Saturday 30 March 2013

जि़न्दगी में कुछ दिनों के लिए ,

जन्म लेकर आए हैं जि़न्दगी में कुछ दिनों के लिए ,
दिल खोलकर मोहब्बत कर लें कुछ दिनों के लिए ,
प्यासे मन की भूख कभी मिटती नहीं जि़न्दगी में ,
मिटा लें भूख अपनी चाहतों की कुछ दिनों के लिए।
खूबकिस्मत हैं हम जो इतने खूबसूरत रूप पाए हैं ,
सँवारें हर पल अपने रूप हम कुछ दिनों के लिए ,
दमन के ख्याल से निकलके दामन थामें प्यार का ,
प्यार से जी लें जि़न्दगी हम कुछ दिनों के लिए ।
बदन से निकलेगी जब रूह अधूरे रह जाएँगे सपने ,
थोड़ा हँसके सँजोएँ सपने हम कुछ दिनों के लिए,
मजहबी अरमानों के साथ इंसानियत हैसियत होती है,
जीत हासिल कर लें हर जगह कुछ दिनों के लिए ।
चिन्ता हर वक्त कतरनी की तरह कतरती है जि़न्दगी ,
दूर से ही करें हम उसे सलाम, कुछ दिनों के लिए ,
खुदा की खिदमत से खुद को कभी अलग न करें ,
उसने दी है 'आनन्दसे मोहल्लत कुछ दिनों के लिए।
दिनांक 28.03.2013 ग़ज़लकार -
आ. पी. आनन्द (एम. जे.)
टीजीटी. हिन्दी
जनवि. पचपहाड़, राजस्थान ।

Friday 11 January 2013

प्यार की जीत से जिन्हें होती है सख्त नफरत


जहाँ एतबार नहीं, वहाँ प्यार नहीं होता ,

भरी महफिल में भी कोई यार नहीं होता,

चाहे लाख कर ले कोई अपनी कोशिश ,

मगर दिलवर का यूं दीदार नहीं होता।



इसी के दम पै पूरी दुनिया बसी होती है ,

एतबार न हो तो हर वक्त हँसी होती है,

खुद बड़ा होने का जो भूल करते हैं हरदम ,

उन्हें अपनों से ही कभी प्यार नहीं होता ।



जमाने की सोच से जो ताल्लुक नहीं रखते,

उन्हीं का ही अक्सर अलग संसार होता है ,

आभार के दर पै जो भार बन खड़े होते हैं ,

उनके दिल में मुहब्बत का आसार नहीं होता।



बनके ढोंगी जो सदा दरबार लगाए रहते हैं ,

जमावड़ा लोगों का, वहाँ  हर बार हीं होता,

प्यार की जीत से जिन्हें होती है सख्त नफरत,

 उस जिन्दगी में ‘आनन्द’का इजहार नहीं होता।

                          ग़ज़लकार-

                      आर.पी. आनन्द (एम.जे.)

                       जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,

                       झालावाड़, राजस्थान।


Thursday 3 January 2013

रोने की चिडि़या


कभी सोने की चिडि़या कहा जाने वाला भारत आज रोने की चिडि़या साबित हो रहा है, क्योंकि जिस स्वतंत्रता के साथ अपराधी, अपराध करके समाज में सिर उठाकर जी रहे हैं । उससे यही बात सामने आती है कि अब शरीफों के लिए इस देश में कोई जगह नहीं है और न ही उन्हें सम्मान से जीने का कोई अधिकार है। सम्मान से जीने का हक तो सिर्फ दौलतमंद और अपराध जगत वाले ही जन्म से अपने साथ लेकर आए हैं। सरेआम एक अपराधी अपनी इव्छानुसार जिसे चाहता है, उसके साथ बलात्कार कर उसकी निर्मम हत्या करके हथियार भाँजते हुए भीड़ के बीच से फरार हो जाता है और लोग उसकी रावण लीला को बड़े आश्चर्य से देखते रह जाते हैं। उसके बाद पुलिस आती है तो कोई गवाही देने के लिए गवाह नहीं मिलता है। जब गवाह ही नहीं मिलेगा तो अपराधी कहाँ से पकड़े जाएँगे? अपराधी नहीं पकड़े जाएँगे तो सजा कहाँ से होगी और जब सजा ही नहीं होगी तो अपराध तो बढ़ेंगे ही । गत दिनों दिल्ली में जिस तरह से एक निजी विद्यालय वाहन में अपराधियों ने अपनी घिनौनी हरकत से पूरे मानव समाज को शर्मसार किया । उस घटना को सुनकर पूरा देश हतप्रभ रह गया।     
                   आनन-फानन में पीडि़ता को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया । लोग पीडि़ता के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। दिल्ली के हर क्षेत्र से बलात्कारियों को फाँसी की सजा देने की आवाज बुलन्द होने लगी। मामले को न्यायालय में लाया गया। सरकारी आदेश के आधार पर याचिका पर सुनवाई प्रतिदिन होने लगी। किन्तु कोई निष्कर्ष नहीं निकला। दिल्ली की आवाज सम्पूर्ण देश में गँूजने लगी। बलात्कार का शिकार हुई लड़की के साथ हर प्रदर्शनकारियों की सहानुभूति थी । लेकिन सहानुभूति व्यक्त करने वाले लोग सड़कों, गलियों और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री आदि के घर के सामने चिल्लाने के सिवा कर ही क्या सकते थे? सरकारी आदेशों की अनुपालना में दिल्ली पुलिस अपनी कार्यवाही में दिनरात लगी हुई थी। कभी अपराधियों को पकड़ने के लिए भागती तो कभी जनसमूह को रोकने के लिए आगे आती । किन्तु लड़की की पीड़ा को दूर करने वाला कोई नहीं था । दरिन्दों ने जो पीड़ा उसे दिया था, उसे दूर करने के लिए डाक्टरों ने खूब मेहनत की,परन्तु कोई सफलता नहीं मिली।
                   अन्ततोगत्वा जीवन की अन्तिम घड़ी में उसे सिंगापुर के एलिजाबेथ अस्पताल में पहँुचाया गया। जहाँ दूसरे ही दिन पीडि़ता ने अपने असहनीय दर्द के साथ संसार को छोड़कर चली गई। इसकी सूचना मिलते ही सारा देश शोक में डूबगया । प्रधानमंत्री ने दंगा-फसाद की आशंका को ध्यान में रखकर देश के नाम सन्देश दिया कि, ’अपराधी को उसके किए की सजा मिलेगी।’ लेकिन कब तक सजा मिलेगी इसकी अभी तक किसी को कोई सूचना नहीं मिली है। वैसे तो रोज इस देश में न जाने कितने बलात्कार होते हैं । लेकिन इस घटना ने तो पूरे देश को हिलाकर रख दिया।
                   आखिर इसमें कौन सी ऐसी बात थी जो सम्पूर्ण भारतीय जनमानस को एकता के स्वर में पिरो दिया ? जायज सी बात है कि जब भी हैवानियत अपनी हद पार करती है तब भी मानवीय स्वाभिमान सदमे में आ जाता है। ऐसी स्थिति में भारतीय एकता सार्वजनिक होती है। जिसे आज देखा और अनुभव किया जा सकता है । जिस लड़की को दरिन्दों ने गन्ने के रस की तरह निचोड़ कर चलती हुई बस से मरा जानकर नीचे फेंक दिया था। वही अस्पताल में जीने की इच्छा जाहिर की थी। शरीर के अंगों के काम न करने के बावजूद भी वह हिम्मत नहीं हारी थी। जिन्दगी जीने की कामना लेकर हैवानों को अधिकतम दण्ड दिलाना चाहती थी। किन्तु उसके सारे अरमान अधूरे रह गए । अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या वर्तमान सरकार भारतीय न्यायपालिका की पेचीदगियों को दरकिनार करके पीडि़ता के बलात्कारियों को मौत की सजा दिलवाने में
सफल हो पाएगी ? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा! जिस प्रकार तेरह दिनों की असहनीय पीड़ा को सहन करके उस युवती ने 29.12.2012को मध्यरात्रि दिन शनिवार को अन्तिम साँस लेकर सम्पूर्ण भारत को जगा गई, उसी प्रकार इस जागरण को सतत् बनाए रखना सभी देशवासियों का नैतिक और सम्वैधानिक कर्तव्य है कि दुष्कर्मियों को घटनास्थल पर ही पकड़कर मृत्युदण्ड देने का संकल्प लें । तभी सम्भवतः आए दिन होने वाली इस तरह की वारदातों से समाज और नारी संवेदना को न्याय मिल सकता है । जब पापाचारियों को सबके सामने मौत के घाट उतारा जाएगा । तभी मानव समाज का अपराध कम होगा। अपराधी या तो अपराध छोड़कर जीवन के सही मार्ग का अनुसरण करेंगे अथवा जीवन सेहाथ धोएँगे ।
                 समाज में जिसके पास अर्थाभाव नहीं है, वही व्यक्ति सामाजिक सभ्यता को खरीद लेता है। क्योंकि अपनी आय से अधिक सम्पत्ति रखकर कर्मशील परिश्रमियों के जीवन का व्यापार करता है। भारत के प्रत्येक राज्य में ऐसे धन्नासेठ अनेक हैं जो अपनी दमनकारी नीतियों के बल पर एक छत्र राज्य कर रहे हैं । ऐसे व्यापारियों के विरुद्ध आवाज कौन उठाए,उनसे झगड़ा मोल लेकर कौन समस्याओं को निमंत्रण दे? जिस पुलिस प्रशासन से न्याय की उम्मीद लेकर घटना की सूचना दी जाती है। घटनास्थल पर पहुँचकर जब वह जाँच आरम्भ करती है तो साक्ष्य के अभाव में निराशा हाथ लगती है। कई जगह तो ऐसा होता है कि सिपाही और कैदी के मिलने से सूचनादाता ही मारा जाता है ।  न्यायपालिका में न्याय की दलील देने वाले अधिवक्ताओं और विधिवेत्ताओं ने तो अपने पेटपूजा का शुल्क इतना बढ़ा दिया है कि उनसे निःशुल्क न्याय की आशा करना सबसे बड़ा अपराध माना जा सकता है। ऐसे में साधारण जीवन जीने वाले व्यक्तियों की जिन्दगी सुरक्षा एक ही न्यायाधीश कर सकता है,वह है; भगवान। अतएव संसार का संचालन करने वाले परमपिता पिता परमेश्वर से हाथ जोड़कर प्रार्थना करेंगे तो निश्चित रूप से वह सबकी सुरक्षा करेगा।
                मानवता को शर्मसार करने वाली दिल्ली की एक घटना ने आज महिला सुरक्षा जागरण को जिस तरह से प्रेरित कियाहै। इस प्रेरणा से प्रत्येक व्यक्ति को चैतन्य होने की जरूरत है, अपने बच्चों को घूमने की खुली छूट देने वाले अभिभावकों को सतर्क होने की आवश्यकता है, घर के हर रिश्ते पर ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि सबसे अधिक महिलाओं के साथ दुराचार घरों के अन्दर होता है, जहाँ कोई सन्देह नहीं करने वाला होता है, वहीं पर अश्लीलता की शुरुआत होती है । इसलिए मानवविहीन प्रवृत्तियों को रोकने के लिए जनजीवन को सर्वप्रथम अपने घरेलू सम्बंधों , रिश्तेदारों, पड़ोसियों, हितैषियों , मित्रों और स्वयं आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों पर मनन करने की आवश्यकता है। तभी समाज के जघन्य अपराधों को रोका जा सकता है। रिश्तों की डोर से बँधे मानव जीवन को यथार्थ के धरातल पर उतारना होगा । स्वयं और अपनी पीढ़ी को आसुरी सोच और कृत्य से उबारना होगा। उसके बाद ही अपराध जगत से मुक्त हो सकेंगे ।
                 आज जिस घिनौने अपराध के विरुद्ध लोग एक़ित्रत होकर सरकार से कड़े से कड़े नियम बनाने की माँग कर रहे हैं, उन्हें अपने चेहरे के पीछे छिपे जीवन की उस घटना की ओर भी ध्यान देना चाहिए, जहाँ वे भी कुछ ऐसे अपराध किए हैं जो शायद क्षम्य न हों। परन्तु घर की महिलाएँ उनके कृत्य को छिपाकर उन्हें जीवनदान दी हैं। कुछ दिन पहले‘स्टारप्लस’ चैनल पर रात्रि दस बजे ‘सच का सामना’ धारावाहिक प्रसारित किया जा रहा था। जिसके माध्यम से घरेलू हिंसा उभरकर सामने आई और उसके बाद कई लोगों का दाम्पत्य जीवन बिखर गया। रुपए कमाने की लालसा ने सच बोलने पर विवश किया और विश्वास की डोर टूट गई। लिहाजा अनेक सज्जन व्यक्ति गृहस्थ जीवन से हाथ धो बैठे । तदुपरान्त न्यायायिक दखल के उपरान्त उस धारावाहिक पर प्रतिबंध लगाया गया और मानव समाज की सच्चाई एकरहस्य बनकर रह गई ।
                  अन्त में इन सारी वृत्तांतों के बाद यही कहना चाहता हँू कि दिल्ली में जिन राक्षसों ने अपनी राक्षसी प्रवृत्तियों के माध्यम से से तेइस वर्षीय युवती को निचोड़ कर उसकी जिजीविषा को क्षतक्षित कर दिया और जिसे सांसारिक भगवान कहे जाने वाले डाॅक्टरों ने किसी तरह भी बचा नहीं पाया। नारी संवेदना का आधार बनी युवती दर्द की पीड़ा से कराहती हुई संसार को छोड़कर चली गई। यह निश्चित रूप से मानवता के लिए शर्मिन्दगी का विषय है और ऐसे विषय में जानवरों से भी गिरी हरकत करने वाले मानवीय पशुओं को सार्वजनिक स्थल पर ही फाँसी देनी चाहिए। तभी समाज की हैवानियत कम हो सकती है। उसके बाद ही भारत को दुनिया में सम्मान जनक नजरिए से देखा सकता है ।
दिनांक - 30.12.2012 
लेखक-
आर. पी. आनन्द (एम.जे.)
प्रक्षिक्षित स्नातक (हिन्दी
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपाहाड़, झाला. राज

Tuesday 1 January 2013

नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें

नव वर्ष में, नव मानव का, आओ हम संधान  करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
जो बीत गया, वह रीत रहा, 
गलती बहुत करी हैं अब तक।
अशिक्षा, आतंकवाद, भ्रूण हत्या,
गैंग रेप सहोगे कब तक?
शासन, प्रशासन, न्यायपालिका,
दोषारोपण करोगे कब तक?
65 वर्ष स्व, तंत्र बना ना,
अंग्रेजी से शासित कब तक?
व्यक्ति, परिवार, समाज शुद्ध हो,
बातें बहुत करी हैं अब तक?
सुख, शान्ति, समृद्धि ना पाओ,
मिलकर साथ चलो ना तब तक।
नव वर्ष में नव मानव का, आओ हम अवधान करें।
 नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
अपना-अपना अह्म त्याग कर,
समन्वय से रहना सीखेंगे।
नहीं समानता, नहीं स्पर्धा,
सबके हित जीना सीखेंगे।
अधिकारों का संघर्ष नहीं,
कर्तव्य निभाना सीखेगें।
सबको दें विकास के अवसर,
साथ में चलना सीखेगें
ना कोई शोषण, ना कोई बंधन,
हम मुक्त विचरना सीखेंगे।
कानूनों का निर्माण न केवल,
सम्मान भी करना सीखेंगे।
नव वर्ष में नव मानव का आओ हम आह्वान करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।
नव वर्ष में, हर मानव को, 
मानवता   सिखलायेंगे।
नव वर्ष में, निज हित खातिर,
नहीं किसी को बहलायेंगे।
सुरक्षा, संरक्षा और समर्थन,
हर नारी को दे पायेंगे।
कानूनों का दुरूपयोग करके,
पतियों को नहीं फँसायेंगे।
अशिक्षा और भ्रूण हत्या को,
जड़ से इस वर्ष मिटायेंगे।
अपनी ढपली अलग न करके,
समूह गान हम गायेंगे।
नव वर्ष में, नव मानव का, आओ हम कल्याण करें।
नर-नारी बन करके पूरक, नव भारत का निर्माण करें।

Monday 31 December 2012

रामप्रीत जी की नव वर्ष



नए साल में नई सोच का ही मात्र प्रसार हुआ,
भूल पुरानी बातों को खुशियों का संसार हुआ ,
नई तरंगे, नई उमंगे जीवन का आधार बनीं ,
हर तरफ सुहाने मौसम का सिर्फ आसार हुआ ।
चकाचैंध की बनी चैकटी सबके घर आँगन में ,
मस्त होकर झूम रहे हैं लोग जीवन के सावन में,
हँसी वसुन्धरा भारत की जब खिले फूल उपवन में ,
हर द्वार पै खुशी मना लो चारों ओर प्रचार हुआ ।
किरण सुनहली सूरज की, जहाँ पहली बार पड़ी ,
चमक उठी होठों की लाली रम्भा जिसके द्वार खड़ी ,
मंद हँसी बाँकी चितवन में प्यार का एहसास हुआ ,
बाल मन सुरभित होता है ,उनके लिए उपकार हुआ।
हिन्दी, हिन्दुस्तान का नारा जिसमें गूँजा सदियों से ,
वो ही असली भारत वासी भरत बना है सदियों से ,
लहराता है जिसका झण्डा आसमान में खुशियाँ लेकर,
खिला उठा है चेहरा सबका ‘आनन्द’ को एतबार हुआ।
दिनांक- 28.12.2012 ग़ज़लकार-
आर. पी. आनन्द (एम. जे.)
जवाहर नवोदय विद्यालय पचपहाड़,
जिला- झालावाड़, राजस्थान ।

नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक

नव वर्ष हो हमें मुबारक



नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक,


पथ हो निर्बाध हमारा, बने न कोई उसमें बाधक।।



हर व्यक्ति का विकास करें हम, साथ-साथ सब आगे बढ़ें हम।


समाज हित में त्याग की क्षमता, परिवार हमारा, विकास करें हम।।



व्यक्ति, परिवार, समाज एक हों, विकास सभी की टेक एक हो।


मिल-जुल कर हम चलना सीखें, भले ही हमारे पथ अनेक हों।।



हो लोक हित में, तन्त्र कार्यरत, लोक-सेवक हो लोक सेवारत


अहम् हमारे मिट जायें सब, कर्तव्य पथ पर चलें कर्मरत।



आतंक का ना कहीं नाम हो, प्रेम भरी सुबह-शाम हो।


छुट्टियों की आदत हम छोड़े, प्यारा सबको काम हो।



नर-नारी ना हों प्रतिस्पर्धी, हो एक-दूसरे से हमदर्दी


साथ-साथ यदि चल न सकें तो, बने न किसी को हम बेदर्दी।



सपना मेरा नये बर्ष का, पल आयेगा कभी हर्ष का


स्टेन-गन ले चलने वाले, सुख पायेंगे, नेह स्पर्श का।



बने न सुविधा के आकांक्षी, नित राष्ट्रप्रेमी है शुभाकांक्षी


ईश नाम पर लड़ने वालो, कर्म करो, कर, ईश्वर साक्षी।



लक्ष्य भले ही ना मिल पाये, आगे नित हम बढ़ते जायें।


बाधाएँ आती हों आयें, पथ अपना हम क्यों घबरायें?



अकेलेपन से ना घबरायें, पथ में ही हम मित्र बनायें।


सबके हित में हाथ मिलायें, हाथों से ही उर मिल जायें।



भले ही हमारे हो आलोचक, हम तो राष्ट्र के हैं आराधक।


नव वर्ष हो हमें मुबारक, बन जायें हम सच्चे साधक।।


Wednesday 6 June 2012

मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ पानी है


       मुस्काओ


मैं हूँ राही अविचल चलना जिसकी रही कहानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
            जहाँ भी जाता पौध लगाता,
           कलियों से मैं फूल खिलाता।                      
           पाने की ना इच्छा करता,
           मैं हूं केवल प्रेम लुटाता।
नाटक था जो क्रोध दिखाया प्रेम ही सच्ची बानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
           कुछ पल था ठहराव हमारा,
          चाहा था हित करें तुम्हारा।
           सन्तुष्टि इससे मिलती है,
           चाह नहीं थी, पायें सहारा।
जहाँ जाओ तुम पु्ष्प बिखेरो भले राह अनजानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से, नहीं बहाओ   पानी है।।
            शक्ति सामर्थ्य शिक्षा सार,
            जीने के हैं ये    आधार।
            अपने तक ना सीमित रखना,
            करना नहीं इनका व्यापार।
शक्ति जहाँ से जैसे पाओ, व्यर्थ न कभी बहानी है।
मुस्काओ तुम, अब नयनों से नहीं बहाओ   पानी है।।

Saturday 26 May 2012

प्रबन्धन गुरू देशभक्त संन्यासी का राष्ट्र के नाम अभिप्रेरण

प्रबन्धन गुरू देशभक्त संन्यासी का राष्ट्र के नाम अभिप्रेरण




रामकृष्ण मिशन इंस्टीच्यूट ऑफ कल्चर द्वारा विवेकानन्द के 125वें जन्म वर्ष के उपलक्ष में बंगला भाषा में प्रकाशित,`सबार स्वामीजी´ का हिन्दी भावानुवाद `सबके स्वामीजी´प्रथम हिन्दी संस्करण(१९९१) के पृष्ठ 39 पर स्वामीजी का राष्ट्र के कर्णधार युवाओं के लिए सन्देश दिया गया है। स्वामीजी तत्कालीन सर्वोच्च प्रबन्धन गुरू कहे जा सकते हैं. स्वामी जी ने मानव संसाधन प्रबन्धन को कितना महत्व दिया? इसमें स्पष्ट है. स्वामी मानव संसाधन की गुणवत्ता को भी समझते व स्पष्ट करते हैं. आप सबके साथ मानव संसाधन पर स्वामीजी के अभिप्रेरण को बांटते हुए मुझे अतीव हर्ष हो रहा है। स्वामीजी का राष्ट्र के युवकों के नाम सन्देश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था, बल्कि उससे भी अधिक प्रासंगिक है क्योंकि स्वामीजी द्वारा दिखाया गया लक्ष्य दिखाई देने लगा है; हमें अब और भी अधिक द्रुत गति से उस तक पहुंचना है किन्तु धैर्य व सहनशीलता के साथ। आज प्रबन्धन में हम जिस समर्पण व अभिप्रेरण की मांग करते है, वह स्वामी जी के इस अभिप्रेरण में सम्मिलित है.

स्वामीजी ने युवाओं को सन्देश दिया है, ``देशभक्त बनो - उस जाति से प्रेम करो जिस जाति ने अतीत में हमारे लिए इतने बड़े-बड़े काम किए हैं।

हे ! वीर-हृदय युवक-वृन्द...... और किसी बात की आवश्यकता नहीं, आवश्यकता है केवल प्रेम, सरलता और धैर्य की। जीवन का अर्थ है विस्तार( विस्तार और प्रेम एक ही है। इसलिए प्रेम ही जीवन है, पे्रम ही जीवन का एकमात्र गति निर्धारक है। स्वार्थपरता ही मृत्यु है, जीवन रहते हुए भी यह मौत है, देहावसान में भी यही स्वार्थपरता मृत्यु स्वरूप मृत्यु है...........जितने नर पशु तुम देखते हो, उसमें नब्बे प्रतिशत हैं मृत, प्रेत तुल्य क्योंकि हे युवक वृन्द! जिसके हृदय में प्रेम नहीं वह मृत के अलावा और क्या हो सकता हैर्षोर्षो हे युवकगण! तुम दरिद्र, मूर्ख एवं पददलित मनुश्य की पीढ़ा को अपने हृदय में अनुभव करो, उस अनुभव की वेदना से तुम्हारे हृदय की धड़कन रुक जाये, सिर चकराने लगे और पागल होने लगो, तब जाकर ईश्वर चरणों में अन्तर की वेदना बताओ। तब ही तुम्हें उनसे ‘ाक्ति व सहायता मिलेगी- अदम्य उत्साह, अनन्त ‘ाक्ति मिलेगी। मेरा मूल मन्त्र था- आगे बढ़ो! अब भी यही कह रहा हूं- बढ़े चलो! तब चारों और अन्धकार ही अन्धकार था, अन्धकार के सिवा कुछ नहीं देख पाता था, तब भी कहा था- आगे बढ़ो। अब जब थोड़ा-थोड़ा उजाला दिखाई पड़ रहा है, तब भी कह रहा हूं - आगे बढ़ो! डरो मत मेरे बच्चो! अनन्त नक्षत्र खचित आकाश की ओर भयभत दृिश्ट से मत देखो, जैसे कि वह तुम्हें कुचल डालेगा। धीरज धरो, देखोगे- कुछ ही समय के बाद सब कुछ तुम्हारे पैरों तले आ गया है। न धन से काम होता है, न नाम यश से काम होता है, विद्या से भी नहीं होता, प्रेम से ही सब कुछ होता है - चरित्र ही बाधा विघ्न की वज्र कठोर दीवारों के बीच से रास्ता बना सकता है।

महान बनने के लिए किसी भी जाति या व्यक्ति में तीन वस्तुओं की आवश्यकता है- `सदाचार की ‘ाक्ति में विश्वास, ईश्र्या और सन्देह का परित्याग एवं जो सदाचारी बनने या अच्छा कार्य करने की कोशिश करता है उनकी सहायता करना।´

कार्य की सामान्य ‘ाुरूआत देखकर घबराओ मत, कार्य सामान्य से ही महान होता है। साहस रखो , सेवा करो, नेता बनने की कोशिश मत करो। नेता बनने की पाशविक प्रवृत्ति ने जीवन रूपी समुद्र में अनेक बड़े-बड़े जहाजो को डुबो दिया है। इस विशय में सावधान रहो, अर्थात मृत्यु को भी तुच्छ मानकर नि:स्वार्थी बनो और काम करते रहो।

हे वीर-हृदय युवको! यह विश्वास करो कि तुम्हारा जन्म बड़े-बड़े काम करने के लिए हुआ है। कुत्तों के भोंकने से न डरो- यहां तक कि आसमान से वज्रपात होने से भी न घबराना, `उठकर खड़े हो जाओ और काम करो।

विश्व के इतिहास में क्या कभी ऐसा देखा गया है कि धनवानों द्वारा कोई महान कार्य सिद्ध हुआ होर्षोर्षो हृदय और दिमाग से ही हमेशा सब बड़े काम किए जाते हैं-धन से नहीं। रुपय-पैसे सब अपने आप आते रहेंगे। आवश्यकता है मनुश्यों की धन की नहीं। मनुश्य सब कुछ करता है, रुपया क्या कर सकता हैर्षोर्षो मनुश्य चाहिए- जितने मिलें, उतना ही अच्छा है।

संसार की समस्त सम्पदाओं से मनुश्य अधिक मूल्यवान है। हे वीर-हृदय बालकगण, आगे बढ़ो! धन रहे या न रहे, लोगों की सहायता मिले या न मिले, तुम्हारे पास तो प्रेम हे नर्षोर्षो भगवान तो तुम्हारा सहारा है नर्षोर्षो आगे बढ़ो, कोई तुम्हारी गति रोक नहीं पायेगा। लोग चाहे कुछ भी क्यों न सोचें( तुम कभी अपनी पवित्रता, नैतिकता तथा भगवत् प्रेम का आदशZ छोटा न करना...... जिसे ईश्वर से प्रेम है उसके लिए ‘ाठता से घबराने का कोई कारण नहीं है, पवित्रता ही पृथ्वी और स्वर्ग में सबसे महत् दिव्य ‘ाक्ति है।

गणमान्य, उच्च पदस्थ और धनवानों पर कोई भरोसा न रखो। उनके अन्दर कोई जीवन ‘ाक्ति नहीं है- एक तरह से उनको मृतकल्प कहा जा सकता है। भरोसा तुम्हारे ऊपर ही है - जो पद मर्यादाविहीन गरीब किन्तु विश्वास परायण है........ हमें धनी और बड़े लोगों की परवाह नहीं। हम लोग हृदयहीन कोरे बुद्धिवादी व्यक्तियों और उनके निस्तेज समाचार पत्र के प्रबन्धों की परवाह नहीं करते। विश्वास-विश्वास, सहानुभूति, अग्निमय विश्वास, ज्वलन्त सहानुभूति चाहिए। जय प्रभु! जय प्रभु! जीवन तुच्छ है, तुच्छ है मरण, भूख तुच्छ है, तुच्छ है ‘ाीत भी। प्रभु की जय हो। आगे बढ़ो, बढ़ते चलो, हम ऐसे ही आगे बढ़ेंगे - एक गिरेगा तो दूसरा उसका स्थान लेगा।

ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि मेरे अन्दर जो आग जल रही है, वह तुम्हारे अन्दर भी जल उठे। तुम्हारे मन और मुख एक हों, तुम लोग अत्यन्त निश्कपट बनो, तुम लोग संसार के रण क्षेत्र में वीर गति को प्राप्त करो- विवेकानन्द की यही निरन्तर प्रार्थना है।






बीकानेर से एक पत्र प्राप्त हुआ है, जो श्री किशार  दास गांधी जी ने लिखा है। उसमें कुछ पीड़ाएं थी तो कुछ आशाएं भी उनके लिये लिखे गए प्रत्युत्तर को यहाँ सार्वजनिक कर रहा हूँ-                    

                                                                                                    26.05.2012


आदरणीय गांधीजी,
                 सादर प्रणाम।
आपका स्नेह आपूरित पत्र व दो पुस्तकें- 1. नारी को अधिकार दो, 2. दिव्य जीवन की ओर, प्राप्त हुईं। बहुत-बहुत धन्यवाद। आभार!
    कल ही माता-पिता के दर्शनों  व बेटे को अपने पास लाने की आकांक्षा से घर के लिए निकलना है। अत: पत्र तुरंत लिखने लग गया, अन्यथा पत्रोत्तर में देरी हो सकती थी।
    आपने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी पीड़ा व्यक्त की है। यह सही है कि  भ्रष्टाचार  की मात्रा बढ़ी है, किंतु विरोध भी बढ़ा है। ईमानदारी के लिए बलिदान भी दिए जा रहे है- मंजुनाथ, सतेन्द्र व नरेन्द्र सिंह आदि शहीदों के नाम मीडिया में आये हैं। पिछले माह एक अध्यापक को कार के नीचे कुचलकर इसलिए मार डाला कि वह परीक्षाओं में नकल कराने के लिए तैयार नहीं था।
     इन उदाहरणों से असत्य व दुराचरण की प्रवृत्ति तो उजागर होती ही है। एक यह पहलू भी उजागर होता है कि ईमानदारी पूर्वक अपने कर्तव्य को अंजाम देने वाले कम भले ही हों, हैं अवश्य। गांधी, गोखले जैसे लोग भी हैं किंतु अब देश परतंत्र नहीं है। अत: लोगों की प्रवृत्ति भौतिकवाद की ओर है। सुख-सुविधाओं और प्रदर्शन की भावनाओं के कारण कृत्रिम जीवन जी रहे हैं। इतिहास साक्षी है, सत्य, ईमानदारी और सदाचरण की राह पर पुष्प नहीं कांटे ही मिलते हैं, मिलेंगे भी।
     मार्च 2010 में सरकारी भण्डार से अपने अधिकारी के यहाँ राशन जाता हुआ, पकड़ने और रोकने पर, असत्य आरोप लगाकर मुझे ही निलंबित करवा दिया गया था। उसके बाद ही यहाँ आना हुआ था। किन्तु कर्तव्य का निर्वाह करना है- राजस्थान हो , हरियाणा हो या अरूणाचल।
     हम सत्य, ईमानदारी और न्याय के पाले में खेल रहे हैं। हमें पता है कि विजयमाला हमारे गले में नहीं, फिर भी हम चुनौती अवश्य बने रहेंगे, हारेंगे नहीं और नष्ट भी नहीं होंगे क्योंकि राक्षसी प्रवृत्तियाँ कितनी भी प्रबल हों, सद-प्रवृत्तियों को मिटा नहीं सकतीं।

         यहां पर मेरी एक कविता जो निम्न लिंक पर मिलेगी उपयुक्त रहेगी-