Wednesday, June 10, 2026

अकेलापन

 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।


चेहरे हज़ारों पास मेरे,  

आँख से आँख फिर भी अजनबी,  

हँसी के शोर में भी देखो,  

मन का कोना सन्नाटा ही मानता है।  


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


शब्द उछलते कानों तक,  

अर्थ कोई छूता नहीं,  

रिश्ते सब रोजनामचे,  

नाम बस नाम ही को मानता है।


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


कंधे से कंधा टकराए,  

फिर भी दूरी योजन भर,  

मैं "मैं" को ही ढो रहा,  

साथ में चलते हुए साथ नहीं मानता है। 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


काश कोई इतना कह दे,  

"रुको, सुनो, तुम हो तो सही",  

स्फोट सा फूटे भीतर तब,  

टूटे ये भ्रम सत्य है जो जानता है।  


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  


भीड़ नहीं, बस एक मन चाहिए,  

जो "तू" कहे, "मैं" मिट जाए,  

फिर न साले अकेलापन,  

जब स्वहित हेतु स्व को भानता है। 


भीड़ में मैं हूँ खड़ा,  

फिर भी  

अकेलापन सालता है।  

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