Monday, January 11, 2016

प्रेम-मार्ग के काँटे तजकर तुमने, समझौते को गले लगाया

प्रेम की राह कँटीली होती, शायद आप समझ अब पाएं।

प्रेम -समर्पण ना कर पाए, ना प्रेम की कद्र आप कर पाए।

आपने भले ही झूठ कहा था, हम तो उसको समझ न पाए।

मित्र कहा पर मित्रता नहीं की, मित्र  ही, पग-पग ठुकराए।


हमने अपने गाने गाए,  आपने अपने ढोल बजाए।

तुम्हारे यहां क्या-क्या होता है? आपने हमको पाठ पढ़ाए।

सत्य और हितकर पर देखो, विचार नहीं बिल्कुल कर पाए।

तुमने हमको समझा नहीं था, हम भी तुमको समझ न पाए।


प्रेम के पथिक नहीं तुम सच्चे, समाज तभी तो आड़े आया।

मिलने को थी बहानों की तलाश, भय ने पीछे तुम्हें हटाया।

सुविधाओं की अभ्यस्त आप, प्रेम का जोखिम नहीं उठाया।

प्रेम-मार्ग के काँटे तजकर तुमने, समझौते को गले लगाया।

Sunday, January 10, 2016

माता और पिता


Saturday, January 9, 2016

आप समाज का झेल न पाईं ताप

आपको भी कभी तो याद आती ही होगी

आँसू भले ही न बहाओ टीस उठती ही होगी

अपने को भुलावे में रखना भी चाहोगी,

कोई इन्तजार में है अभी भी आप जानती ही होगी।


08.11.2007

प्रिय था समानता का नारा आपको

मुझको तो बस प्रिय थीं आप

मुझको तो प्रिय अब भी आपके हैं वे कर्म

आप समाज का झेल न पाईं ताप।

Tuesday, January 5, 2016

हम भूल नहीं सकते

हम भूल नहीं सकते 

भले ही आप भूलें

हम पा नहीं सकेगें

आप झूलेंगी झूले

हम खोजते रहेंगे

तड़पते रहेंगे

जब तक आपको ना 

देख पायें

हम आपकी तस्वीर को ही

ताकते रहेंगे।

Sunday, January 3, 2016

मजबूरी में कराना कुछ भी, बलात्कार कहलाता है

हम हैं शिकार, तुम हो शिकारी


धोखा देकर, फुसलाना भी, दुष्कर्मो में आता है।

मजबूरी में कराना कुछ भी, बलात्कार कहलाता है।।


सच जानकर, निर्णय का, प्राकृतिक अधिकार मिला।

झूठ बोलकर फँसाये जो, उसको पश्चाताप मिला।

धोखा देकर हमें फँसाया, इसका नहीं कोई गिला।

आँख बंदकर किया भरोसा, उसका मिला हमें सिला।

जाल बिछाकर शिकार बनाया, कैसा रिश्ता-नाता है?

मजबूरी में कराना कुछ भी, बलात्कार कहलाता है।।


जीवन नहीं है कोई सौदा, लाभ-हानि की बात नहीं।

हम तो सच के हमराही हैं, झूठ तुम्हारी हर बात रही।

हम हैं शिकार, तुम हो शिकारी, फंदा तुम्हारी बात रही।

शिकार का फंदा ढीला न हो ले, यही तुम्हारी बात रही।

आनन्द तुम्हें भी मिल न सकेगा, जो बोया मिल जाता है।

मजबूरी में कराना कुछ भी, बलात्कार कहलाता है।।


संघर्ष में ही सारा जीवन बीते, हमें कोई परवाह नहीं।

जीते जी हों साथ तुम्हारे, बनी ऐसी कोई राह नहीं।

अमानत जिसकी, उसकी हो, हम हड़पें ऐसी चाह नहीं।

मन के मीत से जा मिलो फिर से, हम तुम्हारे हमराज नहीं।

दिल की राह पर निडर बढ़ो तुम, वह गीत प्रेम के गाता है।

मजबूरी में कराना कुछ भी, बलात्कार कहलाता है।।

पूर्ण समर्पण के सिवाय अब कुछ भी अंगीकार नहीं है




मैं पंक्षी हूँ मुक्त गगन का,बंधन कोई स्वीकार नहीं है।


पूर्ण समर्पण के सिवाय अब कुछ भी अंगीकार नहीं है।।


आश्वासन और वचन वायदे,भ्रमित नहीं मुझको कर सकते।   

          
बहु संताप सहे हैं अब तकसीमा टूटीं नहीं सह सकते।


जिस बंधन में बाँधा तुमने,उसका कोई आधार नहीं है।


आधारहीन ऐसे बंधन में बँधना मुझे स्वीकार  नहीं है।।


कर्तव्य रहित अधिकार जो चाहे ऐसा साथी किस मतलब का।


मित्र नहीं सुविधा-प्रेमी जो ,मित्र बने जाने किस-किस का।


रूप और धन आकर्षण का,यहाँ कोई प्रभाव नहीं है।


उपाधि वितरक शिक्षा का भी वर्चस्व मुझे स्वीकार नहीं है।।

Saturday, January 2, 2016

जरा समझाओ तो?

मित्रता


कहते हैं किसे


जरा बतलोओ तो


याद रखते हैं कितने दिन


जरा समझाओ तो?

Friday, January 1, 2016

प्रेम तो सद्भावना है

प्रेम की है भूख सबको,


प्रेम ना मिलता किसी को,


प्रेम को सौदा बना के,


पाना जब चाहते किसी को,


प्रेम तो सद्भावना है


प्रेम तो बस कामना है


प्रेम तो बस इतना सिखाता,


संकटों में हाथ थामना है।

Wednesday, December 30, 2015

अन्दर रिश्ता और था, बाहर राखी बाँधी हाथ

प्यार किया किसी और को, मस्ती और के साथ।

अन्दर रिश्ता और था,  बाहर  राखी बाँधी हाथ।

धन के लालच फिर फँसी, हमें भी फँसाया साथ।

सच बोल,  विश्वास कर,  अब पीट रहे हम माथ।

कितने चाहिए नोट?

विश्वास पर की आपने विश्वासघात की चोट।


पोल खुली जब आपकी हम में निकालें खोट।


झूठ, छल, कपट की यह सीख कहाँ से पाई?


विश्वास का यूँ खून किया, कितने चाहिए नोट?

संशयों से भरी हों दो बात तो होंगी

सोचते हैं आपसे मुलाकात तो होगी

संशयों से भरी हों दो बात तो होंगी

हम तो इसी उम्मीद में जीते हें सनम

गुस्सें में भले हों आप साथ तो होंगी।

Tuesday, December 29, 2015

हमें भुलाने के प्रयत्न

आपको हमें भुलाने के प्रयत्न भले ही नहीं करने पड़ें।

यादों को कुचलने के प्रयत्न भले ही नहीं करने पड़ें।

हम तो प्रयत्न भी कर नहीं सकते आपको भुलाने के,

भले ही आपको पाने के प्रयत्न जन्म-जन्म करने पड़ें।

Monday, December 28, 2015

आज भी हम चाहते हैं उसी तरह

आपको आज भी हम चाहते हैं उसी तरह

आपके आज भी हम निहारते हैं किसी तरह

आप भले ही जबाब न दो हमारे खतों के,

हम तो आज भी खत बन आते हैं उसी तरह।

Sunday, December 27, 2015

काश! हम आपके रूमाल ही बन पाते

काश! हम आपके रूमाल ही बन पाते।


चेहरा साफ करते, आपके होठों से लग जाते।


आपकी मुस्कराहट के भी होते हम ही साक्षी,


यदि कभी नयनों से बहते अश्रु हम उन्हें पी जाते।

Saturday, December 26, 2015

संसार


मुस्करा के इन्कार कर पायें

हम कर रहे इन्तजार उस पल का जब आपके दीदार कर पायें।


हम आप हों आमने-सामने और हम आपको इजहार कर पायें।


समय चक्र घूमता ही रहता नित, किन्तु एक बार फिर हों हम,


सामने आपके, और आप हमें देख, मुस्करा के इन्कार कर पायें।

Friday, December 25, 2015

जो पाया है उसे सभालो, सृजन प्रकृति से नहीं है पाया

खोटा सिक्का नहीं हो तुम भी



एक रुपये के  नोट को  तुमने, एक हजार  कह  हमें चलाया।

खोटा सिक्का नहीं हो तुम भी, अपना मूल्य है अधिक लगाया।।

झूठ बोलकर मूल्य न बढ़ता,

छल-कपट तो मति है हरता।

गलती स्वीकार, सुधार करे जो,

व्यक्ति वही  शिखर पर चढ़ता।

हमने सब कुछ सौंप दिया था, तुमने सब कुछ सब से छिपाया।

खोटा सिक्का नहीं हो तुम भी, अपना मूल्य है अधिक लगाया।।

सब कुछ सच-सच बताया होता,

समर्पण का जज्बा दिखाया होता।

प्रेम, विश्वास और सेवा से ही,

संबन्ध का बिरवा लगाया होता।

मुड़े-तुड़े  और फटे  नोट को, तुमने  हमको नया बताया।

खोटा सिक्का नहीं हो तुम भी, अपना मूल्य है अधिक लगाया।।

अति विश्वास की भेंट चढ़े हम,

विश्वासघात के शिकार बने हम।

भिन्न-भिन्न हैं अपने पथ अब,

महफिल सजो तुम, अकेले रहे हम।

जो पाया है  उसे सभालो,  सृजन  प्रकृति से नहीं है पाया।

खोटा सिक्का नहीं हो तुम भी, अपना मूल्य है अधिक लगाया।।

राष्ट्रप्रेमी की है सशर्त बधाई

सशर्त बधाई

दो हजार पन्द्रह का पुनः अवलोकन, सोलह की करो योजना भाई।

ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो, राष्ट्रप्रेमी की है सशर्त बधाई।।


मौज-मस्ती भी तभी मिलेगी, व्यस्त रहो कुछ कर्म भी कर लो

स्वार्थ भी पूरे तब ही होंगे, सुरक्षित समाज की रचना कर लो

कानूनों से ही सुरक्षा न मिलेगी, अन्तर्मनों को शिक्षित कर लो

अधिकारों को झगड़े बहुत हो, कर्तव्यों की कुछ सुध कर लो

समानता, स्वतंत्रता और बंधुता, न्याय की भी तो करो कमाई।

ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो, राष्ट्रप्रेमी की है सशर्त बधाई।।

लूटपाट, अपहरण, बलात्कार अब तजने का संकल्प करो।


दोषारोपण बहुत हो चुका, कुछ करने का संकल्प करो।

मनुष्य न बन, अपराधी बनते, शिक्षालयों का संकल्प कर।

अपराध मुक्त यदि समाज बनाना, सद् शिक्षा का संकल्प करो।

नकल मुक्त शिक्षालय हो तो, सदाचारी सब बनेंगे भाई। 

ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो, राष्ट्रप्रेमी की है सशर्त बधाई।।


सरकार बदली वर्ष भी बदली, स्वयं बदलने की बारी है।

केवल सरकार न कुछ कर पाये, समाज की भी जिम्मेदारी है।

अपेक्षा बहुत पाली है अब तक, समझे कर्म से  भी यारी है।

केवल सरकार पर निर्भर होकर करते हम अपनी ख्वारी है।

सरकार अपना काम है करती, हम भी अपना कर लें भाई!

ज्ञान, भाव और कर्म मिले तो, राष्ट्रप्रेमी की है सशर्त बधाई।।

आशिक बहुत हैं पास तुम्हारे

झूठ बोलकर हमें फँसाया, साथ न तुमको चलना था।
साथी तुम्हारे दिल में बैठा, हमको तो वश गलना था।
षड्यंत्रों की जनक बड़ी हो, बनना उसी की ललना था।
पागल थे हम साथी खोजा, हमें तो अकेले ही चलना था।

गेम खेलने का शोक तुम्हें है, खेल तुम्हारा अपना था।
अपने धन को पास रखो तुम, लूटो हमें जो सपना था।
आशिक बहुत हैं पास तुम्हारे, जिन्हें नाम तुम्हारा जपना था।
जहाँ जाओगी, मिलेंगे वहाँ भी, मिटेंगे, हमको मिटना था।

जाओ वहीं और सुखी रहो तुम, जिसकी गोद में पलना था।
तुमने तोड़ा, टूट गये  हम, टूटा वह  भी  जो सपना था।
तुम्हें  मुबारक,  तुम्हारा  साथी, रोना  हमारा  अपना था।
जिसको चाहा, उसको भोगो, लुटते  हैं हम,  लुटना  था।

Thursday, December 24, 2015

अवगुण भी आपके हमें, सदैव लगते दुलारे हैं

आपकी ही नहीं चाहत आपके गुण हमें प्यारे हैं।


अवगुण भी आपके हमें, सदैव लगते दुलारे हैं।


मान-अपमान का नहीं ख्याल हमको रहा,


हम तो जान सब कुछ आप पर ही बारे हैं।