प्रेम की राह कँटीली होती, शायद आप समझ अब पाएं।
प्रेम -समर्पण ना कर पाए, ना प्रेम की कद्र आप कर पाए।
आपने भले ही झूठ कहा था, हम तो उसको समझ न पाए।
मित्र कहा पर मित्रता नहीं की, मित्र ही, पग-पग ठुकराए।
हमने अपने गाने गाए, आपने अपने ढोल बजाए।
तुम्हारे यहां क्या-क्या होता है? आपने हमको पाठ पढ़ाए।
सत्य और हितकर पर देखो, विचार नहीं बिल्कुल कर पाए।
तुमने हमको समझा नहीं था, हम भी तुमको समझ न पाए।
प्रेम के पथिक नहीं तुम सच्चे, समाज तभी तो आड़े आया।
मिलने को थी बहानों की तलाश, भय ने पीछे तुम्हें हटाया।
सुविधाओं की अभ्यस्त आप, प्रेम का जोखिम नहीं उठाया।
प्रेम-मार्ग के काँटे तजकर तुमने, समझौते को गले लगाया।


