Friday, January 31, 2014

शिकागो में जा शंख था फूँका

उनके पथ चलकर दिखलाओ


विवेकानन्द के गीत न गाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
कर्मठ बन, शक्ति की पूजा
दरिद्र मान नारायण पूजा।
अनूठे धर्म की राह दिखाई,
विवेकानन्द सम नहीं है दूजा।
नर-नारी संग बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


युवा शक्ति को पथ दिखलाया,
समन्वय का था पाठ पढ़ाया।
राष्ट्रप्रेमी कर शक्ति साधना,
बीजमंत्र था यह सिखलाया।
शिक्षित बन, शिक्षा फैलाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


शिकागो में जा शंख था फूँका,
अध्यात्म बिना, मन रहेगा भूखा।
चरित्र-गठन की सीख दी हमको,
विज्ञान का भी ना पड़ जाय सूखा।
प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


वेद मार्ग के पथिक थे स्वामी,
रामकृष्ण के थे अनुगामी।
संन्यासी बन गए भले ही,
राष्ट्र सेवा की भरी थी हामी।
कर्म से पूजा करते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


Sunday, January 26, 2014

90वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ने 30 साल छोटी महिला से रचाई दूसरी शादी

दैनिक जागरण, पानीपत, 25 जनवरी 2014   से साभार
पृष्ठ संख्या 6,एक नजर

90वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी ने 30 साल छोटी महिला से रचाई दूसरी शादी


‘‘कोझिकोडः वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी और खतरनाक कीटनाशक इंडोसल्फान के खिलाफ मुहिम चलाने वाले एएस नारायण पिल्लई (90) ने अपने से 30 साल छोटी महिला से दूसरी शादी रचाई है। उनकी पहली पत्नी की वर्ष 1986 में मौत हो गई थी। अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन की केरल इकाई के उपाध्यक्ष पिल्लई ने गुरुवार को कोझिकोड निवासी आंगनवाड़ी कर्मचारी राधा (60) से यहाँ सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में शादी की। इस दौरान उनके कुछ करीबी लोग उपस्थित थे। पिल्लई के मुताबिक उन्होंने यह शादी वैवाहिक सुख के लिए नहीं बल्कि एक गरीब महिला को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए की है। पिल्लई करीब चार दशक पहले वायनाड में बस गए थे।’’
उपरोक्त समाचार छोटा होते हुए भी ध्यान खींचता है, जिसमें असामान्य उम्र पर शादी, दोनों की उम्र में असामान्य अन्तर व शादी का असामान्य उद्देश्य महत्वपूर्ण पहलू हैं। मै पिल्लई दंपत्ति को बधाई और सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएँ अर्पित करता हूँ।
इस समाचार ने मुझे 14 वर्ष पीछे पहुँचा दिया, जब मैंने इसी उद्देश्य को लेकर एक आश्रमवासिनी विधवा महिला से पारिवारिक असहमति को नजरअन्दाज करते हुए अन्तर्जातीय विवाह किया था। यह अलग बात है मैं उस समय 30 वर्षीय अविवाहित युवक था। किन्तु मेरी शादी असफल हुई और प्राप्त अनुभव से महसूस हुआ कि शादी और सहायता दोनों अलग-अलग बिन्दु हैं। शादी सहायता का माध्यम नहीं हो सकती। शादी की अपनी आवश्यकताएँ, अपेक्षाएँ व अनिवार्यताएँ होतीं हैं। दोनों एक-दूसरे की शक्ति होते हैं। शादी में दोनों का समानता के स्तर पर एक-दूसरे के लिए समर्पण होता है। किसी भी प्रकार की दया शादी का आधार नहीं हो सकती। 

Saturday, January 25, 2014

-ः गणतंत्र को शुभकामनाएँ:-

-ः गणतंत्र को शुभकामनाएँ:- 

भारतीय गणतंत्र को गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर उसे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार व सेवाभावी नेता, लोकसेवक( जिनके हाथों फहराये जाने पर तिरंगे को गौरवानुभूति हो सके); नागरिकों के चरित्रनिर्माण में संलग्न सदाचारी, कर्तव्यनिष्ठ व आत्मसम्मानित शिक्षक; कर्तव्यनिष्ठ, राष्ट्र-भक्त व राष्ट्र के गौरव के लिए कर्मरत नागरिक मिलने की शुभकामनाएँ! 


Thursday, January 23, 2014

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।

        मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

               

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
कब?
कहाँ?
कैसे?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
साल?
दो साल?
या युगों के बाद?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
जवानी?
प्रोढ़ावस्था
या वृद्धावस्था में?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
शारीरिक?
मानसिक?
या आत्मिक रूप से?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
चेतन?
अवचेतन?
या अचेतन?
न मुझे मालुम
न तुमको।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
नियोजित?
अनियोजित?
या अचानक?
न मुझे मालुम
न तुमको।


मुझे मालुम है
वश इतना
एक ना एक दिन
एक ना एक पल
मैं तुम्हें फिर मिलूँगा।
तुम भले ही
पहचानने से इन्कार कर देना
कुशल व्यापारी की तरह।


Monday, January 20, 2014

कहो, कोयल कैसे फिर गाए?

बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??


बैठने को जब डाल नहीं है, कहो, कोयल कैसे फिर गाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
शिक्षालयों में डिग्री बिकतीं,
आश्रमों में हैं नारी लुटतीं।
गुरू जी ही हैं नकल कराते,
फर्जी उनकी उपस्थिति लगती।
समलैंगिकता अधिकार बने तो, प्रकृति कैसे फिर बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
न्यायाधीश ही इज्जत लूटें
नायक ही हैं देखो झूठे।
शिक्षा ही जब मूल्यहीन हो,
आशा किरण कहाँ से फूटे?
नर-नारी संघर्ष रहें करते, परिवार कहो कैसे बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??
काँटों का संरक्षण करते,
गलत काम से नहीं हैं डरते।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे,
आस्था का आडम्बर करते।
कर्तव्य नहीं, अधिकार चाहिए; राष्ट्रप्रेमी कैसे बच पाए?
निरापद जब कोई राह नहीं है, बसन्त यहाँ कैसे फिर आए??

Sunday, January 12, 2014

स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस- युवा दिवस पर विशेष

शिकागो में जा शंख था फूँका



विवेकानन्द के गीत न गाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
कर्मठ बन, शक्ति की पूजा
दरिद्र मान नारायण पूजा।
अनूठे धर्म की राह दिखाई,
विवेकानन्द सम नहीं है दूजा।
नर-नारी संग बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
युवा शक्ति को पथ दिखलाया,
समन्वय का था पाठ पढ़ाया।
राष्ट्रप्रेमी कर शक्ति साधना,
बीजमंत्र था यह सिखलाया।
शिक्षित बन, शिक्षा फैलाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
शिकागो में जा शंख था फूँका,
अध्यात्म बिना, मन रहेगा भूखा।
चरित्र-गठन की सीख दी हमको,
विज्ञान का भी ना पड़ जाय सूखा।
प्रगति पथ पर बढ़ते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।
वेद मार्ग के पथिक थे स्वामी,
रामकृष्ण के थे अनुगामी।
संन्यासी बन गए भले ही,
राष्ट्र सेवा की भरी थी हामी।
कर्म से पूजा करते जाओ।
उनके पथ चलकर दिखलाओ।।


Tuesday, January 7, 2014

बातों के ही शेर

बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से आग लगायें।
अकर्मण्यता, लापरवाही, पड़ोसियों को बस धमकायें।।
अपनी दीवार टूटी-फूटी,
कथनी-करनी हमसे रूठी।
आतंकियों का बचाव करें,
वोट की खातिर, नीति झूँठी।
आग में हम घी डालते, पड़ोसी क्यों ना उसे बढ़ायें?
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से आग लगायें।
माना पड़ोसी उच्श्रृंखल बच्चा,    
हम नहीं कर सकते, अपनी रक्षा?
खुद ही आग में वह जल रहा,
खिलाड़ी वह है भाई कच्चा!
बचाने की हम गुहार लगाते, रक्षा अपनी नहीं कर पायें।
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से ही आग लगायें।
राश्ट्र संघ हो या अमरीका,
सबकी अपनी-अपनी टीका।
स्वयं मरे बिन स्वर्ग न मिलता,
खींच दो बढ़कर, लक्ष्मण लीका।
`
वीर भोग्या वसुन्धरा´, शान्ति गीत कायर बन गायें?
बातों के ही शेर हैं क्या हम? बातों से ही आग लगायें।

प्रेम की खोज में दुनिया भटके, किन्तु प्रेम विरलों को मिलता

प्रेम की खोज में दुनिया भटके, किन्तु प्रेम विरलों को मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
प्रेम नहीं भौतिक वस्तु है,
प्रेम नहीं बाजार में मिलता।
प्रेम लुटाने का अमृत है,
प्रेम नहीं सौदे में फलता।
प्रेम नहीं रिश्तों तक सीमित, प्रेम नहीं वासना में फलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
कैसा प्रेम हम नहीं समझे?
तेजाब डाल जलाया चेहरा।
पति-गृह दुल्हन जल जाती,
जिसके लिए बाँधा था सेहरा।
प्रेम के गीत सभी हैं गाते, किन्तु, प्रेम नहीं शब्दों में मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।
कर्तव्यों की डोर अलग है,
किन्तु प्रेम उससे है आगे।
प्रेम से पत्थर उर भी पिघले,
प्रेम पुकार प्रभू भी जागे।
प्रेम नहीं अधिकार किसी का, प्रेम नहीं विरासत में मिलता।
बुद्धि स्वार्थ में ले जा पटके, प्रेम का फूल हृदय महिं खिलता।।

Sunday, January 5, 2014

२०० वां शतक

मित्रो, अक्टूबर २००७ से इस ब्लोग पर कार्यरत हूं. आज २००वां 

शतक अर्थात २००वीं पोस्ट प्रस्तुत है-


जीवन-पथ काव्य संग्रह से साभार


कवि- एक परिभाषा


कहो न कविवर मानव हृदय कैसे कवि बन जाता है।
एक लड़ी में पिरों भावों को जन-जन को हर्षाता है।।
भले शब्द न मिलें कवि को बस अन्तर्मन की पीर मिले।
मननशील और व्यथित हृदय सदा संवेदनशील  मिले।
जड़ जगत के कण-कण में भी प्राणों का आभास मिले।
मरुस्थल के तपते आँचल में सदा साँस की आस मिले।
तिरस्कार को समझ स्वागत मानव जब अपनाता है।
तभी से समझो प्रिय बन्धु! मानव कवि बन जाता है।।

मुक्तक

हैं भावना के थाल में जब चेतना के दीप जलते।
संवेदना की गोद में अनुभूतियों के राग पलते।
दर्द दुनिया का सहलाने की कला जब सीख लेते-
तब ही जन्म लेती कविता और मधुरतम गीत बनते।।
               कवि - श्री रामफल सिंह खटकड़
                     हिन्दी प्राध्यापक
                     गाँव व डाकघर- खटकड़, जीन्द-126115

Thursday, January 2, 2014

रामप्रीत जी की अदा


Tuesday, December 31, 2013

राष्ट्रप्रेमी की ओर से नव वर्ष की सशर्त बधाई और शुभकामनाएं

राष्ट्रप्रेमी की ओर से नव वर्ष की सशर्त  बधाई और शुभकामनाएं


मित्रो एक वर्ष और बीत गया, फिर चलेगा बधाइयों का दौर 

और फिर हम सब अगले वर्ष भी किसी न किसी अपराध में सम्मिलित होकर

 या अपराध का समर्थन करके या फिर अपराध को नजर अन्दाज करके,

 हम सभी अपराधों को बढ़ावा देने और कानून और सरकार को कोसने को तैयार हो जायेंगे। 

ऐसे में किस प्रकार हमारा नव वर्ष शुभ हो सकता है?

अतः मैं आप सबको बधाई और शुभकामनाएँ तो देना चाहता हूँ 

बशर्ते हम अपने ज्ञान, भाव व कर्म को एकरूपता प्रदान कर

 सबके हित में निरन्तर कर्मरत रहने का संकल्प करें


-हम संकल्प करें-

जो सोचें, वही बोलें और वही करें

ईश्वर को मंदिर, मस्जिद, चर्च से बाहर लाकर प्रत्येक कर्म का साक्षी बनायें 

और कर्म को धर्म में परिवर्तित कर लें।

सशर्त बधाई


दो हजार तेरह का पुनः अवलोकन, चौदह की करो योजना भाई।
ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो,   राष्ट्रप्रेमी की नव वर्ष बधाई।।

मौज-मस्ती भी तभी मिलेगी, व्यस्त रहो कुछ कर्म भी कर लो
स्वार्थ भी पूरे तब ही होंगे, सुरक्षित समाज की रचना कर लो
कानूनों से ही सुरक्षा न मिलेगी, अन्तर्मनों को शिक्षित कर लो
अधिकारों को झगड़े बहुत हो, कर्तव्यों की कुछ सुध कर लो
समानता, स्वतंत्रता और बंधुता, न्याय की भी तो करो कमाई।
ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो,   राष्ट्रप्रेमी की नव वर्ष बधाई।।

लूटपाट, अपहरण, बलात्कार अब तजने का संकल्प करो।
दोषारोपण बहुत हो चुका, कुछ करने का संकल्प करो
मनुष्य न बन, अपराधी बनते, शिक्षालयों का संकल्प करो
अपराध मुक्त यदि समाज बनाना, सद् शिक्षा का संकल्प करो।
नकल मुक्त शिक्षालय हो तो, सदाचारी सब बनेंगे भाई। 
ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो,   राष्ट्रप्रेमी की नव वर्ष बधाई।।

Thursday, December 26, 2013

श्री रामप्रीत जी द्वारा प्रेषित

Sunday, September 22, 2013

हम पढ़ाते रहें

तुम पढ़ाई करो खूब हम पढ़ाते रहें ,
गौर कर जि़न्दगी को  बढ़ाते रहें ,
बिना षिक्षा के जीवन का मोल नहीं है,
षिक्षित जीवन से अच्छा कोई रोल नहीं है ,
सब जगह यही सन्देष पहँुचाते रहें ,
गौर कर जि़न्दगी को बढ़ाते रहें
तुम पढ़ाई करो......................................
सही सलामत हो तुम कुदरत की देन है ,
जीवन की हलचलें सागर की फेन हैं ,
नई पीढ़ी हो तुम नई सोच से पढ़ो ,
तुम्हें शोहरत मिले जंग सब जीत लो ,
मिले फुरसत गर कभी याद आते रहो ,
तुम पढ़ाई करो .........................
तुम्हारे जीवन के साँचे में शामिल कई लोग ,
स्वच्छ वातावरण हो, तुम सदा नीरोग हो ,
बाँकी चितवन का तुम पर असर न हो कभी ,
तुम्हारी शैली की पहल में सदा भोर हो ,
देष पावन की गरिमा को करके नमन ,
शीष अपना निरन्तर हम झुकाते रहें ,
तुम पढ़ाई करो ........................................


 

 

Saturday, March 30, 2013

जि़न्दगी में कुछ दिनों के लिए ,

जन्म लेकर आए हैं जि़न्दगी में कुछ दिनों के लिए ,
दिल खोलकर मोहब्बत कर लें कुछ दिनों के लिए ,
प्यासे मन की भूख कभी मिटती नहीं जि़न्दगी में ,
मिटा लें भूख अपनी चाहतों की कुछ दिनों के लिए।
खूबकिस्मत हैं हम जो इतने खूबसूरत रूप पाए हैं ,
सँवारें हर पल अपने रूप हम कुछ दिनों के लिए ,
दमन के ख्याल से निकलके दामन थामें प्यार का ,
प्यार से जी लें जि़न्दगी हम कुछ दिनों के लिए ।
बदन से निकलेगी जब रूह अधूरे रह जाएँगे सपने ,
थोड़ा हँसके सँजोएँ सपने हम कुछ दिनों के लिए,
मजहबी अरमानों के साथ इंसानियत हैसियत होती है,
जीत हासिल कर लें हर जगह कुछ दिनों के लिए ।
चिन्ता हर वक्त कतरनी की तरह कतरती है जि़न्दगी ,
दूर से ही करें हम उसे सलाम, कुछ दिनों के लिए ,
खुदा की खिदमत से खुद को कभी अलग न करें ,
उसने दी है 'आनन्दसे मोहल्लत कुछ दिनों के लिए।
दिनांक 28.03.2013 ग़ज़लकार -
आ. पी. आनन्द (एम. जे.)
टीजीटी. हिन्दी
जनवि. पचपहाड़, राजस्थान ।

Friday, January 11, 2013

प्यार की जीत से जिन्हें होती है सख्त नफरत


जहाँ एतबार नहीं, वहाँ प्यार नहीं होता ,

भरी महफिल में भी कोई यार नहीं होता,

चाहे लाख कर ले कोई अपनी कोशिश ,

मगर दिलवर का यूं दीदार नहीं होता।



इसी के दम पै पूरी दुनिया बसी होती है ,

एतबार न हो तो हर वक्त हँसी होती है,

खुद बड़ा होने का जो भूल करते हैं हरदम ,

उन्हें अपनों से ही कभी प्यार नहीं होता ।



जमाने की सोच से जो ताल्लुक नहीं रखते,

उन्हीं का ही अक्सर अलग संसार होता है ,

आभार के दर पै जो भार बन खड़े होते हैं ,

उनके दिल में मुहब्बत का आसार नहीं होता।



बनके ढोंगी जो सदा दरबार लगाए रहते हैं ,

जमावड़ा लोगों का, वहाँ  हर बार हीं होता,

प्यार की जीत से जिन्हें होती है सख्त नफरत,

 उस जिन्दगी में ‘आनन्द’का इजहार नहीं होता।

                          ग़ज़लकार-

                      आर.पी. आनन्द (एम.जे.)

                       जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,

                       झालावाड़, राजस्थान।


Thursday, January 3, 2013

रोने की चिडि़या


कभी सोने की चिडि़या कहा जाने वाला भारत आज रोने की चिडि़या साबित हो रहा है, क्योंकि जिस स्वतंत्रता के साथ अपराधी, अपराध करके समाज में सिर उठाकर जी रहे हैं । उससे यही बात सामने आती है कि अब शरीफों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं है और न ही उन्हें सम्मान से जीने का कोई अधिकार है। सम्मान से जीने का हक तो सिर्फ दौलतमंद और अपराध जगत वाले ही जन्म से अपने साथ लेकर आए हैं। सरेआम एक अपराधी अपनी इव्छानुसार जिसे चाहता है, उसके साथ बलात्कार कर उसकी निर्मम हत्या करके हथियार भाँजते हुए भीड़ के बीच से फरार हो जाता है और लोग उसकी रावण लीला को बड़े आश्चर्य से देखते रह जाते हैं। उसके बाद पुलिस आती है तो कोई गवाही देने के लिए गवाह नहीं मिलता है। जब गवाह ही नहीं मिलेगा तो अपराधी कहाँ से पकड़े जाएँगे? अपराधी नहीं पकड़े जाएँगे तो सजा कहाँ से होगी और जब सजा ही नहीं होगी तो अपराध तो बढ़ेंगे ही । गत दिनों दिल्ली में जिस तरह से एक निजी विद्यालय वाहन में अपराधियों ने अपनी घिनौनी हरकत से पूरे मानव समाज को शर्मसार किया । उस घटना को सुनकर पूरा देश हतप्रभ रह गया।     
                   आनन-फानन में पीडि़ता को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया । लोग पीडि़ता के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। दिल्ली के हर क्षेत्र से बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की आवाज बुलन्द होने लगी। मामले को न्यायालय में लाया गया। सरकारी आदेश के आधार पर याचिका पर सुनवाई प्रतिदिन होने लगी। किन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली की आवाज सम्पूर्ण देश में गँूजने लगी। बलात्कार का शिकार हुई लड़की के साथ हर प्रदर्शनकारियों की सहानुभूति थी । लेकिन सहानुभूति व्यक्त करने वाले लोग सड़कों, गलियों और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि के घर के सामने चिल्लाने के सिवा कर ही क्या सकते थे? सरकारी आदेशों की अनुपालना में दिल्ली पुलिस अपनी कार्यवाही में दिनरात लगी हुई थी। कभी अपराधियों को पकड़ने के लिए भागती तो कभी जनसमूह को रोकने के लिए आगे आती । किन्तु लड़की की पीड़ा को दूर करने वाला कोई नहीं था । दरिन्दों ने जो पीड़ा उसे दिया था, उसे दूर करने के लिए डाक्टरों ने खूब मेहनत की,परन्तु कोई सफलता नहीं मिली।
                   अन्ततोगत्वा जीवन की अन्तिम घड़ी में उसे सिंगापुर के एलिजाबेथ अस्पताल में पहँुचाया गया। जहाँ दूसरे ही दिन पीडि़ता ने अपने असहनीय दर्द के साथ संसार को छोड़कर चली गई। इसकी सूचना मिलते ही सारा देश शोक में डूबगया । प्रधानमंत्री ने दंगा-फसाद की आशंका को ध्यान में रखकर देश के नाम सन्देश दिया कि, ’अपराधी को उसके किए की सजा मिलेगी।’ लेकिन कब तक सजा मिलेगी इसकी अभी तक किसी को कोई सूचना नहीं मिली है। वैसे तो रोज इस देश में न जाने कितने बलात्कार होते हैं । लेकिन इस घटना ने तो पूरे देश को हिलाकर रख दिया।
                   आखिर इसमें कौन सी ऐसी बात थी जो सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को एकता के स्वर में पिरो दिया ? जायज सी बात है कि जब भी हैवानियत अपनी हद पार करती है तब भी मानवीय स्वाभिमान सदमे में आ जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय एकता सार्वजनिक होती है। जिसे आज देखा और अनुभव किया जा सकता है । जिस लड़की को दरिन्दों ने गन्ने के रस की तरह निचोड़ कर चलती हुई बस से मरा जानकर नीचे फेंक दिया था। वही अस्पताल में जीने की इच्छा जाहिर की थी। शरीर के अंगों के काम न करने के बावजूद भी वह हिम्मत नहीं हारी थी। जिन्दगी जीने की कामना लेकर हैवानों को अधिकतम दण्ड दिलाना चाहती थी। किन्तु उसके सारे अरमान अधूरे रह गए । अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या वर्तमान सरकार भारतीय न्यायपालिका की पेचीदगियों को दरकिनार करके पीडि़ता के बलात्कारियों को मौत की सजा दिलवाने में
सफल हो पाएगी ? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा! जिस प्रकार तेरह दिनों की असहनीय पीड़ा को सहन करके उस युवती ने 29.12.2012को मध्यरात्रि दिन शनिवार को अन्तिम साँस लेकर सम्पूर्ण भारत को जगा गई, उसी प्रकार इस जागरण को सतत् बनाए रखना सभी देशवासियों का नैतिक और सम्वैधानिक कर्तव्य है कि दुष्कर्मियों को घटनास्थल पर ही पकड़कर मृत्युदण्ड देने का संकल्प लें । तभी सम्भवतः आए दिन होने वाली इस तरह की वारदातों से समाज और नारी संवेदना को न्याय मिल सकता है । जब पापाचारियों को सबके सामने मौत के घाट उतारा जाएगा । तभी मानव समाज का अपराध कम होगा। अपराधी या तो अपराध छोड़कर जीवन के सही मार्ग का अनुसरण करेंगे अथवा जीवन सेहाथ धोएँगे ।
                 समाज में जिसके पास अर्थाभाव नहीं है, वही व्यक्ति सामाजिक सभ्यता को खरीद लेता है। क्योंकि अपनी आय से अधिक सम्पत्ति रखकर कर्मशील परिश्रमियों के जीवन का व्यापार करता है। भारत के प्रत्येक राज्य में ऐसे धन्नासेठ अनेक हैं जो अपनी दमनकारी नीतियों के बल पर एक छत्र राज्य कर रहे हैं । ऐसे व्यापारियों के विरुद्ध आवाज कौन उठाए,उनसे झगड़ा मोल लेकर कौन समस्याओं को निमंत्रण दे? जिस पुलिस प्रशासन से न्याय की उम्मीद लेकर घटना की सूचना दी जाती है। घटनास्थल पर पहुँचकर जब वह जाँच आरम्भ करती है तो साक्ष्य के अभाव में निराशा हाथ लगती है। कई जगह तो ऐसा होता है कि सिपाही और कैदी के मिलने से सूचनादाता ही मारा जाता है ।  न्यायपालिका में न्याय की दलील देने वाले अधिवक्ताओं और विधिवेत्ताओं ने तो अपने पेटपूजा का शुल्क इतना बढ़ा दिया है कि उनसे निःशुल्क न्याय की आशा करना सबसे बड़ा अपराध माना जा सकता है। ऐसे में साधारण जीवन जीने वाले व्यक्तियों की जिन्दगी सुरक्षा एक ही न्यायाधीश कर सकता है,वह है; भगवान। अतएव संसार का संचालन करने वाले परमपिता पिता परमेश्वर से हाथ जोड़कर प्रार्थना करेंगे तो निश्चित रूप से वह सबकी सुरक्षा करेगा।
                मानवता को शर्मसार करने वाली दिल्ली की एक घटना ने आज महिला सुरक्षा जागरण को जिस तरह से प्रेरित कियाहै। इस प्रेरणा से प्रत्येक व्यक्ति को चैतन्य होने की जरूरत है, अपने बच्चों को घूमने की खुली छूट देने वाले अभिभावकों को सतर्क होने की आवश्यकता है, घर के हर रिश्ते पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि सबसे अधिक महिलाओं के साथ दुराचार घरों के अन्दर होता है, जहाँ कोई सन्देह नहीं करने वाला होता है, वहीं पर अश्लीलता की शुरुआत होती है । इसलिए मानवविहीन प्रवृत्तियों को रोकने के लिए जनजीवन को सर्वप्रथम अपने घरेलू सम्बंधों , रिश्तेदारों, पड़ोसियों, हितैषियों , मित्रों और स्वयं आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों पर मनन करने की आवश्यकता है। तभी समाज के जघन्य अपराधों को रोका जा सकता है। रिश्तों की डोर से बँधे मानव जीवन को यथार्थ के धरातल पर उतारना होगा । स्वयं और अपनी पीढ़ी को आसुरी सोच और कृत्य से उबारना होगा। उसके बाद ही अपराध जगत से मुक्त हो सकेंगे ।
                 आज जिस घिनौने अपराध के विरुद्ध लोग एक़ित्रत होकर सरकार से कड़े से कड़े नियम बनाने की माँग कर रहे हैं, उन्हें अपने चेहरे के पीछे छिपे जीवन की उस घटना की ओर भी ध्यान देना चाहिए, जहाँ वे भी कुछ ऐसे अपराध किए हैं जो शायद क्षम्य न हों। परन्तु घर की महिलाएँ उनके कृत्य को छिपाकर उन्हें जीवनदान दी हैं। कुछ दिन पहले‘स्टारप्लस’ चैनल पर रात्रि दस बजे ‘सच का सामना’ धारावाहिक प्रसारित किया जा रहा था। जिसके माध्यम से घरेलू हिंसा उभरकर सामने आई और उसके बाद कई लोगों का दाम्पत्य जीवन बिखर गया। रुपए कमाने की लालसा ने सच बोलने पर विवश किया और विश्वास की डोर टूट गई। लिहाजा अनेक सज्जन व्यक्ति गृहस्थ जीवन से हाथ धो बैठे । तदुपरान्त न्यायायिक दखल के उपरान्त उस धारावाहिक पर प्रतिबंध लगाया गया और मानव समाज की सच्चाई एकरहस्य बनकर रह गई ।
                  अन्त में इन सारी वृत्तांतों के बाद यही कहना चाहता हँू कि दिल्ली में जिन राक्षसों ने अपनी राक्षसी प्रवृत्तियों के माध्यम से से तेइस वर्षीय युवती को निचोड़ कर उसकी जिजीविषा को क्षतक्षित कर दिया और जिसे सांसारिक भगवान कहे जाने वाले डाॅक्टरों ने किसी तरह भी बचा नहीं पाया। नारी संवेदना का आधार बनी युवती दर्द की पीड़ा से कराहती हुई संसार को छोड़कर चली गई। यह निश्चित रूप से मानवता के लिए शर्मिन्दगी का विषय है और ऐसे विषय में जानवरों से भी गिरी हरकत करने वाले मानवीय पशुओं को सार्वजनिक स्थल पर ही फाँसी देनी चाहिए। तभी समाज की हैवानियत कम हो सकती है। उसके बाद ही भारत को दुनिया में सम्मान जनक नजरिए से देखा सकता है ।
दिनांक - 30.12.2012 
लेखक-
आर. पी. आनन्द (एम.जे.)
प्रक्षिक्षित स्नातक (हिन्दी
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपाहाड़, झाला. राज

Tuesday, January 1, 2013

नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें

नव वर्ष में, नव मानव का, आओ हम संधान  करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
जो बीत गया, वह रीत रहा, 
गलती बहुत करी हैं अब तक।
अशिक्षा, आतंकवाद, भ्रूण हत्या,
गैंग रेप सहोगे कब तक?
शासन, प्रशासन, न्यायपालिका,
दोषारोपण करोगे कब तक?
65 वर्ष स्व, तंत्र बना ना,
अंग्रेजी से शासित कब तक?
व्यक्ति, परिवार, समाज शुद्ध हो,
बातें बहुत करी हैं अब तक?
सुख, शान्ति, समृद्धि ना पाओ,
मिलकर साथ चलो ना तब तक।
नव वर्ष में नव मानव का, आओ हम अवधान करें।
 नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
अपना-अपना अह्म त्याग कर,
समन्वय से रहना सीखेंगे।
नहीं समानता, नहीं स्पर्धा,
सबके हित जीना सीखेंगे।
अधिकारों का संघर्ष नहीं,
कर्तव्य निभाना सीखेगें।
सबको दें विकास के अवसर,
साथ में चलना सीखेगें
ना कोई शोषण, ना कोई बंधन,
हम मुक्त विचरना सीखेंगे।
कानूनों का निर्माण न केवल,
सम्मान भी करना सीखेंगे।
नव वर्ष में नव मानव का आओ हम आह्वान करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
नव वर्ष में, हर मानव को, 
मानवता   सिखलायेंगे।
नव वर्ष में, निज हित खातिर,
नहीं किसी को बहलायेंगे।
सुरक्षा, संरक्षा और समर्थन,
हर नारी को दे पायेंगे।
कानूनों का दुरूपयोग करके,
पतियों को नहीं फँसायेंगे।
अशिक्षा और भ्रूण हत्या को,
जड़ से इस वर्ष मिटायेंगे।
अपनी ढपली अलग न करके,
समूह गान हम गायेंगे।
नव वर्ष में, नव मानव का, आओ हम कल्याण करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।

Monday, December 31, 2012

रामप्रीत जी की नव वर्ष



नए साल में नई सोच का ही मात्र प्रसार हुआ,
भूल पुरानी बातों को खुशियों का संसार हुआ ,
नई तरंगे, नई उमंगे जीवन का आधार बनीं ,
हर तरफ सुहाने मौसम का सिर्फ आसार हुआ ।
चकाचैंध की बनी चैकटी सबके घर आँगन में ,
मस्त होकर झूम रहे हैं लोग जीवन के सावन में,
हँसी वसुन्धरा भारत की जब खिले फूल उपवन में ,
हर द्वार पै खुशी मना लो चारों ओर प्रचार हुआ ।
किरण सुनहली सूरज की, जहाँ पहली बार पड़ी ,
चमक उठी होठों की लाली रम्भा जिसके द्वार खड़ी ,
मंद हँसी बाँकी चितवन में प्यार का एहसास हुआ ,
बाल मन सुरभित होता है ,उनके लिए उपकार हुआ।
हिन्दी, हिन्दुस्तान का नारा जिसमें गूँजा सदियों से ,
वो ही असली भारत वासी भरत बना है सदियों से ,
लहराता है जिसका झण्डा आसमान में खुशियाँ लेकर,
खिला उठा है चेहरा सबका ‘आनन्द’ को एतबार हुआ।
दिनांक- 28.12.2012 ग़ज़लकार-
आर. पी. आनन्द (एम. जे.)
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,
जिला- झालावाड़, राजस्थान ।

नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक

नव वर्ष हो हमें मुबारक



नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक,


पथ हो निर्बाध हमारा, बने न कोई उसमें बाधक।।



हर व्यक्ति का विकास करें हम, साथ-साथ सब आगे बढ़ें हम।


समाज हित में त्याग की क्षमता, परिवार हमारा, विकास करें हम।।



व्यक्ति, परिवार, समाज एक हों, विकास सभी की टेक एक हो।


मिल-जुल कर हम चलना सीखें, भले ही हमारे पथ अनेक हों।।



हो लोक हित में, तन्त्र कार्यरत, लोक-सेवक हो लोक सेवारत


अहम् हमारे मिट जायें सब, कर्तव्य पथ पर चलें कर्मरत।



आतंक का ना कहीं नाम हो, प्रेम भरी सुबह-शाम हो।


छुट्टियों की आदत हम छोड़े, प्यारा सबको काम हो।



नर-नारी ना हों प्रतिस्पर्धी, हो एक-दूसरे से हमदर्दी


साथ-साथ यदि चल न सकें तो, बने न किसी को हम बेदर्दी।



सपना मेरा नये बर्ष का, पल आयेगा कभी हर्ष का


स्टेन-गन ले चलने वाले, सुख पायेंगे, नेह स्पर्श का।



बने न सुविधा के आकांक्षी, नित राष्ट्रप्रेमी है शुभाकांक्षी


ईश नाम पर लड़ने वालो, कर्म करो, कर, ईश्वर साक्षी।



लक्ष्य भले ही ना मिल पाये, आगे नित हम बढ़ते जायें।


बाधाएँ आती हों आयें, पथ अपना हम क्यों घबरायें?



अकेलेपन से ना घबरायें, पथ में ही हम मित्र बनायें।


सबके हित में हाथ मिलायें, हाथों से ही उर मिल जायें।



भले ही हमारे हो आलोचक, हम तो राष्ट्र के हैं आराधक।


नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक।।


Wednesday, June 6, 2012

मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ पानी है


       मुस्काओ


मैं हूँ राही अविचल चलना जिसकी रही कहानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
            जहाँ भी जाता पौध लगाता,
           कलियों से मैं फूल खिलाता।                      
           पाने की ना इच्छा करता,
           मैं हूं केवल प्रेम लुटाता।
नाटक था जो क्रोध दिखाया प्रेम ही सच्ची बानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
           कुछ पल था ठहराव हमारा,
          चाहा था हित करें तुम्हारा।
           सन्तुष्टि इससे मिलती है,
           चाह नहीं थी, पायें सहारा।
जहाँ जाओ तुम पु्ष्प बिखेरो भले राह अनजानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
            शक्ति सामर्थ्य शिक्षा सार,
            जीने के हैं ये    आधार।
            अपने तक ना सीमित रखना,
            करना नहीं इनका व्यापार।
शक्ति जहाँ से जैसे पाओ, व्यर्थ न कभी बहानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से नहीं बहाओ   पानी है।।