Saturday, May 22, 2021

अपने बनकर देते, धोखे

मिल  जाते हैं, उनको मौके

           


समय मिला, कुछ करना है।

मिलकर,  आगे बढ़ना   है।

शिखरों पर  चढ़कर के ही,

घाटियों में  हमें उतरना है।


प्रेम नहीं, आतंकित  करता।

बूँद-बूँद से, घड़ा है भरता।

गति के साथ, अविरल चल,

जन, जीवन यात्रा पूरी करता।


चिकने पथ भी, बहुत मिलेंगे।

चलेंगे उन पर, वह फिसलेंगे।

ऊबड़-खाबड़ पथ है अपना,

ठोकर खाकर भी  पहुँचेंगे।


पढ़े बहुत, पर नहीं हैं सीखा।

नेत्र भले ही, पथ नहीं दीखा।

समय बीत गया, पहुँच न पाए,

करते रहे,  औरों पर  टीका।


अवसर गया,  न फिर आएगा।

जो बोएगा,  वह ही खाएगा।

पल-पल समय का उपयोग कर,

वरना  बाद में  पछताएगा।


सुःख- दुःख आते जाते रहते।

जीवन में सब ही कुछ सहते।

रूक  जाना है, मृत्यु निशानी,

जीवित हैं, जो हैं, नित बहते।


अपने  बनकर  देते,  धोखे।

मिल  जाते हैं, उनको मौके।

विश्वासघात से घायल कर,

खुद ही लगाते, छक्के-चैके।


सब कुछ सहकर बढ़ना है।

कष्टों से खुद को गढ़ना है।

थकान हुई, विश्राम कुछ करो,

शिखरों पर तुम्हें चढ़ना है।


किसी वस्तु की चाह नहीं है।

अपनी भी  परवाह  नहीं है।

पढ़ना-लिखना भी  निरर्थक है,

बनाता यदि  इंसान नही है।


नेता और अधिकारी  बनते।

नौकरी के नित, ख्वाब हैं पलते।

आई ए एस, सी ए मिल जाते,

प्रबंधक मिलें, इंसान  न मिलते।


सब  अपना-अपना  राग अलापें।

मुश्किल पड़े,  ऐसी  में  काँपे।

निज  कर्तव्यों को समय न मिलता,

व्यर्थ शिकायतों से नहीं धाँपे।


मुफ्त का सबको, माल चाहिए।

कर्तव्य  नहीं, अधिकार चाहिए।

काम नहीं, नित माल मिले बस,

ऐसा सबको  रोजगार चाहिए।

 


Tuesday, May 18, 2021

सशक्तीकरण का, युग है भाई

 नारी नर पर भारी है

            

सशक्तीकरण का, युग है भाई, नारी नर पर भारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली, घर की पट रानी।

बड़े-बड़ों को, पिलाती पानी।

अप्रसन्न हो गयीं, किंचित भी,

नर को याद दिलाती नानी।

घर ही नहीं, कार्यस्थल पर भी, प्रेम से चलाती आरी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

शिक्षा में अब, नर से आगे।

गुस्से से अब, भूत भी भागे।

नर की इज्जत लूट रही है,

अधिकारों हित, नारी जागे।

अत्याचार सहे थे अब तक, अब नारी की बारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।

घरवाली का खिताब है छोड़ा।

कर्तव्यों से, रिश्ता  तोड़ा।

नर के पीछे दौड़ रही है,

कानून का ले, हाथ में कोड़ा।

नारी को अधिकार मिले सब, नर की जिम्मेदारी है।

नर को, गुलाम बनाने की अब, उसकी पूरी तैयारी है।।


Sunday, May 16, 2021

सबका अपना-अपना चिंतन

 अपना-अपना राग है

          


सबका अपना-अपना चिंतन, अपना-अपना राग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


अपनी-अपनी ढपली सबकी, अपना-अपना राग।

कोई छल-कपट कर लूटे, कोई करता त्याग।

सीधे-सच्चे पथ पर, चलकर खोज रहा वो शांति,

दूजा दुनिया को, पाने को, करता भागम भाग।

विविधतामयी, विश्व ये देखो, पानी के संग आग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


दाल-रोटी पाकर केवल, वह रहता कितना शांत?

ऐश्वर्य में सुख, ढूढ़ रहा है, दूजा कितना भ्रांत।

प्रगति पथ प्रशस्त कर, दिखाए सबको  राह,

दूजा विध्वंश का बन नायक, जग को करे अशांत।

पिज्जा बर्गर को बिकती वह, इसको भाता साग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


चकाचैंध, रंगीली दुनिया, नहीं होती यहाँ, रात।

जहाँ, प्रेम के नाम पर, बिकते हैं, हर पल गात।

एक सेवा के पथ पर बढ़, देता खुद को त्याग,

दूजा आसमान में उड़ता, करे न, धरणि से बात।

इधर देर तक, नींद न खुलती, उधर भोर ही जाग है।

कोई शांति का बने पुजारी, कोई रक्त का फाग है।।


Friday, May 14, 2021

पुदीने की पहचान

 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र युवा कवि  गोलेन्द्र पटेल द्वारा रचित मिट्टी की खुशबू का गान गाती कविता प्रस्तुत है-

खुद का दुख!

                                              गोलेन्द्र पटेल

दुख की दुपहरिया में

मुर्झाया मोथा देख रहा है

मेंड़ की ओर

मकोय पककर गिर रही है

नीचे

(जैसे थककर गिर रहे हैं लोग

तपती सड़क पर...)

और

हाँ,यही सच है कि पानी बिन

ककड़ियों की कलियाँ सूख रही हैं

कोहड़ों का फूल झर रहा है


गाजर गा रही है गम के गीत

भिंड़ी भूल रही है

भंटा के भय से

मिर्च से सीखा हुआ मंत्र

मूली सुन रही है मिट्टी का गान


बाड़े में बोड़े की बात न पूछो

तेज हवा से टूटा डम्फल

ताड़ ने छेड़ा खड़खड़ाहट-का तान


ध्यान से देख रही है दूब

झमड़े पर झूल रही हैं               अनेक सब्जियाँ

(जैसे - कुनरू , करैला, नेनुआ, केदुआ, सतपुतिया, सेम , लौकी...)


पास में पालक-पथरी-चरी-चैराई चुप हैं

कोमल पत्तियों पर प्यासे बैठे पतंगें कह रहे हैं

इस कोरोना काल में

पुदीने की पहचान करना 

कितना कठिन हो गया है


आह!                                     

आज धनिया खोटते-खोटते

खोट लिया मैंने                          

खुद का दुख!


जिंदादिली से जीना है तो

 कांटों में भी खिलना होगा

             

साथ न कोई चल पाएगा, अकेले पथ पर बढ़ना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

सुख-दुख जैसी, कोई चीज ना।

कायरता का, कहीं, पड़े बीज ना।

सबके हैं, अपने-अपने  स्वारथ,

धीरे-धीरे, तुझे पड़े, खीज ना।

साथी भले ही, साथ राह में, सावधान हो चलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

ना कोई अपना, ना है पराया।

मित्र दिखे, हर चेहरा मुस्काया।

विश्वास किया है, जिस पर तूने,

विश्वासघात का, अस्त्र थमाया।

आकर्षण पग-पग, जाल हैं, तुझको, उनसे बचना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।

किसी से, करनी नहीं, शिकायत।

पढ़नी नहीं, मुझे, धर्म की आयत।

ठोकर खाकर, पग-पग बढ़ना,

कर्मवीर को, शुभ हैं, सब सायत।

काम बहुत है, समय ढल रहा, समय के साथ, ढलना होगा।

जिंदादिली से जीना है तो, कांटों में भी खिलना होगा।।


Wednesday, May 12, 2021

जिनको अपना, समझ रहा था

 उनसे ही विष पीना  होगा

              


सब की खातिर, जीकर देखा, खुद की खातिर जीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

परिवर्तन का, दंभ भरा था।

संवेदना का,  दर्द हरा था।

कदम-कदम, ठोकर खाकर भी,

नहीं कभी, संघर्ष मरा था।

अपेक्षा सभी की, पूरी न होतीं, सब कुछ कर, कमीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

लीक से हटकर, चलता है जो।

समाज का कंटक बनता है वो।

उपलब्धि कितनी भी पा ले,

अंत में अकेला, मरता है वो।

करनी नहीं, किसी से आशा, बहाना खुद ही, पसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।

अकेले ही, फिर से बढ़ना होगा।

थकान मिटा, फिर चढ़ना होगा।

निराश मिटा, जिंदा दिल बन,

कर्म का पाठ, फिर पढ़ना होगा।

चिंता छोड़, चिंतन भी तज तू, कर्म ही तेरी  हसीना होगा।

जिनको अपना, समझ रहा था, उनसे ही विष पीना  होगा।।


Tuesday, May 11, 2021

कोई साथ नहीं आता है

 सच की राह पर

          

सच की राह पर

चलने का, 

संकल्प लेकर,

चाहा था,

एक साथी।

चाहा, खोजा,

मनाया, प्रेम किया,

अपने आपको,

लुटाया।


बस,

एक ही इच्छा,

सच की राह पर,

साथी का हाथ पकड़,

जब मुश्किल घड़ी हो,

एक-दूसरे का हाथ जकड़,

साथ-साथ चलेंगे।

सच के पथ को,

नहीं तजेंगे।


मूर्ख था मैं,

ना समझ भी,

समझ न पाया।

सच की राह पर तो,

सच भी, 

साथ छोड़ जाता है।

अपना साया भी,

साथ नहीं आता है।

खुद को खुद का,

साथ भी नहीं भाता है।


कोई मूर्ख पथिक ही,

सच की यात्रा पर,

साथी का गान गाता है।

वास्तविकता तो यही है,

सच के पथ पर,

पथिक को अकेला ही,

चलना होता है।

कोई साथ नहीं आता है।


Monday, May 10, 2021

नर-नारी के एक होने से

 सृष्टि  जन्मती पलती है

            


इक-दूजे से शेयर करके, परिवार की गाड़ी चलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

सहयोग समन्वय से आगे बढ़ के।

साथ-साथ  बढ़,  सीढ़ी चढ़ के।

विकास पथ पर, आगे बढ़ो मिल,

मिट जाओगे, अकेले  अढ़ के।

इक-दूजे की देखभाल कर, प्रेम भावना बढ़ती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

केयरिंग-शेयरिंग, सूत्र यहाँ पर।

पारिवारिक हैं,  मूल्य जहाँ पर।

प्रेम, त्याग, समर्पण, निष्ठा,

साथ में जीते, स्वर्ग वहाँ पर।

छल, धोखा, कपट भावना, परिवार में सबको खलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।

प्रेम से देखो, घर महकेगा।

दिखावे से तो, बस बहकेगा।

इक-दूजे हित जीना सीखो,

रोम-रोम फिर से चहकेगा।

ईष्र्या, द्वेष तज, प्रेम भाव से, सूरत घर की बदलती है।

नर-नारी के  एक होने से, सृष्टि  जन्मती पलती है।।


Sunday, May 9, 2021

आज सीख वह देता है

 


आखिर वह मेरा बेटा है

      

आज सीख वह देता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


उसके जन्म से बाप बना।

खुद को भूला, ताप बना।

होते हुए भी, अभाव दिए,

मजबूत बने, मैं घात बना।

ज्ञान में, उसे लपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


खेल-खिलोनों से दूर रखा।

वात्सल्य भी, नहीं  चखा।

योग्य बनाने के चक्कर में,

बना नहीं, मैं कभी सखा।

एकान्त ने दिया चपेटा है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


वह तकनीक की ओर चला।

जीवन से,  वह दूर  चला।

मोबाइल ही, है बस साथी,

सम्बन्धों से, वह, दूर चला।

बड़ा हुआ, अब  चेता है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


संबंधों का,  बंधन तजकर। 

रहना नहीं, कहीं तू फंसकर।

उड़ ले, गगन में, जितना चाहे,

जीवन जीना तू बस हँसकर।

समझे न  कोई हेटा  है।

आखिर वह मेरा बेटा है।।


Monday, May 3, 2021

असफलता संग व्यथा रही

 मेरे जीवन की कथा रही

     


असफलता संग व्यथा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


पीड़ा से पीड़ित था बचपन।

भय से भयभीत था, छुटपन।

किशोर हुआ, अभाव मिले नित,

युवावस्था भी, थी बस ठिठुरन।

अकेलेपन की सजा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


किसी को कुछ भी दे न सका।

साथ आया जो,  वही  पका।

भटकर को ना, राह मिली,

टूटा सपना, पर नहीं थका।

राह ही जिसका, पता रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


राह में कुचली कली मिली।

दुलारा उसको, वही खिली।

राह अलग, उसको था जाना,

नहीं कभी वह, हिली-मिली।

साथ हमारे, बस सजा  रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


आदर्शो की कुछ राह चुनीं।

अपनों की भी, नहीं सुनी।

संघर्ष पथ पर साथ था खोजा,

मिली न अब तक कोई गुनी।

कोशिशों की बस  कज़ा रही।

मेरे जीवन की कथा रही।।


Saturday, May 1, 2021

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता

साथ किसी के,  रो न  सके

               

साथ के सपने अपने भी थे, साकार कभी भी हो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

किसी का बुरा, कभी न चाहा।

किसी के दुख में, कहा न आहा।

अनजानों को गले लगाकर,

सबको नेह से, था अवगाहा।

हमने सबको, अपना समझा, पराया किसी को कह न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता,  साथ किसी के,  रो न  सके।।

धोखे से साथ में हमें फंसाया।

छल-कपट का जाल विछाया।

प्रहार आत्मा पर करने को,

विश्वासघात का अस्त्र चलाया।

षड्यंत्रों से हमको घेरा, सच के सपने,  खो  न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के, रो न  सके।।

हमने सब कुछ, सौंपा जिसको।

उसने  मूरख, समझा  हमको।

हमने सब कुछ खोल दिया था,

उसने सब कुछ छिपाया खुदको।

प्रेम बिना, है खेती सूखी, विश्वास के बीज, बो न सके।

पीड़ाओं में, हँसना पड़ता, साथ किसी के,  रो न  सके।।


Friday, April 30, 2021

अलग राह की राही हो तुम

 जाओ हमें सरोकार नहीं है

             

कर्म के पथिक, सच है साथी, और कोई दरकार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

मूरख थे, हम समझ न पाये।

व्यर्थ ही तुमको गले लगाये।

सीधे-सच्चे पथिक हैं हम तो,

तुमने विकट थे,जाल विछाये।

प्रेम की तुम व्यापारी शातिर, हमारा कोई इकरार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

तुम्हारा कोई दोष नहीं है।

हमको ही था होश नहीं है।

षड्यंत्रों की देवी हो तुम,

पास हमारे कोष नहीं है।

सच के साथ विश्वास पनपता, किसी से कोई तकरार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।

नित तुम प्रेम के जाल विछाओ।

नए-नए नित शिकार फंसाओ।

मुझे छोड़ो, और आगे जाओ,

और किसी को तुम भरमाओ।

तुम कानून के जाल हो बुनती, हमारी कोई सरकार नहीं है।

अलग राह की राही हो तुम, जाओ हमें सरोकार नहीं है।।


Wednesday, April 7, 2021

जीवन का मर्म

 कर्म, कर्म, कर्म!

 



कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


सक्रियता ही,

जीवन की निशानी है।

इच्छाएँ, कामनाएँ,

बाधाएँ, पीड़ाएँ,

आस्थाएँ और भावनाएँ,

चुनौतियों का बीड़ा,

तर्क-वितर्क के होते हुए भी,

कर्म के बिना,

व्यक्ति है बस एक कीड़ा।

जीना ही है,

सबसे प्राचीन धर्म!

कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


छोटा हो या बड़ा,

अमीर हो या गरीब,

बैठा हा या खड़ा,

गतिमान हो या अड़ा,

चलना ही,

जीवन की निशानी है,

थम गया जो,

वह है मरा।

जो पड़ गया,

वो है सड़ा।

कर्म से कैसी शर्म?

कर्म ही है सच्चा धर्म।


कर्म, कर्म, कर्म!

कर्म जीवन का मर्म।


Sunday, April 4, 2021

एकान्त और अकेलापन

 

एक समय था,

जब मैं चाहता था,

एकान्त।


तब कुछ पढ़ने की,

कुछ बनने की,

किसी को पढ़ाकर,

कुछ बनाने की,

तीव्र इच्छा, 

मुझे एकान्त के लिए,

मजबूर करती थी।


एक समय था,

जब साथी को चाह थी,

मेरे साथ की,

बेटे को चाह थी,

हर पल, हर क्षण,

हर दिन, हर राह,

मेरे साथ की

मुझसे दुलार की।


और मैं,

उन्हें आगे बढ़ाने,

उन्हें कुछ सिखाने,

अपना करियर बनाने,

के चक्कर में,

अपने आपको भूल गया!

पता ही नहीं चला,

कब अपनी राह भूला,

और ठहर गया।


और आज

जब साथी साथ मिलने का,

इंतजार करते-करते,

प्रतीक्षा से थककर,

आगे बढ़ गया।

दूसरे शब्दों में कहूँ,

साथ अलग हो गया।


और आज

हर पल, हर क्षण

हर राह,

साथ चाहने वाला बेटा,

साथ रहना भूलकर,

एकान्त के पथ पर,

बढ़ गया।

एकान्तवासी बन गया।


और आज

मैं एकान्त से भी,

ठुकराया गया,

अकेला रह गया।

एकांत और अकेलेपन

का अंतर समझ आ गया।

अनुभव से

कुछ ज्ञानवर्धन हो गया।


Thursday, April 1, 2021

सबके विकास की बातें करते

  आत्म विकास नहीं कर पाते


                 


ईर्ष्या, द्वेष,  नफरत है दिल में,  किंतु, प्रेम के गाने गाते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

करते रहे औरों की समीक्षा।

कैसे पूरी हो?  फिर इच्छा।

सबको सीख देत हो क्षण-क्षण,

खुद ही, खुद की, ले लो परीक्षा।

भ्रष्ट आचरण, कर्महीन धन,  उससे, कराते हो जगराते।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

अहम ने, सबको, दूर भगाया।

दान के नाम, खुद को भरमाया।

खुद ही, खुद को, समझ न पाये,

पल-पल औरों को समझाया।

धैर्य, शान्ति की बातें करते, धैर्य बिना, कटें, खुद की रातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।

कर में जो है, यहीं है पाया।

सीख रहे जो, केवल माया।

खुद तो भ्रम में जीते हर पल,

औरों को भी, है भरमाया।

सच क्या है? ईश्वर कैसा? जाना न, किसी ने, केवल बातें।

सबके विकास की बातें करते, आत्म विकास नहीं कर पाते।।


Wednesday, March 31, 2021

नर क्या समझे

 

               नारायण को,  नारी ने भरमाया है


प्रकृति सृष्टि का गूढ़ तत्व है, समझ न कोई पाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

नर, सागर की, गहराई नापे।

मौसम की कठिनाई भी भाँपे।

आसमान में उड़ता है नर,

इससे देखो, पर्वत काँपे।

नारी की मुस्कान ने जीता, प्रकृति की कैसी माया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

वेद ज्ञान से, भरे पड़े हैं।

कुरान और हदीस लड़े हैं।

नारी प्रेम की चाह में ये नर,

बुद्धिहीन से, पीछे खड़ें हैं।

सिद्धांत गढ़ो, कुछ भी कह लो, नर नारी का साया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।

 उपदेश नहीं, कुछ कर दिखलाओ।

चाहो नहीं, बस प्यार लुटाओ।

सबको मुफ्त की सीख हो देते,

चलकर उन पर, खुद दिखलाओ।

छल, कपट, धोखे में फंसाकर, गान मिलन का गाया है।

नर क्या समझे,  नारायण को,  नारी ने भरमाया है।।


Monday, March 29, 2021

संग-साथ की इच्छा सबकी

किन्तु साथ कुछ को मिलता है

                  




पुष्प की चाह, सभी को होती, कुछ ही पल को वह खिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

चाहने से यहाँ, कुछ नहीं होता।

काटता है वही, जो व्यक्ति बोता।

कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे,

कदम-कदम वह, निश्चित रोता।

साथ उसी को, मिलता जग में, प्रेम सूत्र रिश्ते सिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

आकांक्षा और अभिलाषाएँ।

तरह-तरह की हैं आशाएँ।

चाहत किसी की पूरी न होतीं,

चुनौती देती, हैं निराशाएँ।

चाहत तजकर,  साथ निभाए, साथ उसी का, बस निभता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।

प्रकृति का कण-कण साथ हमारे।

सुना न तुमने, हम थे पुकारे।

कर्तव्य पथ पर, बढ़ते रहेंगे,

मृत्यु भी, पग-पग, हमें दुलारे।

पथ ही साथी, जब हो पथिक का, ऐसे पथिकों से, जग हिलता है।

संग-साथ की इच्छा सबकी,  किन्तु साथ कुछ को मिलता है।।


Saturday, March 27, 2021

समय का साधक, कर्म करे बस

 नहीं माँगता बस देता है।

  


अकेलेपन से जूझ रहे सब, साधक एकान्त का रस लेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

इक-दूजे से सब हैं जूझें।

मित्र कौन है?  कैसे बूझें?

प्रेम-प्रेम कह, लूट रहे नित,

भीड़ में अपना, ना कोई सूझे।

परिवार में ही महाभारत होता, अपना वही जो नाव खेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

खुद ही खुद से, जूझ रहे हम।

विश्वासघात नित, झेल रहे हम।

जिसको अपना साथी समझा,

घात से उसके, अचेत हुए हम।

विश्वास किया था, जिस पर हमने, चुंबन लेकर गला रेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।

मित्र खोजना बंद करो अब।

अपने आपके मित्र बनो अब।

इसको-उसको, समय बहुत दिया,

खुद ही, खुद को, आज गढ़ो अब।

आगे बढ़कर,  पथ जो बनाये,  वही कहाता, प्रणेता है।

समय का साधक, कर्म करे बस, नहीं माँगता बस देता है।।


Friday, March 26, 2021

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी

 प्रकृति न हमसे न्यारी है

  


प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।

महासागर,  पर्वतमालाएँ, प्रकृति ही,  नर और नारी है।।

प्रकृति का सूक्ष्म रूप है नारी।

ललित लालिमा कितनी प्यारी!

पर्वत हरीतिमा, ललचाती है,

गोलाइयों में, भटकाती नारी।

जीवन रस देती हैं नदियाँ,  पयस्वनी  माता नारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

प्रेम अश्रु में, डूबी नदियाँ।

सहनशील प्रथ्वी की तरियाँ।

प्रचण्ड अग्नि पुंज है नारी,

बाँह फैलाए, हैं वल्लरियाँ।

सर्पिल चितवन पर नर मर मिटता, वक्ष उरों पर आरी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

पर्वतों को, धूल चटाता जो नर।

सागर विजयी, कहलाता जो नर।

नारी नयन के,  अश्रु बिन्दु में,

गल बह जाता, कठोर हृदय नर।

विश्वामित्र ऋषि, हत हो जाते, जब मार मेनका मारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।

विकास के लक्ष्य, बड़े जो होते।

प्रकृति के साथ ही, पूरण होते।

नारी साथ मिल, इच्छाशक्ति से,

नर आनन्द के,  खोले सोते।

विध्वंस पथों पर सृजन सजाती, नर-नारी की यारी है।

प्रकृति के ही घटक हैं हम भी, प्रकृति न हमसे न्यारी है।।


Thursday, March 25, 2021

किसी से, किसी की, करो न शिकायत

 समाधान बनकर दिखलाओ

                 


समस्याओं से,  तुम कभी न भागो, सोचो, समझो और गले लगाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

रोते हुए को, कोई न देखे।

सबके अपने-अपने  लेखे।

समय की शिकायत करते हैं जो,

करते रहते, वही  परेखे।

बातों से,  कभी,  काम न होते,  चलो,  चलो और  चलते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

उसकी, उससे बातें करते।

समय नष्ट कर, क्यों हो मरते?

अपने आप से, बातें करके,

सिद्ध करो, तुम, नहीं हो डरते।

लीकों पर चल,  कहाँ पहुँचोगे?  तुम बाधाओं से, राह बनाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

विकास के पथ, तुम चलते जाओ।

कहते  हो जो,  कर दिखलाओ।

डर ही, शिकायत, इसकी, उसकी,

कर्म से,  डर को,  दूर भगाओ।

खुद पर, तुम विश्वास करो, फिर, शिखरों पर, तुम चढ़ते जाओ।

किसी से, किसी की, करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।

कर्म के पथिक को, कोई न पराया।

निराशा को, पल-पल,  ठुकराया।

कमियों को,  वो, नहीं खोजते,

जिनने खुद को खुद ही बनाया।

मरने की मन,  बात करो ना,  अकेले रहो,  सबको अपनाओ।

किसी से किसी की करो न शिकायत, समाधान बनकर दिखलाओ।।