Thursday, November 6, 2014

ज्योतिबा फुले के सपनों का आदर्श परिवार- हरियाणा के रेबाड़ी में

तोड़ डाली जाति और धर्म की जंजीर 


दैनिक जागरण 2 नवंबर 2014 के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित व्यक्तित्व आधारित फीचर में ज्योतिबा फुले के सपनों को साकार होता देखा जा सकता है। दैनिक जागरण के अनुसार-

1. अनूठा, अद्वितीय और प्रेरक। कृष्णा नगर निवासी सरदार त्रिलोचन सिंह के परिवार के बारे में बस यही कहा जा सकता है। धर्म व जाति के नाम पर भले ही कहीं तलवारें खिचतीं होेंगी, लेकिन यहाँ तो प्रेम का दरिया बहता है। मानवता और प्रेम के लिए इस परिवार ने धर्म व जातिगत संकीर्णता की दीवर को तोड़ दिया।त्रिलोचन के चारों पुत्रों ने न केवल हिंदू, मुस्लिम, सिख व ईसाई धर्म से नाता रखने वाले परिवारों में शादियाँ की, बल्कि अपनी पत्नियों की आस्था के अनुसार उन्हें अपने घर में पूजा का भी अवसर दिया।
2. देश में जाति और धर्म के नाम पर आज खूब राजनीति हो रही है। धर्म के नाम पर समाज को अलग-अलग नजरिये से देखा जाता है, लेकिन त्रिलोचन सिंह का परिवार हर साल होली, दीपावली, गुरूपर्व, ईद व क्रिसमस का त्योहार धूमधाम और समान रूप से मनाता है। इस घर में चारों धर्मो के ग्रंथ और धार्मिक साहित्य पढ़े जाते हैं।
3. सरदार त्रिलोचन सिंह, जो कि स्वयं सिख परिवार से हैं के चार पुत्र हैं। इनकी शादियाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई परिवारों में हुई हैं। परिवार के सदस्य गुरुपर्व पर आयोजित होने वाले आयोजन में बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं।
4. सरदार त्रिलोचन सिंह का बड़ा बेटा संतोख सिंह ‘लवली’ की वर्ष 2004 में रेवाड़ी के बंजारवाड़ा मोहल्ले की एकता के साथ शादी हुई। उनका पूरा परिवार हिंदू रीतिरिवाज से जुड़ा हुआ है। स्वयं संतोख सिंह का भी कहना है कि वह अब तक 16 बार हरिद्वार से कावड़ ला चुके हैं। मंदिरों में पत्नी के साथ पूजा अर्चना करने जाते हैं। पत्नी भी हिंदुओं की पूजा अर्चना के साथ सिख समुदाय की परंपराएं भी निभाती हैं।
5. दूसरे बेटे डा.कमल सिंह की पत्नी सरिता यादव की माँ मीना मुस्लिम समुदाय से संबधित हैं। सरिता यादव के पिता रामू यादव रेलवे से सेवानिवृत्त हैं। सरिता के अधिकांश रिश्तेदार मुस्लिम ही हैं। उनके नाना अब्दुल रशीद खान जहाँ मुस्लिम होने के बाबजूद उन्हें निरंकारी मिशन की ओर से पंडित की उपाधि दी गई है। इसके पीछे मुख्य कारण उनका सभी धर्मो के बारे में जानकारी होना है। ईद पर परिवार में सेवइयां बनने के साथ अल्लाह को याद किया जाता है।

Wednesday, November 5, 2014

साथ रहने का ख्वाब क्यूँ देखें?

3.23.07
साथ रहने का ख्वाब क्यूँ देखें? 
साथ हमारे आप खुष रह नहीं सकतीं।
साथ चलने का ख्वाब क्यूँ देखें?
साथ हमारे आप, पैदल चल नहीं सकतीं।
राजदार बनने का ख्वाब क्यूँ देखें?
आप अपने राज हमें कह नहीं सकतीं।
खत  पाने  का ख्वाब क्यूँ देखें?
मालुम है आप खत लिख नहीं सकतीं।

3.24.07

उलझा लेंगे अपने को, दुनियाँ भर के कामों में।
हम तो थे आपके लिए, जैसे गुठली होती आमों में।
गिरना, सड़ना और फिर उगना ही उसकी फितरत,
हम भी सहेंगे सब कुछ, आप खिलती रहें बहारों में।

3.25.07

आप बड़ी हैं हम जानते थे मगर,
इतनी न समझा हम छू न पायेंगे।
आप हसीं थीं, हम जानते थे मगर,
इतनी न समझा, आपके बिना जी न पायेंगे।

3.26.07
बचपन से लेकर अब तक भाये नहीं थे हमको गाने
उदासी, चिन्ता, गंभीरता ही समझे थे जीवन के माने
तन्हा जीवन, सुर संजीवन, याद आपके आते ताने
अन्दर रोना, बाहर हँसना सीखे जीवन के अफंसाने।

3.27.07
जाते-जाते आपने हमको, ऊपर से हँसना सिखा दिया
कभी न हम मजबुर हुए थे, मजबूरी से मिला दिया
चाहत आपकी बन न सके, वह भी नहीं जो मान रही हो,
हम तन्हा थे, हम तन्हा हैं, तुमको पिया से मिला दिया।

3.28.07
हमने आपको समझा नहीं था, आप भी हमको समझ न पाये
अविष्वास आपकी रग-रग में था,विष्वास आपको दिला न पाये
हमने तो सब कुछ कह डाला, राज आपके हम, जान न पाये
हुईं पराजित, घुटने टेके, समाज से आपको, हम बचा न पाये।

Tuesday, November 4, 2014

एक कविता रोज

3.18.07
तेरे नाम से जिन्दा हैं हम, तेरा नाम ले मर जायेंगे।
अपनी खुशियाँ जान न पाए, तेरी खुशियों में गायेंगे।
जिसको चाहे, उसको पाये, खुशियाँ तुझको गले लगायें,
फूले-फले परिवार तुम्हारा, तन्हाई को हम ही पायें।

 3.19.07
साथ भले ही ना मिल पाया, तुमको नहीं भुला पायेंगे।
जीना पड़े भले ही कितना? गीत तुम्हारे ही गायेंगे।
तुमने लिखा था एक बार, जनम-जनम का साथ हमारा।
संयम, धैर्य और साहस से पथ निष्कंटक बने तुम्हारा।
मस्त, व्यस्त और स्वस्थ रहो, स्मरण न करना कभी हमारा।
एकल पथ है, बढ़ना होगा, हम हिय में तुम्हें बसायेंगे ।

3.20.07
जगते, सोते और सपने में हम तुम्हारे ई-मेल पढ़ेगे।
महफिल में रहकर भी तुम बिन तन्हाई को हम झेलेंगे।
तुमको अमृत मिलता हो तो, पीना पड़े हम बिष पी लेंगे।
खिलखिलाहट बनी रहे तुम्हारी, मौन रहें हम मुँह सीं लेंगे।
चाहत ही जब धोखा दे तो, जीवन में क्या कुछ पायेंगे।
साथ भले ही ना मिल पाया, तुमको नहीं भुला पायेंगे।

3.21.07 
हर  चोट  सह  मुस्काएँ, मनमौजी  हम  हैं  मतवाले।
पारदर्शी तुम बन नहीं सकतीं, प्यार में चलते नहीं घोटाले।
खत जलाए, खता नहीं कुछ, जब दिल ही के टुकड़े कर डाले।
ठण्डी आग में जलते रहें, बस तुम्हें मिलें खुशियों के प्याले।
तुम बिन किसके सपने देखें, किसके साथ हम चल पायेंगे।
साथ भले ही ना मिल पाया, तुमको नहीं भुला पायेंगे।

3.22.07
न है चाहत, न है नफरत, न है अग्नि पश्चाताप की।
आपके  थे, आपके  हैं, हम  दौलत  रहेंगे  आपकी।
डाँटों, गालियाँ दो, दुत्कारो, चाहे जितने खत फाड़ो;
लिखा था, लिख रहे हैं, लिखते रहेंगे, हम तो यादें आपकी।

Thursday, October 30, 2014

बार-बार यही कामनाएँ, आपकी, पूरी हों इच्छा सभी।

४-३-२००७
छत्तीस के हम हो चुके, आप अड़तीस की हो जायेंगी।
बच्चों जैसी जिद से लेकिन, आप मुक्त कब हो पायेंगी।
प्यार का सागर दिखाया, आज गुस्सा किसलिए इतना लुटाया?
जबाब देने की आदत नहीं, रात देखो ख्वाब में आ जायेंगी।
हमारे जन्म दिन पर आपने, था कार्ड भेजा था कभी।
फोन पर घंटी बजाकर, आपने मुबारक दे दीं अभी। 
दूरियाँ तो तन की केवल, मन से मेरे पास हर पल,
बार-बार यही कामनाएँ, आपकी, पूरी हों इच्छा सभी।

Wednesday, October 29, 2014

एक कविता रोज ---------------------------

3.11.07
गुलाबी  हैं अधर, खिल रही  मुस्कान
हिय में तो प्रेम बसे, ऊपर से करे मान
रागिनी का अंग-अंग, नृत्य करे पल-क्षण,
दुर्भाग्य ही था जो, मिली न तुझे सुख खान।


3.12.07
प्यार के काबिल नहीं,हम, दीदार चाहिए।
इन्कार का इजहार भी, तरीके से चाहिए।
दुत्कार तुमने दीं, कोई गिला नहीं हमको,
बीच में ना हमारे कोई दीवार चाहिए।

3.13.07
हमको नहीं आपकी तदवीर चाहिए।
हमको नहीं आपकी तकदीर चाहिए।
आपको पाने की गफलत में नहीं, हम,
हमको बस आपकी तस्वीर चाहिए।

3.14.07
खत नहीं खत का मजमून चाहिए।
आन नहीं आपका सुकून चाहिए।
हाजिर कर देंगे, जरा मुस्काके कहो,
हमारे अरमानों का,यदि खून चाहिए।

3.15.07
केरल हो या कन्याकुमारी, याद हमेशा रहे तुम्हारी।
मधुर दर्द असह्य है हरदम, याद रहेंगी चोट तुम्हारी।
अब तड़पन ही जीवन-साथी, कभी रही थी तुमसे यारी,
नहीं रहा कुछ शेष जहां में, बाकी हैं बस याद तुम्हारी।

3.16.07
सागर जिसको समझा हमने, वह केवल दरिया निकली।
हमने जिसको कोयल समझा, तितली जैसी परिंदा निकली।
राह तकी है, राह तक रहे, जीवन भर ही राह तकेंगे,
जिसको दिल की बगिया सौंपी, बेबफा वही दरिन्दा निकली।

3.17.07
जिसको हमने अपना समझा, निकल पड़ा वह ही बेगाना।
हमराही था हमने समझा, झिड़का उसने पास न आना।
हमने सब कुछ सौंप दिया,पर तुमने कब था इसको माना,
जीवित हमको मार दिया, गाती रहो तुम खुशी से गाना।

Tuesday, October 28, 2014

मैं तो पिया से मिलन गई रे।

3.10.07

तुम्हारा गीत

मैं तो पिया से मिलन गई रे।
मैं तो पिया की बाँहों में झूली
तन से हर्षित मन से फूली
रोम-रोम में बस गए प्रियतम्
उनकी खातिर चढ़ जाऊँ शूली।

सब संशयों से पार भई रे।
मैं तो पिया से मिलन गई रे।
जब प्रियतम् ने गले लगाया
प्यार का अर्थ समझ में आया
जिम्मेदारी सभी निभाऊँ,
मिल जाए बस प्रिय का साया
तन-मन से पिया की भई रे।
मैं तो पिया से मिलन गई रे।

पिया ने अमृत मुझे पिलाया
जीवन क्या? अहसास कराया
मुझ पगली को बाँहों में लेके
जीवन पथ पर साथ चलाया
पिया के रंग में रंग गई रे।
मैं तो पिया से मिलन गई रे।

Sunday, October 26, 2014

कैसे होता? प्रिये! आपका अपने पिया से मेल!

4.2.2007


कैसे? 
आपकी याद में, 
उदासी के साथ
हो रहे होते प्रसन्न

कैसे?
सह रहे होते
मीठा-मीठा
जुदाई का दर्द
गर्मियों में भी 
तन नहीं होता सर्द
शायद हमारा भी 
कोई होता हमदर्द

किन्तु कैसे?
होती आपके अहम की सन्तुष्टि
प्राप्त करके फेंकने की तुष्टि
ठुकराने की पुष्टि.

कैसे ?
खेल पातीं
आप प्रेम का खेल.

कैसे होता
प्रिये!
आपका अपने पिया से मेल!
यदि नहीं होती
हमारी आपकी मुलाकात
नहीं रहे होते
कुछ दिनों
हम साथ-साथ
नहीं डाले होते
हाथों में हाथ!

Friday, October 24, 2014

हर त्योहार समर्पित तुझको

3.04.07
तुम्हें तुम्हारे रंग मिल जाएँ, हमने है रंगो को छोड़ा।
सारे रिश्ते तुम्हें मुबारक, अन्दर हो तुम, सबको छोड़ा।
तुम सारी खुशियों से जी लो, हम जी लेंगे थोड़ा-थोड़ा।
तन से भले ही दूर रहो तुम, मन ने नहीं है रिश्ता तोड़ा।

हर त्योहार  समर्पित तुझको, तुझको समर्पित है यह मन।
हर पल चिन्तन समर्पित तुझको, तुझको समर्पित है हर गायन।
 दिन ही नहीं, हर निशा समर्पित, तुझको समर्पित है हर लाइन।
जीवन के सब रंग समर्पित, तुझको समर्पित काया कण-कण।

होली की रंगीनी से तुम, रंग डालो अपने प्रियतम को।
होली की अग्नि से तुम, चमकाओ निज अन्तरतम को।
होली की कामना हैं प्यारी, पा जाओ जो सुन्दरतम् हो।
होली की जो प्यास तुम्हारी, शीघ्र बनेगी पावनतम् हो।

कविता नहीं यह पत्र साथ ही।
लिखो नहीं कुछ करो बात ही।
भूल जाओ तुम, हम नहीं भूलें,
जहाँ जायँ हम, रहो साथ ही।

Thursday, October 23, 2014

प्रेम नहीं कर सकती

08.15.2007
प्रेम नहीं कर सकती 
बुद्धि,
वह तो हानि-लाभ का 
हिसाब लगाती है।

प्रेम नहीं कर सकती
कामना,
वह तो स्वार्थो को
पूरा करने के तिगड़में लगाती है।

प्रेम नहीं कर सकतीं
सुविधाएँ
वे तो येन-केन-प्रकारेण
हरदम संसाधनों को जुटाती हैं।

प्रेम नहीं कर सकता
 अहम
वह तो अपने को ही सही
सिद्ध करने के कुतर्क खंगालता है।

प्रेम नहीं कर सकती
चुनौती
सब कुछ कर पाने की 
वह तो रोंदने में मजा पाती है।

प्रेम उपजता है
 दिल में
जो देने के अहम से भी दूर
समर्पण करना जानता है।

प्रेम करती है
 भावना
जो अपना सब कुछ सौंपकर भी
कुछ नहीं चाहती।

रोशनी के लिये


Wednesday, October 22, 2014

बधाई पूर्व करनी होगी, सत्कर्मो की तुम्हें कमाई।

मित्रों! आओ दीपावली पर स्वीकारो मेरी भी बधाई।

बधाई पूर्व करनी होगी, सत्कर्मो की तुम्हें कमाई।

प्रदूषण फैलाकर दीप जलाते, कैसी दीपावली है भाई?

पूजा नहीं, अनुसरण राम का, इसमें सबकी होगी भलाई।

सीता को वनवास मिले ना, पग-पग हो न परीक्षा भाई।

रावण का पुतला मत फूँकों, अन्तर्मन की करो सफाई।

सूपर्णखाँ की नाग कटे ना, शादी का अवसर मिले भाई।

अब मजबूर न नारी हो कोई, जैसे जमीन में सीता समाई। 

जनकसुता क्यों जमीन में गढ़तीं, उनका भी सम्मान हो भाई।

नर-नारी हो सहयोगी, सुखी रहें सब लोग-लुगाई।

अधिकारों की आग में जलकर, कर्तव्यों की राह गँवाईं?

नर-नारी मिल करें प्रतिज्ञा, सत्कर्मो की स्वीकारो बधाई।

Tuesday, October 21, 2014

एक कविता रोज

3.03.07

मुबारक होली

होली रहे मुबारक तुमको, जीवन में खुशहाली लाए।
फूले-फले परिवार तुम्हारा, बहुरंगो से तुम्हें सजाए।
महके हरदम तन का उपवन, मन खुशियों से गाए।
खुशियों में तुम डूबो इतनी नहीं याद हमारी आए।

होली की दें मुबारकवाद हम, क्रोध नहीं हम पर करना।
पारदर्शिता जीवन में हो, नहीं किसी से तुमको डरना।
सारे कष्ट, दुःख और चिन्ता पायें हम तुमसे है हरना।
तन्हाई में खुश हो लेंगे , तुम्हारी महफिल में हांे सजना।

एक वर्ष है होने वाला हमने दर्शन पाए थे।
दो दिन ही बस पास रहे जो हमरे मन में भाए थे।
हम तो राह देखते अब भी, तुमने ही तरसाए थे।
तुम्हारे सानिध्य में हम, उस दिन कितने हरषाए थे।

गुलाबी कपोल, अधरों पर मुस्कान।
बोली में जिसके कोयल गाए गान।
मानिनी का मन-मयूर नृत्य करे हर-पल।
भाग्यशाली कितना, मिली जिसे सुख-खान।

होली लाए खुशहाली, फूल उठे डाली-डाली।
महक उठे अंग-अंग, मन नहीं रहे खाली।
कपोलों पे अरूणाई, सुधा भरी अधर-प्याली।
कलियों से पुष्प खिलें, सीचें बगिया को माली।

रामप्रीत जी की गज़ल


Friday, October 3, 2014

एक कविता रोज

हम पथ में खड़े बुलाते हैं।

03.10.2007
शुभ प्रभात! वह कह सकते हैं, जो प्रभात में जग जाते हैं।
प्रकृति लुटाती भोर में खुशियाँ, जो जगते आरोग्य पाते हैं।
जीवन है चलने का नाम, इसे आलस में बर्बाद करो ना,
अगड़ाई ले, बढ़ो चलो अब, हम पथ में खड़े बुलाते हैं।

सिर्फ आपके लिए

छियालीसवें जन्म दिवस की शुभकामनाओं के साथ



सिर्फ आपके लिए है, लेना दिल में एक बार उतार।
  बाद में दिल की तरह, इसको भी देना फाड़।।



Friday, June 27, 2014

मेरी छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद

मेरी छठी पुस्तक तीन वर्ष की प्रतीक्षा के बाद 

प्रकाशक महोदय ने हिन्दी निबन्ध की पुस्तक 

"आधुनिक सन्दर्भ में" २५ जून २०१४ को मुझे 

प्राप्त करा दी. 

प्रकाशक महोदय- 

अतुल गुप्ता, 

जाह्नवी प्रकाशन,  

ए-७१, विवेक विहार, फ़ेस-२, 

दिल्ली- ११००९५  

को 

बहुत-बहुत धन्यवाद.

Monday, March 17, 2014

लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

संसदीय चुनाव


                                      डॉ.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
संसदीय चुनाव
वोटर खेले फाग
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को 
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे, 
बेच दे उसको वैश्यालय पहुँचा दे।

संसदीय चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग 
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर पुती है कालिख
आ वोटर!वोट बेच, 
कीमत वसूल!
थोड़ी कालिख, 
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।

संसदीय चुनाव
सत्ता रूपी दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर भरना अपना पेट।

संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
वश बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
 इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
 वोट देना जरूरी है
नोटा का विकल्प भले ही है मिला
किन्तु अभी नहीं हुआ सिलसिला।

संसदीय चुनाव
शिव की नगरी में आई बहार
वाराणसी की गंगा में रेलमपेल है
नरेन्द्र भले ही प्रधानमंत्री की दौड़ में हों
केजरी वाल के लिए तो चुनाव बस खेल है।
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
आम आदमी भी सरकार में सहयोगी बनेगा
तभी तो कांग्रेस का चरखा चलेगा।
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

संसदीय चुनाव
लोकतंत्र का आगाज
वोटर तू अब जाग!
सपने मत ले
तू भी खेल ले फाग!
वोट की पिचकारी उठा
सभी प्रचलित रंगों को जुटा
भ्रष्टाचारियों के चेहरे कर तू काले
जमानत के पड़ जायँ उनको लाले
सरकार चुन ले सशक्त
जिसमें नेता हो देशभक्त
वादों को ध्यान से देख
निकाल इनमें मीन-मेख
मुफ्त में मकड़जाल में मत फँस।
यह कीचड़ है इसमें मत धस!
तेरे ऊपर दारोमदार है
राष्ट्रप्रेमी राष्ट्र हित का कर विचार
मत फँस झूठे हैं ये प्रचार
अन्तर्राष्ट्रीय छवि भी बनानी है
महँगाई पर लगाम, 
विकास की गंगा बहानी है
नया पथ चुन
पुरानी कहानी मत सुन
देश को सुना मधुप की मधुर गुन-गुन।

Sunday, March 2, 2014

राष्ट्र-यज्ञ में सब कुछ अर्पित, आहुति बढ़कर देना सीखें

देश के हित में जीना सीखें

                

तन-मन-धन सब पाया यहीं पर, इसमें से कुछ देना सीखें।
हर पल क्षण कर इसे समर्पित, देश के हित में जीना सीखें।।
राष्ट्रदेव का ध्यान धरें हम,
कर्म ही सारे नेक करें हम।
जो भी बाधा पथ में आयें,
सब-कुछ तजकर साफ करें हम।
धन-पद-यश सम्बन्धों से हट, जन-हित में कुछ करना सीखें।
हर पल क्षण कर इसे समर्पित, देश के हित में जीना सीखें।।
देश के हित की बात करें सब,
भ्रष्टाचार  से  क्यूँ  नाता है?
देश की जनता खड़ी देखती,
अपना इसमें क्या जाता है?
देश की संपत्ति अपनी ही है, इसकी रक्षा करना सीखें।
हर पल क्षण कर इसे समर्पित, देश के हित में जीना सीखें।।
जीवन ही  ये,  राष्ट्र धरोहर,
अपना सब-कुछ इसे समर्पित।
धन-पद-यश कुछ नहीं चाहिए,
सम्बन्ध भी सब इसको अर्पित।
नर-नारी  प्रतिस्पर्धा  तज, मिल कर आगे बढ़ना सीखें।
हर पल क्षण कर इसे समर्पित, देश के हित में जीना सीखें।।
आओ मिल संकल्प करें हम,
ईर्ष्या-द्वेष, मद-मोह तजें हम।
नर-नारी हैं, देश की संपत्ति,
आओ सब मिल साथ रहें हम।
राष्ट्र-यज्ञ में सब कुछ अर्पित, आहुति बढ़कर देना सीखें।
हर पल क्षण कर इसे समर्पित, देश के हित में जीना सीखें।।


Friday, February 14, 2014

प्रेम-दिवस पर विशेष

प्रेम ही ईश्वर है अविनाशी



तुम तो हो  प्राणों में बसते, हमको जग भी प्यारा है।
प्रेम तो बस विश्वास जगाए, समझो नहीं यह कारा है।।
प्रेम ही ईश्वर है अविनाशी,
प्रेमी क्यों जाए मथुरा काशी।
उर-उर में है प्रेम का सोता,
दुनिया फिर भी नेह की प्यासी।
प्रेम बीज भय में ना पलता, प्रेम तो सच का सहारा है।
तुम तो हो  प्राणों में बसते, हमको जग भी प्यारा है।।
प्रेम नहीं बंधन है प्यारी!
प्रेम नहीं झूठ की क्यारी।
प्रेम-पात्र हो दूर भले ही,
राह कभी ना होगी न्यारी।
राष्ट्रप्रेमी बस प्रेम ही बाँटे, प्रेम में जग सब हारा है।
तुम तो हो  प्राणों में बसते, हमको जग भी प्यारा है।।
प्रेम नहीं देता है धोखा,
प्रेम है बसन्त का झोका।
बासन्ती है बयार बह रही,
प्रेम रंग  चढ़ेगा  चौखा।
बसन्त प्रेम को दे आमन्त्रण, ईश प्रेम का मारा है।
तुम तो हो  प्राणों में बसते, हमको जग भी प्यारा है।।
 


तुमने तन ही दिया भले हो, हमने मन भी बारा है

जो भी तुमको प्यारा है 

                               

तुमने तन ही दिया भले हो, हमने मन भी बारा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।
नहीं किसी से ईर्ष्या हमको
नहीं बाँधना चाहे तुमको
हमें भले ही ना मिल पाया,
जीवन-रस मिल जाये तुमको।
हिमगिरि तब था भाया हमको, अब सागर का किनारा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।
नेत्रों से जल, कभी न निकसे
हृदय-कुमुद रहे हरदम विकसे
अधरों पर मुस्कान रहे नित,
आप नहीं, अब हम ही सिसके।
स्वार्थों की मारी मति ने ही तो, प्रेम से छीना सहारा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।
मृग-मरीचिका है अब अपनी,
मरूथल में है माला जपनी
अपनी जान जहाँ में खोई,
नहीं किसी की जान हड़पनी।
विस्तृत जग आमन्त्रित करता, याद तुम्हारी कारा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।
क्षिति जल पावक गगन समीरा
देखो कैसे भये अधीरा ?
अवशोषण नासूर बना अब
कौन लगाये इसको चीरा।
धरा ही नहीं, आसमान भी, देखो हमने फाड़ा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।
जल को भी, हमने नहीं बक्शा
वायु भी फेलाये गमछा
पावक को भी बाँधा नर ने,
 कब तक इसका चलेगा चमचा।
प्रकृति के आड़ोलन ने ही, भय का झण्डा गाड़ा है।
हमको सब कुछ अच्छा लगता, जो भी तुमको प्यारा है।।


Tuesday, February 11, 2014

हे पिक! छिप जा घर में जाकर

हे पिक! छिप जा घर में जाकर



हे पिक! छिप जा घर में जाकर।
निरापद यहाँ कोई राह नहीं है,
विषैलेपन की थाह नहीं है।
जिनको रक्षक समझ रही तू,
ऐसी उनकी चाह नहीं है।
आग उगलते आम यहाँ पर!
हे पिक! छिप जा घर में जाकर।


शिक्षक नहीं, नौकर हैं यहाँ पर,
नेता नहीं, जोकर है यहाँ पर।
प्रशासक शिक्षा के माफिया,
अपराधी ही शाह यहाँ पर।
बसन्त झुलसता आज यहाँ पर!
हे पिक! छिप जा घर में जाकर।


घर भी सुरक्षित नहीं है लगता,
मसलें कली, फूल नहीं खिलता।
मर्यादा ही विकास पथ रोके,
कागज का ही, फूल है बिकता।
क्या पायेगी? यहाँ गा-गाकर!
हे पिक! छिप जा घर में जाकर।


नहीं फूल अब यहाँ हैं खिलते,
भ्रमर भी अब नहीं मचलते।
 तितली तेजाब से डरती हैं,
आस्तीनों में साँप ही पलते।
राष्ट्रप्रेमी डरता, प्रेम भी पाकर!
हे पिक! छिप जा घर में जाकर।
 


Tuesday, February 4, 2014

मित्रो बसन्तोत्सव आपके  जीवन में प्रेम और सौन्दर्य की सौगात लेकर के आये 

Sunday, February 2, 2014

समलैंगिकता का कुष्ठ मिटे

शीत ऋतु अब बीत गई है, कोयल गा बसन्त के गीत


न्याय कुमुद भारत में विकसे, जनतंत्र पाये फिर जीत।
शीत ऋतु अब बीत गई है, कोयल गा बसन्त के गीत।।
शिक्षालयों में शिक्षा की कामना,
जलाशयों में जल की कामना।
गर्भ में भी सुरक्षित हो नारी,
सुरक्षा बलों में सुरक्षित भावना।
राजनीति में नीति आये फिर, दहेज बिना मिले मन का मीत।
शीत ऋतु अब बीत गई है, कोयल गा बसन्त के गीत।।
कानून मंत्री कानून न तोड़े,
तत्र नहीं जन का सिर फोड़े।
न्यायालयों में न्याय मिल सके,
पीड़ित पर ना पड़ें हथोड़े।
नर-नारी संग-साथ रहें मिल, ऐसी बनायें अब हम रीत।
शीत ऋतु अब बीत गई है, कोयल गा बसन्त के गीत।।
समलैंगिकता का कुष्ठ मिटे,
भ्रष्टाचार का कलंक मिटे।
शिक्षक-छात्र सदाचारी बनें,
शिक्षालयों से धुंध हटे।
राष्ट्रप्रेमी हरियाली हो और सुन्दर सुमन खिलें हो पीत।
शीत ऋतु अब बीत गई है, कोयल गा बसन्त के गीत।।


Friday, January 31, 2014

शिकागो में जा शंख था फूँका

उनके पथ चलकर दिखलाओ


विवेकानन्द के गीत न गाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
कर्मठ बन, शक्ति की पूजा
दरिद्र मान नारायण पूजा।
अनूठे धर्म की राह दिखाई,
विवेकानन्द सम नहीं है दूजा।
नर-नारी संग बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


युवा शक्ति को पथ दिखलाया,
समन्वय का था पाठ पढ़ाया।
राष्ट्रप्रेमी कर शक्ति साधना,
बीजमंत्र था यह सिखलाया।
शिक्षित बन, शिक्षा फैलाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


शिकागो में जा शंख था फूँका,
अध्यात्म बिना, मन रहेगा भूखा।
चरित्र-गठन की सीख दी हमको,
विज्ञान का भी ना पड़ जाय सूखा।
प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


वेद मार्ग के पथिक थे स्वामी,
रामकृष्ण के थे अनुगामी।
संन्यासी बन गए भले ही,
राष्ट्र सेवा की भरी थी हामी।
कर्म से पूजा करते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


Sunday, January 26, 2014

90वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ने 30 साल छोटी महिला से रचाई दूसरी शादी

दैनिक जागरण, पानीपत, 25 जनवरी 2014   से साभार
पृष्ठ संख्या 6,एक नजर

90वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ने 30 साल छोटी महिला से रचाई दूसरी शादी


‘‘कोझिकोडः वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी और खतरनाक कीटनाशक इंडोसल्फान के खिलाफ मुहिम चलाने वाले एएस नारायण पिल्लई (90) ने अपने से 30 साल छोटी महिला से दूसरी शादी रचाई है। उनकी पहली पत्नी की वर्ष 1986 में मौत हो गई थी। अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन की केरल इकाई के उपाध्यक्ष पिल्लई ने गुरुवार को कोझिकोड निवासी आंगनवाड़ी कर्मचारी राधा (60) से यहाँ सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में शादी की। इस दौरान उनके कुछ करीबी लोग उपस्थित थे। पिल्लई के मुताबिक उन्होंने यह शादी वैवाहिक सुख के लिए नहीं बल्कि एक गरीब महिला को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए की है। पिल्लई करीब चार दशक पहले वायनाड में बस गए थे।’’
उपरोक्त समाचार छोटा होते हुए भी ध्यान खींचता है, जिसमें असामान्य उम्र पर शादी, दोनों की उम्र में असामान्य अन्तर व शादी का असामान्य उद्देश्य महत्वपूर्ण पहलू हैं। मै पिल्लई दंपत्ति को बधाई और सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ।
इस समाचार ने मुझे 14 वर्ष पीछे पहुँचा दिया, जब मैंने इसी उद्देश्य को लेकर एक आश्रमवासिनी विधवा महिला से पारिवारिक असहमति को नजरअन्दाज करते हुए अन्तर्जातीय विवाह किया था। यह अलग बात है मैं उस समय 30 वर्षीय अविवाहित युवक था। किन्तु मेरी शादी असफल हुई और प्राप्त अनुभव से महसूस हुआ कि शादी और सहायता दोनों अलग-अलग बिन्दु हैं। शादी सहायता का माध्यम नहीं हो सकती। शादी की अपनी आवश्यकताएँ, अपेक्षाएँ व अनिवार्यताएँ होतीं हैं। दोनों एक-दूसरे की शक्ति होते हैं। शादी में दोनों का समानता के स्तर पर एक-दूसरे के लिए समर्पण होता है। किसी भी प्रकार की दया शादी का आधार नहीं हो सकती। 

Saturday, January 25, 2014

-ः गणतंत्र को शुभकामनाएँ:-

-ः गणतंत्र को शुभकामनाएँ:- 

भारतीय गणतंत्र को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उसे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार व सेवाभावी नेता, लोकसेवक( जिनके हाथों फहराये जाने पर तिरंगे को गौरवानुभूति हो सके); नागरिकों के चरित्रनिर्माण में संलग्न सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ व आत्मसम्मानित शिक्षक; कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्र-भक्त व राष्ट्र के गौरव के लिए कर्मरत नागरिक मिलने की शुभकामनाएँ! 


Thursday, January 23, 2014

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।

        मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

               

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
कब?
कहाँ?
कैसे?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
साल?
दो साल?
या युगों के बाद?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
जवानी?
प्रोढ़ावस्था
या वृद्धावस्था में?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
शारीरिक?
मानसिक?
या आत्मिक रूप से?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
चेतन?
अवचेतन?
या अचेतन?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
नियोजित?
अनियोजित?
या अचानक?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मुझे मालुम है
वश इतना
एक ना एक दिन
एक ना एक पल
मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
तुम भले ही
पहचानने से इन्कार कर देना
कुशल व्यापारी की तरह।


Monday, January 20, 2014

कहो, कोयल कैसे फिर गाए?

बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??


बैठने को जब डाल नहीं है, कहो, कोयल कैसे फिर गाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
शिक्षालयों में डिग्री बिकतीं,
आश्रमों में हैं नारी लुटतीं।
गुरू जी ही हैं नकल कराते,
फर्जी उनकी उपस्थिति लगती।
समलैंगिकता अधिकार बने तो, प्रकृति कैसे फिर बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
न्यायाधीश ही इज्जत लूटें
नायक ही हैं देखो झूठे।
शिक्षा ही जब मूल्यहीन हो,
आशा किरण कहाँ से फूटे?
नर-नारी संघर्ष रहें करते, परिवार कहो कैसे बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
काँटों का संरक्षण करते,
गलत काम से नहीं हैं डरते।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे,
आस्था का आडम्बर करते।
कर्तव्य नहीं, अधिकार चाहिए; राष्ट्रप्रेमी कैसे बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??

Sunday, January 12, 2014

स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस- युवा दिवस पर विशेष

शिकागो में जा शंख था फूँका



विवेकानन्द के गीत न गाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
कर्मठ बन, शक्ति की पूजा
दरिद्र मान नारायण पूजा।
अनूठे धर्म की राह दिखाई,
विवेकानन्द सम नहीं है दूजा।
नर-नारी संग बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
युवा शक्ति को पथ दिखलाया,
समन्वय का था पाठ पढ़ाया।
राष्ट्रप्रेमी कर शक्ति साधना,
बीजमंत्र था यह सिखलाया।
शिक्षित बन, शिक्षा फैलाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
शिकागो में जा शंख था फूँका,
अध्यात्म बिना, मन रहेगा भूखा।
चरित्र-गठन की सीख दी हमको,
विज्ञान का भी ना पड़ जाय सूखा।
प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
वेद मार्ग के पथिक थे स्वामी,
रामकृष्ण के थे अनुगामी।
संन्यासी बन गए भले ही,
राष्ट्र सेवा की भरी थी हामी।
कर्म से पूजा करते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


Tuesday, January 7, 2014

बातों के ही शेर

बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से आग लगायें।
अकर्मण्यता, लापरवाही, पड़ोसियों को बस धमकायें।।
अपनी दीवार टूटी-फूटी,
कथनी-करनी हमसे रूठी।
आतंकियों का बचाव करें,
वोट की खातिर, नीति झूँठी।
आग में हम घी डालते, पड़ोसी क्यों ना उसे बढ़ायें?
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से आग लगायें।
माना पड़ोसी उच्श्रृंखल बच्चा,    
हम नहीं कर सकते, अपनी रक्षा?
खुद ही आग में वह जल रहा,
खिलाड़ी वह है भाई कच्चा!
बचाने की हम गुहार लगाते, रक्षा अपनी नहीं कर पायें।
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से ही आग लगायें।
राश्ट्र संघ हो या अमरीका,
सबकी अपनी-अपनी टीका।
स्वयं मरे बिन स्वर्ग न मिलता,
खींच दो बढ़कर, लक्ष्मण लीका।
`
वीर भोग्या वसुन्धरा´, शान्ति गीत कायर बन गायें?
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से ही आग लगायें।

प्रेम की खोज में दुनिया भटके, किन्तु प्रेम विरलों को मिलता

प्रेम की खोज में दुनिया भटके, किन्तु प्रेम विरलों को मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
प्रेम नहीं भौतिक वस्तु है,
प्रेम नहीं बाजार में मिलता।
प्रेम लुटाने का अमृत है,
प्रेम नहीं सौदे में फलता।
प्रेम नहीं रिश्तों तक सीमित, प्रेम नहीं वासना में फलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
कैसा प्रेम हम नहीं समझे?
तेजाब डाल जलाया चेहरा।
पति-गृह दुल्हन जल जाती,
जिसके लिए बाँधा था सेहरा।
प्रेम के गीत सभी हैं गाते, किन्तु, प्रेम नहीं शब्दों में मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
कर्तव्यों की डोर अलग है,
किन्तु प्रेम उससे है आगे।
प्रेम से पत्थर उर भी पिघले,
प्रेम पुकार प्रभू भी जागे।
प्रेम नहीं अधिकार किसी का, प्रेम नहीं विरासत में मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।

Sunday, January 5, 2014

२०० वां शतक

मित्रो, अक्टूबर २००७ से इस ब्लोग पर कार्यरत हूं. आज २००वां 

शतक अर्थात २००वीं पोस्ट प्रस्तुत है-


जीवन-पथ काव्य संग्रह से साभार


कवि- एक परिभाषा


कहो न कविवर मानव हृदय कैसे कवि बन जाता है।
एक लड़ी में पिरों भावों को जन-जन को हर्षाता है।।
भले शब्द न मिलें कवि को बस अन्तर्मन की पीर मिले।
मननशील और व्यथित हृदय सदा संवेदनशील  मिले।
जड़ जगत के कण-कण में भी प्राणों का आभास मिले।
मरुस्थल के तपते आँचल में सदा साँस की आस मिले।
तिरस्कार को समझ स्वागत मानव जब अपनाता है।
तभी से समझो प्रिय बन्धु! मानव कवि बन जाता है।।

मुक्तक

हैं भावना के थाल में जब चेतना के दीप जलते।
संवेदना की गोद में अनुभूतियों के राग पलते।
दर्द दुनिया का सहलाने की कला जब सीख लेते-
तब ही जन्म लेती कविता और मधुरतम गीत बनते।।
               कवि - श्री रामफल सिंह खटकड़
                     हिन्दी प्राध्यापक
                     गाँव व डाकघर- खटकड़, जीन्द-126115

Thursday, January 2, 2014

रामप्रीत जी की अदा