द के साथ खेलना पड़ा। भारतीय मनीषी आचार्य वामन का मत है, ‘गद्यं कवीनां निकषं वदंति।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, गद्य कवियों या लेखको की कसौटी है तो निबंध गद्य की भी कसौटी है। मेरे विचार में डाॅ. प्राची जी के निबंध इस कसौटी पर एकदम सही उतरते हैं।

Tuesday, January 15, 2019

परीक्षा पर चर्चा


परीक्षा पर जोर देने की आवश्यकता ही नहीं है। हमारे सामने समस्यायें इसलिये पैदा होती है कि हम प्राथमिकताओं का गलत निर्धारण कर लेते हैं। हमें समझना होगा और समझाना होगा कि परीक्षा नहीं सीखना महत्वपूर्ण है। परीक्षा तो एक मापन का यन्त्र है, जैसे- हम दूध पीना चाहते हैं किन्तु हम लीटर को पकड़ लेते हैं, जबकि लीटर नहीं दूध की पौष्टिकता महत्वपूर्ण है। लीटर पर जोर देने के कारण ही मिलावट सामने आती है। ठीक इसी प्रकार परीक्षा पर जोर देने के कारण ही परीक्षायें तनाव का कारण बनती हैं। यही नहीं परीक्षाओं पर अधिक जोर देने के कारण ही अनुचित साधनों का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। वास्तविकता तो यह है कि परीक्षा नहीं सीखना महत्वपूर्ण है। जब हम सीखने पर जोर देंगे, तो सब कुछ आसान हो जायेगा। सीखना आनन्ददायक हो जायेगा। हमें मालुम ही नहीं पड़ेगा कि कब परीक्षा हुई क्योंकि जब आप सीखने पर ध्यान केन्द्रित करेंगे तो परीक्षा तो एक खेल मात्र रह जायेगी। अतः परीक्षा पर चर्चा छोड़कर सीखने पर चर्चा कीजिये। देश के लिये सीखना, समाज के लिये सीखना, परिवार के लिये सीखना, जीवन के लिये सीखना सबसे आगे बढ़कर आनन्द के लिये सीखना, जब सीखना ही महत्वपूर्ण होगा तो परीक्षा तनाव नहीं आनन्द देने लगेगी जिसके लिये किसी तैयारी की आवश्यकता ही नहीं होगी ।

Wednesday, January 2, 2019

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-४०

आनलाइन मैरिज, धोखे से शादी रचाकर दहेज का आरोप लगाकर ठगी करने की कहानियाँ मनोज काफी पढ़ता रहा था किंतु इस तरह की धोखाधड़ी में वह स्वयं ही फंस जायेगा, उसे क्या पता था? जो मनोज कभी दहेज के लेन-देन वाली शादियों में भाग नहीं लेता था। उस पर दहेज के ऐसे संगीन आरोप लगाकर उसे लूटने का प्रयास किया जायेगा। मनोज की कल्पना से परे था। जिस शादी में उसने रूमाल तक स्वीकार नहीं किया था। उसमें कोर्ट के सामने प्रस्तुत याचिका में दहेज में दिये गये सामान की सूची देखकर मनोज का तो सिर ही चकरा गया । जिस तथाकथित पत्नी को मनोज ने अपनी इच्छा से कभी हाथ नहीं लगाया था। हाथ लगाना तो दूर जिसका स्पर्श घृणास्पद लगता था, उसके द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत याचिका में कोर्ट से अपेक्षित आदेशों की सूची किसी भी कल्पना की पराकाष्ठा कही जा सकती है-
1. न्यायालय से माँग की गयी थी कि मनोज के खिलाॅफ इस प्रकार का आदेश पारित किया जाय कि वह किसी भी प्रकार की घरेलू हिंसा न करे और न किसी से करावे। अजीब स्थिति जब घर ही नहीं तो घरेलू हिंसा किस बात की? मनोज मो उस तथाकथित पत्नी का स्पर्श ही नहीं करना चाहता था। उससे हाथ लगाना तो दूर की बात। इसके विपरीत वह कपटी औरत ही उसके दिन के चैन और रातों की नींद हराम किये रहती थी। मनोज को तो अपने बेटे और अपने प्राणों की चिंता ही हर समय सताती रहती थी।
2. न्यायालय में प्रस्तुत याचिका में दूसरी माँग यह की गयी थी कि मनोज को उस तथाकथित पत्नी के निवास स्थान पर प्रवेश करने से रोका जाय। कितनी हास्यास्पद बात थी कि जिस निवास स्थान को मनोज ने शादी से पूर्व ही नहीं देखा था। जहाँ शादी के समय भी उसे जाने का मौका नहीं मिला। उस स्थान पर इस कपटपूर्ण शादी की सच्चाई जानने के बाद वह वहाँ जाने की हिम्मत ही कैसे कर सकता था?
3. न्यायालय से माँग की गयी थी कि वह प्रत्यार्थी अर्थात मनोज को उसी स्तर की आवास सुविधा हेतु जैसी वह स्वयं उपभोग कर रहा है, रूपये 10000 मासिक किराये के रूप में प्रदान करे। जब उस तथाकथित पत्नी के पास इस प्रकार का घर था, जहाँ वह मनोज के प्रवेश को वर्जित करने की माँग कर रही थी तो फिर किराये के घर की क्या आवश्यकता थी। हाँ! आवश्यकता थी क्योंकि शादी का नाटक ही ठगने के लिए किया गया था।
4. मनोज के लिए सबसे हास्यास्पद बात तो यह थी कि जिसने अपने और अपने बेटे के लिए एक रूमाल तक स्वीकार नहीं किया उस पर स्त्रीधन और मूल्यवान वस्तुएँ हड़पने का आरोप लगाते हुए जो सूची प्रस्तुत की गयी थी वह भी मनोरंजक ही थी, जिसके लिए दावा किया गया था कि वह तथाकथित मूल्यवान धन उसके परिवार और रिश्तेदारों द्वारा दिया गया था-

Monday, December 31, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३९

उसका बेटा परीक्षा देकर लगभग 2 बजकर 30 मिनट पर वापस आया। मनोज ने पूरा प्रयत्न किया कि उसका बेटा उसकी चिंताओं को समझ न सके। मनोज ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए दरवाजा खोला। सामान्य होकर बेटे से परीक्षा के बारे में पूछताछ की। किंतु वह बेटा ही क्या ? जो अपने पिता के चेहरे से उसकी चिंताओं को न पढ़ सके। प्रभात मनोज के चेहरे को देखकर ही समझ गया कि कुछ गंभीर बात है। क्योंकि उसे पता था कि उसके पिता छोटी-मोटी बातों से चिंतित नहीं होते। प्रभात ने मनोज से बार-बार पूछा कि पापा बात क्या है? आप परेशान क्यों लग रहे हैं? मनोज ने उसे सब कुछ सामान्य बताकर केवल इतना ही कहा, ’मुझे किसी आवश्यक कार्य से तुरंत बाहर जाना होगा। अतः तुम्हारी बुआ कल यहाँ आ रही है।’
                      मनोज को परेशानी यह नहीं थी कि उसके खिलाफ कोर्ट में केस हो गया है। केस तो होना ही था। यह उसे उसी दिन पता चल गया था, जिस दिन माया पहली बार शादी के नाटक के बाद घर आई थी। यह उसे उसी क्षण लग गया था जिस क्षण उसे पता चला था कि माया अपना मोबाइल लेकर नहीं आई है। यह उसी समय पता चल गया था कि माया ने अपने वायदे के अनुसार अपना बैंक खाता बंद करके उसकी धनराशि अपनी माँ को नहीं दी है। यह उसी दिन पता चल गया था जिस दिन माया ने मनोज के मोबाइल से अपने संदेश मिटाए थे। वास्तविक रूप से माया ने शादी नहीं, मनोज का शिकार किया था। माया और माया के भाई ने सोच-समझकर मनोज को फंसाया था। जबकि मनोज ने अपने प्रोफाइल पर स्पष्ट लिख दिया था कि किसी भी प्रकार का झूठ का मतलब शादी चल नहीं सकेगी। विवाह संबन्ध विश्वास पर टिके होते हैं। विवाह को पवित्र संस्कार कहा जाता है। यदि विवाह की बुनियाद ही झूठ पर आधारित हो तो वह विवाह कैसा? वह तो धोखे, छल व कपटपूर्ण ढंग से किसी का शिकार करना ही हुआ ना? अतः यह तो पहले दिन से ही तय था कि माया ने मनोज के साथ नेक इरादे से शादी न की थी। 
                        ऐसी शादी के बड़े खतरनाक परिणाम होते हैंे। शादी के बाद तथाकथित पत्नी अपने प्रेमियों के साथ मिलकर पति की हत्या इस ढंग से करती है कि वह आत्महत्या या दुर्घटना लगे और पत्नी पति की संपत्ति को अपने कब्जे में करके मौजमस्ती भरा जीवन बिता सके। इस तरह की घटनाएं आये दिन अखबारों में और पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। टेलीविजन पर भी सावधान इंडिया और क्राइम अलर्ट जैसे सच्चाई का दावा करने वाले धारावाहिक भी इस तरह की घटनाओं को दिखाते रहते हैं।  दूसरा रास्ता झूठे मुकदमेबाजी में फसाकर ब्लेकमैलिंग करके रूपये ऐंठना या कोर्ट की सहायता से कानूनों का दुरूपयोग करके अच्छी खासी रकम प्राप्त करना। प्रारंभ में ही माया के षडयन्त्र को मनोज ने समझ लिया था। अतः वह चैकन्ना हो गया था। यदि वह अपने प्रेमियों  के साथ मिलकर मनोज की हत्या भी करवाती तो उसे जेल ही जाना पड़ता। उसके हाथ कुछ न आता। वैसे भी मनोज के बाद प्रभात ही उसका वारिस था। माया के षडयंत्रपूर्वक शादी की बात पता चलते ही मनोज अपने बेटे की सुरक्षा को लेकर अत्यन्त जागरूक हो गया था। अतः माया के पास कोर्ट के माध्यम से अपने इरादों को पूरा करने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता न था। अतः मनोज को अनुमान था कि माया अवश्य ही ऐसा करेगी किंतु इतना जल्दी करेगी? यह उसने न सोचा था। 

Saturday, December 29, 2018

दिखावटी प्रेम के दोहे

शादी हैं धन्धा बनीं, झूठे दहेज के केस।
काली कपट कलंकिनी, पहनें दुल्हन वेश॥
शर्म हया लज्जा बिकी, धन ही है बस सार।
शादी पति के पर्स से, मजे करन को यार॥
शादी को कुछ ओर है, नौकरी को कुछ ओर।
शादी को धन्धा बना, कहत और को चोर॥
सम्बन्धों को बेचते, रिश्तों का व्यापार।
छल,कपट औ प्रपंच कर, कहते तुमसे प्यार॥
जिसको कुछ ना चाहिये, पास वही अब आय। 
हम पहले ही लुट चुके, पास बचा कुछ नाय॥
धोखे, छल औ कपट से, दिखलाती हैं प्यार।
शादी है धन्धा बनी, ये हैं आधुनिक नार॥
धोखे का ये बीज बो, कपट का डाले खाद।
शादी का नाटक करें, कोर्ट में करें फ़रियाद॥
प्रेम शब्द से अब बचो, जी लो पल दो चार।
प्रेम धोखे का नाम है, करता बण्टा ढार॥
इंसानित है खो गयी, प्यार बना व्यापार।
गला रेत कर कहत हैं, हमको तुमसे प्यार॥

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३८

1 मार्च से बेटे की परीक्षा प्रारंभ हुईं। मनोज ने बड़े प्यार से बेटे को पहली परीक्षा देने भेजा था। बेटा परीक्षा कक्ष में बैठा परीक्षा दे रहा होगा किंतु मनोज उसी के बारे में सोचता हुआ, घर के कामों को निपटा रहा था। बेटे के आने से पहले उसे उसकी इच्छा के अनुसार  भोजन जो तैयार करना था। मनोज रसोई का काम भी लगभग पूरा कर चुका था। वह बेटे की प्रतीक्षा करने लगा। तभी उसके क्वाटर की घण्टी किसी ने बजाई। मनोज ने सोचा इतनी जल्दी उसका बेटा कैसे आ सकता है। अभी तो उसकी परीक्षा का समय भी समाप्त नहीं हुआ है। उसका अनुमान सही था। दरवाजे पर उसका बेटा नहीं डाकिया था। डाकिया एक रजिस्टर्ड पत्र लेकर आया था। मनोज ने डाकिया से पत्र प्राप्त किया। लिफाफे पर ही प्रेषक के स्थान पर न्यायालय की मुहर देखकर वह घबड़ा ही गया। जिसका डर था वही हुआ। आज बेटे का पहला प्रश्न पत्र था। अभी किसी भी प्रकार का तनाव उसकी परीक्षाओं में व्यवधान डालने के बराबर ही था। 
                माया ने अपनी माया दिखा दी थी। उसे मनोज और मनोज के बेटे से क्या मतलब? उसे अपने स्वार्थ की पूर्ति करनी थी और उसका रास्ता तो कोर्ट से होकर ही गुजरता था। मनोज के लिए जीवन का कठिनतम् समय था। जिस बेटे के लिए उसके पिछले पन्द्रह साल सब कुछ सहा है। आज यदि उसे किसी भी प्रकार के तनाव से गुजरना पड़ा तो निसन्देह उसकी परीक्षाओं में उसका निष्पादन प्रभावित होगा। इसके लिए और कोई नहीं स्वयं मनोज ही जिम्मेदार है। मनोज के लिए जिम्मेदारी स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं थी। वह अपनी जिम्मेदारियों से कभी भागने की चेष्टा नहीं की। किंतु प्रश्न यह था कि वह इस समय बेटे के लिए तनाव मुक्त वातावरण किस प्रकार प्रदान कर सकता है?
                                  सबसे पहली बात तो यह थी कि कोर्ट का नोटिस था। वहाँ तो जाना ही था। वहाँ जाने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। ऐसी विकट व अनिवार्य परिस्थिति में उसे अपनी बहन का नाम ही याद आया। एक वही एक ऐसी व्यक्ति है जो उसकी समस्या को समझ सकती है और उसकी अनुपस्थिति में उसके बेटे प्रभात को सभाल सकती है। मनोज के बाद प्रभात का भावनात्मक लगाव किसी से था तो वह प्रभात की बुआ ही थी। मनोज ने तुरंत अपनी बहन को फोन पर तुरंत सारी परिस्थिति बताई और तुरंत प्रभात के पास आने के लिए कहा क्योंकि मनोज को दूसरे ही दिन बरेली के लिए निकलना था। मनोज की बहिन की भी शादी हो चुकी थी। वह स्वतंत्र नहीं थी कि मनोज ने कहा और वह तुरंत चल पड़े। उसे भी अपनी ससुराल से अनुमति की आवश्यकता थी। परेशानी यह भी थी कि मनोज की बहन ससुराल में यह सब बता भी नहीं सकती थी क्योंकि मनोज की आनलाइन शादी की बात वहाँ किसी को मालुम न थी। अब सब कुछ बताने का मतलब हंगामा होना ही था। उस समय ऐसा कुछ करना प्रभात के पास आने में रूकावट ही बनता। अतः प्रभात की बुआ अर्थात मनोज की बहिन ने अपने पति को विश्वास में लेकर ससुराल से अनुमति प्राप्त की और दूसरे दिन ही मनोज के पास आने के लिए तैयार हो गयी। मनोज ने यह सब अपने बेटे के परीक्षा देकर आने से पूर्व ही कर लिया था।

Tuesday, December 25, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३७

मनोज ने बोर्ड कक्षाओं को ध्यान में रखकर अपने बेटे प्रभात की देखभाल के लिए लगभग चार महीने के लिए अर्धवेतन अवकाश ले लिया जिसमें आधा वेतन ही मिलना था। किंतु मनोज को अब वेतन या अपने जाॅब की चिन्ता नहीं थी। जब अपनों के प्राणों पर संकट बन आये तो व्यक्ति अपने प्राणों की चिंता भी छोड़ देता है। जाॅब की तो बात ही क्या है? यहाँ तो अपने बेटे के भविष्य का प्रश्न था। केवल भविष्य ही क्यों? झूठी, धोखेबाज व कपटी लालची औरत कुछ भी कर सकती थी। मनोज का बेटा ही उसका एकमात्र वारिस भी था। ऐसी स्थिति में वह लालची औरत उसके प्राणों के लिए संकट भी बन सकती थी। 

               अपने बेटे के प्राणों की रक्षा के प्रयत्न के बाद अब मनोज अपने बेटे को तनावमुक्त अध्ययन के अवसर भी उपलब्ध करवाना चाहता था। मनोज सभी प्रकार के तनाव के होते हुए भी अपने बेटे को तनावमुक्त माहोल प्रदान करने की हर संभव कोशिश करने लगा। मनोज का बेटा भी काफी समझदार था, वह सब कुछ नजरअंदाज करके अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करके परीक्षाओं की तैयारी में व्यस्त हो गया। मनोज का मानना था कि कम से कम माया प्रभात की परीक्षाओं तक कोई व्यवधान नहीं डालेगी। लेकिन मनोज के मानने से क्या होने वाला था? यदि माया सीधे और सरल मार्ग की पथिक होती तो मनोज को झूठ बोलकर कपटपूर्वक शादी के जाल में ही क्यों फंसाती? सच्ची व समर्पित पत्नी और माँ बनने लायक होती तो शायद अभी तक कुँआरी नहीं बैठी होती? 

               सच्ची व समर्पित पत्नी और माँ की भूमिका निभाती तो मनोज को अपने बेटे की परीक्षाओं के लिए अपने विभाग से अर्ध-वेतन अवकाश क्यों लेना पड़ता? नौकरी-पेशा लोग सामान्यतः वेतन कटवाकर अवकाश लेना अच्छा नहीं मानते। किंतु मनोज का जीवन सामान्य तो न था? सब कुछ असामान्य घटित हो रहा था उसके साथ। उसके साथी उसे समझाते क्यों व्यर्थ में इतने रूपये का नुकसान कर रहे हो। बेटा अब तक जिस प्रकार पढ़ा है। अब भी पढ़ लेगा किंतु मनोज को ही पता था कि उसके बेटे को कितना झेलना पड़ा है? वह समझता था कि बोर्ड की अन्तिम परीक्षा में वह बेटे का जितना ख्याल रख सके उतना ही कम है?

Saturday, December 22, 2018

मन के पऺक्षी

अरमान
         अर्चना पाठक

मन के पंछी उड़
      अरमान बड़ा बाकी है।
धागा रिश्तों का उलझा,
       ताना बुनना बाकी है।
अकेला अकेला रोया खूब,
       हंसना हंसाना बाकी है।
मन के पंछी उड़
      अरमान बड़ा बाकी है।
शिकवे शिकायत बहुत हुए,
      मिलना मिलाना बाकी है।
बीत कर सब रीत गया,
     प्रीत निभाना बाकी है।
मन के पंछी उड़,
       अरमान बड़ा बाकी है।।

                        #होश॑गाबाद

Friday, December 21, 2018

जब से बने हैं हम ओफ़ीसर

 ओफ़ीसर 

                                               डाॅ.सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी

जब से बने हैं, हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।
प्यार  प्रेम  की  बातें  भूले, क्रोध  छोड़कर  कूल भये।।
अधीनस्थ ना चाहें हमको।
काम बताते, पी के गम को।  
पास में आने से डरते वे,
फिर भी साथ ले चलते सबको।
अधिकारी हमें घास न डालें, हम उनको हैं फूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
गाना कोई याद न आये।
नियम ही देखो मन पर छाये।
करने कराने के चक्कर में,
हम भी हैं कुछ, हम भरमाये।
ड्यूटी करने के चक्कर में, अधीनस्थों को शूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
सेवा नियमावली में उलझे।
जीवन के ना मुद्दे झुलझे।
पेंशन पाने का चक्कर है,
टीए डीए में भी उलझे।
राष्ट्रप्रेमी हैं जीवन भूले, केवल अब हम टूल भये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।
प्रेम नहीं आॅॅफीसर करता।
नफरत का कोई काम नहीं।
खाना-पीना भूलें हैं हम,
रात को भी आराम नहीं।
मनोरंजन की बात छोड़ दो, कविता लिखना भूल गये।
जब से बने हैं हम ओफ़ीसर, इंसान भी हैं हम भूल गये।।

जवाहर नवोदय विद्यालय, केन्द्रीकोणा, साउथ वैस्ट गारो हिल्स-794106 (मेघालय)
चलवार्ता 09996388169  ई-मेलःsantoshgaurrashtrapremi@gmail.com 
बेब ठिकाना: www.rashtrapremi.com, www.rashtrapremi.in

Tuesday, December 11, 2018

बेटा! अब है बड़ा हो गया


मना करने पर पास था आता।
साथ में ही था वो सो पाता।
हाथ से मेरे, दूध था पीता,
वरना भूखा था सो जाता।
                अकेले का अभ्यास हो गया।
                बेटा! अब है बड़ा हो गया।
डाॅटा, डपटा, मारा-पीटा।
दूध पिलाया, खिलाया पपीता।
अपनी, उसकी, इच्छा मारी,
चाहा था, बने ज्ञान की गीता।
                 इंटरनेट से विद्वान हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।
मोबाइल ही सार हो गया।
लेपटाॅप से प्यार हो गया।
साथ न उसको भाता है अब,
लगता वह वीतराग हो गया।
                 अपने पैरों खड़ा हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।
संयम का अभ्यास कर रहा।
बचपन बीता, चाव मर रहा।
स्वस्थ रहे बस, यही चाह है,
जग को दे जो, अभी ले रहा।
                 अपने आगे खड़ा हो गया।
                 बेटा! अब है बड़ा हो गया।

Wednesday, November 7, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम- दीपावली विशेष

नवीन परिस्थितियों में मनोज कोे अपने और अपने बेटे के प्राणों पर संकट दिखाई दे रहा था। यही नहीं वह किसी भी कीमत पर अपने बेटे की पढ़ाई को नुकसान होने देना नहीं चाहता था। उसका बेटा प्रभात बहुत समझदार था और अपने पिता की मजबूरी को समझ रहा था। अतः वह पढ़ने के लिए छुट्टी वाले दिन भी घर (वैसे उस स्थल को घर कहना ही गलत होगा, वह तो मनोज और उसके बेटे के लिए प्रताड़ना स्थल में परिवर्तित हो चुका था।) से निकलकर विद्यालय में जाकर पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ने लगा। जो मनोज अपने बेटे को एक पल के लिए अपनी नजरों से दूर नहीं होने देता था। उसका बेटा मजबूरी में पढ़ने के लिए पेड़ों के नीचे जा रहा है, यह देखकर वह कितनी पीड़ा का अनुभव करता होगा? इसे कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। मनोज को फिलहाल कैसे भी अपने बेटे प्रभात की सुरक्षा व उसे पढ़ाई के लिए वातावरण उपलब्ध करवाने की चिंता थी। मनोज का क्वाटर तनाव का चैम्बर बन चुका था, जहाँ केवल और केवल माया की मनमर्जी चल रही थी। बेटे को बोर्ड की परीक्षायें देनी थीं। परीक्षायें इतनी निकट थीं कि चाहकर भी मनोज अपने बेटे को किसी अन्य स्कूल में नहीं भेज सकता था। परीक्षाओं तक अपने बेटे को पास रखना मनोज के लिए मजबूरी थी। अतः मनोज ने किसी प्रकार कुछ महीनों के लिए माया को उसके मायके भेजने का विचार बनाया। किंतु समस्या यह थी कि माया को इसके लिए तैयार कैसे किया जाय? माया का तो उद्देश्य ही मनोज और उसके बेटे को तनाव देकर परेशान करना था।  अतः वह क्यों मानेंगी? इसी उहापेाह में दीपावली निकट आ गयी।

                    मनोज किसी भी प्रकार बेटे की परीक्षाओं को लेकर तात्कालिक रूप से माया को अपने व अपने बेटे से अलग करना चाहता था ताकि उसके बेटे के अध्ययन पर माया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके। मनोज ने काफी-सोच विचार और विचार-विमर्श के बाद दीपावली पर माया को उसके मायके भेजने का रास्ता निकालने का मन बनाया। मनोज ने दीपावली का बहाना लेकर स्वयं और अपने बेटे के साथ अपने पैतृक गृह जाने का कार्यक्रम बनाया। माया और मनोज की शादी मनोज के घरवालों के विरोध के बावजूद हुई थी। अतः माया का वहाँ जाना संभव नहीं था। अतः वह अपने चचेरे भाई के पास गाजियाबाद जाने के लिए तैयार हो गयी। 
                   दीपावली को सामान्यतः लक्ष्मी पूजन का पर्व माना जाता है। घर की लक्ष्मी गृहलक्ष्मी होती है। अतः दीपावली गृहलक्ष्मी के पूजन का दिन होता है, मनोज का ऐसा मानना था। किंतु यहाँ तो अजीब स्थिति थी, कपटपूर्वक षडयंत्र रचकर यहाँ तो गृहलक्ष्मी के पद को एक झूठी, बदमिजजाज राक्षसी ने कब्जा लिया था। जो हर क्षण मनोज व उसके बेटे का रक्त पी रही थी। वह तो आयी ही इस उद्देश्य से थी किसी प्रकार मनोज और उसके बेटे प्रभात को ठिकाने लगाकर उनके पास जो था, उस पर कब्जा कर सके। अतः जैसे-तैसे उस राक्षसी को जाने के लिए तैयार किया। यह मनोज और उसके बेटे की किस्मत ही थी कि वह अपने भाई के पास जाने के लिए तैयार हो गयी। माया के प्रेमी अफजल ने मनोज को आश्वासन दिया था कि कैसे भी एक बार उसे यहाँ भेजिए फिर वह वापस नहीं जायेगी। मनोज यही चाहता था। तात्कालिक रूप से उसे राहत भी मिली। अब उसके बेटे के लिए कम से कम कुछ दिनों के लिए सुरक्षित माहोल सुलभ हो सकेगा। यह सोचकर कुछ आश्वस्त हुआ। किंतु मामला इतना सरल नहीं था। 
                   माया को बेटे की परीक्षाओं तक वापस न आने के लिए तैयार करना लगभग असंभव काम था। दीपावली के तुरंत बाद माया फोन करके वापस आने के लिए दबाब बनाने लगी। अतः मनोज ने माया और अफजल के संबन्धों को उसके भाइ्र्र और चचेरे भाई के सामने रखकर माया को वापस बुलाने से साफ इंकार कर दिया। माया बार-बार फोन करके उसे धमकाने लगी। यही नहीं, माया ने मनोज की माताजी को भी फोन करके धमकाया कि वह सीधी-सादी औरत नहीं है। वह मनोज को जेल की सलाखों के पीछे भेज देगी। मनोज ने माया से अपने बेटे की बोर्ड परीक्षाओं तक किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही न करने के लिए प्रार्थना भी की किंतु माया को मनोज, उसके परिवार और उसके बेटे से क्या लेना-देना था? उसे तो अपने स्वार्थ पूरे करने थे।

Wednesday, October 31, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३५

संसार में शायद ही कोई स्वीकार करे कि मनोज ने केवल अपने बेटे और अपने माता-पिता को सुरक्षित देखभाल उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से ही शादी की असफल कोशिश की थी। उसकी इस बात को केवल उसका बेटा प्रभात ही जानता था। मनोज कई वर्षो से अपने बेटे से वायदा करता आ रहा था, ‘शायद अगले वर्ष से तुझे घर के काम-काज अपने आप न करने पड़े।’ मनोज लगातार वैवाहिक वेबसाइटों के माध्यम से जीवन साथी की तलाश कर रहा था। मनोज जानता था कि उसके जैसे विशिष्ट जीवन शैली वाले व्यक्ति के लिए जीवन साथी मिलना मुश्किल है, किन्तु असंभव है यह मानने को उसका मन तैयार न था। इतनी स्पष्टता व सच्चाई से अपनी बात रखने वाला मनोज यह कल्पना नहीं कर सका कि शादी के नाम पर उसके साथ धोखा भी हो सकता है। स्वयं धोखा खाने के बाद भी उसे विश्वास करना मुश्किल ही रहा कि ऐसा भी हो सकता है बल्कि उसके साथ ऐसा हो चुका है। अब भी वह विचार करता है तो यह समझ ही नहीं पाता कि उसके साथ उन लोगों ने इस प्रकार धोखा क्यों किया होगा? कोई झूठ बोलकर कपटपूर्वक किसी से शादी कैसे कर सकता है? कैसे कोई किसी को शिकार बनाने के लिए शादी जैसे पवित्र रिश्ते का प्रयोग कर सकती है? मजेदार बात यह कि वह इस सबके बावजूद प्रेम होने का दावा अभी भी करती है। आई लव यू तो जैसे उसका तकिया कलाम है। शायद! सभी को वह ऐसे ही बोलती होगी। 

ऐसी औरतों के लिए प्रेम केवल मनोरंजन की एक चाल मात्र होता है। ऐसी चालबाज औरतों की संख्या समय के साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है। पहले कभी दहेज के आधार पर महिलाओं का उत्पीड़न होता रहा होगा किन्तु अब समय बदल चुका है और चालू औरतें दहेज विरोधी कानूनों का दुरूपयोग करके केवल  तथाकथित पति का ही नहीं तथाकथित ससुराल के प्रत्येक सदस्य का उत्पीड़न करती हैं और स्वयं अपने यारों के साथ गुलछर्रे उड़ाती हैं। अब तो घर-घर से ऐसी समस्याएँ सुनने को मिलती हैं। अपनी काली करतूतों को छिपाने के लिए आधुनिक तथाकथित दुल्हनें ससुराल में आते ही अपनी मनमर्जी चलाने लगती हैं। उनकी मनमर्जी में किसी प्रकार की बाधा आने पर दहेज का केस लगाने की धमकी देती हैं। केस, कचहरी और बदनामी के डर से सामान्यतः लोग ऐसी औरतों की ब्लेकमेलिंग में फंसकर नारकीय जीवन को स्वीकार कर लेते हैं। मनोज को इस प्रकार का नारकीय जीवन स्वीकार नहीं था। उसका मानना था कि प्रति दिन मृतवत जीवन जीने से अच्छा है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार की कुर्बानी दी जाय। घुट-घुट कर जीवन जीने से तो अच्छा है कि एक बार में ही मृत्यु को गले लगा लिया जाय। मनोज के मन में माया के षडयंत्र में फंसने के बाद कई बार आत्महत्या करने का भी विचार आया किन्तु उसके लिए ऐसा करना संभव ही न था। आत्महत्या को वह सबसे निकृष्ट कृत्य समझता था।

अब आॅनलाइन शादी के षड्यंत्र में फसने के बाद मनोज के सामने प्रश्न यह था कि इस कपटजाल से अपने बेटे को किस प्रकार से बचाये। मनोज को केवल अपने बेटे के प्राणों की रक्षा ही नहीं करनी थी वरन उसको विकास के अवसर भी उपलब्ध करवाने थे। मनोज को वर्तमान वातावरण में अपने बेटे को पढ़ाई लिखाई का वातावरण उपलब्ध करवाना असंभव जैसा लग रहा था। जो औरत कपटपूर्वक उसकी तथाकथित पत्नी का दर्जा पा गई थी। वह वास्तव में एक ठग थी जिसने योजनापूर्वक मनोज को फसाया था। इस काम में उसके भाई ने भी उसी का साथ दिया था। मनोज तो नितान्त अकेला था। शादी के नाटक के समय भी मनोज के पास तो अपने गवाह भी न थे। मनोज की तरफ से भी माया के भाई बन्दों ने ही गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे।

Friday, October 19, 2018

दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३४

मनोज के सामने जिम्मेदारी फिक्स करने का मसला नहीं था। काम न करने के बहाने खोजने वालों में मनोज न था। किस काम के लिए कौन जिम्मेवार है? इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि काम श्रेष्ठतम गुणवत्ता के साथ पूरा हो। मनोज अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने से भागने वाला इंसान भी नहीं था। निसन्देह! अपने बेटे की सुरक्षा व संरक्षा व विकास के अवसर उपलब्ध करवाने के लिए वह ही जिम्मेदार था। तलाक के बाद माता और पिता दोनों की जिम्मेदारी उसकी ही थी। अपनी इसी जिम्मेदारी में सहयोग प्राप्त करने के लिए ही उसने शादी की थी किन्तु वह शादी नहीं, वह तो उसके जीवन को बर्बाद करने का आधार तैयार हो गया था। अब उसके पारिवारिक जीवन का कोई मतलब नहीं रह गया था। परिवार का तो कहना ही क्या? उसके माता-पिता और बेटे का मनोज के साथ रहना लगभग असंभव हो गया था। जिस औरत ने रूपये के लिए शादी की थी, उसके लिए सम्बन्धों का क्या मतलब था? वह औरत कलह प्रिय और अच्छी होने का नाटक करने को तत्पर रहती थी। मनोज के स्थान पर और कोई रहा होता तो शायद आत्महत्या भी कर चुका होता। उस कठिन दौर में यदि मनोज को भी अपने माता-पिता और बहन का साथ न मिला होता तो शायद मनोज परिस्थितियों से पलायन कर चुका होता। माया का वहाँ होना ही मनोज के लिए असह्य और तनाव पैदा करने वाला था। मनोज को नहीं मालुम था कि माया कब क्या कर बैठ? जो स्त्री अपने तथाकथित पति की उपस्थिति में अपने प्रेमी से बात करती हो। उसके बारे में क्या कल्पना की जा सकती है। दूसरी ओर उसका प्रेमी बार-बार वहाँ आकर मनोज से मिलने का आग्रह कर रहा था। 

मनोज का बेटा प्रभात उसके सामने भूखा घूमता रहता था किंतु मनोज कुछ भी करने की स्थिति में नहीं था। इससे ज्यादा वेदना किसी संवेदनशील पिता के लिए क्या हो सकती थी। हाँ! मनोज को उन दिनों को याद करके अभी भी आश्चर्य होता है कि उसके बेटे ने कितनी समझदारी दिखाई और मनोज से कभी किसी भी प्रकार की शिकायत नहीं की। यहाँ तक कि वह मनोज के तनाव को कम करने का ही प्रयास करता। प्रभात समझता था कि उसका पिता स्वयं कितने तनाव में है। वह यह भी जानता था कि उसका पिता स्वयं भूखा रहकर पूरे दिन काम करता रहता है। ऐसी स्थिति में प्रभात का भी दुःखी होना लाजिमी था। दोनों बाप-बेटे एक-दूसरे से कुछ न कहते थे किन्तु एक-दूसरे की आन्तरिक वेदना को अच्छी तरह से समझते थे। विद्यालय जाने से पूर्व ड्रेस पहने हुए उसका चावल बीनना अभी भी याद आता है। यदि प्रभात चावल बीनकर रखकर नहीं जाता तो माया कीड़ों व पत्थर सहित ही चावल उबालकर रख देती। दिन रात आराम फरमाना, अपने प्रेमी से बातों में मशगूल रहना और मनोज पर व्यंग्य करना माया के प्रतिदिन के कार्य थे। यहाँ तक कि रात को सोने से पहले रसोई में झूठे बर्तनों को साफ करके सोना मनोज की मजबूरी थी। ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मनोज के पारिवारिक जीवन मूल्य आदर्शवाद से प्रेरित थे। पत्नी का गृहणी के रूप में एक देवीय रूप की कल्पना मनोज के मस्तिष्क में थी किंतु यहाँ तो एक राक्षसी आ गयी थी। जो प्रत्यक्ष रूप से खून भले ही न पीती हो किन्तु हर क्षण खून जलाती अवश्य थी। इसके बावजूद दिखावा एक समर्पित पत्नी का करती थी। किसी ने सच ही कहा है बुरा व्यक्ति जब अच्छा होने का दिखावा करता है, तब वह और भी बुरा हो जाता है।

Thursday, October 18, 2018

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३३"

जब से माया मनोज के पास शादी का ड्रामा रचाकर आई थी, तभी से वह स्वयं, उसका बेटा प्रभात और मनोज की माँ सभी परेशान थे। घर घर न रहा था। वह तनाव का अड्डा बन चुका था। माया को कोई काम-धाम तो करना नहीं था। उसका काम तो एक मात्र सभी को परेशान करना ही था। बेटा प्रभात और मनोज की माँ! मनोज की मजबूरी और पीड़ा को समझ रहे थे। अतः उन्होंने किसी भी प्रकार की कोई शिकायत कभी भी मनोज से नहीं की किंतु मनोज सब कुछ समझ रहा था। वह जब भी घर के काम-धाम और अपनी माँ या अपने बेटे की देखभाल के बारे में माया से बात करने की कोशिश करता। माया स्पष्ट रूप से धमकाने के अन्दाज में कहती किसी ने कोई शिकायत की क्या? अब ऐसी खतरनाक औरत की कोई शिकायत कैसे कर सकता था? मनोज का बेटा प्रभात और मनोज की माँ दोनों बड़ी ही सहनशीलता और धैर्य से काम ले रहे थे। वे दोनों ही मनोज को और दुखी नहीं करना चाहते थे। वे समझ रहे थे कि मनोज अपनी शादी के गलत निर्णय के कारण पहले से ही दुःखी है और अपने कष्टों के बारे में बताकर और दुःखी क्यों करें? जबकि वे दोनों भली प्रकार समझ रहे थे कि माया जैसी दुष्ट, बदमिजाज, शातिर, कपटी और बेशर्म औरत के लिए पारिवारिक मूल्यों का कोई मतलब नहीं था।

               मनोज ने सबसे पहले अपनी माँ को अपने गाँव में भेजने की व्यवस्था की, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसकी माँ के लिए कोई खतरा पैदा हो। माया के चाल-चलन और उसके व्यवहार से स्पष्ट था कि वह अपने किसी विशिष्ट मकसद और खतरनाक इरादों से कपटपूर्वक शादी रचाकर मनोज के पास आई है। मनोज का यह विचार तब और पक्का हो गया, जब माया अपने प्रेमी अफजल से खुलेआम बातें करने लगी। वह बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए रात के दो-दो बजे तक अपने प्रेमी से बातें करने में मशगूल रहती। इस प्रकार के तनाव भरे माहोल में मनोज के लिए अपने बेटे को पढ़ाई का माहोल देने में समस्या हो रही थी। उसने माया से बात की कि प्रभात का बोर्ड का एग्जाम है, इस प्रकार से उसकी पढ़ाई का नुकसान होगा। माया ने धमकाने के अंदाज में स्पष्ट रूप से कहा कि इसके लिए तुम और केवल तुम जिम्मेदार होगे। मनोज क्या करता? उसके लिए जिम्मेदारी फिक्स करना महत्वपूर्ण नहीं था। उसके लिए महत्वपूर्ण था अपने बेटे के लिए अध्ययन का वातावरण उपलब्ध करवाना और वह वैसा कर नहीं पा रहा था। अतः वह स्वयं ही तनाव में रहने लगा था। अपने बेटे की समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता उसकी समझ नहीं आ रहा था।

Tuesday, October 16, 2018

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३२"‍


मनोज आज जब अपने गुजरे हुए जीवन पर नजर डालता है तो उसे अपने पहले प्रयोग में कोई बुराई नजर नहीं आती। वही परिस्थितियाँ दुबारा उसके जीवन में हों तो शायद सहायता करने से अब भी पीछे नहीं हटेगा। शादी का उसका पहला प्रयोग असफल भले ही रहा हो किंतु उसमें धोखा न था, लालच न था। परिस्थितियों की मजबूरी भले ही रही हो किंतु किसी भी पक्ष की ओर से कोई कपट न था। हाँ! दूसरी बार वह जब वास्तव में शादी करके जीवन संगिनी चाहता था। वह पारिवारिक जीवन जीना चाहता था। वह चाहता था कि उसके बेटे व माँ-बाप की देखभाल में उसकी जीवनसंगिनी सहयोग करे। वह व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में अपने साथ चल सकने वाली जीवनसंगिनी चाहता था। वह चाहता था कि मन, विचार व आचार एक करके वह अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन कर सके। किंतु व्यक्ति जो सोचता है वही तो नहीं होता। मनोज के साथ भी नहीं हुआ और वह आॅनलाइन मैरिज के ऐसे धंधेबाजों के चंगुल में फंस गया कि उस चक्रव्यूह से निकलने का कोई रास्ता ही नहीं दिखाई देता।


धोखा देकर कपट पूर्वक शादी करके कोई खुश रहने की कल्पना कैसे कर सकता है? मनोज के लिए यह घोर आश्चर्य की बात थी। जब से माया मनोज के पास शादी का नाटक करके आई थी, पहले दिन से ही मनोज के लिए तनाव का वातावरण बन गया था। मनोज को जब मालुम हुआ कि माया अपना मोबाइल लेकर नहीं आई है। उसी से स्पष्ट हो गया था कि दाल में कुछ काला अवश्य है अन्यथा मोबाइल नितान्त व्यक्तिगत उपकरण है और उसे कोई छोड़कर नहीं आता/जाता। ऐसा भी नहीं था कि माया उसे गलती से भूल आई हो। यदि हम मोबाइल गलती से भूल जाते हैं तो वह हमारे परिवार वालों के पास होता है। उसे बन्द नहीं किया जाता। माया तो जानबूझकर अपने मोबाइल को बन्द करके आई थी। शायद नष्ट करके आई थी, क्योंकि बार-बार जोर देने पर उसकी ओर से और उसके भाई की ओर से यही कहा गया कि मोबाइल खराब हो गया है। कोई महिला शादी के बाद अपने मोबाइल को अपने माइके में तभी नष्ट करके आयेगी, जब वह कोई ऐसा धन्धा करती होगी कि ससुराल में मालुम पड़ने के बाद भूचाल आ जाने की संभावना हो या उसके इस प्रकार के फोन काॅल आते हों, जिनको कोई भी सामान्य व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा। इस प्रकार माया के द्वारा अपने मायके में मोबाइल नष्ट करके आना, मनोज के लिए प्रथम साक्ष्य था कि अवश्य ही माया शादी से पूर्व गलत गतिविधियों में लिप्त थी।

मनोज के पास आते ही माया के द्वारा मनोज के मोबाइल से एक-एक करके अपने द्वारा भेजे गये सभी सन्देशों को मिटा देना जिनसे माया की वचनबद्धता प्रकट होती थी। मनोज के लिए तनाव का दूसरा कारण था। माया स्पष्ट रूप से शादी से पूर्व किये गये वायदों से हट गयी थी। वह परिवार के प्रति किसी भी जिम्मेवारी को निभाना तो क्या? उसने मनोज के द्वारा कोई भी सामान न लाने के निर्देश का भी पालन नहीं किया था। मनुष्य की भी क्या विडम्बना है? वह जिसको गलत कहता है, उसी को करने की कोशिश करता है। मनोज ने शादी से पूर्व ही स्पष्ट कर दिया था कि वह माया से या माया के घर वालों से किसी भी प्रकार की कोई वस्तु या धन स्वीकार नहीं करेगा। यहाँ तक कि शकुन के रूप में किसी प्रकार के वस्त्र भी उसे स्वीकार नहीं थे। किन्तु माया और उसके धोखेबाज भाई को तो झूठा नाम भी दिखाना था कि उसने दहेज में बहुत कुछ दिया है। वे कुछ देना भी नहीं चाहते थे और देने का दिखावा भी करना चाहते थे। यदि उन्हें वास्तव में कुछ देना होता तो 40 की उम्र तक माया शादी के बिना नहीं भटक रही होती। बार-बार मना करने के बाबजूद माया न जाने क्या अपने बैगों और कुछ डिब्बों में कुछ न कुछ लेकर आयी। यह मनोज के लिए तनाव का एक और कारण था। जब शादी के पूर्व ही स्पष्ट कर दिया गया था कि कुछ नहीं का मतलब कुछ नहीं, तो माया उसकी आत्मा को घायल करने पर क्यों उतारू थी? और जो स्त्री अपने तथाकथित पति की आत्मा पर ही वार करे वह किसी की पत्नी कैसे हो सकती है?

"दहेज के बिना शादी के संकल्प का परिणाम-३१"


मनोज को न धन चाहिए था, न यश की कामना थी। मनोज जाति व संप्रदाय में भी बिल्कुल विश्वास नहीं करता था। मनोज को धन, पद, संबन्ध या यश किसी की कामना नहीं थी। उसे तो केवल अपने कर्तव्यों के निर्वहन में रूचि थी। इसीलिए वह शादी करना ही नहीं चाहता था। अतः कुवारी लड़की से शादी करने का तो कोई सपना संभव ही न था। उसे परिवार की भी कोई कामना नहीं थी। मनोज को तो ऐसा साथ चाहिए था, जो उससे कभी कुछ न छिपाये। सदैव सच बोले और ईमानदारी के रास्ते का पथिक बनने के लिए तैयार हो। मनोज का यह सपना असंभव था। मनोज के साथ रहने का मतलब निस्वार्थ भाव से जीवनयापन करना। एक महिला ने तो मनोज से स्पष्ट रूप से कह ही दिया था कि जब संन्यासी की तरह जीवन जीना है तो शादी करने का क्या मतलब है? किसी का कुछ भी विचार हो। मनोज अपने रास्ते पर ‘अकेला चलो रे‘ की नीत पर चलने के लिए भी तैयार था। उसके बावजूद उसने इस आशा के साथ कि स्पष्ट बातचीत करने पर शायद कोई उसकी राह की पथिक मिल ही जाय। उसने बेवसाइट पर प्रोफाइल बनाया और वह माया के जाल में फँस गया। शिकारी के जाल में एक बार फँसने के बाद उसके जाल से निकलना मुश्किल ही नहीं होता, लगभग असंभव होता है। यही मनोज के साथ हुआ।

मनोज जब स्नातक का विद्यार्थी था। तभी उसकी कल्पना थी कि वह संप्रदाय, जाति व अन्य किसी वर्गभेद से अलग हटकर किसी ऐसी महिला को जीवनसंगिनी बनायेगा, जो किसी भी जाति की हो, भले ही समाज की परिभाषा में वह बांझ हो। भले ही उसने स्वार्थी बनाने वाली आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त न की हो किंतु जिसमें कुछ करने की ललक हो। जो छल, कपट और झूठ से दूर रहती हो जिसमें प्रदशर्न की भावना न हो। जो सादा व साधारण जीवन जीते हुए न केवल उच्च विचार रखती हो वरन विचारों के अनुरूप उसके कर्म भी हों। इसी बात को ध्यान में रखते हुए उसने मैरिज ब्यूरो का विज्ञापन देखकर विधवा/तलाकशुदा बांझ महिला से शादी के लिए पत्र भी लिखा था। किंतु उस समय अपरिपक्व विचार को क्रियान्वित करने का साहस मनोज में न था। वह पूरी तरह परिवार के उपर आश्रित था। अतः स्वतंत्र निर्णय नहीं कर सकता था और न ही उस समय शादी की उम्र थी और न ही आवश्यकता। किंतु मनोज के वे विचार समय के साथ धुधले नहीं हुए वरन् और भी प्रखर होते गये और एक दिन दया की भावना में बहकर उसने बिना किसी की स्वीकृति की अपेक्षा किए हुए। एक अनाथ, विजातीय, विधवा व निरक्षर महिला को पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। यह अलग बात है कि उसका प्रयोग असफल रहा। असफल रहा यह कहना भी सत्य प्रतीत नहीं होता। उस महिला के साथ उसका तलाक भले ही हो गया हो, किंतु उस महिला का जीवन बदल गया। उस उम्र में जाकर एक निरक्षर महिला मनोज के प्रयासों से पढ़ाई शुरू करके स्नातक, स्नातकोत्तर के बाद शिक्षा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर सकी।

Thursday, September 27, 2018

निष्ठुर नहीं, मनुष्य बनो

हे  मानुष तनधारी!

                          अर्चना पाठक

हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।
कहते तो रहते ही हो साहस करके आज सुनो।।
दया तुम्हारा धर्म है,
मदद तुम्हारा कर्म।
जीवन मूल्य से मनुष्य तुम,
वरना सुंदर चर्म।
गिरने से न डरना तुमको, सत्पथ के तुम पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।

राह कठिन, कंटक पूरित,
लहूलुहान तुम हो भले ही।
पंच तत्व में मिलेगा,
 तन यह सुंदर हो भले ही।
प्रेम में जियो, प्रेम बिखेरो, मानव प्रेम के पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।

स्वारथ में जिए हो अब तक,
संग्रह नहीं अब दान करो।
कर्म करो, मत फल को देखो,
खुद  पर तुम विश्वास करो ।
बाधाओं से नहीं रुकना है, मानवता के तुम पथिक बनो।
हे मानुष तनधारी! निष्ठुर नहीं, तुम मनुष्य बनो।।
              

होशंगाबाद

Saturday, September 15, 2018

प्रेम की व्यापारी



Friday, September 14, 2018

हिन्दी दिवस के अवसर पर


Thursday, September 13, 2018

जीवन पीछे छूट गया है