Thursday, April 14, 2022

आघात कितना भी गहरा हो

हम रिश्तों में बदी न करते 


तुमने भले ही ठगा हो हमको, हम बदले में ठगी न करते।

आघात कितना भी गहरा हो, हम रिश्तों में बदी न करते।।

तुमने भले ही हमें फसाया।

हमने तुम पर प्यार लुटाया।

नहीं उजाड़ा कभी किसी को,

प्रेमी संग है तुम्हें बसाया।

अपने बंधन काट रहे हम, तुमसे कोई हँसी न करते।

आघात कितना भी गहरा हो, हम रिश्तों में बदी न करते।।

धोखे से नहीं रिश्ते बनते।

कानूनों से विश्वास न पलते।

विश्वासघात कर प्रेम चाहतीं,

तलवारों से पुष्प न खिलते।

जिसकी थीं, उसको ही सौंपी, किसी की चीज कभी न हरते।

आघात कितना भी गहरा हो, हम रिश्तों में बदी न करते।।

समय बहुत अब बीत गया है।

हमारा नहीं कोई मीत भया है।

तुम्हारी चोट थी इतनी गहरी,

धोखा तुम्हारा जीत गया है।

कपट कपट का मित्र न होता, कपटी से भी कपट न करते।

आघात कितना भी गहरा हो, हम रिश्तों में बदी न करते।।

 


प्रेमी तो बस प्रेम बाँटता

प्रेम ही उसकी जान है


 प्रेम नाम होते हैं सौदे, प्रेम नहीं वहाँ बान है।

प्रेमी तो बस प्रेम बाँटता, प्रेम ही उसकी जान है।।

प्रेम समर्पण, प्रेम है पूजा।

प्रेम में नहीं कोई होता दूजा।

मान मनोवल तो चलता है,

आपा होम कर होती पूजा।

प्रेम में कोई माँग न होती, ना होता अभिमान है।

प्रेमी तो बस प्रेम बाँटता, प्रेम ही उसकी जान है।।

प्रेम नहीं है कभी बाँधता।

प्रेम नहीं धन है जाँचता।

प्रेम कभी प्रतिशोध न लेता,

प्रेम देकर है प्रेम बाँचता।

प्रेम में कभी नफरत ना होती, प्रेम के ही बस गान हैैं।

प्रेमी तो बस प्रेम बाँटता, प्रेम ही उसकी जान है।।

अधिकारों की जंग नहीं है।

कानूनों का भंग नहीं है।

अधिकारों का संघर्ष जहाँ है,

कुछ भी हो पर प्रेम नहीं है।

प्रेम नाम है कपट जहाँ, प्रेम का नहीं वहाँ मान है।

प्रेमी तो बस प्रेम बाँटता, प्रेम ही उसकी जान है।।


Wednesday, April 13, 2022

प्रेम ही है जीवन की सरगम

प्रेम, प्रेमी की आन है 


प्रेम ही है जीने का मकसद, प्रेम, हृदय का गान है।

प्रेम ही है जीवन की सरगम, प्रेम, प्रेमी की आन है।।

हर प्राणी की चाह प्रेम है।

हर प्राणी की आह प्रेम है।

हर प्राणी है प्रेम का भूखा,

हर प्राणी की राह प्रेम है।

प्रेम नहीं है, कानूनी बंधन, प्रेम, प्रेमी की जान है।

प्रेम ही है जीवन की सरगम, प्रेम, प्रेमी की आन है।।

प्रेम नहीं किसी को बाँधें।

प्रेम नहीं कोई स्वारथ साधे।

प्रेमी कभी कोई माँग न करता,

प्रेमी, प्रेम को बस आराधे।

प्रेम नाम पर स्वारथ साधें, वे, नहीं, प्रेम के मान हैं।

प्रेम ही है जीवन की सरगम, प्रेम, प्रेमी की आन है।।

प्रेम नाम पर जो हैं फँसाते।

खुद को ही हैं वे भरमाते।

बिना शर्त जो करें समपर्ण,

प्रेम पुजारी, प्रेमी, कहलाते।

प्रेम नाम, अधिकार माँगते, वे, नहीं प्रेम की शान हैं।

प्रेम ही है जीवन की सरगम, प्रेम, प्रेमी की आन है।।


Tuesday, April 12, 2022

तुमने हमको गले लगाकर

प्रेम का पहला पाठ पढ़ाया 


आभार तुम्हारा करते पल-पल, जीवन जीना हमें सिखाया।

तुमने हमको गले लगाकर, प्रेम का पहला पाठ पढ़ाया।।

जीवन में हम भटक रहे थे।

बिना लक्ष्य के लटक रहे थे।

तुमने तब था थामा हमको,

जब सबको हम खटक रहे थे।

जब-जब हम गिरकर टूटे, तुमने अपना हाथ बढ़ाया।

तुमने हमको गले लगाकर, प्रेम का पहला पाठ पढ़ाया।।

नहीं कभी भी हमको बांधा।

जब भी टूटे तुमने साधा।

तुमसे ही था जीना सीखा,

तुम्हारे बिना अब भी हूँ आधा। 

हमने थी बस दया दिखाई, तुमने सब कुछ हमें थमाया।

तुमने हमको गले लगाकर, प्रेम का पहला पाठ पढ़ाया।।

प्रेम की नहीं कोई है सीमा।

ना कोई बंधन, ना कोई बीमा।

अपने अंदर हमें समाकर,

आनन्द की तोड़ी सारी सीमा

जीवन अमृत हमें पिलाकर, युग शिखरों पर हमें चढ़ाया।

तुमने हमको गले लगाकर, प्रेम का पहला पाठ पढ़ाया।।


Monday, April 11, 2022

प्रेम में नाप-तौल ना होती

कानूनों का जाल नहीं है


 प्रेमी प्रेम लुटाता पल पल, पाना उसको  माल नहीं है।

प्रेम में नाप-तौल ना होती, कानूनों का जाल नहीं है।।

चाह नहीं, चाहत नहीं।

राह नहीं, राहत नहीं।

समर्पण है, माँग नहीं,

आह नहीं, आहत नहीं।

प्रेम है जीवन, प्रेम संजीवन, शिकारी का कोई जाल नहीं है।

प्रेम में नाप-तौल ना होती, कानूनों का जाल नहीं है।।

समर्पण में संघर्ष न होता।

सुख बाँट कर दुखी न होता।

कर्तव्य केवल याद हैं रहते,

अधिकारों का हर्ष न होता।

प्रेम में तो बस सृजन है होता, प्रेम किसी का काल नहीं है।

प्रेम में नाप-तौल ना होती, कानूनों का जाल नहीं है।।

प्रेम को कोई लूट न सकता।

प्रेमी कभी भी झूठ न बकता।

नहीं करे कभी कोई दावा,

आपा मिटाकर, प्रेम हो सकता।

प्रेम तो खुशियों का है सर्जक, बजाता केवल गाल नहीं है।

प्रेम में नाप-तौल ना होती, कानूनों का जाल नहीं है।।


Sunday, April 10, 2022

विश्वास नहीं अब, खुद पर हमको

गुस्सा करना भूल गए


 तुमने प्रिये! आघात किया जो, हँसना-हँसाना भूल गए।

विश्वास नहीं अब, खुद पर हमको, गुस्सा करना भूल गए।।

हमने सब कुछ सौंप दिया था।

बिना जाँच विश्वास किया था।

तुमरे जाल में फंसा था ऐसा,

धोखे को सच मान जिया था।

प्रेम वचन जो मधुर थे उस पल, आज वही हैं शूल भए।

विश्वास नहीं अब, खुद पर हमको, गुस्सा करना भूल गए।।

चोट भले ही कितनी गहरी।

जिंदगी नहीं है, फिर भी ठहरी।

जिजीविषा अब भी जीवित है,

सच है हमारा आज भी प्रहरी।

उत्साह, आक्रोश, क्रोध था पल पल, निराश आज हम कूल भए।

विश्वास नहीं अब, खुद पर हमको, गुस्सा करना भूल गए।।

केवल खुद को मुक्त चाहते।

तुमको भी नहीं रिक्त चाहते।

निज प्रेमी संग, खुशी रहो तुम,

हम तो बस एकांत चाहते।

पुष्प भी काँटे बन जाते हैं, काँटें भी हमको कूल भए।

विश्वास नहीं अब, खुद पर हमको, गुस्सा करना भूल गए।।


Saturday, April 9, 2022

प्रेम व्याप्त जग के कण कण में,

प्रेम जगत का सार है


 प्रेम व्याप्त जग के कण कण में, प्रेम जगत का सार है।

जीवन वही सफल कहलाता, जो बिखराता प्यार है।।

प्रेम से जीवन विकसित होता।

प्रेम बिना, भंवरों में गोता।

आनंद शिखर चढ़ पाता है नर,

प्रेम, प्रेम संग, प्रेम से सोता।

प्रेम हेतु संघर्ष जगत में, प्रेम सृजन आधार है।

प्रेम व्याप्त जग के कण कण में, प्रेम जगत का सार है।।

जिसको नहीं प्रेम मिल पाता।

निरर्थक सब हो रिश्ता-नाता।

जीवन नहीं वह जी पाता है,

मन का मीत नहीं जो पाता।

हर बाधा को पार वो करता, जिसको मिलता यार है।

प्रेम व्याप्त जग के कण कण में, प्रेम जगत का सार है।।

प्रेम ही देव, प्रेम ही गीता।

प्रेम ही राधा, प्रेम ही सीता।

विकार मुक्त नर हो जाता है,

प्रेम का सर्जक, प्रेम जो पीता।

प्रेम का अभाव नहीं जब होता, प्रेम से  बेड़ा पार है।

प्रेम व्याप्त जग के कण कण में, प्रेम जगत का सार है।।


Friday, April 8, 2022

क्रूरता की हद पार कर गईं,

मौत भी हमको नहीं डराती


 शिकवा शिकायत का पल बीता।

जीवन रह गया रीता-रीता।

विश्वास घात ने विश्वास डिगाया,

मिलतीं नहीं अब सीता गीता।


किसी को कितना भी तुम चाहो!

प्रेम से कितना भी अवगाहो!

दिल हैं देखो! मशीन बन गए,

जीते रहो या तुम मर जाओ।


प्रेम नहीं अब पवित्र रह गया।

ऑनलाइन वह आज बिक गया।

लालच, लिप्सा और वासना,

धोखे का पर्याय रह गया।


तुमने भी तो वही किया है।

संबन्धों को नहीं जिया है।

प्रेम और विश्वास की खातिर,

हमने तो बस जहर पिया है।


धोखा खाकर शिकार बन गए।

शिकारी तुम, हम शिकार बन गए।

विश्वासघात की चोट तुम्हारी,

प्रेम और विश्वास मिट गए।


जीवन में अब आश नहीं है।

कोई अपना खास नहीं है।

जीवन पथ पर निपट अकेले,

कोई अपने पास नही है।


कर्म पथ हम आज भी चलते।

सपने नहीं अब सुनहरे पलते।

नहीं चाहिए साथ किसी का,

खुद से खुद को धोखे मिलते।


प्रेम का गान तुम अब भी गातीं।

प्रेम की हत्या कर,  भरमातीं।

क्रूरता की हद पार कर गईं,

मौत भी हमको नहीं डराती।


Thursday, April 7, 2022

धोखे की तेरी चोट थी गहरी

 पत्थर पिघला, तेल हो गया


अकेलेपन से मेल हो गया।

खुद से खुद को प्रेम हो गया।

विश्वास घात की चोट से तुमरी,

जीवन अपना खेल हो गया।


तेरे बिन निःसंग हो गया।

लक्ष्य हमारा भंग हो गया।

पढ़ना लिखना भी है छूटा,

बिन पटरी की रेल हो गया।


प्रेमी से, मैं कौन हो गया।

वाचाल से, अब मौन हो गया।

तेरे बिन सब कुछ अब सूना,

आवास ही अपना जेल हो गया।


राह की अब मैं धूल हो गया।

गर्मी निकली, कूल हो गया।

धोखे की तेरी चोट थी गहरी,

पत्थर पिघला, तेल हो गया।


Wednesday, April 6, 2022

नर-नारी के दिल जब मिलते

 उनसे बड़ा उत्कर्ष नहीं है



समानता का संघर्ष नहीं है।

मिलने से बड़ा हर्ष नहीं है।

नर-नारी के दिल जब मिलते,

उनसे बड़ा उत्कर्ष नहीं है।


प्रेम में मिले जो वही सही है।

रंग कोई हो, वही सही है।

प्रेम की कोई जात न होती,

हमने तुमरी बाँह गही है।


दिल से दिल में झूठ न होता।

प्रेम सरोवर लगता गोता।

स्वर्ग की कोई चाह न रहती,

प्रेम प्रेम संग जब है सोता।


अधिकारों का संघर्ष नहीं है।

चलता कोई कानून नहीं है।

विश्वास घात से सब कुछ मिटता,

सच के बिना, विश्वास नहीं है।


प्रेम में ना हो कोई सौदा।

प्रेम का नहीं होता हौदा।

प्रेम का सार है पूर्ण समर्पण,

खुशियाँ मिलतीं, खाकर कौंदा।


प्रेम में नहीं वासना होती।

लालच और आश ना होती।

सब कुछ समर्पित करके भी,

चाहत कोई खास ना होती।


प्रेम नहीं हम कभी कर पाए।

प्रेम के केवल गाने गाए।

तुमने सब कुछ सौंप दिया था,

प्रेम के हमने पाठ पढ़ाए।


Monday, April 4, 2022

ठोकर से भी हम हरषाए

 हम प्यार तुम्हें करते कितना?

समझा नहीं या समझ न पाए?

तुमने भले ही हो भरमाया?

हमने तुम्हारे गाने गाए।


प्यार तुम्हारा भले हो सौदा?

हमने समझा उसे घरौंदा।

तुम्हारी यादों में जीते हम,

तुमने भले ही प्यार को रौंदा।


तुम्हारी खुशियों से खुश होते।

मुस्काकर भी हम अब रोते।

आवाज तुम्हारी सुनने को हम,

पल पल तड़पें विचलित होते।


तुमसे वफा की चाह नहीं है।

ठुकराओ भले! आह नहीं है!

पल पल जीते यादों में हम,

तुमको कोई परवाह नहीं है।


हमने तुमसे कब कुछ चाहा?

केवल प्रेम से था अवगाहा।

तुम्हारी खुशियों की खातिर ही,

लुटकर भी करते हम आहा!


तुमने कहा, वही था माना।

तुमसे हटकर कुछ ना जाना।

विश्वास पर घात किया है,

अब भी बहाने करती नाना।


प्रेम तुम्हारी चाह  नहीं है।

धोखा हमरी आह नहीं है।

दिल तो सौंप दिया था तुमको,

तुम्हारी कोई थाह  नहीं है।


हमने तुमको प्यार किया था।

तुम्हारे प्रेमी को भी जिया था।

तुम थीं, खुद को धोखा देतीं,

हमने तुम्हारा क्रोध पिया था।


हम तो तुम्हें भुला नहीं पाए।

नित ही तुमरे गाने गाए।

तुमने ठोकर भले ही मारी,

ठोकर से भी हम हरषाए।


Sunday, April 3, 2022

सबको प्रेम करने की जिद में,

 किसी को गले लगा नहीं पाए



सबको पल पल सीख दे रहे, खुद को कभी सिखा नहीं पाए।

अपनी ढपली खुद ही बजाएं, ओरों को कभी सुन नहीं पाए।

प्यार की खोज करते हैं पल पल, पास नहीं है, नहीं दे पाए,

आदर्श के, दंभ में भरकर, किसी को गले लगा नहीं पाए।।


अलग राह चलने की जिद में, साथ किसी के चल नहीं पाए।

सच के साथ चलने की जिद में, छोड़ गए सब, नहीं चल पाए।

दुनियादारी नहीं कभी सीखी, ईमानदारी की टेक लगाए;

सबको प्रेम करने की जिद में, किसी को गले लगा नहीं पाए।।


सबके साथ, नहीं चल सकते, इस सच को, कभी समझ नहीं पाए।

सबके अपने अपने पथ हैं, पथ तज, साथ में, चल नहीं पाए।

आगे बढ़कर जो भी आया, लुटते रहे हम, लूट न पाए,

सबको मित्र, हम, समझ रहे थे, किसी को गले लगा नहीं पाए।।


कविता लिखी भले ही हमने, गीत कभी कोई गा नहीं पाए।

ओरों से तो मिलते क्या हम, खुद से खुद को मिला नहीं पाए।

घाव सहे नित, विश्वासघात के, खुद को, फिर भी सुधार न पाए,

सहयोग सभी का करते हैं हम, किसी को गले लगा नहीं पाए।।


Sunday, November 7, 2021

समय भले ही बहुत है बीता

 याद आज भी ठहरी हैं


प्रेम दिनों-दिन बढ़ता जाता, आँखें तुम्हारी गहरी हैं।

समय भले ही बहुत है बीता, याद आज भी ठहरी हैं।।

यादों में जीते हैं हम संग।

सौन्दर्य पूरित, है अंग-अंग।

उम्र भले ही हुई पचास की,

बुद्धि और उर की जारी जंग।

मन मारतीं, उर है दबातीं, लज्जा तुम्हारी प्रहरी है।

समय भले ही बहुत है बीता, याद आज भी ठहरी हैं।।

कब तक यूँ मारोगी मन को।

सुन्दर हो तुम, सजाओ तन को।

पास नहीं आ सकतीं माना,

बातों से हरषाओ मन को।

हम तो गाँव के गँवार रह गए, तुम बनीं अब शहरी हैं।

समय भले ही बहुत है बीता, याद आज भी ठहरी हैं।।

करते हैं हम तुम्हारी प्रतीक्षा।

प्रेमी कभी करते न समीक्षा।

इंतजार की वेला असीमित,

प्रेम की तुमने ही दी दीक्षा।

उर की पुकार, जबाव नहीं है, जान बूझकर बहरी है।

समय भले ही बहुत है बीता, याद आज भी ठहरी हैं।।


Sunday, October 31, 2021

तब रोज ही मनती दीवाली

 दीवाली 

     


जब साथ में होती घरवाली,

तब रोज ही मनती दीवाली।


जब पास में अपने होती है।

वह सपने नए नित बोती है।

हमें जीवंत बनाए रखने को,

वह अपने आपको खोती है।

जब प्रेम में होती मतवाली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


जादू उसके कर में है।

खुशी छिपी हर वर में है।

समस्याओं से घिरी हुई,

पर समाधान भी सर में है।

दूध की देती जब प्याली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


कभी नहीं रहती खाली।

कभी तवा, कभी थाली।

संतुष्ट नहीं कभी होती,

पर नहीं कभी देती गाली।

जब हमें सजाती बन माली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


फूल नहीं, वह फुलवारी।

कभी नहीं वह है हारी।

समर्पण और त्याग की देवी,

हर पल लगे हमें प्यारी।

जब सजा के लाती है थाली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


साक्षात लक्ष्मी, नहीं है मूरत।

दुनिया में सबसे खुबसूरत।

साथ में जब वह होती है,

नहीं किसी की हमें जरूरत।

जब आती है छोटी साली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


जीवन मधु है वही पिलाती।

मरते हुए भी हमें जिलाती।

हमने भले ही हो ठुकराया,

नहीं कभी भी वह ठुकराती।

जब उसके चेहरे पर लाली।

तब रोज ही मनती दीवाली।


सखी, सहेली, वह आली।

कष्टों के हित है काली।

चाह नहीं, चाहत नहीं,

मुस्कान उसकी, सजी थाली।

अधर नयन हों, रस प्याली।

साक्षात, वही, है दीवाली।


जब साथ में होती घरवाली।

तब रोज ही मनती दीवाली।




Monday, October 25, 2021

इक दूजे के हित ही बने हैं

 नर हो  या फिर नारी है


इक दूजे के हित ही बने हैं, नर हो  या फिर नारी है।

संघर्ष में ना समय नष्ट कर, प्रेम से खिली फुलवारी है।

इक-दूजे के दिल में समाओ।

इक-दूजे पर प्रेम लुटाओ।

इक-दूजे बिन रह नहीं सकते,

इक होकर के भेद मिटाओ।

हाथ थाम दोनों, साथ चलो जब, देखे दुनिया सारी है।

इक दूजे के हित ही बने हैं, नर हो  या फिर नारी है।।

अलग अलग क्यों रहे अधूरे।

मिलकर दोनों हो जाओ पूरे,

इक-दूजे के विपरीत चलकर,

हो जाओगे, तुम दोनों  घूरे।

प्रेम में कोई माँग न होती, प्रेम के बनो न व्यापारी है।

इक दूजे के हित ही बने हैं, नर हो  या फिर नारी है।

प्रेम खेल मिल साथ में खेलो।

कष्टों को मिलकर के ठेलो।

दुनिया जो कहती है कह ले,

साथ में रह वियोग ना झेलो।

साथ-साथ चल कर्म करो, सजाओ जीवन क्यारी है।

इक दूजे के हित ही बने हैं, नर हो  या फिर नारी है।


Sunday, October 17, 2021

ईश्वर भक्तों से कुत्ता भक्तों तक की महान परंपरा


वर्तमान समय में सोशल मीडिया पर भक्तों की चर्चा जोर-शोर से हो रही है। कुछ अज्ञानी लोग भक्त शब्द का प्रयोग नकारात्मक अर्थ में भी करते हैं। भक्ति योग को सभी योगों में श्रेष्ठतम् माना गया है। भक्त परंपरा अनादि काल से रही है। वह चाहे ईश्वर भक्ति के रूप में रही हो या देशभक्ति के रूप में, राज भक्तों से भी इतिहास भरा पड़ा है। समय समय पर राजभक्ति को ही देशभक्ति की भी संज्ञा दी जाती रही है। देशभक्ति से राजभक्ति, राजभक्ति से कुर्सीभक्ति से होते हुए व्यक्ति भक्ति ही नहीं कुछ भक्त लोग तो कुत्ता भक्ति में भी महानता सिद्ध करते हैं। भक्तों की महानता की यह श्रृंखला अनादि काल से जारी है और अनादि काल तक अक्षुण्य रहेगी। इस बात में किसी प्रकार का संदेह नहीं है। इसे अक्षुण्य रहना भी चाहिए क्योंकि भ्रष्टाचार की महान परंपरा भी भक्त परंपरा के आधार पर ही फलती-फूलती है।

भक्तों की महान परंपरा सभी धमों में मिलती है। सनातन धर्म कहलाने वाले हिंदू धर्म में भक्ति मार्ग, भक्ति साहित्य, भक्ति आंदोलन, भक्त कवियों और संतो की भरमार है तो सूफी भक्त परंपरा के साथ नवीनतम् धर्म इस्लाम भी पीछे नहीं है। पितृ भक्ति में राम, और भ्रातृ-भक्ति में लक्ष्मण और भरत के सानी मिलना मुश्किल है तो राजभक्त के रूप में विभीषण का नाम भी लिया जा सकता है, जिन्होंने राज्य की खातिर अपने ही कुटुंब से किनारा कर लिया। कुर्सी भक्तों में कंस का नाम ले सकते हैं, जिसने कुर्सी की खातिर अपने पिता को बंदी बनाया, यह परंपरा मुगल काल से लेकर अभी तक जारी है। वर्तमान में भी पिता को हटाकर कुर्सी पर बैठने की परंपरा जारी है। अंग्रजों ने भी इस महान परंपरा के फलने-फूलने की पूरी व्यवस्था की। भारत में मैकाले महोदय द्वारा स्थापित शिक्षा प्रणाली अभी तक इस भक्त परंपरा को जिंदा रखे हुए है। तभी तो राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-

आधुनिक शिक्षा अगर तुम, प्राप्त भी कुछ कर सको।

तो लाभ क्या बस क्लर्क बन, पेट अपना भर सको।

सिर झुका लिखते रहा सुन, अफसरों की गालियाँ,

दो सकेगीं रात को दो रोटियाँ, घर वालियाँ।

वही भक्त पैदा करने वाली शिक्षा व्यवस्था कुछ सामयिक संशोधनों के साथ बदस्तूर जारी है। कहने को तो हम नयी शिक्षा नीति लागू करने का बार-बार प्रयास करते हैं किंतु अंग्रेजी की भक्त परंपरा हिंदी थोपी जाने का हवाला देकर सारी राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों को धता बता देती है।

जब भक्त की बात करते हैं तो कुछ लोग अंधभक्त कहकर खिल्ली उड़ाने का काम करते हैं किंतु लेखक इस बात का सख्त विरोधी है। भक्ति के क्षेत्र में कहावत है कि गुरू और इष्ट के अवगुणों को नहीं देखा जाता। गुरू के अवगुण देखने पर महापाप लगता है। वह भक्त ही क्या जो अंधा न हो। आँखों, कानों और दिमाग का प्रयोग करने वाले कभी भक्त नहीं हो सकते। भक्ति तो स्वार्थ आधारित दिल का सौदा है। सूरदास अंधे होने के कारण ही भक्त बन सके। तुलसी ने दास्य भाव को अंगीकार कर लिया और भक्तों में नाम लिखाया। तभी तो तुलसी के हवाले से कहा जाता है-

कलयुग केवल नाम अधारा। सुमिरि-सुमिरि नर उतरहिं पारा।

अर्थात इस मशीनी युग में केवल नाम की भक्ति करके ही हमारे स्वार्थ सिद्ध हो सकते हैं। वह स्वार्थ भले ही काम करने के झंझट से मुक्ति का हो या कुर्सी से चिपके रहने का या येन केन प्रकारेण धन लिप्सा को पूरा करने का। दास परंपरा के मलूकदास ने तो स्पष्ट लिखा है-

अजगर करे न चाकरी, पंक्षी करे न काम।

दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।

कहने का आशय यह है कि भक्तों को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। वे काम में नहीं नाम की भक्ति में विश्वास रखते हैं। उनका स्वार्थ सिद्ध होना चाहिए वह कुत्ते की भक्ति से भी पीछे नहीं रहेंगे। यह भक्त परंपरा ही है जो भ्रष्टाचारी व्यवस्था का संरक्षण करती है।

भक्त परंपरा पर लिखने का आशय पाठक गण यह न निकालें कि लेखक भी कोई महान भक्त है। लेखक न कभी भक्त था, न भक्त है और न ही, भक्त बनने का कोई इरादा रखता है। इन भक्तों, राजभक्तों, कुर्सीभक्तों व कुत्ताभक्तोें की अक्षुण्य परंपरा में लेखक कोई योगदान देना नहीं चाहता। लेखक न तो इस परंपरा को को पुष्ट करना चाहता है और न ही इसको समाप्त करने में कोई रूचि रखता है। लेखक ने अपने पिता से बचपन में ही सुना था, ‘कुत्ता पाले, सो कुत्ता और कुत्ता मारे सो कुत्ता।’ अतः लेखक भक्तों को दूर से ही साक्षात दण्डवत करने में विश्वास रखता है। उनकी महानता पर किसी प्रकार का प्रश्नचिह्न लगाए बिना अपने कर्म पथ पर बढ़ते रहने में विश्वास रखता है। 

भारत में भक्त परंपरा कितनी पुष्ट है इसकी पुष्टि के लिए इसी प्रकार के भजन भी प्रचलित हैं। लेखक आश्चर्यचकित रह गया, जब सुना ‘‘राम से बड़ा राम का नाम।’’ जबकि इसको होना चाहिए था, ‘‘राम से बड़ा राम का काम।’’ प्रसिद्ध दार्शनिक कांट के अनुसार नैतिक मूल्यों का आधार कर्तव्य के लिए कर्तव्य( doctrine of duty for duty's sake ) होना चाहिए अर्थात कर्तव्य महत्वपूर्ण है कर्तव्य किसी उद्देश्य से किया जा रहा है या किस स्वार्थ के लिए किया जा रहा है, वह नैतिक मूल्य को गिरा देता है। विश्व प्रसिद्ध प्रबंधन गुरू श्री कृष्ण ने भी अपने प्रबंधन ग्रंथ गीता में लिखा है-

‘कर्मण्येवाधिकारेस्तु मा फलेशु कदाचन’

अर्थात हमें अपने कर्तव्य पालन पर ही ध्यान देना है। उससे प्राप्त होने वाले फल पर ध्यान केन्द्रित करके अपने जीवन मूल्यों का पतन नहीं करना है। किंतु ईश्वर भक्तों से लेकर कुत्ता भक्तों की इस महान परंपरा को श्री कृष्ण भी कहाँ तोड़ पाए? भक्त परंपरा में कृष्ण भक्तों की एक नई परंपरा सुदामा और गोपियों की और जुड़ गई। गोपियाँ तो भक्त परंपरा में इतनी महान थीं कि उन्होंने उद्धव को भी भक्त बना डाला। नारियाँ तो भक्ति परंपरा की पराकाष्ठा रहीं हैं। सती प्रथा भक्ति का शिखर कही जा सकती है, जिसको नारियों के बलिदान पर ही तथाकथित भक्तों ने स्थापित किया। 



Saturday, October 16, 2021

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो

 मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ


परिस्थितियों की दासी बनीं तुम, मैं तो पथ पर खड़ा हुआ हूँ।

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो, मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ।।

समय बहुत अब बीत गया है।

यौवन बीता, मन रीत रहा है।

तुमने भले ही भुला दिया हो,

कर प्रतीक्षा, मन मीत रहा है।

तुम संबन्धों की बेल में जकड़ीं, मैं प्रेम की सूली चढ़ा हुआ हूँ।

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो, मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ।।

यादों में तुम नित आती हो।

सद्य स्नाता, अब भी भाती हो।

अंग-अंग सौन्दर्य टपकता,

स्वर में ज्यों कोयल गाती हो।

वियोग वेदना कितनी भी दे लो, तुम्हारे प्रेम से गढ़ा हुआ हूँ।

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो, मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ।।

मैंने तो केवल प्रेम किया है।

दूर से भी,  साथ जिया है।

तुम्हारे लिए मैं तड़प रहा हूँ,

तुमको भी तो, मिला न पिया है।

एक बार आ, दर्शन दो प्रिय, प्रेम के पथ पर पड़ा हुआ हूँ।

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो, मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ।।

अधरों की मुस्कराहट देखूँ।

सौन्दर्य से मैं, आँखें सेकूँ।

एक बार आ गले लगा लो,

तुम्हारे लिए मैं खुद को बेकूँ।

अन्दर लेकर देखो तो प्रिय, तुम्हारे प्रेम से बड़ा हुआ हूँ।

तुम वायदे से, मुकरी मौन हो, मैं वचनों पर अड़ा  हुआ हूँ।।

Thursday, October 7, 2021

जीवन मधुर संगीत भी है

जीवन

यहां हार भी है, यहां जीत भी है।

जीवन मधुर संगीत भी है।।

अपनों का संग है,जीने की उमंग है।

इंद्रधनुष सम खुशियों का रंग है।।

खुशहाली भी है, और लाचारी भी।

छाई है जीवन में, महामारी भी।।

खुशियों के,गमों के,सभी प्रकार के रंग है।

जीवन अपने आप में, एक मीठी जंग है।।

कोरोना के इस रण में, हम सभी अस्त्र है।

धैर्य और आत्मविश्वास, हमारे शस्त्र है।।

बुलंद र हौसला, जंग में कर प्रहार।

न देख उस पार, जीत हो या हार।।

जीत की न खुशी, न हो अफसोस हार का।

जीवन एक सबक है , मौका है सुधार का।।

जीवन एक सीख है,जीवन गुरु है।

अंतके बाद ही तो कुछ नया शुरू है।

                       

                                                                                                                                                                                                                    आदित्य चंद्र साहा, मेघालय

 

 

Sunday, October 3, 2021

तुम्हारे अधरों से हँसता में

 तुम मेरे नयनों से रोती हो


मैं तो केवल सींच रहा हूँ, प्रेरणा तुम ही बोती हो।

तुम्हारे अधरों से हँसता में, तुम मेरे नयनों से रोती हो।।

भले ही तुम मेरे पास नहीं हो।

पल नहीं कोई आस  नहीं हो।

जीवन में कभी मिल न सकोगी,

करती क्या परिहास  नहीं हो?

जो भी, जहाँ भी कर्म में करता, यादों में तुम ही रोती हो।

तुम्हारे अधरों से हँसता में, तुम मेरे नयनों से रोती हो।।

तुम्हें उर में सजाये जीता हूँ।

नित .स्वप्न सुधा, मैं पीता हूँ।

तुम्हारे बिना, नही कोई जीवन,

ना मालूम, मैं, क्यों जीता हूँ?

नयनों में अब भी स्वप्न बसे, निहार रहा मैं, तुम सोती हो।

तुम्हारे अधरों से हँसता में, तुम मेरे नयनों से रोती हो।।

मिलन वायदा, तुमने किया था।

वायदे में, मैंने, स्वप्न जिया था।

आओगी तुम, प्रतीक्षा है अब भी,

याद करें, जो, सुधा पिया था।

जग से मुझको, कुछ चाहिए, मेरे मन की तुम मोती हो।

तुम्हारे अधरों से हँसता में, तुम मेरे नयनों से रोती हो।।


Sunday, August 22, 2021

पता परिवर्तन

 सभी मित्रों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएँ।

स्थानांतरण के कारण मेरे कार्यस्थल व आवास में परिवर्तन हुआ है  मेरा नवीन पता अधोलिखित है-

डा संतोष कुमार गौड़,

प्राचार्य

जवाहर नवोदय विद्यालय

कालेवाला, पोस्ट- गोपीवाला, 

ठाकुरद्वारा, मुरादाबाद-244601

उत्तर प्रदेश