Saturday, June 11, 2016

खुद पर ही विश्वास ना, वही मांगते और



शान्ति और आनन्द तज



प्रेम कहीं ना मिल सका, प्रेम रहे थे ढ़ूढ़।

उर माहि ही स्रोत झरत, अब तक थे हम मूढ़॥


नारी का सम्मान क्यूं? क्यों नर का हो मान?

केवल सच्चे कर्म ही, जग में होत महान॥


प्रेम और विश्वास से, बढ़कर ना कुछ और।

लुटेरों की चिन्ता नहीं, सत्य का उर में ठौर॥


लूट-लूट हासिल करें, झेलन पड़े तनाव।

शान्ति और आनन्द तज, खाली हाथ जनाब॥



खुद पर ही विश्वास ना, वही मांगते और।

झूठ, छ्ल और कपट से, लूट रहे सब
ठौर॥

Friday, June 10, 2016

पिता का पत्र बेटे के नाम

मित्रो! फ़ुरसत के क्षणों में पुरानी साहित्यिक पत्रिका परिधि-१० जनवरी १०१२ पढ़ने लगा। अशोक जैन ’पोरवाल" जी की रचना ’अगर मैं कभी......." ने ध्यान खींचा। वर्तमान समय में लोगों ने संबन्धों को भावनात्मक पहलू से दूर ले जाकर आर्थिक पहलू पर टिका दिया है। ऐसे समय में पिता के भावनात्मक पत्र के माध्यम से अशोक जी ने एक पिता की भावनाओं किस प्रकार उकेरा है। आइये आप भी पढ़िये

Tuesday, June 7, 2016

प्रेमी क्षण-क्षण बदलते, पति को डाला धोय

प्रेम नहीं मिलता कहीं, करो उसकी खोज।

खुले हाथ तुम बांट लो, मिलता है हर रोज॥


प्रेम नहीं मांगे मिले, मिले हाट बजार।

शिकारी ना प्रेम पाय, शिकार करे हजार॥


प्रेम पास ना फ़टकता, पास दमड़ी होय।

प्रेम नाम सब लूटते, छोड़त खाली जोय॥



प्रेम आज सस्ता हुआ, हलो, हाय, ज्यों होय।

प्रेमी क्षण-क्षण बदलते, पति को डाला
धोय॥

Sunday, June 5, 2016

धोखा देना प्रेम है? हार कहाती जीत

निज को प्रेम कर सके, और करेंगे कोय।

जो जग को तजि चल सके, साथ हमारे होय।।



प्रेम हवन का कुण्ड है, सब कुछ होता होम।

समर्पण का यह मूल है, सब तजे प्रेमी कोम।।



राष्ट्र प्रेम एक भाव है, क्षण - क्षण बदले रूप

कर्तव्यबोध विचित्र है, ज्यो छाया धूप।।



प्रेम नही हम जानते, नही जानते मान।

दुत्कारे झेली बहुत, और सहे अपमान ।।




प्रेम-व्रेम है कुछ नही, मात्र निभाते रीत।

धोखा देना प्रेम है? हार कहाती जीत।।

दुराचारिणी स्त्रियों के लिये पति ही उनका शत्रु होता है

लुब्धानां याचकः शत्रुमूर्खाणां बोधकः रिपुः।


जारस्त्रीणां पतिः शत्रुश्चोराणां चन्द्रमा रिपुः॥६॥


मनुस्मृति दशवा अध्याय


अर्थात- 
लोभी व्यक्तियों के लिये भिक्षा, चन्दा या दान मांगने वाले व्यक्ति शत्रु रूप होते हैं, क्योंकि याचक को देने के लिये उन्हें अपनी गांठ के धन का त्याग करना पड़ता है। मूर्खों को समझाने वाला व्यक्ति अपना शत्रु मालुम पड़ता है। दुराचारिणी स्त्रियों के लिये पति ही उनका शत्रु होता है, क्योंकि उसके कारण उनकी स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता में बाधा पड़ती है। चोर चन्द्रमा को अपना शत्रु समझते हैंं क्योंकि उन्हें चांदनी में छिपना मुश्किल होता है।



मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्य़ा अधनानां महाधनाः।


वारांगनाः कुलस्त्रीणां सुभगानां च दुर्भगाः॥


मनुस्मृति- पंचम अध्याय- छ्ठा श्लोक


अर्थात- 
पण्डितों से मूर्ख ईर्ष्या करते हैं, निर्धन बड़े-बड़े धनिकों से अकारण द्वेष करते हैं, वेश्याएं तथा व्यभिचारिणी स्त्रियां पतिवृताओं से तथा सौभाग्यवती स्त्रियों से विधवायें द्वेष करती हैं। यह संसार की मनोवृत्ति है।