आपको आज भी हम चाहते हैं उसी तरह
आपके आज भी हम निहारते हैं किसी तरह
आप भले ही जबाब न दो हमारे खतों के,
हम तो आज भी खत बन आते हैं उसी तरह।
"मुझे संसार से मधुर व्यवहार करने का समय नहीं है, मधुर बनने का प्रत्येक प्रयत्न मुझे कपटी बनाता है." -विवेकानन्द
नहीं चाह अब रही हमारी, चाह रहे बस खुशी तुम्हारी। जीत हार अब पीछे छूटी, तुम्हारी जीत ही जीत हमारी।। कैसे खुश रहना सीखो तुम, चलना ही जीवन ...
"स्वतन्त्र भारत में नारी को मिले वैधानिक अधिकारों की कमी नहीं- अधिकार ही अधिकार मिले हैं, परन्तु कितनी नारियां हैं जो अपने अधिकारों का सुख भोग पाती हैं? आप अपने कर्तव्यों के बल पर अधिकार अर्जित कीजिए। कर्तव्य और अधिकार दोनों का सदुपयोग कर आप व्यक्ति बन सकती हैं। आपको अपने कर्तव्यों का भान है तो कोई पुरुष आपको भोग्या नहीं बना सकता-व्यक्ति मानकर सम्मान ही करेगा। इसी तरह आने वाली पीढ़ी आपकी ऋणी रहेगी।"
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