Wednesday, December 23, 2015

आपके बिना हर खत अंजाना लगता है

आपके चाहत का ही यह प्रभाव लगता है।


आपके बिना हर लम्हा बेगाना लगता है।


खत तो आते ही रहते हैं अक्सर किन्तु,


आपके बिना हर खत अंजाना लगता है।

Tuesday, December 22, 2015

हर शक्लोसूरत आपकी ही नजर आती है

हर फोन कॉल आपकी नजर आती है।

हर शक्लोसूरत आपकी ही नजर आती है।

जिसे भी सुनते हैं, हर आवाज लगती वही,

हर पल हमें हमारी सरकार नजर आती हैं।

Monday, December 21, 2015

आपने क्या जादू कर डाला

समझ न पाये अपने आपको

आपने क्या जादू कर डाला

बांध न पाया जिसको कोई

आपके नाम की जपता माला।


बिना आपके चैन मिले ना

बिना आपके नैन खुलें ना

आपही है दिल की मलिका

बिना आपके होठ हिलें ना।

Sunday, December 20, 2015

इंकार में छिपा आमंत्रण, अब भी याद आता है

आपका हँसता हुआ वो चेहरा याद आता है।


होठों का मुस्काता गुलाब, अब भी याद आता है।



मधुरता लिए हुए वो गुस्सा था कितना मनोहर,


नयनों में बसा वो प्रेम, अब भी याद आता है।



मुस्कराने की वो अदा, वो ढलती हुई जवानी,


इंकार में छिपा आमंत्रण, अब भी याद आता है।



कुछ भी करने की चाहत, वो संदेहों के घेरे,


साथ निभाने का वायदा, अब भी याद आता है।



अविश्वास भरा विश्वास, सन्देह भरा समर्पण,


लोक-भय भरा आलिंगन, अब भी याद आता है।

Saturday, December 19, 2015

मरते हैं हम थोड़ा-थोड़ा

तुम्हें तुम्हारे रंग मिल जाएँ, हमने है रंगो को छोड़ा।


सारे रिश्ते तुम्हें मुबारक, अन्दर हो तुम, सबको छोड़ा।


तुम सारी खुशियों को जी लो, मरते हैं हम थोड़ा-थोड़ा।


तन से भले ही दूर रहो तुम, मन ने नहीं है रिश्ता तोड़ा।

छल-कपट से क्यूं दबातीं?

प्रेम का रस तो अन्दर बहता

हिय में से क्षण-क्षण है रिसता

छल-कपट से क्यूं दबातीं?

जो है आपके अन्दर बसता।

आप भले ही हमें ठुकराओ

दूर भले ही हम से जाओ

हम आपको भूल न सकते

पीछा छूटे, विष दे जाओ।


Friday, December 18, 2015

प्रेम को बस देना आता है

प्रेम न होता

समय का बन्दी

कभी था में ना

परिवर्तित होता

प्रेमी वियोग में 

हरदम रोता


प्रेम न होता 

उड़ता पंक्षी

छोड़ कभी भी

नहीं उड़ सकता

आप भले ही समझ न पाई

मैं तो देखो राह ही तकता


जिनका प्रेम मिट जाता है

प्रेम का वह तो नहीं नाता है

वह तो केवल स्वार्थ ही होता

वासना ही के गीत गाता है

प्रेम में नहीं कोई चाहना होती

प्रेम को बस देना आता है।

Thursday, December 17, 2015

बांकी पूछ


बांकी पूछ-१


बांकी पूछ-२


नारी का कविता ब्लॉग: तुमने कहा था...

नारी का कविता ब्लॉग: तुमने कहा था...

खिली कली ने चाह जगाई

नीलाकाश में थे

भटकते हम

राह न पड़ती थी दिखाई

न थी चाह

किसी के साथ की

खिली कली ने चाह जगाई


चाह जगी जब 

कली छिटक गई

जिन्दगी अपनी राह भटक गई


एक बार फिर उसको देखा

समझा खुल गई किस्मत रेखा

हाथ कली की तरफ बढ़ा जब

एक बार फिर हाथ झटक गई।

Wednesday, December 16, 2015

बैठी नहीं आप हमारे रथ में

चाहा था 
हमने
आपके साथ 
जी लेंगे 
चन्द क्षणों की
इस जिन्दगी को
आपने भी तो
स्वीकार किया था
देर से ही सही
हमारी उस बन्दगी को
अचानक 
क्या हुआ?
छा गया
धुंआ
हमारे पथ में
बैठी नहीं आप
हमारे रथ में
हमको भी 
आपने 
फेंक दिया गर्त में
आप जा छुपी
न जाने किस पर्त में।

Monday, December 14, 2015

नयनों के हमारे सामने होंगी

क्या कर रही हैं आप प्रिये, छुट्टी है शायद घर पर होंगी।

हम तो घर को देख न पाये, खुश हैं आप तो निज घर होंगी।

हम पागल हैं, दीवाने आपके, चाह रहे बस आपके दर्शन,

कौन सा दिन वो आयेगा जब, नयनों के हमारे सामने होंगी।

Saturday, December 12, 2015

हम राह तक रहे, मित्र आपके!

आपके कहने से तो हम पहले ही हो चुके आपके।

बात फिर क्यों बदलतीं, अस्वीकारो फिर भी आपके।

मित्र कहा, बनी प्रेमिका, साथ चलने का वो वायदा,

भूल गईं भले आप, हम राह तक रहे, मित्र आपके!

Friday, December 11, 2015

क्या बाँहें फैला भी नहीं सकतीं?

कैसी हैं? क्या कर रहीं हैं? क्या आप हमें बता भी नहीं सकतीं?

न लिखो, न दो जबाब, करती रहो प्रयास, भुला भी नहीं सकतीं?

आपने जो किया, जो नहीं किया, इसका हमको नहीं कोई गिला,

नही आ सकतीं,  आते हैं हम, क्या बाँहें फैला भी नहीं सकतीं?

Thursday, December 10, 2015

आप यदि होतीं पास

शुभ प्रभात आपको कर पाते, सुबह चेहरा आपका निहार।
आपके चेहरे की मुस्कराहट, सोने से पहले पाते हम निहार।
खुशियाँ होती चन्द हमारे भी जीवन में, आप यदि होतीं पास,
रक्त में होता, रोमांच, रोमांस और आपको रहते निहार।

Wednesday, December 9, 2015

तुम तो बस हरजाई हो

घाट-घाट का पानी पीकर, तुम, द्वार हमारे आई हो।

ना समझ थे, समझ न पाये, तुम तो बस हरजाई हो।।

      खुली किताब है, जीवन अपना।

      हमें न किसी का माल हड़पना।

      झूठ, छल, कपट की प्रतिमा,

      हमें न तुम्हारे साथ में चलना।

निर्दयता से जाल में फाँसा, सम्बन्ध भी बने कमाई हो।

ना समझ थे, समझ न पाये, तुम तो बस हरजाई हो।।

      जाति, धर्म और कुल ना कोई।

      जो भी मिला, अपनाया  सोई।

      ‘प्रेम’ शब्द व्यापार  बनाया,

      ऊसर भूमि कहीं जाती बोई?

धन ही धर्म है, धन की धनि हो, धन ही तुम्हारा भाई हो।

ना समझ थे, समझ न पाये, तुम तो बस हरजाई हो।।

      सच के पथिक हैं, साथ न कोई।

      अकेले  चलेंगे, ना खोजें  कोई।

      तुम जिसकी हो, उसे सौंपते,

      काटेंगे  हम,  फसल जो बोई।

शिकारी हो तुम, शिकार बने हम, काटो तुम्हीं कसाई हो।

ना समझ थे, समझ न पाये, तुम तो बस हरजाई हो।।

वह तो नारी पराई थी

‘झूठ के पाँव नहीं होते’ यह पढ़ते सुनते हम आये थे।

विश्वास जमाने  हेतु ही, हमने  सच्चे गीत सुनाये थे।

राष्ट्रप्रेमी का शिकार हो गया, झूठ के शस्त्र चलाये थे।

शिकार बनाने की खातिर, तुमने कितने जाल बिछाये थे।


स्वर्ग नरक हम नहीं  मानते, तुमने ट्रेलर दिखा दिया।

हमने खुद को तुमको सौंपा, और कोई था तेरा पिया।

तुम्हारे साथ में समय जो बीता, पाप किये, नर्क जिया।

एक हाथ से ताली न बजती, तुमने विश्वास घात किया|


हम जिसे अपनी समझ रहे थे, वह तो नारी पराई थी।

शिकार बनाने की खातिर ही, वह तो केवल आई थी।

राष्ट्रप्रेमी है तुम्हारे जाल में, अब मरने की तैयारी में,

खाल खींचकर खुश तुम हो ना, सारी बातें  हवाई थीं?


हाथ-पाँव सब बाँध  के तुमने, मौत की  राह पर डाला है।

डोरी खींचती,  खुश हो होती, करके  मुँह निज काला है।

प्यास लगी थी तुमने पकड़ाया, हमको जहर का प्याला है।

धोखा खाकर समझ गये हम, हमने खुद ही संकट पाला है।

Tuesday, December 8, 2015

जिसको चाहा उसको भोगा

आपकी ही हर जिद हर पल पूरी होती आई है।

जिसको चाहा उसको भोगा, की जो मन को भाई है।

इच्छा है अपनी तो बस एक बार फिर मिल पायें हम,

हम तो हर पल पाट रहें हैं जो बीच हमारे खाई है।