08.23.2007
सैकड़ों दुनियाँ में खिलते हैं फूल
कुचले जाते और बनते धूल
हम भी आपके पथ में आए,
कुचल बढ़ी, क्या आपकी भूल!
"मुझे संसार से मधुर व्यवहार करने का समय नहीं है, मधुर बनने का प्रत्येक प्रयत्न मुझे कपटी बनाता है." -विवेकानन्द
जीवन खुली किताब है, छिपा न कोई राज। अपनी अपनी राह है, अपना अपना काज।।1।। जीवन साधन साधना, ना कोरी यह आस। बोए बिना किसान को, मिलती नहीं कपास...
"स्वतन्त्र भारत में नारी को मिले वैधानिक अधिकारों की कमी नहीं- अधिकार ही अधिकार मिले हैं, परन्तु कितनी नारियां हैं जो अपने अधिकारों का सुख भोग पाती हैं? आप अपने कर्तव्यों के बल पर अधिकार अर्जित कीजिए। कर्तव्य और अधिकार दोनों का सदुपयोग कर आप व्यक्ति बन सकती हैं। आपको अपने कर्तव्यों का भान है तो कोई पुरुष आपको भोग्या नहीं बना सकता-व्यक्ति मानकर सम्मान ही करेगा। इसी तरह आने वाली पीढ़ी आपकी ऋणी रहेगी।"
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